Friday, 10 August 2018

सोशलिस्ट पार्टी का 'शिक्षा और रोजगार दो वर्ना गद्दी छोड़ दो' अभियान पूरे देश में जारी रहेगा

10 अगस्त 2018
प्रेस रिलीज

सोशलिस्ट पार्टी का 'शिक्षा और रोजगार दो वर्ना गद्दी छोड़ दो' अभियान पूरे देश में जारी रहेगा

भारत छोड़ो आंदोलन की 76वीं सालगिरह 9 अगस्त के मौके पर सोशलिस्ट पार्टी ने 'शिक्षा और रोजगार दो वरना गद्दी छोड़ दोरैली निकाली। ये रैली मंडी हाउस से संसद मार्ग तक निकाली गई। इस रैली में विभिन्न राज्यों से आये सोशलिस्ट पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने बड़ी संख्या में हिस्सा लिया। रैली में सोशलिस्ट युवजन सभा (एसवाईएस) के युवा सदस्य, सहमना संगठनों के नेता, एक्टिविस्ट, कलाकार और बुद्धिजीवी शामिल हुए। रैली में दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जामिया विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं और शहर के युवाओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। रैली का नेतृत्व सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ प्रेम सिंह ने किया। वरिष्ठ समाजवादी नेता पन्नालाल सुराणा ने मंडी हाऊस से रैली को झंडी दिखाकर रवाना किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि मौजूदा नरेन्द्र मोदी सरकार संवैधानिक निर्देशों और दायित्व को त्याग कर शिक्षा को पूंजीपतियों के मुनाफे का जरिया बना रही है। प्रधानमंत्री रोजगार के बारे में अपने चुनावी वादे को निभाने में नाकामयाब रहे हैं। नवउदारवादी नीतिया जब तक रहेंगी, सभी बच्चों और युवाओं को शिक्षा और रोजगार नहीं मिल सकता। उन्होंने आह्वान किया कि शिक्षा और रोजगार देने में पूरी तरह विफल रही इस सरकार को देश के युवाओं को उखाड़ फेंकना चाहिए ।


मंडी हाउस पर जमा हुए युवाओं को रैली का मकसद समझते हुए डॉ. प्रेम सिंह ने कहा कि सभो समान, गुणवत्तायुक्त और मुफ्त शिक्षा देना सरकारों का संवैधानिक दायित्व है। सरकार की पूंजीपति परस्त नीतियों के चलते केवल मुट्ठी भर अमीर घरों के बच्चे और युवक-युवतियां अच्छी और मन-मुताबिक शिक्षा पा सकते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि रोजगार के मामले में प्रधानमंत्री युवाओं का मज़ाक उड़ा रहे हैं। वे जनता की मेहनत की कमाई का अरबों रुपया अपने चुनाव पर खर्च कर चुके हैं। अरबों रुपया अपने विज्ञापन और विदेश यात्राओं पर खर्च कर रहे हैं। धन्नासेठों का दिया लाखों रूपये का सूट पहनते हैं। देश की दौलत अपने चहेते उद्योगपतियों पर लुटा रहे हैं। लेकिन शिक्षित बेरोजगार युवाओं से पकोड़े बेचने और स्मार्ट इंडिया के तहत चलने वाले निर्माण कार्यों में मज़दूरी करने को कहते हैं। प्रधानमंत्री ने प्राइवेट कंपनियों अधिकारियों को भारतीय सिविल सेवा के पदों पर बिठाने का फैसला कर लिया है। आगे वे राज्य सेवाओं में भी वे ऐसा कर सकते हैं। सोचना युवाओं को है कि इस सरकार को चलने देना है या उखाड़ फेंकना है? रैली में मौजूद युवाओं ने कहा कि शिक्षा उर रोजगार नहीं देने वाली सरकार को उखड फेंकेंगे।

मंडी हाउस से संसद मार्ग तक रैली में 'शिक्षा और रोजगार दो वरना गद्दी छोड़ दो' नारे के साथ अगस्त क्रांति के शहीदों की याद में लगाये गए नारे गूंजते रहे। संसद मार्ग पर रैली जनसभा में बदल गई।

जनसभा को पार्टी की महासचिव मंजू मोहन और राजशेखरन नायरउपाध्यक्ष रामबाबू अग्रवालपूर्व उपाध्यक्ष संदीप पांडे, प्रवक्ता डॉ. अभिजीत वैद्य, कोषाध्यक्ष जयंती पांचाल, सचिव फैजल खानराष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य श्याम गंभीरडॉ. अश्विनी कुमारराष्ट्रीय कार्यकारिणी के विशेष आमंत्रित सदस्य सुरेंद्र कुमार, सोशलिस्ट युवजन सभा (एसवाईएस) के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीरजमहासचिव बंदना पांडे, सोशलिस्ट पार्टी के तमिलनाडु राज्य के अध्यक्ष इलम सिंघमगुजरात के अध्यक्ष कौशर अलीतेलंगाना की महासचिव डॉ. लुबना सर्वथकेरल के अध्यक्ष ईके श्रीनिवासन, मध्य प्रदेश के अध्यक्ष रामस्वरूप मंत्री, पंजाब के अध्यक्ष हरेंद्र सिंह मानसाइयादिल्ली के अध्यक्ष तहसीन अहमद. महासचिव योगेश पासवान, सचिव शाहबाज़ मलिक सहित कई पार्टी नेताओं ने संबोधित किया। सीपीआईएमएल (न्यू प्रोलितेरियन) के अध्यक्ष डॉ. शिवमंगल सिद्धांतकार, वरिष्ठ पत्रकार अरुण त्रिपाठीडूटा के पूर्व उपाध्यक्ष और पूर्व विधायक डॉ. हरीश खन्ना, दिल्ली विश्वविद्यालय अकादमिक परिषद् के सदस्य डॉ. शशि शेखर सिंह, वरिष्ठ समाजवादी डॉ. भगवान सिंह, खुदाई खिदमतगार के सदस्य कृपाल सिंह मंडलोई ने जनसभा को संबोधित किया। इस मौके पर ज़बिउल्लाह और भारती वर्मा ने कविता-पाठ किया।


जनसभा के अंत में डॉ. प्रेम सिंह ने घोषणा की कि सोशलिस्ट पार्टी की सभी राज्य इकाइयाँ 'शिक्षा और रोजगार दो वरना गद्दी छोड़ दो' अभियान जारी रखेंगी।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. हिरण्य हिमकर ने किया और राजेश कुमार मिश्रा ने रैली में हिस्सा लेने वाले सभी साथियों का धन्यवाद ज्ञापन किया।

मंजू मोहन
महासचिव,
सोशलिस्ट
पार्टी(इंडिया)

Tuesday, 7 August 2018

भारत छोड़ो आंदोलन की 76वीं सालगिरह के मौके पर 'शिक्षा और रोजगार दो वर्ना गद्दी छोड़ दो' रैली


7 अगस्त 2018
प्रेस विज्ञप्ति   

भारत छोड़ो आंदोलन की 76वीं सालगिरह के मौके पर
'शिक्षा और रोजगार दो वर्ना गद्दी छोड़ दो' रैली
9 अगस्त 2018  
रैली सुबह 12 बजे मंडी हाउस से चल कर संसद मार्ग पहुंचेगी
संसद मार्ग पर जनसभा होगी
             


       9 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन/अगस्त क्रांति की शुरुआत हुई. गांधीजी के 'करो या मरो' के आह्वान पर भारत की 20 प्रतिशत जनता ने इस आंदोलन में सक्रिय हिस्सेदारी की. ब्रिटिश हुकूमत ने करीब 50 हज़ार देशभक्तों को मारा. भारत के क्रन्तिकारी आंदोलन की धारा भारत छोड़ो आंदोलन में समाहित हो गई और यह साम्राज्यवादी गुलामी के खिलाफ निर्णायक संघर्ष साबित हुआ. भारत की आज़ादी के प्रवेशद्वार इस आंदोलन का नेतृत्व समाजवादी नेताओं ने किया. 'भारत छोड़ो' नारे  की रचना युसुफ मेहर अली ने की थी.   
       डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने कहा कि 9 अगस्त भारतीय जनता का दिन है और 15 अगस्त भारतीय राज्य का दिन है. उनका मानना था कि 9 अगस्त निहत्थी जनता के संघर्ष के इतिहास का पहला दिन है. उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन की 25वीं सालगिरह (9 अगस्त 1967) पर इच्छा ज़ाहिर की थी कि भारत छोड़ो आंदोलन की 50वीं सालगिरह इतने विशाल पैमाने पर मनाई जाये कि 26 जनवरी का गणतंत्र दिवस भी फीका पड़ जाए. आप जानते हैं 50वीं सालगिरह 9 अगस्त 1992 को पड़ी. यह वह समय था जब संविधान की मूल संकल्पना के बरखिलाफ देश में नवसाम्राज्यवाद का दरवाजा खोलने वाली नई आर्थिक नीतियां 1991 में लागू की जा चुकी थीं. इसी के साथ 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद को ढहा दिया गया था. ज़ाहिर है, अगस्त क्रांति की 50वीं सालगिरह को भारतीय जनता के दिन के रूप में याद नहीं किया गया.
       तब से अब तक - डंकल प्रस्तावों से लेकर रक्षा क्षेत्र में 100 विदेशी निवेश के फैसले तक - शासक जमातें देश के संविधान को दरकिनार करती गई हैं. नीति-निर्धारण का काम विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोश, विश्व व्यापार संगठन, विश्व आर्थिक मंच जैसी नवउदारवाद की पुरोधा वैश्विक संस्थानों के आदेश पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बड़े कार्पोरेट घरानों के हित में कर रही हैं.        
      
9 अगस्त 2018 को भारत छोड़ो आंदोलन की 76वीं सालगिरह है. सोशलिस्ट पार्टी ने इस मौके पर 'शिक्षा और रोजगार दो वर्ना गद्दी छोड़ दो' रैली का आयोजन किया है. यह युवा ललकार रैली पार्टी के अध्यक्ष डॉ. प्रेम सिंह के नेतृत्व में निकाली जाएगी. वरिष्ठ समाजवादी नेता पन्नाला सुराणा मंडी हाउस से रैली को रवाना करेंगे. रैली का मकसद देशवासियों तक यह सन्देश पहुँचाना है कि सरकार द्वारा शिक्षा और रोजगार के लिए नीति-निर्धारण का काम संविधान में उल्लिखित 'नीति-निर्देशक तत्वों' के आधार पर हो, न कि नवउदारवादी नीतियों के तहत. की पुरोधा उपरोक्त संस्थाओं के आदेश पर. संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक भारत के निर्माण का संकल्प तभी पूरा हो सकता है. सोशलिस्ट पार्टी सभी देशवासियों, विशेष तौर पर युवाओं से आगामी 9 अगस्त को ज्यादा से ज्यादा तादाद में दिल्ली के मंडी हाउस और संसद मार्ग पहुँचने की अपील करती है. आइये, इस संविधान विरोधी सरकार को सत्ता से उखाड़ फेंकें.

सोशलिस्ट पार्टी का नारा समता और भाईचारा

डॉ. प्रेम सिंह
अध्यक्ष


Wednesday, 1 August 2018

National Register of Citizens in Assam: Need for Responsibility, Caution and Restraint

1 August 2018
Press Release


The problem of presence of illegal Bangladeshi nationals in Assam is quite complex and old. When the students movement against the Bangladeshi infiltration in Assam held in the eighties, they were supported by socialists and Gandhians of the country. Then that movement was secular and its emphasis was on Assamese citizens identity. Although there was opposition to Bangla-speaking population, but people of all sections of Assamese society took part in the movement. The then Prime Minister Indira Gandhi tried to give it a communal color. When she went to address a rally in the Brahmaputra Valley, a slogan 'hath men bidi muhn men paan, asam banega pakistan' (having bidi in hand and betel leaf in mouth Assam will become Pakistan) was raised. That was a vote bank of the Congress. The intrusion continued due to lose security arrangements on  Bangladesh border. Meanwhile the Nelly massacre of women and children of minority community highlighted the communal and gruesome face of that movement. After her, Rajiv Gandhi became prime minister and signed the Assam Accord in 1985. The concept of National Register of Citizens (NRC) in Assam is the result of that process. According to this, those whose names are not registered in the NCR, will not be considered as citizens of India. It was decided to identify foreign nationals and exclude them from the NCR. But due to lack of political will and no such agreement with Bangladesh, that work could not be done.

The NRC issued on Monday by the present government excludes names of over 40 lakh people. If their families are added then this number will be more than one crore. It is being said that most of the 4 million people out of the National Citizen Register are Indian citizens. These include both Hindus and Muslims. Putting such a large number of people in one state of insecurity shows that the duty to prepare the NRC has not been fulfilled properly. It seems that the government was quick to issue a NRC for electoral gains rather than a proper solution to the problem. This essential work of national interest should have been done in a non-political manner. But the Bharatiya Janata Party (BJP) leadership did not act maturity.

The BJP president Amit Shah is presenting the publication of the National Citizen Register as a bravery. The BJP in-charge of West Bengal, Kailash Vijayvargiya has   given a statement in the style of attack on West Bengal after Assam. Amit Shah has made an unsubstantiated statement to link the whole issue with national security even in the Parliament. With this kind of irresponsible statements of BJP leaders, the initial balanced statement given by Home Minister Rajnath Singh on this issue has become meaningless. The ruling party and its president should understand that the threat to national security rather lies in their intention of making communal polarization across the country in the name of the National Register of Citizens in Assam. In fact, the BJP had an eye on this long-standing and complex problem. After getting power at the center and the state, it has used the Office of the Registrar General of India and the Census Commissioner in such a way that it can play politics of communal polarization for a long time to come. The BJP's immediate target on the path of communal polarization is the Lok Sabha elections 2019. The BJP has lost mid-term elections due to the unity of opposition parties in the Hindi region. Therefore it wants to compensate the loss from the Northeast and West Bengal.

Although the work of identifying genuine citizens is being supervised by the Supreme Court, and the court has stated that this list is not final and no action should be taken on its basis. The Election Commission has also said that the National Register of Citizens will not disrupt voter rights of the people. But how can the court prevent the politics on this sensitive issue? While Chief of Army Staff General Vipin Rawat has also intervened there by giving a political statement. In view of the Socialist Party that it is the responsibility of the leadership of all the parties, including the ruling party. The Socialist Party urges the country's political leadership to ensure that instead of doing vote politics on this sensitive issue, make sure that no single Indian citizen is left out of the National Register of Citizens. Whether it belongs to any religion, caste and state. While preparing the National Register of Citizens, it was the responsibility of the citizens themselves to prove that they are citizens of India, while the United Nations puts the responsibility on the state too. Secondly, the leadership should decide the fate of Bangladeshi citizens living illegally, whether they are Hindus or Muslims, in the light of the Indian Citizenship laws and the provisions of the United Nations (UNO).

The Socialist Party believes that India has the right to recognize the people who have entered the country illegally. If possible, send them back to their country, if not possible, then consider granting them permits or giving citizenship. The provisions made in the Indian Citizenship Amendment Bill, 2014 only allowed to give citizenship to non-Muslims, but not to Muslims. India is a member of the United Nations. The goal of the United Nations is to eliminate the statelessness of citizens from the world by 2014. If such a large number of people will be made stateless then this will create an international problem. The excluded population is 10 percent of Assam state. Therefore, those who claim to be 'Vishwguru' and who chant the mantra of 'Vasudhaiva Kutumbakam', instead of considering it from a communal perspective, should think in a sensitive human way. Opinion of all the political parties should be considered and the Supreme Court should make decisions according to the Constitution and United Nations Charter in order to solve the problem.

Dr. Prem Singh
President

असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर : जिम्मेदारी, सावधानी और संयम की जरूरत

1 अगस्त 2018
प्रेस रिलीज़


असम में अवैध रूप से रहने वाले बंग्लादेशी नागरिकों की मौजूदगी की समस्या काफी जटिल और पुरानी है. असम में बांग्लादेशी घुसपैठ के विरुद्ध अस्सी के दशक में जब वहां के छात्रों ने आंदोलन किया था तो उनका समर्थन पूरे देश के समाजवादियों और गांधीवादियों ने किया था। तब वह आंदोलन धर्मनिरपेक्ष था और उसका जोर असमिया नागरिकों की अस्मिता बचाने पर था। हालांकि उसमें बांग्लाभाषियों का विरोध था, लेकिन आंदोलन में असमिया समाज के सभी तबके के लोगों ने हिस्सा लिया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उसे सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की और जब वे ब्रह्मपुत्र घाटी में एक रैली में गईं तो वहां नारा भी लगा था कि 'हाथ में बीड़ी मुहं में पान असम बनेगा पाकिस्तान'। वह सब कांग्रेस का वोट बैंक था. बांग्लादेश से लगी सीमा पर ढीली-ढाली सुरक्षा व्यवस्था होने के कारण घुसपैठ जारी रही। इस बीच नेल्ली नरसंहार ने उस आंदोलन का सांप्रदायिक और वीभत्स रूप भी उजागर किया। उस नरसंहार में अल्पसंख्यक समुदाय के औरतों-बच्चों को काट डाला गया था। उनके बाद प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी ने 1985 में असम समझौता किया. असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की परिकल्पना उसी प्रक्रिया का परिणाम है. इसके मुताबिक जिनके नाम राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर में नहीं दर्ज होंगे, उन्हें भारत का नागरिक नहीं माना जायेगा. इसमें विदेशी नागरिकों की पहचान करके उन्हें बाहर करने का निर्णय लिया गया। लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव और बांग्लादेश से इस तरह का कोई समझौता न होने के कारण वह काम हो नहीं पाया।

मौजूदा सरकार ने सोमवार को जो राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर जारी किया है, उसमें 40 लाख से ऊपर लोगों के नाम नहीं हैं. उनके परिवारों को जोड़ा जाए तो यह संख्या एक करोड़ से ज्यादा होगी. ऐसा बताया जा रहा है कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर से बाहर किये गए 40 लाख लोगों में से ज्यादातर भारतीय नागरिक हैं. इनमें हिंदू और मुसलमान दोनों शामिल हैं. एक राज्य में इतनी बड़ी संख्या में लोगों को असुरक्षा की स्थिति में डाल देना बताता है कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर तैयार करने में कर्तव्य का सही तरह से निर्वाह नहीं किया गया है. ऐसा लगता है कि सरकार को समस्या के समुचित समाधान के बजाय चुनावी फायदे के लिए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर जारी करने की जल्दी थी. इस आवश्यक कार्य को गैर-राजनीतिक तरीके से किया जाना चाहिए था. लेकिन भाजपा नेतृत्व ने वैसी परिपक्वता का प्रमाण नहीं दिया.

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अध्यक्ष अमित शाह राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के प्रकाशन को पराक्रम की तरह पेश कर रहे हैं. पश्चिम बंगाल के भाजपा प्रभारी कैलाश विजयबर्गीय असम के बाद पस्श्चिम बंगाल पर धावा बोलने की शैली में बयान दे रहे हैं. अमित शाह ने पूरे मसले को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ने की बेजा बयानबाजी संसद में की है. भाजपा नेताओं की इस तरह की गैर-जिम्मेदाराना बयानबाज़ी से इस मुद्दे पर गृहमंत्री राजनाथ सिंह द्वारा दिया गया शुरूआती संतुलित बयान निरर्थक हो गया है. सत्तारूढ़ पार्टी और उसके अध्यक्ष को समझना चाहिए कि  राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के नाम पर पूरे देश में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने की उनकी मंशा से है. दरअसल, देश की इस पुरानी और जटिल समस्या पर भाजपा की निगाह लंबे समय से थी. केंद्र और राज्य में सत्ता में बैठने के बाद उसने रजिस्ट्रार जनरल आफ इंडिया और जनगणना आयुक्त के कार्यालय का इस्तेमाल कर उसे ऐसा रूप दिया है कि उस पर लंबे समय तक साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति की जा सके. साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के रास्ते पर भाजपा का तात्कालिक लक्ष्य 2019 के लोकसभा चुनाव हैं. हिंदी क्षेत्र में विपक्षी दलों की एकजुटता से भाजपा मध्यावधि चुनाव हार चुकी है. उसकी भरपाई वह पूर्वोत्तर और पश्चिम बंगाल से करना चाहती है.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में होने वाले नागरिकों के पहचान के इस कार्यक्रम में न्यायालय ने हस्तक्षेप करते हुए यह जरूर कहा है कि यह सूची अंतिम नहीं है बल्कि एक मसविदा है और इसके आधार पर कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। चुनाव आयोग ने भी कहा है कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर लोगों के मतदाता अधिकार को बाधित नहीं करेगा. लेकिन इस संवेदनशील मुद्दे पर जो राजनीति की जा रही है उसे न्यायालय कैसे रोक सकता है? जबकि सेनाध्यक्ष जनरल विपिन रावत भी राजनीतिक बयान देकर वहां हस्तक्षेप कर चुके हैं। यह सत्तारूढ़ पार्टी सहित सभी पार्टियों के नेतृत्व की जिम्मेदारी है. सोशलिस्ट पार्टी देश के राजनैतिक नेतृत्व से अपील करती है कि इस संवेदनशील मुद्दे पर वोट की राजनीति करने के बजाय मिल कर सुनिश्चित करें कि एक भी भारतीय नागरिक राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर से बाहर नहीं रहे. चाहे वह किसी भी प्रदेश का रहने वाला हो. राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर तैयार करते वक्त यह जिम्मा स्वयं नागरिकों का था कि वे साबित करें कि भारत के नागरिक हैं, जबकि संयुक्त राष्ट्र यह जिम्मेदारी राज्य पर भी डालता है। दूसरे, अवैध रूप से रहने वाले बंग्लादेशी नागरिकों, चाहे वे हिंदू हैं या मुस्लमान, पर भारतीय नागरिकता कानून और संयुक्त राष्ट्र (यूएनओ) के प्रावधानों की रोशनी में कार्रवाई करें.

सोशलिस्ट पार्टी का मानना है कि भारत को पूरा हक है कि वह अवैध तरीके से घुस आए लोगों की पहचान करे. अगर संभव है तो उन्हें उनके देश वापस भेजे, अगर नहीं संभव है तो उन्हें परमिट देने या नागरिकता देने पर विचार करे। इस बारे में नागरिकता संशोधन विधेयक 2014 में गैर-मुस्लिमों को नागरिकता देने की व्यवस्था तो है, लेकिन मुस्लिमों के लिए नहीं है। भारत संयुक्त राष्ट्र का सदस्य है. संयुक्त राष्ट्र का उद्देश्य 2024 तक दुनिया से नागरिकों की राज्यविहीनता समाप्त करना है। अगर इतनी बड़ी संख्या में लोगों को राज्यविहीन किया जाएगा तो इससे एक अंतरराष्ट्रीय समस्या पैदा होगी। 'विश्वगुरु' और 'वसुधैव कुटुंबकम' का दावा करने वाले भारत को इस समस्या पर सांप्रदायिक नजरिए से नहीं, संवेदनशील मानवीय नज़रिए से विचार करना चाहिए। इसमें सभी दलों की राय लेनी चाहिए, सुप्रीम कोर्ट को संविधान और संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अनुरूप निर्णय देना  चाहिए।  


डॉ. प्रेम सिंह
अध्यक्ष

Tuesday, 31 July 2018

दिल्ली में भूखी बच्चियों की मौत : कौन जिम्मेदार?


  
                
प्रेम सिंह

डॉ. प्रेम सिंह, सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के अध्यक्ष हैं |
देश की राजधानी दिल्ली के मंडावली इलाके में तीन बच्चियों (मानसी 8 साल, शिखा 4 साल, पारो 2 साल) की एक साथ मौत चर्चा, अफसोस, जांच और राजनैतिक पार्टियों/नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप का विषय बनी हुई है. तीनों बहनें थीं. उनकी मां बीना के बारे में पता चला कि वह मानसिक रोग से  पीड़ित है, जिसे बच्चियों की मौत के बाद अस्पताल में भरती कराया गया है. बच्चियों की मौत के एवज़ में उसे दिल्ली सरकार की ओर से कुछ नक़द धनराशि भी दी गई है. बच्चियों का पिता मंगल सिंह शराबी बताया गया है. संभ्रांत समाज मज़दूरों के इस दुर्गुण पर सहज ही विश्वास कर उनकी बुरी आर्थिक हालत के लिए जिम्मेदार मान लेता है. हालांकि मंगल सिंह के पुराने जानने वालों के मुताबिक वह मेहनती और निपुण कुक है. पहले एक कैटरिंग सर्विस में नौकरी और बाद में अपनी परांठा और चाय की दुकान में वह अच्छा खाता-कमाता था. उसके साझीदार ने धोखा किया और घाटे के कारण उसे अपनी दुकान बंद करनी पड़ी. नई जगह पर उसने फिर से दुकान ज़माने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली. उसके जानकार बताते हैं कि दो-अढ़ाई साल से वह काफी शराब पीने लगा था. उसने रिक्शा चलाना शुरू किया, जिसे किन्हीं लोगो ने छीन या चुरा लिया. बेटियों की मौत के बावजूद वह अभी तक लापता है.

पोस्टमार्टम की रपट में आया है कि तीनों बच्चियां कुपोषण और भूख से मरी हैं. दोबारा अंत्यपरीक्षण करने पर भी वही परिणाम आया. डाक्टरों ने बताया है कि तीनों बच्चियों के पेट में आठ दिन से निवाला नहीं गया था और शरीर पर वसा (फैट) का नामोनिशां नहीं था. डाक्टरों के मुताबिक 'बच्चियों की मौत भयावह और दर्दनाक है'. बच्चियों के हिस्से का निवाला छीनने वाले कौन हैं? और उनके जीवन के लिए जरूरी चर्बी किन लोगों के शरीरों पर चढ़ी हुई है? - यह बताना डाक्टरों का काम नहीं है. उनकी मौत पर चर्चा, अफसोस, जांच और आरोप-प्रत्यारोप में लगे महानुभावों का यह काम है. उनसे कुछ छुपा नहीं है. लेकिन वे इधर-उधर की सारी बातें करेंगे - मसलन, तीनों एक साथ कैसे मर सकती हैं? चौबीस घंटे पहले खाना खाया था तो भूख से कैसे मर सकती हैं? उपराज्यपाल राशन नहीं रोकते तो क्या बच्चियां मरतीं? पिता ने जो दवा पानी में मिला कर दी थी, मौत उसका परिणाम तो नहीं है? यानी शराबी पिता बच्चियों को मार कर फरार तो नहीं हो गया है ...? - लेकिन सच्चाई नहीं बताएंगे.

यह इलाका दिल्ली के उपमुख्यमंत्री, जिनके पास महिला एवं बाल विकास मंत्रालय भी है, का क्षेत्र है. इस मायने में नहीं कि उन्होंने यहां लम्बे अरसे तक कोई राजनीतिक या सामाजिक काम किया था. वे यहां से पिछली बार विधायक का चुनाव जीते थे. अपने चुनाव क्षेत्र में हुई तीन बच्चियों की मौत को उन्होंने व्यवस्था की असफलता बताया है. उनके मुताबिक गरीबों के लिए योजनाओं की कमी नहीं है, उन बच्चियों तक योजनाओं का फायदा नहीं पहुंच पाया. क्यों नहीं पहुंच पाया, व्यवस्था की इस असफलता की जांच कराने का आदेश उन्होंने दिया है. उपमुख्यमंत्री, मुख्यमंत्री, उनकी सरकार या उनके समर्थक यह कदापि स्वीकार नहीं करेंगे कि बच्चियों की मौत व्यवस्था की असफलता का नतीज़ा नहीं, सीधे गलत व्यवस्था का नतीज़ा है; कि यह नवउदारवादी व्यवस्था ही गलत है, जिसे भारत का राजनीतिक और बुद्धिजीवी वर्ग पिछले तीन दशकों से चला रहा है. सभी को पता है बड़े कारपोरेट घरानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित में चलाई जा रही नवउदारवादी व्यवस्था संवैधानिक कसौटी पर अवैध ठहरती है. लेकिन कारपोरेट घरानों के हित-साधन में इस व्यवस्था को चलाने और चलाने वालों का समर्थन कर ने वालों का हित बखूबी सध जाता है.

यह अकारण नहीं है कि देश की 73 प्रतिशत दौलत एक प्रतिशत लोगों के पास इकठ्ठा हो गई है. इन एक प्रतिशत लोगों को सरकारों, उन्हें चलाने वाली राजनीतिक पार्टियों और बुद्धिजीवियों का तिहरा सुरक्षा घेरा प्राप्त है. वे चाहें तो देश में रह कर मेहनतकश जनता और उनके बच्चों का खून चूस सकते हैं, चाहें तो विदेश भाग जा सकते है. यह तिहरा घेरा देश-परदेश दोनों जगह उनकी सुरक्षा की गारंटी करता है. खुद प्रधानमंत्री उनके बचाव में कहते हैं कि वे 'चोर-लुटेरे नहीं हैं'. प्रधानमंत्री के कथन का निहितार्थ है कि नवउदारवाद के नाम पर देश के समस्त संसाधनों और श्रम, शिक्षा से लेकर रक्षा तक को कारपोरेट घरानों को बेचने वाला राजनीतिक और बुद्धिजीवी वर्ग भी कोई चोर-लुटेरा नहीं हैं! नवउदारवाद के पैरोकार ही वे लोग हैं, जिन्होंने मानसी, शिखा, पारो जैसी करोड़ों बच्चियों के पेट का निवाला और शरीर का वसा छीना हुआ है.   

नवउदारवाद में अर्थव्यवस्था (इकॉनमी) पूरी आबादी के लिए नहीं होती. वह मूलत: कारपोरेट घरानों और उस तिहरे घेरे में शामिल लोगों के लिए होती है. बाकी बची अधिकांश आबादी के लिए कई तरह की योजनाएं चलाई जाती हैं. ये योजनायें प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री एवं सत्तारूढ़ दलों के प्रतीक पुरुषों के नाम पर होती हैं. वर्तमान केंद्र सरकार की इस तरह की योजनाओं की एक लंबी सूची है. एक तरफ ये योजनाएं विज्ञापन के ज़रिये नेताओं और सरकार की छवि चमकने के काम आती हैं, दूसरी तरफ इन योजनाओं के लिए आबंटित धन-राशि का बड़ा हिस्सा सीधे अर्थव्यवस्था से लाभान्वित लोग हड़प जाते हैं. वैसी ही आंगनवाड़ी अथवा स्कूल में भोजन व वर्दी-किताबों के लिए कुछ पैसा देने जैसी योजनाओं का ज़िक्र उपमुख्यमंत्री कर रहे हैं. वे मान कर चल रहे हैं कि नवउदारवादी व्यवस्था के तहत ये योजनाएं बच्चियों के अभी और भविष्य के जीवन के लिए 'रामबाण' थीं. कुछ भ्रष्ट तत्वों, जिनमें उपराज्यपाल भी शामिल हो सकते हैं, ने उन रामबाण योजनाओं का लाभ बच्चियों तक नहीं पहुंचने दिया और एक परिपूर्ण व्यवस्था पर असफलता/नाकामी का दाग लगा दिया.

नवउदारवादी व्यवस्था लागू होने के बाद से देश में बड़े पैमाने पर आबादी का विस्थापन और बाह्यीकरण (एक्सक्लूशन) हुआ है. देहात और कस्बों से उखड़े लोग बड़े शहरों, महानगरों में दिन-रात काम करने, सिर छुपाने, बच्चों को पढ़ाने, दावा-दारू जुटाने की जद्दोजहद में भिड़े रहते हैं. (मंगल सिंह भी पश्चिम बंगाल से दिल्ली आकर करीब 15 साल से अपने परिवार के जीवन की जड़ें ज़माने की जद्दोजहद कर रहा था.) जो लोग गांव-कस्बों-छोटे शहरों में रह गए हैं, वे अपने को (विकास की दौड़ में) पीछे छूटा हुआ मान कर पराजित मानसिकता में जीते हैं. नवउदारवादी अर्थव्यवस्था ने भारत के सामाजिक और राजनीतिक पटल को अंदर-बाहर काफी बदल दिया है. गांव-कस्बों-छोटे शहरों में छूट गई और बड़े शहरों, महानगरों में पहुंची आबादी की अपनी एक अलग दुनिया और समस्याएं हैं. अपने को विकल्पहीन जताने वाली नवउदारवादी व्यवस्था इस बह्यीकृत दुनिया का समायोजन करने की कोशिश करती है. इसके दो मुख्य कारण हैं : एक, लोकतंत्र में इस दुनिया में रहने वालों के वोट का महत्व है. चुनाव इसी दुनिया के समर्थन से जीते जा सकते हैं. दूसरे, नवउदारवादियों की 'सोने की लंका' को इन 'भालू-वानरों' से बचा कर रखना है. नवउदारवाद के कर्ताओं ने इस विशाल आबादी की समस्याओं के समाधान के नाम पर सरकारी योजनाओं के समानांतर एक विशाल एनजीओ तंत्र विकसित किया है. यह दोहरा तंत्र समस्याओं के समाधान का झांसा बनाए रखने में कामयाब रहता है.
  
यह सच्चाई विद्वानों और राजनैतिक एक्टिविस्टों के अध्ययनों पर आधारित है कि पूरी दुनिया में फैला एनजीओ नेटवर्क नवउदारवादी व्यवस्था का अविभाज्य हिस्सा है. समाजवादी विचारधारा, यहां तक कि उदार लोकतंत्र (लिबरल डेमोक्रेसी) पर आधारित कल्याणकारी राज्य की अवधारणा की चुनौती ख़त्म करने में एनजीओ तंत्र ने बड़ी भूमिका निभाई है. एनजीओ तंत्र इस प्रचार का भी मज़बूत वाहक बना है कि नवउदारवादी व्यवस्था विकल्पहीन है. दिल्ली में सरकार चलाने वाली नवेली आम आदमी पार्टी और उसके मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री सीधे नवउदारवाद की कोख से पैदा हुए हैं. नेता बनने के पहले वे यूरोप अमेरिका की बड़ी-बड़ी दानदाता संस्थाओं से मोटा धन लेकर एनजीओ  चलाते थे और कभी मनमोहन सिंह, कभी लालकृष्ण अडवाणी, कभी सोनिया गांधी से 'स्वराज' मांगते थे. उनका 'ज़मीनी' संघर्ष केवल 'यूथ फॉर इक्वेलिटी' संगठन के साथ मिल कर दाखिले और नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था ख़त्म करने की मांग के रूप में देखने में आया था.

करीब दो दशक के नवउदारवादी दौर के बाद भारतीय राजनीति में ऐसा समय आया जब सरकारें नवउदारवादी व्यवस्था के वैश्विक प्रतिष्ठानों - विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन, विश्व आर्थिक मंच आदि - के लिए एनजीओ सरीखा काम करने लगीं. ऐसे में लम्बे समय से राजनीति की परिधि पर चक्कर काटने वाले एनजीओ कर्मियों को राजनीति में आना ही था. भारत शायद पहला देश है, जहां एनजीओबाजों का राजनीति में प्रवेश सबसे पहले और धूमधाम से हुआ है. नवउदारवादी व्यवस्था को इससे दोहरी मज़बूती मिली है. ये लोग खुल कर कहते हैं, राजनीति में विचारधारा की ज़रुरत नहीं होती. मजेदारी यह है कि सबसे ज्यादा विचारधारा की बात करने वाले कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट इनके सबसे बड़े समर्थक हैं. शुरू में ही इन्होंने संविधान की ज़रुरत को भी नकारा था, तो प्रभात पटनायक और एसपी शुक्ला जैसे विद्वानों के कान खड़े हुए थे. मुख्यमंत्री बनने पर उद्योगपतियों से पहली मुलाकात में ही केजरीवाल ने कहा था कि वे पूंजीवाद के विरोधी नहीं हैं, क्रोनी पूंजीवाद के विरोधी हैं. यहां पहली बात यह कि राजनीति में विचारधारा के निषेध की वकालत करने वाले वास्तव में नवउदारवादी विचारधारा के स्वाभाविक सेवक होते हैं. दूसरी बात यह कि चाहे पहले का उपनिवेशवादी दौर रहा हो या यह नवसाम्राज्यवादी दौर - भारत में पूंजीवाद क्रोनी ही रहा है. यह नहीं माना जा सकता कि भारत के कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट यह नहीं जानते हों. दरअसल, सरकारी कम्युनिस्ट और सरकारी सोशलिस्ट विचारधारा की लड़ाई नहीं लड़ना चाहते. वे सत्ता की लड़ाई के सिपाही हैं. इसीलिए मंडावली से लेकर मुजफ्फरपुर तक नवउदारवादी व्यवस्था द्वारा बाहर फेंक दी गईं भारत माता की बच्चियों के लिए निकट भविष्य में न्याय की आशा नहीं दिखती.

Friday, 27 July 2018

'REDUNDANT' - AN UNFORGIVABLE EXPRESSION USED FOR OFFICIALLY DESIGNATED DRINKING WATER RESERVOIRS BY GOVERNMENT OF TELANGANA IN THE HIGH COURT at HYDERABAD

HYDERABAD 25 JULY2018
PRESS RELEASE
'REDUNDANT' - AN UNFORGIVABLE EXPRESSION USED FOR OFFICIALLY DESIGNATED DRINKING WATER RESERVOIRS BY GOVERNMENT OF TELANGANA IN THE HIGH COURT at HYDERABAD


Today we, (Sanghamitra, Asif Ali Khan, Lubna Sarwath), met Shri Suryanarayana, Director-Technical, Hyderabad Metro Water & Sewage Board at his office and gave him a representation (attached).

We urged that:

- Water Board take up with goverment counsel how he stated before high court that two existing drinking water reservoirs can be stated as 'redundant'. we showed him the news item of times of india.

Director said he was not aware of that.

Director also denied any knowledge about Joint Collector RR district filing affidavit in Tribunal regarding illegal layouts/structures/buildings.

we assured him that we would email him the same.


  • Water board give us time frame when Hyderabadis can drink sweet waters of Gandipet and Himayat sagar, again, as water board has denied fundamental right of drinking waters supply from twin reservoirs to Hyderabadis.
  • Water Board evict all inflow channel blockages and diversions, as Managing Director has himself expressed anguish that despite Excess rainfall in catchment the twin reservoirs failed to be filled up.

  • We also reminded him that very recently when Water board asked for release of Nagarjuna sagar waters for the Hyderabad city, the Chief Engineer denied stating that water was needed for irrigation.

Hence, it is simple commonsense and wisdom that we nurture our heritage water reservoirs and not make our city dependent on far off water sources, which are again unpredictable;

These two reservoirs are the shaan(pride) of our city and its pride is essentially in restoring its glory of being able to supply drinking water on a continuum, as it used to be when the inflow channels were not diverted/blocked.

Osman Sagar and Himayat Sagar should not be treated as lakes but as two drinking water reservoirs.

As 'Purification of Land records' process is completed, government immediately examine and tell the court, who are the major land holders in the 84 villages of GO111, and, who are those demanding for shrinking of GO111(as mentioned in HMDA counter affidavit in high court), so that people understand government better when its counsel called the drinking water reservoirs as 'redundant'.

The entire hydrological architecture and structure as bequeathed to the city by VII Nizam Osman Ali Khan through his eminent engineers Sir Mokshagundam Visweswarayya and Mir Ahmed Ali, Nawab Ali Nawaz Jung Bahadur, should be preserved as a heritage marvel in essential utility on a continuum.

Sanghamitra Malik(Poetess & Activist)
Asif Ali Khan(Hyderabadi Architect), 
Dr Lubna Sarwath(General Secretary, Socialist Party(India)-Telangana

Monday, 23 July 2018

बाज़ार की गली में गांधी-अम्बेडकर पर बहस


बाज़ार की गली में गांधी-अम्बेडकर पर बहस
प्रेम सिंह

सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता दिल्ली और एनसीआर में सदस्यता अभियान और आगामी 9 अगस्त की 'शिक्षा और रोजगार दो, वर्ना गद्दी छोड़ दो' रैली के परचे बांट रहे हैं. हम अच्छी तरह जानते हैं कि राजनीति विज्ञापन का खेल बन चुकी है, जिसमें जनता की गाढ़ी कमाई का लूटा गया अकूत धन सरकारी और प्राइवेट स्रोतों से पानी की तरह बहाया जाता है. चाहे वह सत्ता पक्ष की हो या विपक्ष की, भारी तामझाम से भरी आज की राजनीति में खुद परचे बांटना और लोगों से चर्चा करना एक अर्थहीन और निराशा भरी कवायद है. आने-जाने वाले ज्यादातर लोग परचा पकड़ते ही नहीं. जो पकड़ते हैं, दो कदम आगे जाकर फेंक देते हैं. सस्ते कागज़ पर परचे का लाल रंग भी लोगों की उपेक्षा का कारण बनता है.

दुकानों पर बहुत कम लोगों की चर्चा करने में रूचि होती है. विचारहीनता का आलम इस कदर है कि अब पुराने और छोटे बाजारों में भी समाजवादी विचारधारा की जानकारी और उसके प्रति सहानुभूति रखने वाले लोग नहीं मिलते. अगर आपका चर्चा टीवी, रंगारंग पोस्टरों, बैनरों, होर्डिंगों पर नहीं है, तो आपकी राजनीति में लोगों की रूचि नहीं है. नवउदारवाद के प्रकट या प्रच्छन्न समर्थकों/भागीदारों ने ऐसे अराजनीतिक वातावरण का निर्माण किया है, समाजवाद छोड़िये, संविधान की विचारधारा की बात करना भी लगभग असंभव हो गया है. अन्ना आंदोलन के कर्ताओं और समर्थकों को विचारधारा-विहीनता को राजनीति का 'गुण' स्थापित करने में काफी हद तक सफलता मिल चुकी है. मार्केट से अलग पार्कों में परचा बांटने की समस्या अलग होती है. वहां क्लर्क से सेक्शन अफसर बन कर रिटायर होने वाले लोगों का बोलबाला होता है. उनकी सबसे प्रबल इच्छा युवा कार्यकर्ताओं से यह जानने की होती है कि उन्हें परचा बांटने का कितना पैसा दिया गया है? उनमें से ज्यादातर ने तनख्वा पर नहीं, ऊपर की कमाई पर सरकारी सेवा की होती है. 
    
जो भी हो. परचा बांटने के दौरान होने वाले खट्टे-मीठे अनुभवों का अपना महत्व है. लोगों के मन में क्या चल रहा है, कई बार इसकी सीधी जानकारी मिलती है. एक अनुभव का यहां ज़िक्र करते हैं. 17 जुलाई 2018 शाम हम कुछ साथी जमनापार लक्ष्मी नगर के बाज़ार में परचा बांटते हुए लोगों से बातचीत कर रहे थे. मंजू मोहन जी भी हमारे साथ थीं. महिला साथ रहने पर एक सुभीता यह होता है कि महिलाओं को भी परचा दिया जा सकता है. यदि कोई महिला दुकानदार है तो उसके साथ बात-चीत का अवसर भी बन जाता है. पुरुष दुकानदार कुछ लिहाज़ से बात करते हैं. उस दिन मंजू जी मेन बाज़ार के अंदर की एक गली में मोबाइल और एसेसरीज की छोटी-सी दुकान में घुस गयीं. दुकानदार के साथ उनकी चर्चा होते देख हम तीन-चार साथी भी अंदर चले गए. दुकानदार का करीब 30 साल का एक परिचित युवक भी वहां बैठा था. दुकानदार की उम्र 50 साल के ऊपर होगी.

सोशलिस्ट पार्टी के हर परचे पर एक स्कैच-चित्र छपा होता है, जिसमें गांधी और अम्बेडकर के बीच कुछ समाजवादी नेताओं के स्कैच हैं. दुकानदार के परिचित ने परचा डेस्क पर पटकते हुए तंज कसा कि हमने दो सड़े हुए लोगों की तस्वीर परचे पर छापी हुई है. मैंने मतलब पूछा तो उसने कहा, 'एक ने देश को पकिस्तान का उपहार देकर नाश किया और दूसरे ने आरक्षण देकर सब बर्बाद कर दिया'. इस दुत्कार के बाद भी हम टले नहीं. बहस छिड़ गई. दुकानदार भी अपने साथी के पक्ष में बहस में शामिल हो गया. सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता अपने पक्ष से राजनैतिक तर्क करने लगे. बहस गाँधी जी पर नहीं जम पाई. युवक ने यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि गांधी को उनकी करतूत के लिए ठीक ही ठिकाने लगा दिया गया. उसकी बात सुन कर मुझे फेसबुक पर कुछ महीने पहले पढ़ा एक कमेंट याद आया. गोडसे के महिमा मंडन पर किसी व्यक्ति ने गांधी की उम्र का हवाला देते हुए उनके पक्ष में कुछ तथ्य रखे थे. उसके जवाब में किसी लडके का कमेंट था कि 'कुछ भी हो, पेला खूब'. अस्सी साल के व्यक्ति की प्रार्थना सभा में धोखे से की गई हत्या पर सत्तर साल बाद एक भारतीय नवयुवक के मन में ऐसी भयानक ख़ुशी! गांधी के प्रति घृणा की यह मानसिकता कहां से पैदा होती है? भारत के लोग क्यों गाँधी की एक बार हत्या से संतुष्ट नहीं हैं? क्यों उसे बार-बार मारते हैं? मैं यह नहीं स्वीकार नहीं करता हूँ कि अकेला  आरएसएस इसके लिए जिम्मेदार है.

बहरहाल, गांधी से हट कर बहस आरक्षण पर जम गई. वे दोनों लोग धुर आरक्षण विरोधी थे. आरक्षण के पक्ष में कोई सामाजिक-राजनीतिक तर्क उन्हें स्वीकार नहीं था. देश, समाज और मानवता के हित में उनके अपने 'तर्क' थे, जिनका वास्तविकता और तथ्यों से संबंध नहीं था. दुकानदार ने अंतत: कहा कि आरक्षित कोटे के डाक्टरों को केवल आरक्षित वर्ग के लोगों का इलाज़ करने देना चाहिए. दूसरे मरीजों को मारने का उन्हें क्या हक़ है? उन्होंने स्पष्ट कहा कि आरक्षण राजनैतिक पार्टियों की मज़बूरी हो सकती है, देशवासियों की मज़बूरी क्यों बने? बहस में ज्यादातर वहां बैठा युवक ही बोला. हम लोग म्याऊं-म्याऊं करते रहे. आखिर हम सबने चलने में ही भलाई समझी.

मैंने यह गौर किया कि वे दोनों लोग पूरी बहस में अनर्गल थे, लेकिन उग्र बिलकुल नहीं थे. युवक हँस-हँस कर सारी बात कर रहा था. हो सकता है दुकानदार का साथी भी छोटा-मोटा दुकानदार हो और उनका वैसा व्यवहार दुकानदारी के धर्म से जुड़ा हो. यह भी हो सकता है वे स्वभाव से अच्छे लोग हों. निकलने से पहले मैंने दुकानदार के साथी से पूछ लिया कि 2019 में क्या करा रहे हो? उसने आत्मविश्वास के साथ कहा, 'पिछली बार की तरह केंद्र में मोदी और दिल्ली में केजरीवाल को लाना है'.

पुनश्च : नरेंद्र मोदी ने गांधी और अम्बेडकर को एक साथ अपनी जेब में डालने का कौतुक किया तो अम्बेडकरवादी और कुछ कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों ने हमला बोला कि आरएसएस अम्बेडकर को नहीं पचा सकता. गोया उन सबने अम्बेडकर को पूरा आत्मसात किया हुआ है! और आरएसएस के इस्तेमाल के लिए अम्बेडकर में कुछ बचा ही नहीं है! गांधी पंचायती बच्चा है ही. स्वार्थ पड़े तो पुचकार दो, नहीं तो लतियाए रखो. उस समय हमारे मन में ख़याल आया था कि आरएसएस पहले गांधी को लात मार कर नीचे गिराएगा या अम्बेडकर को? लगता है गांधी की बारी पहले आएगी. 'हिंदू राष्ट्र' का कुछ स्थायित्व होते ही आरएसएस साफ़ तौर पर कह देगा - गांधी की हत्या उसी की योजना थी. तब पूरे राष्ट्र में खुल कर मिठाई बांटी जायेगी - पूरी योजना के तहत. अगर किन्हीं साथियों को हमारी स्थापना से मतभेद है तो बेशक बताएं. हम विस्तार से जवाब देने के लिए तैयार हैं.  

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