Thursday, 19 July 2018

सबक सिखाने के दौर में

सबक सिखाने के दौर में

प्रेम सिंह



सामाजिक एक्टिविस्ट स्वामी अग्निवेश पर हुए हमले की जहां ठीक ही कड़ी निंदा की जा रही है, वहीँ कई लोग स्वामी जी के कुछ पूर्व प्रकरणों का हवाला देकर इसे सही परिणति बता रहे हैं. यह निश्चित ही दुर्भाग्यपूर्ण है. जिन्हें उनके विचारों और कार्यों से सहमति नहीं है, वे अपना मत रखने के स्वतंत्र हैं. वे उनका विरोध करने के लिए भी स्वतंत्र है. हालाँकि, ऐसा करते हुए उन्हें स्वामी अग्निवेश की पृष्ठभूमि पर भी नज़र डालनी चाहिए.

     इधर देखने में आ रहा है कि संघी ब्रिगेड के 'हिंदुत्ववादी लुम्पनों' के हमलों से त्रस्त कुछ साथी उन्हें सबक सिखाने के लिए दलित, पिछड़े, आदिवासी, अल्पसंख्यकों की एकजुटता का आह्वान करते हैं. स्वामी अग्निवेश पर हुए हमले की प्रतिक्रिया में भी यह स्वर काफी उभर का आ रहा है. कुछ साथियों ने ललकारा है कि जब दलित, पिछड़े, आदिवासी, अल्पसंख्यकों का एका हो जायेगा, तब हिंदुत्ववादी लुम्पनों की खैर नहीं रहेगी. आरएसएस का हिंदूत्व और उससे जुड़ा गर्व पराजित मानसिकता की कुंठा से पैदा होता है. इसीलिए वह हमेशा नकारात्मक बना रहने के लिए अभिशप्त है. साथियों की दलित, पिछड़े, आदिवासी, अल्पसंख्यकों की एकजुटता से हिंदूत्ववादी लुम्पनों को सबक सिखाने की ललकार भी सकारात्मक नहीं कही जा सकती. यह एक तरह से कुंठित आक्रोश की पुकार है.

      इस सन्दर्भ में पहला निवेदन यह है कि दलित, पिछड़े, आदिवासियों का एका आरएसएस/भाजपा के साथ बखूबी हो चुका है और चल रहा है. आरएसएस/भाजपा का 'एकात्म' नवउदारवाद/नवसाम्राज्यवाद के साथ हो चुका है. कहने की जरूरत नहीं है कि आरएसएस/भाजपा के साथ एकजुट दलित, पिछड़े, आदिवासियों का भी. जहाँ तक अल्पसंख्यक मुसलामानों की बात है, वे कितने दिनों तक अलगाव में रह कर आरएसएस/भाजपा का विरोध करते रह सकते हैं? आखिर वे भी हम सब जैसे भारतवासी हैं. उन्हें भी दीन के साथ कुछ न कुछ सत्ता का सहारा चाहिए. आरएसएस शिया मुसलमानों में घुस कर काम कर रहा है. इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि आरएसएस का काम देर से ही सही, परिणाम लेकर आता है. वर्ना आज हालत यह नहीं होती कि उसने समस्त वैज्ञानिक, प्रगतिशील और क्रन्तिकारी चिंतन की धाराओं को एक 'पांचजन्य' से पीट दिया है! वैसे भी मुसलमान इतना जानता है कि वह किसी भी सूरत में हिंदूत्ववादी लुम्पनों की खुली कुटाई नहीं कर सकता. दलित, पिछड़े और आदिवासी ही उसे सबक सिखा देंगे!   

      दूसरा निवेदन है, अगर इस देश के बुद्धिजीवियों को दलित, पिछड़े, आदिवासी, अल्पसंख्यकों को हिंदूत्ववादी लुम्पनों को सबक सिखाने के लिए ही एकजुट करना है, तो स्वीकार कर लेना होगा कि लोहिया का आह्वान - 'जिंदा  कौमें पांच साल इंतज़ार नहीं करतीं - उनका एक मुगालता था. लोहिया ने यह समझ कर कि अस्मिता का विमर्श और राजनीति दक्षिणपंथी ताकतों की सहायक न बन जाएं, राजनीति में दलित, पिछड़े, आदिवासी, महिला, अल्पसंख्यकों की एकजुटता का सूत्र दिया था. इसके पीछे उनका नई भारतीय सभ्यता के निर्माण का स्वप्न था, जिसे आधुनिक विश्व में अपनी जगह बनानी थी. उनकी परिकल्पना में भारत की आबादी का यह अधिकांश हिस्सा उपनिवेशपूर्व की ब्राह्मणवादी विचारधारा और उपनिवेशकालीन पूंजीवादी विचारधारा के शिकंजे से कमोबेस मुक्त रहा है. इन समूहों की एकजुटता से लोकतंत्र में राजनीतिक सत्ता हासिल करके दुनिया के सामने ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद से अलग बराबरी की नई व्यवस्था कायम की जा सकती है. उसी दिशा में आगे बढ़ने के लिए उन्होंने विशेष अवसर का सिद्धांत (आरक्षण) रखा था. लोहिया के इस सूत्र का अभी तक वोट की राजनीति के लिए ही इस्तेमाल हुआ है. आरएसएस/भाजपा ने भी देखा-देखी वह कर लिया.

      अगर बुद्धिजीवी कह रहे हैं कि इन समूहों की एकजुटता से हिंदूत्ववादी लुम्पनों को सबक सिखाना है, तो यह वोट की राजनीति से भी पीछे जाने वाली बात होगी. कारपोरेट पूंजीवाद देश के नेताओं को ही नहीं, बुद्धिजीवियों को भी नचा रहा है. ध्यान दिला दें, हिंदूत्ववादी लुम्पनों को सबक सिखाने के लिए दलित, पिछड़े, आदिवासी, अल्पसंख्यकों की एकजुटता का आह्वान करने वाले बुद्धिजीवी धुर आरक्षण विरोधी अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के समर्थन में 'भीड़' बन गए थे!  

स्वामी अग्निवेश पर हमला निंदनीय और आपराधिक

प्रेस रिलीज़
स्वामी अग्निवेश पर हमला निंदनीय और आपराधिक

               
 सोशलिस्ट पार्टी सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश पर झारखण्ड के पाकुड़ शहर में कल हुए हमले की कड़ी निंदा करती है. पार्टी की नजर में यह आपराधिक कृत्य है. खबरों से यह साफ़ पता चलता है कि हमला करने वाले आरएसएस/भाजपा से जुड़े लोग हैं. झारखंड में भाजपा की सरकार है. ज़ाहिर है, हमला करने वालों को यह भरोसा रहा होगा कि कानून हाथ में लेने के बावजूद उनका कुछ नहीं बिगड़ पाएगा. भारतीय जनता युवा मोर्चा और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के पदाधिकारियों का यह कहना सही नहीं माना जा सकता कि उन्होंने स्वामी अग्निवेश के खिलाफ केवल प्रतिरोध का आयोजन किया था. अगर हमला उन्होंने नहीं किया तो फिर वे कौन लोग थे?
               
यह अच्छी बात है कि मुख्यमंत्री रघुबर दास ने घटना की जांच का आदेश दिया है और पुलिस प्रशासन ने 92 अनाम और 8 नाम सहित आरोपियों पर प्राथमिकी दर्ज की है. आरोपियों पर लगाई गई धाराओं में जानलेवा हमला भी शामिल है. अगर राजनैतिक नेतृत्व, पुलिस प्रशासन और न्यायपालिका भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा और नागरिकों की हत्याओं पर त्वरित कार्रवाई करे तो तेज़ी से फ़ैल रही इस खतरनाक प्रवृत्ति पर काबू पाया जा सकता है.
      
सोशलिस्ट पार्टी झारखंड राज्य सरकार से मांग करती है कि स्वामी अग्निवेश पर जानलेवा हमला करने वाले लोगों पर त्वरित कार्रवाई करे और दोषियों को कानून के तहत सजा दिलवाए. स्वामी अग्निवेश एक चर्चित और सम्मानित नागरिक हैं. उन पर इस तरह सरेआम हमला कानून-व्यवस्था पर तो चोट है ही, इससे उनके मित्रों और समर्थकों की भावनाओं को भी चोट पहुंची है. सोशलिस्ट पार्टी उनके प्रति सहानुभूति और समर्थन व्यक्त करती है.

डॉ. अभिजीत वैद्य
प्रवक्ता       

Attack on Swami Agnivesh is a deplorable and criminal act

   Press release
Attack on Swami Agnivesh is a deplorable and criminal act


     The Socialist Party strongly condemns the recent attack on social activist Swami Agnivesh that took place in Pakur city of Jharkhand. The Socialist Party terms the act as criminal. It is clear from the reports that the attackers are persons belonging to the RSS/BJP. There is BJP government in Jharkhand. Therefore, the attackers might have thought that despite taking the law into their hands, nothing would happen to them. The clarification given by the office bearers of Bharatiya Janata Yuva Morcha (BJYM) and Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad (ABVP) that they had merely organized resistance against Swami Agnivesh, cannot be accepted as right. If not them, then, who were the other people involved in the attack on Swami Agnivesh?
     It is good that the Chief Minister Raghubar Das has ordered an inquiry and police administration has registered an FIR against accused, which includes 92 unnamed persons and 8 with names. The sections imposed on the accused include the attempt to murder. If the political leadership, police administration and judiciary mobilize prompt action on the incidents of mob violence and mob lynching, this fast spreading and dangerous trend could be controlled.
            The Socialist Party urges the Jharkhand State government to take immediate action against those who made this murderous attack on Swami Agnivesh, and to punish the culprits under the law. Swami Agnivesh is a well known and respected citizen. The attack on him has not broken law and order but has also caused deep injury to the sentiments of his friends and followers. The party expresses support and concern towards him.

Dr. Abhijit Vaidya
Spokesperson

Tuesday, 3 July 2018

US pressure on Modi's foreign policy

3 July 2018
Press release

Prime Minister Narendra Modi's so-called aggressive foreign policy is once again ready to surrender the political sovereignty of the country to American imperialism. After breaking the nuclear treaty with Iran the American President Donald Trump has told all countries of the world that they should completely stop importing oil from Iran until November 4. Nikki Haley, the visiting representative of the United States in the United Nations, has given the same message to the Prime Minister of India in stern words. She has said that India should rethink its relations with Iran, because America considers Iran a threat to world peace. Haley  said that Iran is going to prove next North Korea. However, in reality the US has recently made an agreement with North Korea with a great fanfare. Due to the engagement of the US representative in connection with the same deal, the India-US dialogue on July 7 has been canceled.

The explanation of Ravish Kumar, spokesperson of the Ministry of External Affairs, did not have any special effect on Nikki. Ravish has said that relations between India and Iran are very old. India is the largest importer country of hydrocarbons from Iran. Indian Oil wanted to buy 7 million tons of crude oil from Iran by March next. In May, India imported 771,000 barrels of oil per day from Iran. The biggest difficulty after the US pressure would be the cash payment. It is not clear how India will pay for the import of crude oil of $ 10 billion. India's oil companies have prepared a flexible plan for the payment along with making payment to Iran in certain items. These items include things like wheat and medicines.

Here the real question arises. Is India's tilt under American pressure not a challenge to its political and economic sovereignty? The ruling class of India and the advocates of capitalism world over do not exhaust stating India as a fast emerging superpower. The Socialist Party wants to ask if the superpower India has no right to decide who to befriend and whom to do business with? It seems that pomposity of 'aggressive' foreign policy of Modi is only to mislead the people of the country.

At the time when India had prepared to build a gas pipeline from Iran, the then Bush administration had forced India to enter into nuclear agreement and had pressurized her to break the gas agreement with Iran. Today, when India was dependent on Iran to meet its energy needs, then it is being forced to rely on Saudi Arabia and other countries. Meanwhile, under the pressure of the US, India continued to vote against Iran in the International Atomic Energy Agency. Yet Iran has continued to have friendship with India. The reason for this is that India has had a stable  Iran policy for a long time. Recently, Prime Minister Modi appeared to be growing in friendship with Iran. But it seems that under the American pressure, he is ready to overturn India's established Iran policy.

The Socialist Party would like to caution the citizens - if it happens, India's image as a sovereign nation will be weak in the world and its interests will be damaged. Therefore, the Socialist Party demands that the Modi-government should not sacrifice India's long-tested Iran policy under the American pressure.


Dr. Abhijit Vaidya
Spokesperson

मोदी सरकार की विदेश नीति पर अमेरिकी दबाव

3 जुलाई 2018
प्रेस रिलीज़



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तथाकथित आक्रामक विदेश नीति एक बार फिर अमेरिकी साम्राज्यवाद के आगे राजनीतिक संप्रभुता के समर्पण के लिए तैयार है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान से नाभिकीय संधि तोड़ने के बाद दुनिया के तमाम देशों से कह दिया है कि वे चार नवंबर तक ईरान से तेल का आयात पूरी तरह बंद कर दें। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की विजिटिंग प्रतिनिधि निक्की हेली ने यही संदेश भारत के प्रधानमंत्री को कड़े शब्दों में दिया है। उन्होंने कहा है कि भारत ईरान के साथ अपने संबंधों पर पुनर्विचार करे, क्योंकि अमेरिका ईरान को विश्व-शांति के लिए खतरा मानता है। हेली का कहना था कि ईरान अगला उत्तर कोरिया साबित होने जा रहा है। हालांकि हकीकत यह है कि अमेरिका ने हाल में गाजे-बाजे के साथ उत्तर कोरिया से समझौता कर लिया है। उसी समझौते के सिलसिले में अमेरिकी प्रतिनिधि की व्यस्तता के कारण इसी सात जुलाई को होने वाली भारत-अमेरिका वार्ता रद्द कर दी गई है।

भारतीय विदेश विभाग के प्रवक्ता रवीश कुमार के स्पष्टीकरण का निक्की पर कोई विशेष असर नहीं पड़ा है। रवीश ने कहा था कि भारत और ईरान के संबंध बहुत पुराने हैं। भारत ईरान से हाइड्रोकार्बन का सबसे बड़ा आयातक देश है। इंडियन आयल अगले मार्च तक 70 लाख टन कच्चा तेल खरीदना चाहता था। मई में भारत ने ईरान से 771000 बैरल तेल प्रतिदिन की दर से आयात किया था। अमेरिकी दबाव के बाद सबसे बड़ी दिक्कत नकद भुगतान को लेकर है। भारत 10 अरब डालर के कच्चे तेल के आयात का भुगतान कैसे करेगा, यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है। एक तरफ भारत की तेल कंपनियों ने वैकल्पिक योजना तैयार कर रखी है, तो दूसरी ओर ईरान को वस्तु के रूप में भुगतान करने की तैयारी भी है। इन वस्तुओं में गेहूं और दवाइयां जैसी चीजें शामिल हैं।

यहां असली सवाल यह है कि अमेरिकी धमकी पर भारत का झुकना क्या उसकी राजनीतिक और आर्थिक संप्रभुता को चुनौती नहीं है? भारत का शासक वर्ग और दुनियां में पूंजीवाद के पैरोकार भारत को एक तेज़ी से उभरती महाशक्ति बताते नहीं थकते। सोशलिस्ट पार्टी पूछना चाहती है कि क्या महाशक्ति भारत को यह तय करने का हक नहीं है कि वह किससे दोस्ती करे और किससे व्यापार करे? लगता यही है कि 'आक्रामक' विदेश-नीति के नाम पर की जाने वाली सारी फू-फां केवल देश की जनता को गुमराह करने के लिए है।

जिस समय भारत ने ईरान के साथ गैस पाइप लाइन बनाने की तैयारी कर ली थी, तब भी तत्कालीन बुश प्रशासन ने भारत को नाभिकीय समझौते के लिए मजबूर किया था और ईरान से गैस का संबंध तोड़ने का दबाव बनाया था। आज जब भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ईरान पर निर्भर था, तब फिर उसे सऊदी अरब व दूसरे देशों पर निर्भर होने के लिए मजबूर किया जा रहा है। इस बीच अमेरिकी दबाव में भारत ने लगातार अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में ईरान के विरुद्ध मतदान भी किया। फिर भी ईरान ने भारत से मैत्री जारी रखी है। इसका कारण है कि भारत की लम्बे समय से एक सुनिश्चित ईरान नीति चली आ रही है। हाल में प्रधानमंत्री मोदी ईरान से दोस्ती की पेंगे बढ़ाते दिखे थे। लेकिन लग यही रहा है कि अमेरिकी दबाव पड़ते ही वे भारत की स्थापित ईरान नीति पर पलटी मारने को तैयार हैं।

सोशलिस्ट पार्टी का मानना है ऐसा होने से एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में भारत की छवि दुनियां में कमजोर होगी और उसके हितों को नुकसान पहुंचेगा। सोशलिस्ट पार्टी मोदी-सरकार से मांग करती है कि उसे अमेरिकी दबाव में भारत की पुख्ता ईरान नीति का त्याग नहीं करना चाहिये।


डॉ. अभिजीत वैद्य
प्रवक्ता  

नदियां साफ करो



नदियां साफ करो
डॉ. राममनोहर लोहिया

 
            आज मैं आपसे एक बात ऐसी करूँगा जिसे धर्म के आचार्यों को करनी चाहिए, लेकिन वे नहीं कर रहे हैं | वे तो गलत और गैरजरूरी कामों में फंसे हुए हैं | मैं अपने लिए कह देता हूं कि मैं नास्तिक हूँ | कोई यह न समझ बैठे कि ईश्वर से मुझे मुहब्बत हो गई है |

            हिन्दुस्तान का मौजूदा जीवन और पुराना इतिहास सभी, बहुत-कुछ नदियों के साथ-साथ चला, यों सारी दुनिया में, लेकिन यहाँ ज्यादा | अगर मैं राजनीति न करता और स्कूल में अध्यापक होता, तो इसके इतिहास को समझता | राम की अयोध्या सरयू के किनारे, कुरु सुर पंचाल और मौर्य तथा गुप्त गंगा के किनारे, और मुग़ल और शौरसेनी नगर और राजधानियां यमुना के किनारे रहीं | बारहों मॉस पानी के कारण, शायद विशेष जलवायु के कारण, या हो सकता है, विशेष संस्कृति के कारण ऐसा हुआ हो | एक बार मैं महेश्वर नाम के स्थान पर गया, जहां अहिल्या अपनी ताकत से गद्दी पर बैठी थी | वहां पर एक संतरी था | उसने पूछा कि तुम किस नदी के हो ? दिल में घर कर जाने वाली बात है | उसने शहर नहीं पूछा, भाषा भी नहीं, नदी पूछी | जितने साम्राज्य बढे, किसी न किसी नदी के किनारे बढे-चोल कावेरी के किनारे, पंड्या वैगई के और पल्लव पालार के किनारे बढे |

            आज हिन्दुस्तान में 40 करोड़ लोग बसते हैं | एक-दो करोड़ के बीच रोजाना किसी न किसी नदी में नहाते हैं और 50-60 लाख पानी पीते हैं | उनके मन और क्रीडाएं इन नदियों से बंधे हैं | नदियाँ हैं कैसी ? शहरों का गंदा पानी इनमें गिराया जाता है | बनारस के पहले जो शहर है, इलाहाबाद, मिर्जापुर, कानपुर, इनका मैला कितना मिलाया जाता है इन नदियों में | कारखानों का गंदा पानी नदियों में गिराया जाता हैं-कानपुर के चमड़े आदि का गंदा पानी | यह दोनों गंदगियाँ मिलकर क्या हालत बनाती हैं ? करोड़ो लोग फिर भी नहाते हैं और पानी पीते हैं | इस समस्या पर मैं, साल से ऊपर हो गया, कानपुर में बोला था |

            तैराकी का खेल दुनिया में सबसे ज्यादा खेला जाता है -क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल से ज्यादा | क्रिकेट कह गया | यह तो पाजी, पुराने सामंतों और जमींदारों का खेल है | यूरोप, अमेरिका में तैराकी के तालाब बनाए जाते हैं | अरबों रुपये खर्च होते हैं | वैसे तालाब यहाँ नहीं हैं | अगले 50-100 वर्षों में रूस और अमरीका के जैसे तैराकी के तालाब यहाँ नहीं बन सकते | जो राजा हैं या गद्दी पर बैठने का मंसूबा रखते हैं, वे थोड़े ही नहाने जाते हैं | वे तो आधुनिक हो गए हैं, किन्तु इतने आधुनिक भी नहीं कि करोड़ों के दुःख-दर्द का इलाज कर सकें |

            क्या हिन्दुस्तान की नदियों को साफ़ रखने और करने का आन्दोलन उठाया जाए ? अगर यह काम किया जाए तो दौलत के मामले में भी फायदा पहुंचाया जा सकता है | मल-मूत्र और गंदे पानी की नालियां खेतों में गिरें | उनको गंगामुखी या कावेरिमुखी न किया जाए | दूर, कोई 10-20 मील पर नालियों द्वारा मल-मूत्र ले जाया जाए | खर्च होगा | दिमाग के ढर्रे को बदलना होगा | मुमकिन है, इस योजना में अरबो रुपयों का खर्च हो | 2,200 करोड़ रूपए सरकार हर साल खर्च करती है | पंचवर्षीय योजना के कुछ काम बंद करने होंगे, हालांकि इसमें रूकावटे जबरदस्त हैं | राजनैतिक व्यक्ति, चाहे गद्दी पर हो चाहे बाहर, अपने दिमाग से नकली यूरोपी हो गए हैं | कौन हैं हिंदुस्तान के राजा ? करीब एक लाख लोग होंगे, या उससे भी कम, जो थोड़ी बहुत अंग्रेजी जानते हैं, कांटे-छुरी से खाना और कोट-टाई पहनना जानते हैं | ताकतवर दुनिया के प्रतिक हैं | पंडित नेहरु मूर्ति हैं ऐसी दुनिया की | किसी कदर श्री संपूर्णानंद भी मूर्ति हैं, हालाँकि शक्ल में भिन्न हैं और यूरोपी जैसे नहीं लगते | श्री नेहरु भी अमरीका में तो रंगीन ही समझे जाएंगे |

            बनारस में विश्वनाथ को लेकर झगड़ा चला | दूसरा मंदिर बनाया जा रहा है | किस विश्वनाथ का झगड़ा चला-ब्राह्मणनाथ अथवा चमारनाथ ? इन बातों में हिन्दू दिमाग बे मतलब फंस जाता है | करपात्री जी, जैसा मैंने कहा  वैसे करते तो अच्छा होता | किस दुनिया के सहारे चलते हैं ये ? ये लोग करोड़पति और राजस्थान के राजाओं के नुमाइंदे हैं | एक विश्वनाथ की जगह पर दो खड़ा करने से काम नहीं चलेगा | सारे राष्ट्र के निर्माण की बात है | बेहद गरीबी है | वह कैसे मिटे ?

            आखिर पलटन में आज सिपाही कौन हैं ? गरीबों के लड़के | वे ही गरीबों पर गोली चलाते हैं | वही खड़गवासला, देहरादून और सैंडहर्स्ट के नकली यूरोपी रंग में रंगे अफसर का हुक्म मानते हैं | उनके पास पैसा है, साधन हैं, और आधुनिक दुनिया के प्रतिक वे हैं ही | करोड़ो से उनका क्या वास्ता ? आज राजगद्दी चलाने वाले हैं कौन ? नकली आधुनिक विदेशी लोग - दिमाग ज़रा भी हिन्दुस्तानी नहीं, नहीं तो हिन्दुस्तान की नदियों की योजना बन जाती | मैं चाहता हूँ कि इस काम में, न केवल सोशलिस्ट पार्टी के, बल्कि और लोग भी आएं, सभाएं करें, जुलूस निकालें, सम्मेलन करें और सरकार से कहें कि नदियों के पानी को भ्रष्ट करना बंद करो | फिर सरकार को नोटिस दें कि 3 से 6 महीने के भीतर वह नदियों का गंदा पानी खेतों में बहाए, इसके लिए ख़ास खेत बनाए, और वह अगर यह न करें तो मौजूदा नालियों को तोड़ना पड़ेगा | इससे हिंसा नहीं होती |

कबीर ने कहा था :
            माया महा ठगिनि हम जानी |
            तिरिगुन फांस लिए कर डोलै,
            बोलै मधुरी बानी |
            केसो के कमला होए बैठी,
            सिव के भवन भवानी |
            पंडा के मूरित होय बैठी,
            तीरथ महं भई पानी |

सब अपने ढंग से इसका अर्थ लगाते हैं | तीर्थ है क्या-पानी | पानी को साफ़ करने के लिए आन्दोलन चाहिए | लोगों को सरकार से कहना चाहिए - बेशर्म, बंद करो यह अपवित्रता ! यह सही है कि दुनिया से सीखना है, लेकिन करोड़ो का ध्यान रखना है | मैं फिर कहता हूँ कि मैं नास्तिक हूँ | मेरे साथ तिर्थबाजी का मामला नहीं है | मुख्य बात यह है कि 30 लाख का देश बने या 40 करोड़ का | इसके लिए अगर कुछ लोग आन्दोलन करना चाहें तो मैं मदद करूँगा |


Sunday, 1 July 2018

मृत्यु - विश्वासघात का कृत्य





मधु दंडवते
संभव है कि मृत्यु ही जीवन को तुम्हारा अंतिम उपहार हो, परंतु यह विश्वासघात का कृत्य नहीं होना चाहिए |                                - डाग हैमरशोल्ड

2 जुलाई 1950 | सूर्य उगने से पहले ही भोर बेला में युसुफ़ मेहरअली की जीवन ज्योति बंबई के जस्सावाला नर्सिंग होम में बूझ गयी | युसुफ़ के घनिष्ठ मित्र और सहकर्मी जयप्रकाश नारायण अंतिम क्षणों में उनके साथ थे | उन्होंने अश्रुपूर्ण नेत्रों से उनको दम तोड़ते देखा | ऊर्जा और गतिशीलता से भरपूर एक स्पंदनशील जीवन का समय से पूर्व ही 47 वर्ष के अल्पायु में अवसान हो गया | यह हृदयद्रावक समाचार जंगल की आग की तरह देशभर में फैल गया तथा  युसुफ़ के प्रति सौहार्दपूर्ण और संवेदनशील श्रद्धांजलि दी जाने लगीं | भावना के आवेग में जयप्रकाश नारायण ने कहा :
"मैं युसुफ़ मेहरअली की जीवन को सर्वदा समर्पण की एक ऐसी अभिव्यक्ति के रूप देखता रहूँगा           जिसका स्थान गांधी जी के बाद सर्वप्रथम है |"

राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने युसुफ़ की स्मृति में श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा :
"मेरे लिए वे एक आत्मीय मित्र और देश के एक समर्पित सेवक थे | अल्पायु में ही उनके निधन से हमारे सार्वजनिक जीवन को भारी क्षति पहुंची है |"

प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने मेहरअली की मृत्यु पर टिप्पणी करते हुए कहा :
"मुझे यह जानकर गहरा दुःख हुआ कि युसुफ़ मेहरअली का बंबई में निधन हो गया | एक लम्बी बीमारी ने उन्हें पंगु बना दिया था तथापि उनके चेहरे पर सदा मुस्कान खेलती रहती थी | वे अपने  परिचितों के लिए एक प्रिय मित्र थे | वे देश के स्वतंत्रता संग्राम के एक वीर तथा दुर्दमनीय सेनानी तो थे ही, उनके चरित्र में उच्चकोटि की प्रामाणिकता का विरल गुण भी विद्यमान था जिसके कारण वे सबके लिए आदर के पात्र बन गए थे | इस उदार मानव और प्रिय मित्र के निधन से हमें भारी क्षति पहुंची है |"

आचार्य नरेंद्र देव ने कहा :
"मेहरअली एक शक्तिशाली और गतिशील व्यक्तित्व के धनि तथा भारतीय राजनीति में अपने ढंग के एक अनूठे व्यक्ति थे |"

आचार्य कृपलानी ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा :
"मेहरअली आदि से अंत तक भारतीय थे अर्थात उनमें उन सभी तत्वों का सामंजस्यपूर्ण संयोग हुआ था, जिन्होंने आधुनिक भारत का निर्माण किया है |"

डॉ. राममनोहर लोहिया ने अपनी श्रद्धांजलि में उनका वर्णन इस प्रकार किया :
"मेहरअली का जीवन राजनीतिक दलों तथा धर्मों के बीच आपसी मतभेदों की खाई को आदर्शों और मानवाहित के प्रति प्रेम से पाटने का एक जीता-जागता उदाहरण था |"

अशोक मेहता ने युसुफ़ को 'समाजवादी आन्दोलन का अंतःकरण' बताया तथा कहा :
"रोग ने उनका शरीर नष्ट कर दिया था परंतु वह उनकी आत्मा को तनिक भी घायल नहीं कर पाया|"

कमला देवी चट्टोपाध्याय ने अपने श्रद्धापूर्ण सन्देश में कहा :
" युसुफ़ मेहरअली एक विलक्षण व्यक्ति थे | उनके निधन से उनकी मित्रमंडली में एक अपूरणीय रिक्तता की चेतना व्याप्त हो गयी है | उनकी आत्मीयतापारक मानवीयता और अपने प्रत्येक साथी में व्यक्तिगत दिलचस्पी लेने तथा उसके हितों का ध्यान रखने की वृति ने उन्हें एक महामानव बना दिया था | साहस और बलिदान के महान कार्य तो बहुत लोग सम्पन्न कर सकते हैं किन्तु व्यक्ति के चरित्र की महानता निर्बलता के प्रति उसकी उदारता तथा दयालुता पर निर्भर करती है | निर्भय तथापि कोमल, साहसी तथापि उदार, प्रत्येक बलिदान के लिए तैयार तथापि प्रेम और स्नेह से परिपूर्ण मेहरअली एक अनूठे पुरुष थे | उन्हें ऐसे समर्पित मित्र तथा निष्ठावान सहकर्मी प्राप्त हुए जो विविध राजनीतिक पक्षों  और धर्मों के अनुयायी थे | युसुफ़ सभी के लिए उस जीवनसूत्र का मूर्त स्वरुप बन गए थे, जो स्वयं उन्हें अत्यंत प्रिय था : 'खतरों में जियो' |"

बॉम्बे क्रानिकल ने युसुफ़ मेहरअली के प्रति अपनी श्रद्धांजलि अपने एक संपादकीय लेख द्वारा अर्पित की, जिसमें कहा गया था :
" ऐसे संसार में जहां ढेरों असत्य खुले में फैला हुआ है और ढेरों सत्य नीचे दबा पड़ा है, एक ऐसे व्यक्ति के अभाव को शब्दों द्वारा नहीं आँका जा सकता जो सादगी और पारदर्शी निश्छलता का प्रतीक बन गया था |"

          युसुफ़ मेहरअली बम्बई विधान सभा के सदस्य थे, इस नाते राज्य विधानमंडल के सदस्यों ने भी उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की |
          मुंबई के मुख्यमंत्री बी. जी. खेर ने युसुफ़ मेहरअली के बारे में कहा : "वे एक ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने अपने आपको कर्म में निचोड़ डाला |"

          विधानसभा में युसुफ़ मेहरअली के समाजवादी सहकर्मी पीटर अलवारिस ने कहा : "वे उग्रता और मधुरता का मिश्रण थे | उनकी चिंता का एक मात्र विषय प्रत्येक मनुष्य का हित था, स्वार्थ नहीं |"

          युसुफ़ को समर्पित इन सब श्रद्धांजलियों में जो सत्य उजागर हुआ है वह अगले पृष्ठों में प्रस्तुत उनके जीवनचरित से प्रमाणित होता है |

          युसुफ़ की मृत्यु के पश्चात उनके पार्थिव शरीर को पहले समाजवादी दल के लाल झंडे में और फिर तिरंगे राष्ट्रिय झंडे में लपेटकर स्वाधीनता संग्राम के पावन गौरव से जुड़े बंबई के जिन्ना हॉल में रखा गया जिससे कि हजारों नागरिक अपने उस प्रिय युवा नेता के अंतिम दर्शन कर सकें जिसे मृत्यु ने विश्वासघात करके उनसे छीन लिया था | मृत्यु ने जीवन की डाली से एक ऐसा फूल तोड़ लिया था जो पूरी तरह खिल भी नहीं पाया था |

          युसुफ़ मेहरअली की शवयात्रा सायंकाल ठीक चार बजे प्रारम्भ हुई | युसुफ़ की इस अंतिम यात्रा में मोरारजी देसाई, जीवराज मेहता, गणपति शंकर देसाई, नगीनदास टी. मास्टर, एन. एम. चोकसी, मीनू मसानी, आबिद अली जाफर भाई, सिरखे स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों तथा जयप्रकाश नारायण, डॉ. राममनोहर लोहिया, अशोक मेहता, एम. हैरिस, अचुत्य पटवर्धन, एन. जी गोरे, एस. एम. जोशी सरीखे युसुफ़ के समाजवादी सहकर्मीयों के अतिरिक्त हजारों औद्योगिक श्रमिक, गुमाश्ते, युवा बुद्धिजीवी और मध्यवर्गीय कर्मचारी भी शामिल हुए | यह सोचकर आज भी दुःख होता है कि एक निर्भीक राजनीतिज्ञ और उत्कट समाज सुधारक युसुफ़ को जिस समय कब्रिस्तान ले जाया जा रहा था, उनके अनेक सहधर्मियों ने उस अंतिम घड़ी में भी उनके साथ चार कदम चलने और उन्हें अपनाने से इंकार कर दिया था | उनमें से कुछ ने तो शवयात्रा को सामने से गुजरते देखकर रोषपूर्वक अपने घरों की खिड़कियाँ तक बंद कर ली थीं | युसुफ़ अपनी सुधारवादी और क्रन्तिकारी भावना के कारण ही उनके क्रोधभाजन बन गए थे |

          रोग की यंत्रणाओं से जर्जर युसुफ़ मेहरअली की देह बंबई के डोंगरी कब्रिस्तान में संगमरमर की एक कब्र में शाश्वत शान्ति में सोयी पड़ी है, परंतु जैसा कि उनके साथी अशोक मेहता ने ठीक ही कहा था - 'वह पंगुकारी रोग उनकी आत्मा को तनिक भी घायल नहीं कर पाया |' उनकी आत्मा की ज्योतिर्मयी शालीनता आज तक उनके लोगों को मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध समर्पित जीवन जीने की प्रेरणा दे रही है | यही वह धरोहर है जो युसुफ़ अपने पीछे छोड़ गए हैं |    



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