Thursday, 16 April 2015

Socialist Party observes National Week against oppressive role of the state power.

April 6, 2015

Press Release



The Socialist Party firmly relates itself to the legacy of the freedom movement of India. In this regard the party would like to remind the citizens of India that the week April 6-13 was observed during the freedom movement and for many years thereafter as National Week in memory of Mahatma Gandhi's call for a nation-wide hartal against the Rowlett legislation on April 6, 1919 and of the Massacre at Jallianwala Bagh on April 13, 1919. Many special activities recommended by Mahatma Gandhi were undertaken during this time mobilizing people against the colonial oppression. The occasion was also used to underline the contribution of all communities in the national struggle.
The Socialist Party believes that the country must not forget this occasion, not least for its caution against the neo-imperialist deeds and the arbitrary use and abuse of state power by the present political class. To commemorate the National Week, like previous years, the Socialist Party will hold discussions by all its state units on the theme of the freedom movement and its democratic, collective, secular and egalitarian legacy.


Bhai Vaidya
President   

(06-13 अप्रैल) राज्य सत्ता के दमनकारी भूमिका के खिलाफ राष्ट्रीय सप्ताह

April 7, 2015

Press Release


सोशलिस्ट पार्टी पूरी मजबूती से भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत से ख़ुद को जोड़ती है। इस संबंध में सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) 06 से 13 अप्रैल के राष्ट्रीय सप्ताह की याद नागरिकों को दिलाना चाहती है। ये वही दिन  हैं जब स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने 6 अप्रैल 1919 को रोलेट एक्ट का विरोध शुरू किया था और 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग में औपनिवेशिक दमन का खूनी खेल खेला गया था महात्मा गांधी के राष्ट्रव्यापी हड़ताल बुलाने की स्मृति में इस सप्ताह को राष्ट्रीय सप्ताह के रूप में मनाना शुरू किया गया था महात्मा गांधी ने इस दौरान औपनिवेशिक दमन के खिलाफ लोगों को एकजुट करने के लिए कई अभियान शुरू किए इस अवसर का इस्तेमाल राष्ट्रीय संघर्ष में सभी समुदायों के योगदान को रेखांकित करने के लिए भी किया गया।

सोशलिस्ट पार्टी इस बात में यक़ीन रखती है, कि नव-साम्राज्यवादी सत्ता और वर्तमान राजनीतिक हालात में राज्य सत्ता के दुरुपयोग के खिलाफ इस मौके को हमें भूलना नहीं चाहिए पिछले साल की तरह इस साल भी, सोशलिस्ट पार्टी राष्ट्रीय सप्ताह मनाने के लिए स्‍वतंत्रता आंदोलन और उसकी लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और समतावादी विरासत विषय पर सभी राज्यों में गोष्ठियोंका का आयोजलन करेगी


Bhai Vaidya
President 

बटाईदारों व भूमिहीन मजदरू को कैसे मिलेगी राहत?

दिनांकः 8 अप्रैल, 2015

प्रेस विज्ञप्ति
बटाईदारों व भूमिहीन मजदरू को कैसे मिलेगी राहत?

               
सरकार की किसान के उत्पाद को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदने की एक व्यवस्था है ताकि किसान को नुकसान न हो। हाल ही में सम्पन्न रबी मौसम में किसान को धान का ग्रेड ए व बी का क्रमषः रु. 1360 व 1400 प्रति कंुतल दर नहीं मिली। सरकारी खरीद केन्द्र या तो खुले नहीं थे अथवा वे खरीदने से मना कर दे रहे थे। मजबूरी में किसान को अपना धान निजी धान पाॅलिषिंग कारखानों को दलालों के माध्यम से रु. 1000 या 1100 में बेच देना पड़ रहा था। अभी किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य न मिलने के संकट से गुजरा ही था कि एक और संकट खड़ा हो गया। बेमौसम बरसात और कहीं-कहीं ओले पड़ने से किसान को अपूर्तीनीय क्षति हो गई है।

                किसानों की आत्महत्याजो अभी तक हम महाराष्ट्र के विदर्भ अथवा आन्ध्र प्रदेश में सुनने में आती  थी अब उत्तर प्रदेश में भी एक प्रकोप के रूप में पहुंच चुकी है।    

                हमारी मांग है कि किसान को बीमा का पैसा दिया जाए जो किसान के्रडिट कार्ड बनवाने के लिए पंजीकरण के साथ ही स्वतः हो जाता है। इस पैसे से किसान अपना ऋण अदा कर सकता हैजो कि किसान की अत्महत्या का एक बड़ा कारण बनता है।

                उस किसान को जो जमीन का मालिक हैभले ही उसके पास किसान के्रडिट हो अथवा नतो कुछ मुआवजा मिल जाएगा लेकिन दो ऐसी श्रेणी के लोग हैं जो मुआवजे के हकदार नहीं बन पाएंगे। एक तो वह भूमिहीन किसान है जो बटाई पर दूसरे का खेत लेकर खेती कर रहा था। चूंकि जमीन उसके नाम नहीं है इसलिए उसे कोई मुआवजा नहीं मिल सकता। जब कि खेती करते समय हो सकता है कि उसने भी कुछ निवेश किया हो। दूसरी श्रेणी उन भूमिहीन मजदूरों की है जिन्होंने असली मेहनत की - बीज रोपाई से लेकर खाद डालनेनिराई करने तथा फसल काटने तक - लेकिन किसी सरकारी दस्तावेजों पर चूंकि उसका नाम अंकित नहीं इसलिए वह भी मुआवजे से वंचित रह जाएगा। कुछ समझौतों में नकद मजदूरी देने की बात नहीं होती। मजदूर उत्पादन का एक हिस्सा ले लेता है। सवाल यह है कि जब उत्पादन ही नहीं हुआ तो उसे क्या मिलेगा?

                एक ऐसी राष्ट्रीय नीति की जरूरत है जिसमें बटाईदारों एवं भूमिहीन मजदूरों के कृषि उत्पादन में योगदान को स्वीकार किया जाए एवं ऐसी परिस्थिति में जब कृषि उत्पाद को नुकसान पहुंचे उन्हें भी मुआवजे का हकदार माना जाए। यह बटाईदारों व कृषि मजदूरों के लिए कोई बीमा योजना के रूप में हो सकता है।
               
                हलांकि केन्द्रीय सरकार ने किसानों के नुकसान के आंकलन के पश्चात वित्तीय सहायता की घोषणा की है तथा ऋण लिए हुए किसानों के ब्याज को माफ किया हैयह देखा जाना चाहिए कि भूस्वामी किसानों और क्रिसान क्रेडिट कार्ड धारक किसानों के साथ-साथ बटाईदारों व भूमिहीन मजदूरों को भी क्षतिपूर्ति मिलनी चाहिए। सौ प्रतिशत नुकसान की स्थिति में ऋण माफी या अगली फसल के लिए बीजखादपानी व बिजली पर सौ प्रतिशत सब्सिडी देने पर विचार कर सकती है।

                ऊपर से भूमि अधिग्रहण बिल का संकट मुंह बाए खड़ा है। किसानों के लिए तो अच्छे दिन कतई नहीं आए। पहले अध्यादेष लाने पर और संसद में उसे पारित न करा पाने की स्थिति में जब अध्यादेष समाप्त हो गया तो नरेन्द्र मोदी सरकार दूसरा अध्यादेष ले आयी है। इसे जला कर आज हम इस पुरजोर विरोध करना चाहेंगे।

                वर्तमान संकट से एक चीज सीखने को मिलती है। यदि सरकार खरीद के मामले में लापरवाही बरतेगी क्योंकि कहीं न कहीं यह फैसला हो चुका है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में राशन देने के बजाए लोगों के बैंक खातों में नकद हस्तांतरित कर दिया जाएगा तो भारतीय खाद्य निगम के गोदाम धीरे-धीरे खाली हो जाएंगे और बेमौसम बरसात से खड़े हुए वर्तमान संकट के समय की चुनौती का हम सामना न कर पाएंगे। इसी तरह महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजनाजिसके विषय में भी वर्तमान सरकार की सोच कोई सकारात्मक नहीं हैगरीब परिवारों के लिए नकद का स्रोत है और संकट के ऐसे समय में उनके लिए एक उम्मीद की किरण है।

संदीप पाण्डेय
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, सोषलिस्ट पार्टी (इण्डिया)

Monday, 13 April 2015

Modi's jibe at judiciary

The Tribune

Friday, April 10, 2015


Rajindar Sachar

 

Modi's jibe at judiciary

The criticism of judicial activism is untenable



Prime Minister Modi’s gratuitous comment about the judiciary being influenced by five-star activists was a cheap joke which brought down the prestige of the biggest political office of the country. And he made these observations at the Chief Justices’ conference, which was also attended by chief ministers. The diatribe against the judiciary was uncalled for, and dangerous if allowed to be followed by chief ministers.
The remark shows ignorance of the kernel philosophy of a democratic country like ours where three wings - the executive, the legislature and the judiciary -- have an equal role within our Constitution, but still inevitably cannot help breathing down on each other's neck. Statesmanship and sobriety require a mature response from all. Unfortunately, Modi, a former Chief Minister, has not been able to find his feet of working in the broad contours of India's Constitution and that alone could be the excuse put forth by his apologists. Thankfully, the Chief Justice of India issued a dignified response that "Indian judges remain as fearless as they ever were".   
In spite of the executive's unhappiness, the judiciary right from the beginning has not shirked from its path as explained by Chief Justice Patanjali Sastri (1951) thus: "We think it right to point out, what is sometimes overlooked, that our Constitution contains an express provision for a judicial review of legislation as to its conformity with the Constitution. If then, the courts in this country face up to such important and none too easy task, it is not out of any desire to tilt at legislative authority in a crusader's spirit, but in discharge of a duty plainly laid upon them by the Constitution".

The criticism of judicial activism as such is, therefore, untenable.  Courts have for long been judicially active in giving relief in social action litigation to labour, to victims of custodial violence, to victims of excesses committed by the executive.  But as previously judicial targets were comparatively junior officials and certainly never involving politicians, the issue of judicial activism was not raised by politicians.  This charge of alleged interference by courts has only now been made because the fire of judicial activism is coming nearer home to the high officials and politicians who had hypnotised themselves into believing that they were above the law. 

The Prime Minister has, in spite of strong T.V. and public criticism, chosen to keep silent about five-star social activists from whom he alleges the judiciary is said to be threatened. Let me then share a few facts. The Supreme Court has passed various orders to uphold the human rights of people, especially of the deprived sections, at the instance of the People's Union of Civil Liberties, a human rights organisation set up in the dark period of the Emergency (1976) by Jayaprakash Narain, the Socialist leader. The PUCL's constitution forbids foreign donations. Its FUNDSare raised locally. It challenged and got some relief from draconian laws enacted in the name of fighting terrorism like TADA, POTA and the Unlawful Activities Act both by the Congress and B.J.P. governments.

It was at the instance of the PUCL that the Supreme Court directed the candidates to disclose information about their FINANCIAL status and criminal cases pending against them at the time of filing nominations for an election. Such was the effrontery of all political parties, including the Congress, the B.J.P. and even the Left, that they unanimously passed a law specifying that, notwithstanding the Supreme Court verdict, the Election Commission would not follow that judgment. The PUCL had to move the Supreme Court second time to have this resolution of Parliament nullified and it is only then that the present system came to be followed. 

Again, it was at the instance of the PUCL that the government was prohibited from telephone tapping at the executive's pleasure and Parliament was forced to pass legislation.

The right to reject a candidate at the time of an election, though recommended by the Election Commission, was withheld by both the Congress and NDA governments for over a decade till a directive was issued to the Central government on a writ petition filed by the PUCL. Directions to the government to supply food to the starving people of Orissa and poor people have been issued at the instance of the PUCL.  

The bar on M.P.s and M.L.A.s to continue as members of their respective legislature after their conviction was the result of a petition by a citizens’ group. So was the exposure of illegal allotments of Spectrum and coal blocks that were later set aside by the Supreme Court.

It is not necessary for me to go into details to recapitulate where, but for a judicial intervention, many of the urgent public matters would have remained in limbo. Thus the Supreme Court's declarations in gender harassment cases led to the framing of legislation. Similarly but for the Supreme Court the independent status of the Central Vigilance Commission would not have been established. Nor would police reforms have been put on the anvil so as to hold the police accountable for custodial illegalities, notwithstanding that police commissions recommending police reforms in their reports submitted over decades back. This was all at the instance of civic-conscious citizen groups.  

I am willing to concede that courts are now showing more activism than before. But this is a consequence of misfeasance of politicians. It will be a pity if ever a climate was created against the exercise of judicial activism because such an eventuality may lead to the loss of faith in the law as an instrument of social change and justice — an alternative course cannot be viewed in equanimity even by Modi loyalists because people, if denied justice through courts, would inevitably be driven to march through the streets.

Yes, I concede there have been decisions made at the instance of five-star personnel — but they are not at the instance of courts - they are the result of a direct link-up between the Modi government and the big corporate sector. The decision not to appeal in the Vodafone case resulted in the loss of Rs 8,000 crore to the government. The Modi government pressured the State Bank of India to guarantee loans to the extent Rs 6,000 crore to an industrial house close to the present political power for utilising FUNDS to extract coal from Australian mines - ironical when our coal mines are remaining idle because the government says it is short of funds. 

No, Mr Prime Minister, this cheap joke directed at the judiciary was totally uncalled for - more especially when you ignored such a wide, ever-expanding mole in the Central Government's own eye.

*******************************************************************************