Sunday, 17 June 2018

Prof. Keshav Rao Jadhav : A man of Courage, Conviction and Commitment

Prem Singh

Prof. Keshav Rao Jadhav, a prominent socialist thinker and leader passes away on 16th June 2018 at a hospital in Hyderabad at the age of 86. Prof. Jadhav was running ill for a long time. His funeral took place the same day in Hyderabad in the presence of several leaders and activists associated with the Telangana movement and the socialist movement. His last rites were performed by her elder daughter according to Arya Samaj method. Senior socialist leader Jaipal Reddy, former Supreme Court lawyer Sudershan Reddy, revolutionary poet Varvar Rao, senior Congress leader K. Jana Reddy, Telangana Jan Samiti president Prof. M. Kodandaram, along with other leaders, writers, journalists and artists, were present at the time of the funeral.  

A teacher by profession, Prof. Jadhav served as a professor of English in Osmania University till his retirement. Prof. Jadhav was a man of dreams and ideas who  joined the socialist movement in his student days. He was deeply inspired by the philosophy of Dr. Ram Manohar Lohia. He was elected to the post of president of Socialist Yuvjan Sabha (SYS), the youth wing of the Socialist Party. He became close associate of Dr. Lohia in the course of time and worked with him in 'Mankind' and 'Jan'. He published 'Lohia in his words' - a collection of quotations from the writings of Dr. Lohia - in the form of booklets. Comrade Ravela Somayya is planning to compile these booklets into a book. Prof. Jadhav brought out a  magazine namely 'New Mankind', on the pattern of 'Mankind', which he kept publishing for 4-5 years. He also published another magazine namely 'Olympus' almost for a decade. He kept himself engaged in holding and attending discussions/dialogues/workshops/seminars through various forums on issues/topics of social significance. He formed Lohia Vichar Manch with Kishan Patnayak. He, thus, enriched the legacy of socialist philosophy and movement.          

He played a major role in the movement of the separate Telangana state from late sixties to early seventies. He was arrested 17 times during the first phase of the movement and was jailed for two years. He led the Telangana Jan Samiti in order to achieve the goal. This was perhaps the reason that the Chief Minister of Telangana Mr. K. Chandrasekhar Rao condoled his demise.

Prof. Jadhav had been a constant fighter for the rights of the marginalized sections. Simultaneously, he  was a champion of civil liberties. He led the People's Union for Civil Liberties (PUCL) in Andhra Pradesh and later in Telangana. Prof. Jadhav, a true democrat, was against violent methods to be used either by the state or by the ultra left groups called Maoists. He, however, was always in favour of a dialogue with the Maoists. He also constantly fought against the communal forces and worked for peace, harmony  and relief during spells of communal riots the city of Hyderabad. Prof. Jadhav was jailed under MISA during the Emergency.  

Prof. Jadhav took active part in the political activities of Janata Party and then Lok Dal. At last he became disillusioned from the mainstream politics and got associated with Samajwadi Jan Parishad (SJP), formed in 1995 by Kishan Patnayak and other senior and young socialists to counter the New Economic Policies imposed in 1991. He held the responsibility of vice president in SJP. But his mind was ever on a quest. He played a major role in the re-establishment of the original Socialist Party in 2011 in Hyderabad as Socialist Party (India). He remained associated with his new party till the end.

Prof. Jadhav will be remembered as a man of courage, conviction and  commitment. The Socialist Party (India) has lost its three stalwarts - Bhai Viadya, Justice Rajindar Sachar and now Prof. Jadhav - within last three months. The demise of Prof. Jadhav is indeed a big loss to the socialist movement in general and to  the Socialist Party in particular.

We pay our humble tributes to him with a pledge that the fight for socialism will go on uninterrupted.

Author teaches Hindi at Delhi University and is president of Socialist Party (India), Former Fellow,Indian Institute of Advanced Study, Shimla
Former Visiting Professor, Center of Oriental Studies, Vilnius University, Lithuania
Former Visiting Professor, Center of Eastern Languages and Cultures.Dept. of Indology, Sofia University,Sofia. Bulgaria              

Saturday, 16 June 2018

Veteran Socialist Party leader Prof. Keshav Rao Jadhav passes away

16 June 20 18
Press Release
Veteran Socialist Party leader Prof. Keshav Rao Jadhav passes away

Prof. Keshav Rao Jadhav, a prominent leader of the Indian Socialist Movement, passes away today on 16th June 2018 at a hospital in Hyderabad. 85 years old Prof. Jadhav was running ill for a long time. His funeral was done in Hyderabad today in which leaders and activists associated with the Telangana movement and socialist movement participated in large numbers.

Prof. Jadhav, a retired teacher of English literature, had close association with Dr. Ram Manohar Lohia. He worked with Dr. Lohia in 'Mankind'. He was among the prominent leaders of Dr. Lohia's Socialist Party.

He played a major role in the movement of separate Telangana state and led Telangana Jan Samiti to achieve the goal. He also led the People's Union for Civil Liberties (PUCL) in Andhra Pradesh later on in Telangana.

Prof. Jadhav had been associated with Samajwadi Jan Parishad(SJP), formed in 1995. He played a major role in the re-establishment of the Socialist Party as Socialist Party (India) in 2011 in Hyderabad.

Prof. Jadhav's death is a big loss for the socialist movement and for the Socialist Party. All members of the Socialist Party pay their humble tribute to Prof. Jadhav.

Dr. Prem Singh

प्रेस रिलीज़
सोशलिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रोफ. केशव राव जाधव का निधन

भारतीय समाजवादी आंदोलन के प्रमुख हस्ताक्षर प्रोफ. केशव जाधव का आज 16 जून 2018 को सुबह हैदराबाद के एक अस्पताल में निधन हो गया. 85 वर्षीय प्रोफ. जाधव लम्बे समय से बीमार चल रहे थे. उनका अंतिम संस्कार आज ही हैदराबाद में किया गया, जिसमें समाजवादी कार्यकर्ताओं के साथ तेलंगाना आंदोलन से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं ने बड़ी संख्या में हिस्सा लिया.

अंग्रेजी साहित्य के शिक्षक रहे प्रोफ. जाधव डॉ. राममनोहर लोहिया के निकट सहयोगी थे. उन्होंने डॉ. लोहिया के साथ 'मैन काइंड' में काम किया था. डॉ. लोहिया की सोशलिस्ट पार्टी के वे प्रमुख नेताओं में थे. उन्होंने 60 के दशक से ही अलग तेलंगाना राज्य बनाने के आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभायी थी. वे तेलंगाना जन समिति के अध्यक्ष थे. पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की आंध्र प्रदेश और तेलंगाना इकाई के साथ भी वे सम्बद्ध रहे.

प्रोफ. जाधव 1995 में गठित समाजवादी जन परिषद् के वरिष्ठ नेता रहे. सोशलिस्ट पार्टी की हैदराबाद में 2011 में सोशलिस्ट पार्टी (भारत) के नाम से की गई पुनर्स्थापना में उनकी प्रमुख भूमिका थी.
प्रोफ. जाधव का निधन समाजवादी आंदोलन और सोशलिस्ट पार्टी के लिए बड़ी क्षति है. सोशलिस्ट पार्टी के समस्त सदस्यों की ओर से प्रोफ. जाधव को विनम्र श्राद्धांजलि.

डॉ. प्रेम सिंह

Wednesday, 13 June 2018

लोकसभा चुनाव 2019 : विपक्षी एकता के लिए एक नज़रिया

प्रेम सिंह

लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के शिक्षक
और सोशलिस्ट पार्टी (भारत) के अध्यक्ष हैं
 विपक्षी एकता के जटिल विषय पर चर्चा करने से पहले कुछ स्पष्ट तथ्यों को देख लेना मुनासिब होगा. पहला, पिछले करीब तीन दशकों से जारी नवउदारवादी नीतियों का कोई विपक्ष देश में नहीं है. न मुख्यधारा राजनैतिक पार्टियों के स्तर पर, न बौद्धिक वर्ग के स्तर पर. लिहाज़ा, देश के संसाधनों, श्रम और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों/प्रतिष्ठानों को कारपोरेट घरानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बेचने का सिलसिला इसी तरह चलते रहना है; किसानों, असंगठित और संगठित क्षेत्र के मज़दूरों, कारीगरों, छोटे उद्यमियों, बेरोजगारों की जो बुरी हालत है, उसमें बदलाव की संभावना नहीं है; और आर्थिक विषमता की खाई इसी तरह बढ़ती जाएगी. नतीज़तन, समाज में तनाव, अलगाव, आत्महत्या, अपराध, अंधविश्वास, झूठ, फरेब जैसी प्रवृत्तियां जड़ जमाती जायेंगी. दूसरा, 2019 के लोकसभा चुनाव में वर्तमान सरकार की पराजय के बावजूद साम्प्रदायिक कट्टरता का उन्मूलन नहीं होगा. मौजूदा साम्प्रदायिक कट्टरता का चरित्र नवउदारवादी व्यवस्था के साथ गहराई से सम्बद्ध है. विपक्षी पार्टियाँ और सेक्युलर बुद्धिजीवी इस सच्चाई से आँख चुरा कर धर्मनिरपेक्षता बचाने की गुहार लगाते हैं. वे यह समझने को तैयार नहीं हैं कि संविधान के मूलभूत मूल्यों में से समाजवाद को त्याग देने के बाद धर्मनिरपेक्षता को नहीं बचाया जा सकता. बल्कि कहा जा सकता है कि साम्प्रदायिक कट्टरता बढ़ती जायेगी और समाज पर उसका कहर ज्यादा तेज़ी से टूटेगा. तीसरा, संविधान और संस्थाओं का अवमूल्यन नहीं रुकेगा, क्योंकि यह संविधान और उस पर आधारित संस्थाएं कारपोरेट उपनिवेशवाद अथवा नवसाम्राज्यवाद के तहत नवउदारवादी भारत (जिसे कभी 'शाइनिंग इंडिया' और कभी 'न्यू इंडिया' कहा जाता है) बनाने के लिए तैयार नहीं किये गए थे. चौथा, व्यक्तिवाद, परिवारवाद, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद, धन-बल, बाहु-बल आदि नकारात्मक प्रवृत्तियों के सम्मिश्रण से बनी राजनीति देश में आगे भी बदस्तूर चलती रहेगी. चौथा, संसाधनों की बिकवाली और सार्वजनिक उद्यमों के विनिवेश की प्रक्रिया में राजनीतिक पार्टियों/नेताओं को जो अवैध और कानूनन चंदे के रूप में अकूत धन मिलता है, उसके बल पर राजनीति धन का खेल बनी रहेगी.
      आशावादी इसे निराशावाद न समझें, यह हकीक़त है. इस हकीक़त के मद्देनज़र 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी एकता का अर्थ चुनावी एकता ही हो सकता है. यह एकता चुनाव-पूर्व होनीं चाहिए और उसे यथार्थवादी नज़रिए, यानी चुनावी जीत के नज़रिए से अंजाम देना चाहिए. मोदी-शाह ने लोकतंत्र को चुनाव जीतने की हविस में तब्दील कर दिया है. लोकतान्त्रिक मर्यादा उनके लिए कोई मायने नहीं रखती. मोदी-शाह के नेतृत्व में 2019 का लोकसभा चुनाव एक ऐसा मर्यादा विहीन घमासान होगा कि लोकतंत्र पनाह मांगता घूमेगा! विपक्ष को चुनावी दौड़ में मोदी-शाह की शिकार-वृत्ति का शिकार नहीं होना चाहिए. उस रास्ते पर जीत मोदी-शाह की ही होगी. विपक्ष को देश के संविधान का सम्मान और नागरिकों पर भरोसा करते हुए लोकतंत्र की मर्यादा के दायरे में चुनाव लड़ना चाहिए.
      यह सही है कि चुनाव लोकतंत्र का सबसे अहम पक्ष है. लेकिन साथ में यह भी सही है कि लोकतंत्र है तो चुनाव हैं. लोकतंत्र चलता रहेगा तो नवउदारवाद/नवसाम्राज्यवाद से लड़ने वाली राजनीति के लिए कुछ न कुछ संभावना बनी रहेगी. डॉ. लोहिया ने कहा है कि राजनीति बुराई से लड़ने का काम करती है. भारत के नेता और बुद्धिजीवी हालाँकि ऐसा नहीं मानते प्रतीत होते, लेकिन भारत की मौजूदा नवउदारवाद/नवसाम्राज्यवाद की मातहत राजनीति अपने आप में एक बुराई बन गई है. राजनीति स्थायी रूप से बुराई की वाहक बन कर न रह जाए, इसके लिए चुनावों में सरकारों का उलट-फेर होते रहना ज़रूरी है. यह लोकतंत्र के रहते ही संभव है. लिहाज़ा, विपक्षी पार्टियों की चुनावी एकता लोकतंत्र के सार्थक बने रहने की दिशा में बड़ी भूमिका निभा सकती है.
      भाजपा के साथ एनडीए में छोटे-बड़े 35 से ऊपर दल शामिल हैं. लोकसभा चुनावों में एक साल से कम समय रह गया है. चुनावों तक इस गठबंधन में टूट-फूट की संभावना कम ही लगती है. लोकजन शक्ति पार्टी, अपना दल, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी आदि का जो असंतोष दिखाई देता है, वह सरकार की नीतियों या असफलता को लेकर नहीं, 2019 में ज्यादा से ज्यादा सीटें पाने के लिए है. मोदी-शाह यह अच्छी तरह समझते हैं.     
      इधर विपक्ष की फुटकर गठबंधनों की रणनीति से कुछ संसदीय और विधानसभा सीटों पर भाजपा को हराया गया है. लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में यह फुटकर गठबंधन की रणनीति कारगर नहीं हो सकती. राष्ट्रीय स्तर का चुनाव राष्ट्रीय स्तर की रणनीति से लड़ा जाना चाहिए. उसके लिए राष्ट्रीय समझ पर आधारित राष्ट्रीय स्तर का गठबंधन जरूरी है. सवाल है कि एनडीए के बरक्स बनने वाला बाकी दलों का गठबंधन कांग्रेस के साथ बने या कांग्रेस से अलग. नेताओं और बुद्धिजीवियों की तरफ से दोनों तरह के विचार और प्रयास सामने आ रहे हैं. यहाँ विचारणीय है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों दो-दलीय संसदीय लोकतंत्र के पक्ष में हैं. मनमोहन सिंह और लालकृष्ण अडवाणी कह चुके हैं कि देश में दो ही पार्टियां होनी चाहिए. बाकी दलों को इन्हीं दो पार्टियों में विलय कर लेना चाहिए. भाजपा अमेरिका के पैटर्न पर अध्यक्षीय प्रणाली के भी पक्ष में है. दरअसल, कारपोरेट पॉलिटिक्स की यही ज़रुरत है कि भारत में अमेरिका की तरह केवल दो पार्टियां हों.
      ऐसी स्थिति में कांग्रेस से अलग गठबंधन बनेगा तो बहु-दलीय संसदीय लोकतंत्र की संविधान-सम्मत प्रणाली को वैधता और मज़बूती मिलेगी. संविधान भारतीय राज्य के संघीय ढाँचे को स्वीकृति देता है. लेकिन आज़ादी के बाद से ही केंदवादी प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिलता रहा है, जिसे वर्तमान सरकार ने चरम पर पहुंचा दिया है. राज्य के संघीय ढाँचे का सत्ता, संसाधन और गवर्नेंस के विकेंद्रीकरण से अविभाज्य संबंध है. भाजपा और कांग्रेस से अलग चुनाव-पूर्व गठबंधन बनने पर संघीय ढांचे और विकेंद्रीकरण का थोड़ा-बहुत बचाव ज़रूर होगा. प्रधानमंत्री मोदी कितना भी कांग्रेस-मुक्त भारत की बात करते हों, वे कांग्रेस को ही अपना विपक्ष मानते हैं. इसका मायना है कि वे कंग्रेसेतर विपक्ष की अवधारणा को ख़त्म कर देना चाहते हैं. यह कांग्रेस के भी हित में है कि 2019 नहीं तो 2024 में मतदाता उसे बहुमत से जिताएं, ताकि राहुल गाँधी के प्रधानमंत्री बनने में कोई बाधा न रहे.
      कांग्रेस पिछले चार सालों में किसान-मज़दूरों-बेरोजगारों के हक़ की बात छोडिये, गहरे संकट में पड़ी देश की सबसे बड़ी अकलियत के बचाव में एक बार भी सड़क पर नहीं उतरी है. इसका मुख्य कारण उसका सत्ता-भोगी चरित्र है. लेकिन यह रणनीति भी है. कांग्रेस शायद चाहती है कि मुसलमान इतना डर जाएं कि भविष्य में आँख बंद करके केवल कांग्रेस को वोट दें. दलित और पिछड़े समुदायों के राजनीतिकरण के बाद कांग्रेस की एकमुश्त वोट बैंक के रूप में मुलसमानों पर ही नज़र है. कांग्रेस से छिटकने के बाद मुसलमानों का ज्यादातर वोट राजनीति की तीसरी ताकत कही जाने वाली पार्टियों को मिलता है.
      मोदी की जुमलेबाजी लोगों को हमेशा बेवकूफ नहीं बनाये रख सकती. न ही येन-केन प्रकारेण चुनाव जीतने और सरकार बनाने की शाह की 'चाणक्य-नीति' हमेशा कारगर बनी रह सकती है. मोदी ने सरकार को कारपोरेट घरानों के मुनाफे का औज़ार बना दिया है. यह सबसे अमीर आदमी को सबसे पहले फायदा पहुँचाने वाली सरकार बन गई गई है. सरकार की इस अंधेरगर्दी से तबाह किसान-मज़दूर-कारीगर-उद्यमी-बेरोजगार आज नहीं तो कल भाजपा के खिलाफ वोट डालेंगे. कारपोरेट घरानों का धन और खरीदा हुआ मीडिया उसकी सत्ता नहीं बचा पाएंगे. कांग्रेस उसी घड़ी के इंतजार में बैठी लगती है. अगर राजनीति की तीसरी कही जाने वाली शक्ति की अवधारणा राष्ट्रीय स्तर पर ख़त्म हो जाती है, तो वह वोट कांग्रेस को ही मिलेगा. और कांग्रेस के पांच या दस साल राज करने के बाद फिर से भाजपा को. अगर कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने पर केंद्र में सरकार बन भी जाती है, तो कांग्रेस उसे कार्यकाल पूरा नहीं करने देगी. मध्यावधि चुनाव होने की स्थिति में फिर मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच होगा.    
      कांग्रेस से अलग राष्ट्रीय मोर्चा बनाने का अर्थ एक राजनीतिक पार्टी के रूप में कांग्रेस का विरोध नहीं है. कांग्रेस अपने में समर्थ पार्टी है. उसका संगठन राष्ट्रीय स्तर पर है. पिछले लोकसभा चुनाव में करारी पराजय के बाद भी संसद में भाजपा के बाद उसका दूसरा स्थान है. जिन राज्यों में उसकी मज़बूती है, वहां वह पूरी ताकत से चुनाव लड़े. अगर राष्ट्रीय मोर्चा को चुनावों में पूर्ण बहुमत नहीं मिल पाता है, तो कांग्रेस बाहर से राष्ट्रीय मोर्चा सरकार को समर्थन दे सकती है. हालाँकि वैसी स्थति में एनडीए के कुछ घटक दल भी भाजपा का साथ छोड़ कर राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के साथ जुड़ सकते हैं.      
      भाजपा और कांग्रेस से इतर गबंधन को सामाजिक न्यायवादी राष्ट्रीय मोर्चा (नेशनल फ्रंट फॉर सोशल जस्टिस) नाम दिया जा सकता है. इसमें कम्युनिस्ट पार्टियों सहित वे सभी दल शामिल हो सकते हैं जो भाजपा और कांग्रेस के साथ मिल कर लोकसभा चुनाव नहीं लड़ना चाहते. राष्ट्रीय मोर्चा के निर्माण का काम बिना देरी किये शुरू किया जाना चाहिए. इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए एक संयोजन समिति, जिसका एक संयोजक हो, बनाने से सहूलियत होगी. संयोजक के पद के लिए एक नाम शरद यादव का हो सकता है. प्रस्तावित मोर्चा के चार-पांच प्रवक्ता बनाए जाएं जो सीधे और मीडिया की मार्फत मोर्चा के स्वरूप, नीतियों और प्रगति पर लगातार रोशनी डालें. एक समिति चुनाव प्रचार की रणनीति और चुनाव सामग्री तैयार करने के लिए बनाई जाये.
      राष्ट्रीय मोर्चा में छोटे विचारधारात्मक दलों की भूमिका का भी सवाल महत्वपूर्ण है. उनके सहयोग का रास्ता निकाला जाना चाहिए. बेहतर होगा कि विचाधाराहीनता (संविधान की विचारधारा सहित) की वकालत करने वाले दलों और व्यक्तियों को राष्ट्रीय मोर्चा से अलग रखा जाए. क्योंकि वे सीधे नवउदारवादी विचारधारा की पैदाइश, लिहाज़ा, समर्थक होते हैं. राजनीतिक समझदारी से काम करने वाले नागरिक संगठनों और व्यक्तियों को भी राष्ट्रीय मोर्चा से जोड़ने का काम होना चाहिए. इनमें कल-कारखानों, खदानों, कृषि, वाणिज्य-व्यापार, साहित्य, कला, अध्ययन, खेल आदि से जुड़े संगठन और व्यक्ति हो सकते हैं. राजनीतिक रूचि रखने वाले अप्रवासी भारतीयों, जो देश के बिगड़ते हालत पर चिंतित हैं, को भी राष्ट्रीय मोर्चा से जोड़ा जा सकता है. ऐसा प्रयास होने से देश में व्यापक सहमती का माहौल बनेगा और राष्ट्रीय मोर्चा भविष्य की राजनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकेगा.       
      राष्ट्रीय मोर्चा की जीत की संभावनाएं बढ़ सकती हैं, यदि साझा न्यूनतम कार्यक्रम इस वायदे के साथ बनाया जाए कि नई सरकार किसानों, मज़दूरों, छोटे-मंझोले व्यापारियों/उद्यमियों, बेरोजगारों के पक्ष में नवउदारवादी आर्थिक नीतियों की समीक्षा करेगी. भाजपा और कांग्रेस यह वादा नहीं कर सकतीं. इसके अलावा, राष्ट्रीय मोर्चा का नेतृत्व अपने सामाजिक आधार के चलते विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन, विश्व आर्थिक मंच आदि के आदेशों को कांग्रेस और भाजपा जैसी तत्परता और तेज़ी से लागू नहीं कर सकता. ऐसा होने से कारपोरेट घरानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट में कुछ न कुछ कमी आएगी. राष्ट्रीय मोर्चा की जीत से सरकारों द्वारा संविधान में उल्लिखित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' के अनुसार आर्थिक नीतियां बनाने की पुनर्संभावना को बल मिलेगा.  
      राष्ट्रीय मोर्चा के प्रधान नेता, जो प्रधानमंत्री का उम्मीदवार भी हो, का फैसला बहुत जटिल काम है. लेकिन 2019 का चुनाव जीतने के लिए विपक्षी नेताओं को यह फैसला समझदारी से करना ही होगा. मैंने 2014 के लोकसभा चुनाव के अवसर पर 'तीसरे मोर्चे की प्रासंगिकता' शीर्षक लेख लिखा था. उसमें कांग्रेस और भाजपा से अलग राजनीतिक दलों के चुनाव-पूर्व गठबंधन बनाने की वकालत की थी. गठबंधन के नेता के रूप में एक नाम सीपीआई के वरिष्ठ नेता एबी बर्धन का सुझाया था. उस समय चुनाव के बाद गठबंधन बनाने का आग्रह लेकर चलने वाले नेताओं की वजह से तीसरे मोर्चे का निर्माण नहीं हो पाया.  
      भाजपा और कांग्रेस से अलग विपक्षी गठबंधन की नेता के रूप में ममता बनर्जी और मायावती के नामों की चर्चा होती है. ममता बनर्जी साधारण पृष्ठभूमि से आती हैं. हालांकि कांग्रेस में रहते हुए उन्हें एक सत्तारूढ़ और साधन-संपन्न राजनीतिक पार्टी का आधार मिला हुआ था. लेकिन कांग्रेस से अलग होने के बाद उन्होंने कड़ी मेहनत से तृणमूल कांग्रेस को खड़ा किया. उन्होंने संघर्ष करके अपनी राजनीतिक हैसियत हासिल की है. उसीके चलते वे लगातार दूसरी बार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं. उनकी सरकार किसी अन्य दल पर निर्भर नहीं है. हाल के पंचायत चुनावों से पता चलता है कि मतदाताओं पर उनकी मज़बूत पकड़ बनी हुई है. बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की सुप्रीमो मायावती दलित समाज से आती हैं. आज की राजनीति में वे अकेली सेल्फ-मेड नेता हैं. उनकी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्ज़ा हासिल है. ज्यादातर प्रांतों में उनकी पार्टी की इकाइयां हैं. 2009 के लोकसभा चुनाव में मायावती को तीसरे मोर्चे का प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाने की बात की गई थी. मायावती के नेतृत्व में बनने वाली सरकार की राजनीतिक अर्थव्यवस्था (पोलिटिकल इकॉनमी) नवउदारवादी अर्थव्यवस्था से कुछ न कुछ अलग हो सकती है. वे फिलहाल विधायक या सांसद नहीं हैं. लिहाज़ा, राष्ट्रीय मोर्चा के निर्माण और चुनावों की तैयारी में अभी से पूरा समय दे सकती हैं.  
      यहाँ उपर्युक्त दो नाम इसलिए विचारार्थ रखे गए हैं क्योंकि इन दो नेताओं के अलावा अभी अन्य किसी नेता का नाम फिलहाल चर्चा में नहीं है. एम. करूणानिधि की उम्र करीब 95 साल हो गई है. मुलायम सिंह की उम्र 78 साल है, लेकिन उनका स्वास्थ्य ऐसा नहीं है कि वे राष्ट्रीय मोर्चा के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार हो सकें. अलबत्ता, सलाहकार की भूमिका वे बखूबी निभा सकते हैं. वे उत्तर प्रदेश के बाहर चुनाव प्रचार के लिए निकालें तो बड़ी उपलब्धि होगी. नीतीश कुमार का नाम पहले काफी चलता था, लेकिन वे महागठबंधन को तोड़ कर भाजपा के साथ जा चुके हैं. वे अब लौटें भी तो उनकी साख नहीं बन पाएगी. चंद्रबाबू नायडू हाल में एनडीए से निकले हैं. उनका भरोसा नहीं है कि वे वापस एनडीए में नहीं लौट जायेंगे. नवीन पटनायक चौथी बार उड़ीसा के मुख्यमंत्री हैं. 2009 में उन्होंने भाजपा नीत एनडीए छोड़ कर वामपंथी पार्टियों के साथ गठजोड़ किया था. वे मुखर नेता नहीं हैं और उड़ीसा के बाहर ज्यादा नहीं निकलते. 2019 के लोकसभा चुनावों को लेकर जो राजनीतिक गहमा-गहमी है, उसमें वे अभी शामिल नहीं हैं. हाल में कर्णाटक में कांग्रेस के समर्थन से बनी जनता दल (एस) की सरकार के शपथ-ग्रहण कार्यक्रम में भी वे नहीं थे. अभी तक वे अप्रतिबद्ध (नॉन कमीटल) हैं. वे राष्ट्रीय मोर्चा में रहें, इसकी कोशिश की जानी चाहिए. कहने की ज़रुरत नहीं कि भाजपा और कांग्रेस से अलग गठबंधन के नेता के रूप में जिस नाम पर सहमति बनती है उसे अपनी सोच का धरातल ऊंचा उठाना होगा.  
      पूर्व वाणिज्य और वित्त सचिव एसपी शुक्ला ने नई आर्थिक नीतियों के दुष्परिणामों पर शुरूआती दौर में ही गंभीर विचार और प्रतिरोध किया था. विपक्षी एकता के सवाल पर उनके साथ हाल में पूना में चर्चा हुई. मैंने उनके सामने ममता अथवा मायावती के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा बनाने का विचार रखा. उन्होंने कहा यदि ममता अथवा/और मायावती के नेतृत्व में अगला चुनाव लड़ा जाता है, तो यह राजनीति में 1989 में हुए सबाल्टर्न प्रवेश के बाद जेंडर प्रवेश का अगला चरण होगा. देश के सभी बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट, जो संविधान के आधारभूत मूल्यों - समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र - और संवैधानिक संस्थाओं के क्षरण को लेकर चिंतित हैं, उन्हें राष्ट्रीय मोर्चा के निर्माण और स्वीकृति की दिशा में सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए. भारत में अक्सर नेताओं ने बुद्धिजीवियों-कलाकारों को प्रेरणा देने का काम किया है. आज की जरूरत है कि बुद्धिजीवी, कलाकार और नागरिक समाज के सचेत नुमाइंदे नेताओं का मार्गदर्शन करें.   


Monday, 11 June 2018

Raj Kishore : An uncompromising journalist passes away

Veteran journalist Raj Kishore passed away on 4 June 2018 at the age of 72. He had recently lost his 42 years old  son Vivek, also a journalist, merely one and a half months ago. Vivek met a sudden death on 21 April  due to a massive brain stroke and was cremated at Nigam Bodh Ghat electric crematorium the same day.
Raj Kishore, as usual, was calm at the crematorium and even discussed with me  the possibility of bringing out a Hindi magazine on the pattern of Mainstream Weekly. I came to know from other colleagues that he had similar discussions with them as well. Despite the numbing loss, he resumed his writings the very next day.  I could feel that he was in some sort of a self-denial mode. The mental shock of the death of his young son ultimately took its toll sooner than one might expect. Raj Kishore suffered an attack of pneumonia just a few days later. He was first admitted to Kailash Hospital at Noida on 15 May. Next day, with the help of Dr. Anup Saraya, he was shifted to the AIIMS and admitted in the ICU for 22 days till he bid farewell to this world.
Raj Kishore started his career as a journalist from Ravivar in Calcutta under the editorship of Surendra Pratap Singh. He was admired by the readers for his innovative ideas, deep human and social concerns, philosophical insights, playful language and a novel style. The aspiring youth who sought to pursue their career in journalism, learnt a lot from his writings. He left Ravivar for a short period to start his own magazine Parivartan and again joined Ravivar.
 He was brought to Delhi by Rajendra Mathur in 1990 and was assigned with the responsibility of editorial page in Nav Bharat Times. I met him for the first time as he took a rented accommodation in Anand Vihar. He inspired me too for writing in newspapers. After a service of 7 years he was ousted from Nav Bharat Times by the new management of the Times Group because he out rightly refused to accept the decision of converting Nav Bharat Times into a ‘Hinglish’ newspaper.
Raj Kishore, a staunch Lohiaite, was groomed in the values of the freedom movement and the post independence era of nation-building. He was firm in his ideological and ethical convictions. Therefore, he never got a job in any of the media houses till his death. In fact, he became the first victim of the neo-liberal political economy adopted by the media houses in the beginning of nineties.
Raj Kishore, 1997 onwards, did freelancing for the survival of his family. He started his own Hindi monthly journal Dusara Shanivar in 1997 but could not sustain it due to financial constrains. Apart from writing articles/comments/features for newspapers and magazines, he wrote and edited several books. Aaj Ke Prashan series edited by him became very popular, particularly among young readers. The series was focused on contemporary contentious issues related to dalit, women, subaltern, minorities discourses, impact of neo-liberal policies and the secular-communal question. He developed and encouraged several new writers through this series.
He edited the ‘Panchayati Raj Update’ in Hindi and English for more than a decade for Institute of Social Sciences. He made study tours to certain European countries during this period. He was at the Mahatama Gandhi Antarrashtriy Hindi Vishwvidyalay (MGAHV) as writer-in-residence. He stayed there from 2011 to 2014 and edited Hindi Samay, an online site of the university. It is one of his important gifts to  Hindi literature apart from his invaluable contribution to Hindi journalism.
As the remuneration in Hindi writing is negligible, he had to burn the midnight oil to make both ends meet. That affected him badly due to  continuous pressure of work. However, there was no choice before him but to work hard for  sheer survival. He started editing Ravivar Digest, a small Hindi monthly in 2015. True to his uncompromising self, he left the job a few months ago because the owner declined to publish an article selected by him in which a critique of ‘Deen Dayal Upadhyaya’s Ekatm Manavwad’ was made.
A few days before the death of his son, Raj Kishore, in search of some new assignment, asked me to talk to Dr. AK Arun, editor of ‘Yuva Samvad’, just to check whether he would be inclined or interested to associate him with the magazine. Even before we could make any move on this, everything ended rather abruptly. The philosopher journalist left the family – wife, daughter, daughter in law, two little grand children – and all of us totally unprepared!
For a life as brilliant and committed as Raj Kishore’s his passing is definitely an irreparable loss to his family but the larger vacuum it has left in the world of  journalism is tangible, even if it doesn’t seem apparent. The damage is most to Hindi journalism as it has lost a figure that stood up staunchly to pressures of  corporate commerce, cynicism and new age madness of neo-liberalism.
Author teaches Hindi at Delhi University and is president of Socialist Party (India), Former Fellow,Indian Institute of Advanced Study, Shimla
Former Visiting Professor, Center of Oriental Studies, Vilnius University, Lithuania
Former Visiting Professor, Center of Eastern Languages and Cultures.Dept. of Indology, Sofia University,Sofia. Bulgaria      

Friday, 8 June 2018

The Qila-Turned-Golf Course in Hyderabad is Why We Must be Sceptical of 'Adopt a Heritage'

Dr. Lubna Sarwath

The golf course inside Naya Qila-Golconda Fort. Credit: Hyderabad Golf Association website

The ‘Adopt a Heritage’ scheme of the government of India, under which Dalmia Bharat Private Limited has been allowed to ‘adopt’ the Red Fort, has created a stormy debate in heritage and conservation circles. A few have supported it arguing that it will only help in the upkeep of old structures and that the Archaeological Survey of India (ASI) will still control the monument itself.
Under the scheme, Golconda Fort and Charminar, Hyderabad, protected monuments of the ASI, are under active consideration in Phase II. In this context, it will be useful to consider the example of Naya Qila, a 17th-century structure which is a part of the larger Golconda Fort complex and which was leased out to a private sporting association some years ago.
The deal was between the Telangana (then Andhra Pradesh) Tourism Development Corporation and Hyderabad Golf Association (HGA) that began in 2002 through a deed of license – executed on the basis of ‘in-principle approval’ given by ASI Delhi dated November 29, 2001. Many had argued that it was in violation of the Ancient Monuments Archaeological Sites and Remains Act,(AMASR Act) 1958.
Since then, the Golconda Fort-Naya Qila has been used as a golf course. In order to blatantly facilitate golfing activity, the structure of the monument, site and remains of ancient heritage walls of Golconda Fort-Naya Qila were broken, blasted, dumped and remodelled in utter disregard of the destruction. Some officials tried to stop this, but their efforts failed when ASI Delhi approved the changes after it was given a go-ahead by the then tourism secretary Chandana Khan and chief minister Chandrababu Naidu.

In violation of all regulations, the Golf Association has been restricting the free entry of the public
 through all entrances to Naya Qila and preventing their free movement
 inside the monument. Courtesy: Dr Mandal
The systemic devastation
Initially, the plan was to set up a birds sanctuary; this changed when the erstwhile Andhra Pradesh government proposed a golf course in 50 acres of Naya Qila-Golconda. The then secretary (culture), R.V.V. Ayyar, the then director general, ASI, New Delhi and then superintending archaeologist, Hyderabad Circle, in 1998 had opposed the idea of a golf course inside fort walls stating that “AMASR Act does not permit such activities and it is beyond his purview to grant permission” and that “Land proposed for golf course is not ideal because of its location inside the fort wall and requested to look for alternate locations outside the fortification” as well as that “Due to the quantum of land required by APTDC (Andhra Pradesh Tourism Development Corporation) and the need for intense manipulation of natural regimens the new golf course and the expansion of the existing golf course inside the Heritage Monument is being generally discouraged all over the world.”
These are all available in the official letters submitted to the court in March 2017 in a petition that I had filed.
However, on November 29, 2001, the director general of ASI gave an in-principle approval for setting up of a golf course within the fort walls of Golconda Fort-Naya Qila in an area roughly measuring 50 acres for landscaping purpose subject to observation of certain conditions by the state government and subject to approval of golf layout plan inside and outside the fort walls. Based upon the in-principle approval, the deed of license was signed in February 2002 between Hyderabad Golf Association and Tourist Development Corporation.
Panoramic view over the southern side of Naya Qila from the top of the Golconda. Credit: Wikimedia Commons
In violation of all regulations, the Golf Association has been restricting the free entry of the public through all entrances to Naya Qila and preventing their free movement inside the monument. During a visit, the security of the club registers the names and mobile numbers of tourists. Golf security guards track those tourists who resist registration. CCTV surveillance cameras have been fixed on fort walls and some places of tourist interest are encircled by barbed wire. Signboards have been put up at many places reading “trespassers will be prosecuted” and/or “Golf course project”.
The chabutras (huge elevated stone platforms) that are a part of the monument are being used for the golf course as tees by raising the level of the surrounding area. Tees have also been laid on fort walls at multi-levels and inside the water body.
The public can access barely 10% of the wall. Similarly, public access to the 13 burges, the cannon, watchtower, surangs, chabutra and water channels has been stopped. The ambience and character of the skyline of the area have been destroyed.

The board at the Naya Qila entrance. Credit: Lubna Sarwath
The stone bund of Naya Qila talab was blasted, heritage sluices and weir were made defunct, and were cemented to lay pipes underneath the bund. Irrigation channels that nourished Qutub Shahi gardens and bowlis inside Naya Qila talab were obliterated. The Naya Qila talab was filled over, which is when Save Our Urban Lakes (SOUL) filed a case in the high court in 2013 that officials and district collector of Hyderabad have included it in the notified water bodies list and declared its area as 28 acres.
There has been a complete destruction of wetlands and migratory birds have not returned. Hundreds of trees inside Naya Qila were burnt. Cases were filed in the high court against the environmental ruin perpetrated by Tourism Development Corporation and ASI. HGA was directed to compensate, which it never did.
Since Golconda Fort was on the tentative world heritage list, UNESCO wrote to the ASI in 2009 about the “negative impact of golf course on Golconda Fort monument” and sought “information on steps taken to protect the fort and its surroundings”.
There was more international pressure in 2009, when Robert Simpkins of San Jose State University wrote to the ASI and the chairman of APTDC stating that the heritage tag of Golconda Fort is in danger and the lease should be cancelled so that the “site integrity of Golconda-Naya Qila can be protected as it retains great site integrity”.
The ASI Hyderabad in its ‘Report on genesis and illegalities of HGA’ as well as in its affidavit filed before the high court held government agencies including the municipal corporation, water board and the HGA responsible for the destruction inflicted on Golconda-Naya Qila.
It is pertinent to note here that in spite of illegalities and breach of contract on multiple counts, and without an approved golf layout plan in place, the ASI still trusted the Golf Association, and an MOU was signed on September 23, 2009 between the ASI New Delhi and secretary tourism with Clause 8 seeking that ‘layout plan of the entire Golf Course including the completed portion, both within the fort walls and outside, is submitted to the ASI by Hyderabad Golf Association for its approval before commencement of any further work’. This in spite of stiff opposition from ASI Hyderabad officials at the time.
In fact, the managing director of Telangana tourist department, secretary of tourist, and superintending archaeologist of ASI Hyderabad are ex-officio members of the HGA managing committee. Further, under the deed of license, that ‘bye-laws/rules of HGA membership provide for membership of service officers present and past of government of India, Telangana government and Licensor (Telangana Tourism Corporation), as communicated by Licensor from time to time.’  Thus official patronage is embedded and creates vested interest to continue with MoU and to not proceed against the Golf Association.
As per the license deed, the HGA pays an annual fee of Re 1 per acre. Even with such invaluable government aid, the HGA replied to an RTI query regarding details of names of members and membership fee saying that the Hyderabad Golf Association does not come under the purview of the RTI. The tourism department simply forwarded the evasive RTI reply to the RTI applicant.
NGOs, people’s collectives, prominent veteran activists had objected to this plunder through protests, and SOUL, Forum for Better Hyderabad have been filing cases in high court, protesting and lodging complaints. After intense research for collating official correspondence to highlight internal resistance to golf course inside a protected monument, and further conducting detailed visits of prohibited areas in Naya Qila, I filed a public interest litigation in March 2017 to get the golf course evicted and have Naya Qila opened up for the public which is still being heard.
During visits to Golconda Fort-Naya Qila, I had observed that ASI and its associates have failed to maintain the historical monuments and failed to adhere to provisions which were agreed upon in the MoU and Deed of License and compliance of AMASR Act.
The sanctity of protected monuments – that they ought to be kept intact completely devoid of any artificial or modern additions that would eventually dilute its archaeological significance – was not taken care of. The maintenance and protection of the ancient monuments and archaeological sites cannot be entrusted to private parties. There is also no mechanism to ensure that the monuments and sites covered would be kept intact. Thus, the director, Archaeological Survey of India ought not to have agreed in principle to the proposal to set up a golf course within the walls/precincts of the Golconda Fort-Naya Qila.
Thus, a part of Golconda-Naya Qila is locked up in a court battle because citizens have protested against it being handed over to a club. As a petitioner for eviction of the golf course and restoration of Golconda-Naya Qila for the public, I wonder therefore how a ‘Vision Bid’ can be submitted by a private organisation to further give the sponsorship of the fort under the ‘Monument Mitra’ programme of the government of India. There is every reason to be sceptical about the ‘Adopt a Heritage’ scheme.
Dr. Lubna Sarwath, general secretary, Socialist Party (India) Telangana, analyses the 'Adopt a Heritage' scheme of the government.
Lubna Sarwath is a heritage rights activist based in Hyderabad and had filed the petition against the Hyderabad Golf course that is being heard in the High Court of Hyderabad.

Sunday, 3 June 2018

3 जून 2018
प्रेस रिलीज़

साथी गौतम कुमार प्रीतम रिहा

SC/ST (Prevention of Atrocities) Act को प्रभावहीन बनाने के खिलाफ आयोजित 2 अप्रैल के भारत बंद में गौतम कुमार प्रीतम को भागलपुर जिला में नेतृत्वकारी भूमिका के साथ सफल बंद कराने के वजह से पुलिस द्वारा दर्ज झूठे मुकदमे के तहत युवा नेता व सोशलिस्ट युवजन सभा के महासचिव गौतम कुमार प्रीतम और अजय रविदास 21 अप्रैल को झंडापुर ओपी (बिहपुर) पुलिस ने गिरफ्तार किया था । उन्हें गिरफ्तारी के बाद नवगछिया ले जाया गया था । उन पर IPC की धाराएं 147, 149, 342,188, 353, 504,05 Assistance Services Act 1960 लगाई गईं थी। जबकि, भागलपुर डीएम ने एक प्रतिनिधि मंडल से वार्ता में दर्ज मुकदमों की वापसी का आश्वासन दिया था । भागलपुर जिला न्यायालय से बेल खारिज हो गयी थी, सोशलिस्ट पार्टी ने उच्च न्यायालय पटना में बेल के लिए अर्जी लगाईं थी| साथी गौतम को उच्च न्यायालय पटना से बेल मिल गयी है और वे 5 जून को जेल से रिहा हो जायेंगे।
भाई गौतम भागलपुर जिला में सामाजिक न्याय के सवाल पर हमेशा मुखर आवाज हैं और सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता तथा नेता के साथ साथ जनगायक भी है। वो कबड्डी संघ भागलपुर के सचिव हैं | भाई गौतम बिहपुर विधानसभा (भागलपुर, बिहार) से 2015 का विधानसभा चुनाव सोशलिस्ट पार्टी से लड़ चुके हैं | अजय रविदास जय प्रकाश नारायण महाविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में सोशलिस्ट युवजन सभा के उम्मीदवार थे |
नीरज कुमार
सोशलिस्ट युवजन सभा

Prof. Keshav Rao Jadhav : A man of Courage, Conviction and Commitment

Prem Singh Prof. Keshav Rao Jadhav, a prominent socialist thinker and leader passes away on 16th June 2018 at a hospital in Hyde...