Thursday, 25 February 2016

घिर गई है भारत माता


(प्रिय साथी हमने नवंबर 2015 में डॉ प्रेम सिंह का पूर्व-प्रकाशित लेख ‘ताकि सनद रहे …. ‘ जारी किया था। उस समय हमने कहा था कि समय-समय पर उनके अन्‍य लेख जारी किए जाएंगे। उसी क्रम में उनका लंबा लेख ‘घिर गई है भारत माता’ जारी किया जा रहा है। यह लेख ‘युवा संवाद’ (अंक मई 2012) में प्रकाशित हुआ था और अब उनकी पुस्‍तक ‘भ्रष्‍टाचार विरोध : विभ्रम और यथार्थ’ (वाणी प्रकाशन) में संकलित है। हम यह इसलिए कर रहे हैं कि डा प्रेम सिंह अकेले विचारक और कार्यकर्ता हैं जो स्थितियों का हमेशा सही विश्‍लेषण प्रस्‍तुत करते हैं। आशा है देशभक्ति के छलछंद भरे कोलाहल में यह मार्मिक लेख आपको अच्‍छा लगेगा।)

घिर गई है भारत माता

प्रेम सिंह


ये भी तो मादरे हिंद की बेटी है!
करीब पांच साल पहले की बात है। हम परिवार के साथ कार में रात के करीब साढ़े ग्यारह बजे नोएडा से एक शादी से लौट रहे थे। गाजीपुर चैराहे पर अंधेरा था और कड़ाके की ठंड थी। करीब पंद्रह साल की एक लड़की लाल बत्ती पर गजरा बेच रही थी। लिबास से वह खानाबदोश या फिर आदिवासी समाज से लग रही थी। वह थोड़ी ही दूरी पर खड़ी थी लेकिन धूसर शरीर और कपड़ों में उसकी शक्ल साफ नहीं दिख रही थी। हालांकि यह साफ था कि वह कुपोषण के चलते पतली-दुबली है और कुदरत की ताकत के सहारे जिंदा (दिल) है। हमने इधर-उधर नजर दौड़ाई। उसके साथियों में और कोई नजर नहीं आया। वह चैराहा शहर के बाहर और सुनसान था, जहां लड़की के साथ कुछ भी हो सकता था। हमने यह मान कर मन को तसल्ली दी कि उसके कोई न कोई साथी जरूर आस-पास कहीं होंगे, लड़की अकेली नहीं है। इतनी रात गए अकेली कैसे हो सकती है?
वह लड़की थोड़ा हमारी कार के पास आई। देखा, वह वैसी चिंतित और डरी हुई नहीं थी जैसा हम उसको लेकर सोच रहे थे। अपनी जड़ों से वह उखड़ी हुइ जरूर थी, लेकिन उसके बावजूद जीवन पर उसकी गिरफ्त मजबूत लगी। हजारों साल का सामंतवाद उसकी स्वायत्तता और स्वच्छंदता को नष्ट नहीं कर पाया था। उसी ताकत के बल पर वह पूंजीवाद से लोहा ले रही थी। हमने महसूस किया कि उस लड़की और हमारे बीच गहरा फासला है। उसका मन-मानस हमसे अलग और आज भी स्वच्छंद है। हमें तब नागार्जुन की उपर्युक्त काव्य-पंक्ति अनायास याद आई थी। हल्की मुस्कुराहट के साथ - मादरे हिंद की एक बेटी यह भी है!
आधुनिक कलाकारों को सामंती/पूंजीवादी शोषण के शिकार लोगों पर रचना करने की आदत पड़ चुकी है। आदत के वशीभूत हम कई दिनों तक उस लड़की की दशा पर कोई लेख या कविता लिखने की सोचते रहे। हालांकि लिखा नहीं गया। यह सोच में पड़ कर कि लोग कब से गरीबों, वंचितों, शोषितों को विषय बना कर लिखते आ रहे हैं। उसे मुक्ति का, क्रांति का साहित्य कह कर उसका संघर्ष और सौंदर्य मूल्य भी सिद्ध कर दिया जाता है। लेकिन भारत के शहरों की गंदी बस्तियों, झुग्गियों, लाल बत्तियों, फुटपाथों पर भीड़, कितना ही खदेड़ो, बढ़ती ही जाती है। यह रोज का किस्सा है, कोई कितनी कविता करेगा! महाकवि को इलाहाबाद के पथ पर जो पत्थर तोड़ती दिखी थी, उसकी पोतियों-नातिनों की इतनी ही तरक्की हुई है कि वे एक के बाद एक और नए से नए बनने वाले एक्सप्रैस रास्तों पर पत्थर तोड़ रही हैं। वे इस देश और दुनिया की कभी नागरिक नहीं बन सकती, उन्हें मानव कहना मुश्किल लगता है। उस दिन खास बात थी तो बस यही कि वह अकेली लड़की एक-दो रुपये के लिए इतनी रात गए वहां थी।
हमें लगा कि जिस तरह पूंजीवादी कंपनियों के लिए जल, जंगल, जमीन संसाधन हैं, आधुनिक और तरक्कीपसंद कलाकारों/लेखकों के लिए कंपनियों द्वारा जड़ों से उजाड़ा गया जीवन भी संसाधन है। कंपनियों को जैसे ज्यादा से ज्यादा मुनाफा चाहिए, रचना के बदले लेखकों को भी नाम और नकद पुरस्कार चाहिए - ज्यादा से ज्यादा और बड़ा से बड़ा। जो सरकार कंपनियों को ठेके देती हैं, वही रचनाकारों को पद और पुरस्कार देती हैं। इधर कंपनियां भी अपने पुरस्कार देने लगी हैं। ‘रचना सत्ता का प्रतिपक्ष होती है’, ‘सत्ता रचना/रचनाकार से भय खाती है’ - इस तरह की टेक को ऊंचा उठाए रखते हुए रचनाकारों ने वे पुरस्कार लेने भी शुरू कर दिए हैं। आने वाले समय में कंपनियों की ओर से कुछ पद भी आॅफर किए जा सकते हैं। आखिर कंपनियों का भी कोई सामाजिक-सांस्कृतिक दायित्व बनता है! यूरोप और अमेरिका में लंबे समय से यह चल रहा है।
बहरहाल, हमने उस लड़की पर कुछ लिखा नहीं। उसे रात के अंधेरे में वहां देख कर सहानुभूति का एक तीव्र ज्वार उठा था। आज साफ लगता है कि उसके बारे में लिखे जाने पर जो भी मुक्ति होती, वह अपनी ही होती। उस लड़की की मुक्ति से उसका कोई साझा नहीं होता। हमारा कभी उससे मिलना या बातचीत नहीं होनी थी। पांच साल बाद देखते हैं कि वह लड़की और ज्यादा अकेली होती और अमानवीय परिस्थितियों में घिरती जा रही है। चिंता की जाती है कि इतिहास, विचारधारा, मुक्ति, प्रतिबद्धता, सरोकार, सहानुभूति आदि पद निकम्मे घोषित हो चुके हैं। उस लड़की के संदर्भ उन्हें एक दिन निकम्मे साबित होना ही था। क्योंके वे पूंजीवाद के पेट से उठाए गए थे। जिस दिन पूंजीवाद को मानव सभ्यता के विकास में क्रांतिकारी चरण होने का प्रमाणपत्र मिला था, उसी दिन यह तय हो गया था कि वह लड़की महानगर के चैराहे पर, रात के अंधेरे में, अकेली गुबारा या गजरा जैसा कोई सामान बेचेगी। और उसकी एक अन्य बहन को उसका मालिक ताले में बंद करके सपरिवार निश्चिंत विदेश घूमने निकल जाएगा। यह तय हो गया था कि यह भारत सहित पूरी दुनिया में अनेक जगहों पर अनेक रूपों में अनेक बार और लगातार होगा। भारत में पिछले 20-25 सालों में इस प्रक्रिया में खासी तेजी आई है।    
पिछले दिनों देश की राजधानी दिल्ली की मध्यवर्गीय आवास काॅलोनी द्वारिका के एक मकान से पुलिस ने एक 13 साल की घरेलू नौकरानी को डाॅक्टर दंपत्ति के घर की कैद से छुड़ाया। डाॅक्टर दंपत्ति मार्च के अंतिम सप्ताह में उसे घर में बंद करके अपनी बेटी के साथ थाईलैंड की सैर पर गए थे। 6 दिन बाद बालकनी से पड़ोसियों ने लड़की की पुकार सुनी। वह पहले भी पुकार करती रही थी, लेकिन किसी ने उसकी मदद नहीं की। 30 मार्च को एक एनजीओ की मदद से पुलिस को बुलाया गया। पुलिस ने फायर इंजिन बुला कर लड़की को कैद से बाहर निकाला। यह मामला मीडिया में काफी र्चिर्चत रहा। खबरों में आया कि लड़की भूखी, डरी हुई और बेहाल थी। मालिकों ने लड़की को उसके लिए छोड़े गए खाने के अलावा रसोई से कुछ और नहीं खाने के लिए सख्ती से मना किया था। खबरों के मुताबिक लड़की ने मालिकों द्वारा अक्सर प्रताडि़त किए जाने की बात भी कही।
मामला टीवी और अखबारों में आने से, जाहिर है, डाॅक्टर दंपत्ति के रिश्तेदारों ने उन्हें बैंकाॅक में सूचित कर दिया। वे आए और पुलिस से बचते रहे। उन्होंने कहा कि उनकी नौकरानी बच्ची नहीं, 18 साल की बालिग है और उसके साथ कोई दुव्र्यवहार नहीं किया जाता रहा है। वे उसे साथ ले जाना चाहते थे, लेकिन लड़की ने जाने से इंकार कर दिया। जो भी हो, मामला पकड़ में आ गया था, पुलिस ने डाॅक्टर दंपत्ति को न्यायिक हिरासत में ले लिया। अब वे जमानत पर हैं और अदालत में केस दायर है। वाकये को ज्यादा दिन नहीं हुए हैं लेकिन लोग अभी से उसके बारे में भूल चुके हैं। हो सकता है कोई गंभीर पत्रकार मामले में आगे रुचि ले और केस की प्रगति और नतीजे के बारे में बताए। और उस लड़की के बारे में भी कि उसका क्या हुआ? उसे क्या न्याय मिला?
जैसा कि अक्सर होता है, इस मामले में भी मीडिया की खबरों में लड़की को मेड (उंपक) अथवा घरेलू नौकरानी लिखा/कहा गया है। लड़की का उत्पीड़न करने वाले डाॅक्टर दंपत्ति का नाम - संजय वर्मा, सुमित्रा वर्मा - हर खबर में पढ़ने/सुनने में आया। काफी खोजने पर हमें लड़की का नाम एक जगह सोना लिखा मिला। हालांकि हमें यह नाम असली नहीं लगता। लड़की की मां जब झारखंड से आई तो उसका नाम भी मीडिया में पढ़ने को नहीं मिला। उसे लड़की की मां लिखा और कहा गया। भारत का मध्यवर्ग अपने बच्चों के नामकरण के पीछे कितना पागल होता है, इसकी एक झलक अशोक सेकसरिया की करीब 15 साल पहले छपी कहानी ‘राइजिंग टू द अकेजन’ में देखी जा सकती है। पिछले, विशेषकर 25 सालों में सुंदर-सुंदर संस्कृतनिष्ठ नाम रखने की देश में जबरदस्त चल्ला चली हुई है। केवल द्विज जातियां ही नहीं, शूद्र और अनुसूचित जाति और जनजाति से मध्यवर्ग में प्रवेश पाने वाले दूसरी-तीसरी पीढ़ी के लोग द्विजों की देखा-देखी यह करते हैं। लाड़लों पर लाड़ तो उंड़ेला जाता ही है, जो स्वाभाविक है, भारत का मध्यवर्ग अपने सांस्कृतिक खोखल को सांस्कृतिक किस्म के नामों से भरने की कोशिश करता है। इस समाज में झारखंड के आदिवासी इलाके से आने वाली निरक्षर मां-बेटियों का नाम नहीं होता।
द्वारिका काॅलोनी का यह मामला सुख्रियों में आने पर नागरिक समाज ने ऐसा भाव प्रदर्शित किया मानो वे स्वयं ऐसा कुछ नहीं करते जो डाॅक्टर दंपत्ति ने किया। मानो वह द्वारिका काॅलोनी, दिल्ली या देश में एक विरल मामला था जो भले पड़ोसियों के चलते समय पर सामने आ गया। कानून तोड़ने और लड़की के साथ अमानवीय व्यवहार करने वाले शख्स को गिरफ्तार कर लिया गया। अब पुलिस और कानून अपना काम करेगा। ऐसा सोचने में उसका पीडि़ता से कोई सरोकार नहीं, खुद से है। ऐसा सोच कर वह अपने को कानून का पाबंद नागरिक और परम मानवीय इंसान मानने की तसल्ली पा लेता है। इस तसल्ली में अगर कुछ कमी रह जाती है तो वह बाबाओं के दर्शन और प्रवचन से पूरी करता है। इस झूठी तसल्ली में वह इतना सच्चा हो जाता है कि गंदी राजनीति और राजनेताओं पर अक्सर तीखे हमले बोलता है। उनके द्वारा कर दी गई देश की दुर्दशा पर आक्रोश व्यक्त करता है। राजनीति को बुरा बताते वक्त भी राजनैतिक सुधार उसकी इच्छा नहीं होती, वैसा करके वह अपने अच्छा होने का भ्रम पालता है। यह सच्ची बात है कि भारत की मौजूदा राजनीति बुरी बन चुकी है। लेकिन इस बुरी राजनीति की मलाई काटने की सच्चाई मध्यवर्ग छिपा लेता है।
हम सब जानते हैं भारत में कारखानों, ढाबों, दुकानों से लेकर घरों तक में बाल मजदूरों की भरमार है। शहर की लाल बत्तियों पर छोटे-छोटे लड़के-लड़कियां तमाशा दिखाते, कोई सामान बेचते या भीख मांगते मिलते हैं। जो 14 साल से ऊपर हो जाते हैं उन्हें भी हाड़तोड़ श्रम के बदले सही से दो वक्त पेट भरने लायक मेहनताना नहीं मिलता। सुबह 6 बजे से रात 8 बजे तक माइयां काॅलोनियों में इस घर से उस घर चैका-बर्तन, झाड़ु-बुहारू, कपड़े धोने, बच्चे सम्हालने और खाना बनाने के काम में चकरी की तरह घूमती हैं। वे दस-बीस रुपया बढ़ाने को कह दें तो सारे मोहल्ले में हल्ला हो जाता है। उनके मेहनताने - ज्यादा से ज्यादा काम, कम से कम भुगतान - को लेकर पूरे मध्यवर्गीय भारत में गजब का एका है।
दूसरी तरफ, मध्यवर्ग के लोग जिस महकमे, कंपनी या व्यापार में काम करते हैं, अपने सहित पूरे परिवार की हर तरह की सुविधा-सुरक्षा मांगते और प्राप्त करते हैं। इसमें संततियों के लिए ज्यादा से ज्यादा संपत्ति जोड़ना भी शामिल है। फिर भी उनका पूरा नहीं पड़ता। वे कमाई के और जरिए निकालते हैं। रिश्वत लेते हैं। टैक्स बचाते हैं। अपने निजी फायदे के लिए कानून तोड़ते हैं। अभिनेता, खिलाड़ी, विश्व सुंदरियां, कलाकार, जावेद अख्तर जैसे लेखक अपने फन से होने वाली अंधी कमाई से संतुष्ट नहीं रहते। वे विज्ञापन की दुनिया में भी डट कर कमाई करते हैं। सरकारें ऐसी प्रतिभाओं से लोक कल्याण के संदेश भी प्रसारित करवाती हैं। वे अपनी कमाई को लेकर जरा भी शंकित हुए, देश की आन-बान-शान का उपदेश झाड़ते हैं। उनमें कुछ सचमुच बड़े कलाकार हैं! किसानों की आत्महत्याओं, महिलाओं के उत्पीड़न, गरीबों की बेबसी, बच्चों की वलनरेबिलिटी को भी मुनाफे का सामान बना लेते हैं। इस तरह अपनी बड़ी-छोटी सोने की लंका खड़ी करके उसे और मजबूत बनाने में जीवन के अंत काल तक जुटे रहते हैं। इनकी हविस का कोई अंत नहीं है। रोजाना करोड़ों बचपन तिल-तिल दफन होते हैं, तब उनकी यह दुनिया बनती और चलती है।
भोग की लालसा में फंसे मध्यवर्ग का एक और रोचक पहलू है जो फिल्मों और साहित्य में भी देखा जा सकता है। यह सब करते वक्त उन्हें अपनी मजबूरी सोना की मां की मजबूरी से भी बड़ी लगती है, जिसे अपनी नाबालिग लड़की अंधेरे में धकेलनी पड़ती है। ‘पापी पेट की मजबूरी’ में वे झूठ बोलने, धोखा देने, फ्लर्ट करने, प्रपंच रचने की खुली छूट लेते हैं। कई बार यह पैंतरा भी लिया जाता है कि हम भी तो कुछ पाने के लिए अपनी आत्मा को अंधेरे में धकेलते हैं। रोशनी दिखाने वाले बाबा लोग न हों तो जीना कितना मुश्किल हो जाए! यह अकारण नहीं है कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के समर्थन में आम मध्यवर्गीय भारतीय से लेकर बड़े-बड़े उद्योगपति, उनकी संस्थाएं और नवसाम्राज्यवाद का पंजा गड़ाने वाली कुख्यात फंडिंग एजेंसियों का धन खाने वाले बुद्धिजीवी और समाजसेवक शामिल हैं।      
लोग यह भी जानते हैं कि देश में चाइल्ड लेबर (प्रोहिबिशन एंड रेगुलेशन) एक्ट 2006 है। लेकिन उसकी शायद ही कोई परवाह करता है। कुछ एनजीओ और स्वयंसेवी संस्थाएं ही इस मुद्दे पर सक्रिय रहते हैं। बाकी कहीं से कोई आवाज नहीं उठती कि बचपन को कैद और प्रताडि़त करने वालों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई हो, अगर मौजूदा कानून में कमी है तो उसे और प्रभावी बनाया जाए। कड़क लोकपाल की स्वतंत्र संस्था और कानून बनाने के लिए आसमान सिर पर उठाने वाले लोग ये ही हैं। उनके लिए ही बाल मजदूरी और सस्ती मजदूरी की यह ‘प्रथा’ चल रही है। वह न चले तो इनका जीवन भी चलना असंभव हो जाएगा।
आइए सोना की बात करें। सोना अपनी मां की बेटी है। लेकिन क्या वह भारत माता की भी बेटी है? नागार्जुन ने अपनी कविता में जब आराम फरमा मादा सुअर का चित्रण किया तो वे उसकी मस्ती और स्वतंत्र हस्ती पर फिदा हुए लगते हैं - देखो मादरे हिंद की गोद में उसकी कैसी-कैसी बेटियां खेलती हैं! कविता का शीर्षक ‘पैने दांतों वाली ...’ कविता की अंतिम पंक्ति है। शायद कवि कहना चाहता है कि ‘‘जमना किनारे/मखमली दूबों पर/पूस की गुनगुनी धूप में/पसर कर लेटी .../यह ... मादरे हिंद की बेटी ...’’ अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करने में समर्थ है।
सोना का वह भाग्य नहीं है। उससे भारत माता की गोद छीन ली गई है। भारत माता सोना की मां जैसी ही मजबूर कर दी गई है, जिसे अपनी बेटी अनजाने देश भेजनी पड़ती है, जहां वह सीधे वेश्यावृत्ति के धंधे में भी धकेली जा सकती है। वह चाह कर भी अपनी बेटी को अपने पास नहीं रख सकती। पूंजीवादी आधुनिक सभ्यता आदिवासियों को उनके घर-परिवेश-परिजनों से उखाड़ कर जमती है। ऐसा नहीं है कि नागरिक समाज में ईमानदार और दयालु लोग नहीं हैं या नवउदारवाद के चलते आगे नहीं रहेंगे। लेकिन उससे अनेकार्थी विषमताजनित शोषण नहीं रुकेगा। आदिवासी लड़कियों, महिलाओं, लड़कों, पुरुषों को अपने घर-परिवेश से निकल कर हमारे घरों और निर्माण स्थलों पर आना ही होगा। उन्हें कुदरत का भी श्राप है। उनकी घर-धरती के नीचे जो खनिज संपदा जमा है, उसे निकाले बगैर पूंजीवाद का एक कदम काम नहीं चल सकता।      
आपको याद होगा अन्ना आंदोलन के दौरान दिल्ली में पोस्टर लगे थे - ‘देश की बेटी कैसी हो, किरण बेदी जैसी हो।’ किरण बेदी काफी चर्चा में रहती हैं। कहती हैं, जो भी करती हैं, देश की सेवा में करती हैं। हमें किरण बेदी की कारगुजारियों से यहां मतलब नहीं है। सवाल है - मादरे हिंद की बेटी कौन है? किरण बेदी या सोना? आप कह सकते हैं दोनों हैं। लेकिन हम सोना को मादरे हिंद की बेटी मानते हैं। इसलिए नहीं कि हमारी ज्यादा सही समझ और पक्षधरता है। सोनाएं किरण बेदियों के मुकाबले भारी सख्या में हैं और किसी का बिना शोषण किए, बिना बेईमानी किए, बिना देश सेवा का ढिंढोरा पीटे, दिन-रात श्रम करके, किफायत करके अपना जीवन चलाती हैं। यौन शोषण समेत अनेक तरह की प्रताड़नाएं सहती हैं। अपनी ऐसी गरीब बेटियों के लिए हर मां मरती-पचती और आंसू बहाती है। सोनाओं की मांओं के समुच्चय का नाम ही भारत माता है। इस भारत माता को कपूतों ने एकजुट होकर अपनी कैद में कर लिया है।

कपूतों की करतूत
हमारे गांव के पंडित लिखी राम अब दुनिया में नहीं हैं। वे एक स्वरचित गीत गाते थे। गीत के बोल बड़े मार्मिक और रोमांच पैदा करने वाले थे। गीत की टेक थी - ‘भारत माता रोती जाती निकल हजारों कोस गया’। हजारों कोस का बीहड़ रास्ता हमारी बचपन की नजरों के सामने खिंच जाता था, जिस पर रोती-बिलखती भारत माता नंगे पांव चली जाती थी। गीत सुखांत नहीं था। हमें इससे परेशानी होती थी। भगत सिंह और उनके पहले के क्रांतिकारियों की शहादत, सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज और गांधी जी की हत्या पर गीत समाप्त होता था। तब हमें राष्ट्रवाद, उसकी विचारधारा और वर्ग चरित्र के बारे में जानकारी नहीं थी। हम अपनी जन्म देने वाली मां के अलावा एक और मां - भारत माता - से जुड़ाव का अनुभव करते थे और पाते थे कि वह कष्ट में है। भावना होती थी कि भारत माता के कष्ट का निवारण होना चाहिए। तब हमें भारत माता साड़ी, मुकुट और गहनों में सजी-धजी नहीं दिखाई देती थी। उसके हाथ में तिरंगा भी नहीं होता था। वह दिन-रात खटने वाली गांव की औरतों के वेश में उन्हीं जैसी लगती थी।
बड़े होकर भी हम पंडित लिखी राम का गीत सुनते रहे। भारत माता की विशिष्ट छवि, उससे संबंधित साहित्य और बहसों के बीच बचपन में पंडित लिखी राम द्वारा खींची गई भारत माता की तस्वीर मौजूद रहती रही है। ‘मैला आंचल’ में तैवारी जी का गीत - ‘गंगा रे जमुनवा की धार नवनवा से नीर बही। फूटल भारथिया के भाग भारत माता रोई रही।’’ पढ़ा तो उसकी टान (लय) लिखी राम के गीत की टान के साथ खट से जुड़ गई। तैवारी जी के गीत की टान को सुन कर बावनदास आजादी के आंदोलन में खिंचा चला आया था। उस टान पर वह अपना जीवन आजादी के संघर्ष में बिता देता है। अंत में माफिया द्वारा निर्ममता पूर्वक मारा भी जाता है। उसे मारा ही जाना था, क्योंकि वह यह सच्चाई जान लेता है कि आजादी के बावजूद भारत माता को स्वार्थी तत्वों ने अपने कब्जे में ले लिया है और वह जार-जार रो रही है। बावनदास गांधी का अंधभक्त है। भारत माता अंग्रेजों की कैद से छूट कर कपूतों के हाथ में पड़ गई है - इस सच्चाई पर वह कोई ‘निगोसिएशन’ करने को तैयार नहीं था। उसकी वैसी तैयारी ही नहीं थी। वह राजनैतिक से अधिक नैतिक धरातल पर जीता था। वह अहिंसक क्रातिकारी था। भला भारत माता को लेकर सौदेबाजी की जा सकती है?
हमारे मित्र चमनलाल ने भगत सिंह पर काम किया है। काम को और बढ़ाने के लिए उन्होंने भारत में नवउदारवाद के प्रतिष्ठापक मनमोहन सिंह को मदद के लिए पत्र लिखा था जिसे नेट द्वारा सबको भेजा कि सभी उनकी मांग का समर्थन करें। पता नहीं मनमोहन सिंह ने उनकी बात सुनी या नहीं। एक बार वे कह रहे थे कि भगत सिंह जिंदा रहते तो भारत के लेनिन होते। उनसे कोई पूछ सकता है कि नवउदारवादी मनमोहन सिंह से भगत सिंह पर काम के लिए मदद मांगने का क्या तर्क बनता है, और भगत सिंह लेनिन क्यों होते; भगत सिंह क्यों नहीं होते? किन्हीं रूपकिशोर कपूर द्वारा 1930 के दशक में बनाए गये एक चित्र की प्रतिलिपि मिलती है। उसमें भगत सिंह तलवार से अपना सिर काट कर दोनों हाथों से भारत माता को अर्पित कर रहा है। भारत माता भगत सिंह को हाथ उठा कर रोते हुए आशीर्वाद दे रही है। (संदर्भ: ‘मैप्स, मदर/गोडेस, मार्टिर्डम इन माॅडर्न इंडिया)।    
नवजागरणकालीन चिंतकों, क्रांतिकारियों, कवियों-लेखकों, चित्रकारों ने विविध प्रसंगों में भारत माता की छवि का अंकन किया है। ‘भारत माता ग्रामवासिनी’ से लेकर ‘हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती’ के रूप में उसके गुण गाए गए हैं। भारत माता की छवि की राष्ट्रीय और सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में भूमिका की सीमाएं और अंतर्विरोध आज हम जानते हैं। विद्वानों के लिए शोध का यह एक प्रमुख विषय है। लेकिन हम यह भूल गए हैं कि क्रांतिकारियों का आंदोलन हो या गांधी के नेतृत्व में चलने वाला आंदोलन या इन दोनों से पहले आदिवासियों और किसानों का आंदोलन - उनमें भारत माता को पूंजीवादी बेडि़यों से मुक्त करने की मंशा थी। आजादी के बाद समाजवादी और कम्युनिस्ट आंदोलन की तो टेक ही पूंजीवाद विरोध थी। लेकिन देखते-देखते देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, दवाइयों से लेकर हथियारों तक हर तरह की दलाली करने वालों, बिल्डरों, माफियाओं, नेताओं, बुद्धिजीवियों ने एका बना कर भारत माता को घेर लिया है। सब मिल कर उसे नवउदारवादी हमाम में खींच रहे हैं।
हम यहां टीम अन्ना और उसके आंदोलन पर इसलिए चर्चा करना चाहेंगे क्योंकि वे भारत माता का नाम बढ़-चढ़ कर लेने वालों में हैं। इस विषय में ज्यादातर जो आलोचना या विरोध हुआ, वह यह कि टीम अन्ना ने जंतर-मंतर पर भारत माता की जो तस्वीर लगाई वह आरएसएस लगाता है। यह बहुत ही सतही आलोचना या विरोध है। हमने आलोचकों से पूछा था कि जो आरएसएस की भारत माता से खफा हैं, वे बताएं कि उनकी अपनी भारत माता कौन-सी है? दूसरे, आरएसएस की भारत माता की तस्वीर से क्या परहेज हो सकता है जब पूरा आरएसएस ही आंदोलन में मौजूद है? भारत माता के घिराव में टीम अन्ना की सहभागिता पर थोड़ा विचार करते हैं।
अन्ना आंदोलन के दौरान सबसे ज्यादा अवमूल्यन भाषा का हुआ है। इस आंदोलन की बाबत यह गंभीर मसला है। कहीं से कोई वाकया उठा लीजिए, उसमें बड़बोलापन और खोखलापन एक साथ दिखाई देगा। आंदोलन में कई गंभीर लोग शामिल हुए। कुछ बाहर आ गए, कुछ अभी वहीं हैं। ऐसे लोगों की भाषा पर भी असर आया है। उनकी भाषा पिछली ताकत खो बैठी। जब विरोधी पृष्ठभूमियों के और विरोधी लक्ष्य लेकर चलने वाले व्यक्ति या समूह आंदोलन के उद्देश्य से एक साथ आते हैं तो भाषा में छल-कपट और सतहीपन आता ही है। टीम अन्ना के प्रमुख सदस्यों द्वारा भाषा का अवमूल्यन अभी जारी है। एक उदाहरण लें। उसकी प्रमुख सदस्य किरण बेदी ने हाल में कहा कि अन्ना हजारे, बाबा रामदेव और श्री श्री रविशंकर तीन फकीर हैं, जो देश का कल्याण करने निकले हैं। हमें 1989 का वह नारा - ‘राजा नहीं फकीर है, भारत की तकदीर है’ - याद आ गया जो समर्थकों ने वीपी सिंह के लिए गढ़ा था।  
जिनका नाम किरण बेदी ने लिया है उन तीनों को अगर सबसे ज्यादा प्यार है तो वह धन से है। धन के लिए वे कोई भी धत्कर्म करने के लिए तत्पर हैं। इसीलिए वल्र्ड बैंक से लेकर भारत और विदेश के आला अमीरों तक इनके तार जुड़े हैं। बंदा अमीर होना चाहिए, वह कौन है, कैसे अमीर बना है, इसकी तहकीकात का काम बाबाओं का नहीं होता! यह ‘फकीरी’ खुद किरण बेदी और टीम अन्ना के पीछे मतवाले मीडिया तथा सिविल सोसायटी को भी बड़ी प्यारी है। फकीरी का यह नया अर्थ और ठाठ है, जो नवउदारवाद के पिठ्ठुओं ने गढ़ा है। भारत का भक्ति आंदोलन सर्वव्यापक था, जिसमें अनेक अंतर्धाराएं सक्रिय थीं। फकीर शब्द तभी का है। संत, फकीर, साधु, दरवेश - इनका जनता पर गहरा प्रभाव था। दरअसल, उनके अपने सादगी और त्याग भरे जीवन का उतना महत्व नहीं है। ज्यादा महत्व इसका है कि उन्होंने सामंती ठाठ-बाट के बरक्स विशाल श्रमशील जीवन के दर्शन को वाणी दी।
ऐसा नहीं है उन्हें संसार और बाजार का ज्ञान और सुध नहीं है। ‘पदमावत’ में ऐसे बाजार का चित्रण है जहां एक-एक वस्तु लाखों-करोड़ों में बिकती है। लेकिन भक्त बाजार से नहीं बंधता। भक्तिकाल में फकीरी भक्त होने की कसौटी है। जो फकीर नहीं है, गरीब नहीं है, वह भक्त नहीं हो सकता। फकीरी महज मंगतई नहीं है। वह एक मानसिक गठन है, जिसे संसार में काम करते हुए उत्तरोत्तर, यानी साधना के जरिए पाया जाता है। वह हद (सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक संरचनाओं) से बेहद (जहां ये संरचनाएं प्रभावी नहीं रह जाती) में जाने की साधना है, जहां भक्त केवल प्रभु का रह जाता है। जब गरीब ही भक्त हो सकता है तो प्रभु गरीब नेवाज होगा ही।
यह साधना बिना सच्चे गुरु के संभव नहीं होती। इसीलिए उसे गोविंद से बड़ा बताने का भी चलन है। जाहिर है, फकीरी गुरु होने की भी कसौटी है। दिन-रात भारी-भरकम अनुदान और दान के फेरे में पड़े तथाकथित गुरुओं और संतों को क्या कहेंगे - फकीर या फ्राड! काफी पहले हमने ‘त्याग का भोग’ शीर्षक से एक ‘समय संवाद’ लिखा था। उसमें सोनिया गांधी के ‘त्याग’ का निरूपण किया था। अन्ना हजारे सरीखों के आरएसएस टाइप त्याग के चैतरफा पूंजीवाद और उपभोक्तवाद चलता और फलता है। ऐसे त्यागी महापुरुषों को उस व्यवस्था से कोई परेशानी नहीं होती। क्योंकि वहां दान के धन से ही सामाजिक काम किए जाते हैं। दान सामंत देता है या पूंजीपति या दलाल, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।  
हमारे मित्र जयकुमार ने सुबह की सैर में हमें ‘खुशखबरी’ दी कि बाबा रामदेव डाॅ. लोहिया का नाम ले रहे थे। करीब दो साल पहले साथी हरभगवान मेंहदीरत्ता (अब दिवंगत) ने भी हमें बताया था कि रामदेव के एक कार्यक्रम में उन्हें डाॅ. लोहिया का चित्र दिखा। कुछ दिन बाद हमने उनके चेलों के हाथ में भारत स्वाभिमान अभियान का वह फोल्डर देखा जिस पर एक पूरी चित्रावली बनी थी। लोहिया का चित्र उसमें भी था। इस देश में गांधी के नाम पर कोई भी जबान साफ कर सकता है। न किसी को ऐतराज होता है, न अचरज। लगभग ऐसी ही गति क्रांतिकारियों की बन चुकी है। वे माफियाओं से लेकर बाबाओं तक के हीरो हैं। लेकिन अन्ना के अंबेडकर का और रामदेव के लोहिया का नाम लेने पर किसी को भी कौतुक होगा। अज्ञेय ने लिखा है, ‘कालिदास की पीड़ा थी, अरसिकों को कवित्त निवेदन न करना पड़ जा जाए, केशवदास की पीड़ा थी, च्रद्रबदनि मृगलोचनी बाबा कहि-कहि न चली जाए, अज्ञेय की पीड़ा है, मैं क्या जानता था यह गति होगी कि हिंदी विभागों में हिंदी के अध्यापकों द्वारा पढ़ाया जाऊंगा!’ भारत में आत्मा मरने के पहले भी रहती है और मरने के बाद भी। लोहिया की आत्मा को जरूर कौतुक हुआ होगा कि भारत माता के नाम पर अपने उपभोक्ता उत्पाद बेचने वाले ध्ंाधेबाज उनका नाम ले रहे हैं!
सुना है रामदेव का अपना ‘विचार साहित्य’ भी है। उसके बारे में जो ब्यौरे इधर-उधर पढ़ने को मिलते हैं, उनसे उनकी कुंठित मानसिकता का पता चलता है। वे दरअसल कुंठित मानसिकता के प्रतिनिधि बाबा हैं। भारत के मध्यवर्ग ने पढ़ना-लिखना बिल्कुल छोड़ दिया है। स्कूल स्तर पर की गई विभिन्न विषयों की पढ़ाई भी उसके जीवन में नहीं झलकती। मध्यवर्ग की नई से नई बसने वाली काॅलोनियों में सब कुछ मिलेगा, सिवाय विचार और रचना-साहित्य के। जहां तक पत्रिकाओं का सवाल है, मनोरंजन, खेल, प्रतियोगिता और राजनीतिक खबरों की पत्रिकाओं के अलावा वहां कुछ नहीं मिलता। मध्यवर्ग ने कर्मकांड को संस्कृति और अंधविश्वास को आस्था मान लिया है। ऐसे में कुंठित मानसिकता ही पनपती है, जो मीडिया की मार्फत परवान चढ़ी हुई है। जब ‘पढ़े-लिखे’ मध्यवर्ग का यह हाल है तो गांवों और कस्बों के बारे में अंदाज लगाया जा सकता है। ज्यादातर फिल्में, सीरियल और धार्मिक-आध्यात्मिक प्रवचन कुंठित मानसिकता का प्रतिफलन और उसे पोसने वाले होते हैं। उपभोक्तवाद के शिकंजे में पूरी तरह फंसा भारत का ‘महान’ मध्यवर्ग भावनाओं, संबंधों, मूल्यों आदि को लेकर अजीबो-गरीब आचरण करता है। मध्यवर्ग की इस विशिष्ट परिघटना पर हमें कभी विस्तार से लिखना है।  
यह फंसाव राजनीति में भी देखने को मिलता है। ताजा उदाहरण सीपीएम का ‘देसी समाजवाद’ है। संगठित और अपने को विचारधारात्मक कहने वाली पार्टी कैसे टोटके कर रही है! उससे पूछा जा सकता है कि आचार्य नरेंद्रदेव, जेपी और लोहिया के बाहर देसी समाजवाद के कौन स्रोत हैं? लेकिन यह किसी ने नहीं पूछा और पूरे मीडिया में सीपीएम प्रस्तावित भारतीय समाजवाद की खूब धूम रही। बाबा रामदेव और श्री श्री रविशंकर को नेताओं से और नेताओं को इन दोनों से संबंध बनाने का बड़ा शौक है। रामदेव ‘व्यवस्था परिवर्तन’ के लिए राजनीतिक पार्टी बनाने से पहले लालू यादव और नीतीश कुमार के एक साथ चहेते थे। श्री श्री की हसरतें ‘जीवन की कला’ का कारोबार शुरू करने के समय से ही जवान रही हैं। हमें ज्यादा हैरानी नहीं हुई, जब देखा कि वे दिल्ली विश्वविद्यालय में भी घुस गए हैं। एक रोज हम स्टाफ रूम में बैठे थे। चार-पांच युवक-युवतियां भक्तिभाव से भरे हुए आए और सूचना दी कि श्री श्री फलां तारीख को हिंदू काॅलेज में आ रहे हैं। फिर कहने लगे कि वे श्री श्री और कार्यक्रम के बारे में एम.ए. की क्लास को संबोधित करना चाहते हैं। हमने उन्हें कहा कि अपना पोस्टर लगाइए और जाइए। हमें लगा कि क्या सचमुच हमारा बीमार समाज बाबाओं की बदौलत चल रहा है!  
रामदेव के साथ न्याय करते हुए कहा जा सकता है कि जब अपने को समाजवादी कहने वाले नेता और पार्टियां कारपोरेट घरानों की राजनीति करते हैं तो बाबा के लोहिया को चेला मूंडने पर क्योंकर ऐतराज किया जा सकता है? यूपी के नए मुख्यमंत्री प्रधनमंत्री से मिलने गए तो उन्होंने वही सब बातचीत की जो दूसरे मुख्यमंत्री करते हैं। सोना से उसकी मां और भारत माता की गोद छीन लेने वाले पूंजीवाद और मनमोहन सिंह द्वारा लाई गई नवउदारवादी नीतियों पर उन्होंने जरा भी सवाल नहीं उठाया। इसके बावजूद भाई लोगों को वहां लोहिया का समाजवाद फलीभूत होने की संभावनाएं नजर आ रही हैं। भारतीय समाज और राजनीति में यह जो स्थिति बनी है, उसकी अभिव्यक्ति के लिए विडंबना, विद्रूप, विसंगति जैसे पद अपर्याप्त हैं। जब कोई समाज अंधी गली में प्रवेश कर जाता है तो यही होता है। जिस आंदोलन की पीठ पर उद्योग और व्यापार जगत की हस्तियां/संस्थाएं हैं, बड़े-बड़े एनजीओ हैं, संघियों के उसमें शामिल होने की बात तो समझ आती है, अचरज है कि समाजवादी, गांधीवादी, माक्र्सवादी उसमें डुबकी लगा रहे हैं।
राजनैतिक समझ के अभाव में अन्ना और रामदेव नहीं समझ सकते कि वे क्या कह और कर रहे हैं। दूसरे शब्दों में, वे वही कह और कर रहे हैं जो उनकी समझदारी है। उनकी समझदारी के मेल का समाज बना हुआ है तो उनका कहना और करना रंग लाता है। उनके सिपहसालार उन्हें किसी विशेष नेता या विचारक का नाम लेने और मुद्दा उठाने की सलाह देते हैं। लेकिन किसी के कहने पर नेता या विचारक विशेष का नाम लेना या किसी विशेष मुद्दे को उठाना रंग को चोखा नहीं कर सकता। इसके पीछे एक जिंदगी बीत जाती है। लेकिन जिनकी राजनीतिक समझदारी है, जो महत्वपूर्ण भूमिका या तो निभा चुके हैं या निभा रहे हैं, उन्हें आज नहीं तो कल जवाब देना पड़ेगा।
यह विचारणीय है कि अगर 1990 के पहले के माहौल में पले-बढ़े लोगों का यह आलम है तो आगे आने वाली पीढि़यों का क्या रुख-रवैया होगा? आज अगर भले ही थोड़े लोग, कम से कम संविधान की कसौटी पर, सही हैं तो आगे ज्यादा सही होने की संभावना बनी रहेगी। लेकिन आज अगर सही नहीं हैं, तब आगे भी सही नहीं होंगे। भ्रष्टाचार विरोध की ओट बहुत दिन तक साथ नहीं दे सकती। विदेशी बैंकों में जमा काला धन हो या यहां की लूट, दोनों पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत हैं। काला धन फिर जमा हो जाएगा। जमा करने वालों में बाबाओं के चेले नहीं हैं या होंगे, इसकी क्या गारंटी है?        
आजकल प्रैस परिषद के अध्यक्ष मार्कंडे काटजू साहब खासे चर्चा में रहते हैं। उन्होंने कई मुद्दों, विशेषकर मीडिया से संबंधित, पर दो टूक बात रख कर बहस पैदा की है। कुल मिला कर, बाजार और विचार की बहस में उन्होंने विचार पर बल दिया। उन्होंने यह भी कहा है कि जंतर-मंतर पर तिरंगा लहराने से भ्रष्टाचार दूर नहीं होगा। हमें लगा कि काटजू साहब की वैचारिकता नवउदारवाद विरोधी रुख अख्तियार करेगी। उनके पद और प्रतिष्ठा को देखते हुए उसका लाभ नवउदारवाद विरोधी मुहिम को मिलेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जल्दी ही पता लग गया कि वे शासक वर्ग के साथ खड़े हैं। अंग्रेजी का अंधविश्वास उन पर भी वैसा ही हावी है। उन्होंने अंग्रेजी न जानने वालों को बैलगाड़ी हांकने वाला कहा है। उनका तर्क मानें तो केवल अंग्रेजी जानने वाले ही भारत माता के बेटे-बेटियां हैं। आपको ध्यान होगा, ऐसा ही तर्क सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व प्रमुख न्यायधीश बालाकृष्णन साहब ने भी दिया था। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी नहीं जानने वाले केवल चपरासी बन सकते हैं। जाहिर है, उनकी नजर में चपरासी और उनके बेटे-बेटियां भारत माता के बेटे-बेटियां नहीं हैं, और न ही कभी बन पाएंगे।
काटजू साहब और बालाकृष्णन साहब के हिसाब से सोना का भारत माता पर कोई दावा ही नहीं है। वह बेचारी कभी अंग्रेजी बोल ही नहीं पाएगी। दूरदर्शन पर देहाती महिलाओं को अंग्रेजी में बताया जाता है कि उनकी बेटियां अच्छी पढ़ाई करती हैं, यानी अंग्रेजी बोलती हैं। नवउदारवाद के पिछले 20 सालों में हिंदुस्तान का शासक वर्ग पूरी तरह अंग्रेजी का अंधा हो चुका है। लोहिया इस वर्ग के इसलिए अपराधी हैं कि उन्होंने अंग्रेजी का विरोध कर सभी बच्चों को भारत माता की गोद में बिठाना चाहा था, जो उनका प्राकृतिक हक है।
अन्ना आंदोलन से भाषा के साथ दूसरा अवमूल्यन प्रतिरोध की अहिंसक कार्यप्रणाली, जिसे लोहिया ने सिविल नाफरमानी कहा है, का हुआ है। इस मायने में कि जिस पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था और शोषण के खिलाफ उसका आविष्कार और उपयोग हुआ, उसी के समर्थन में उसे लगाया जा रहा है। इसके गहरे और दूरगामी परिणाम होने हैं। जाहिर है, इससे अहिंसक आंदोलन को गहरा धक्का लगेगा। अहिंसक कार्यप्रणाली में विश्वास करने वाले कई महत्वपूर्ण जनांदोलनकारी और राजनैतिक कार्यकर्ता इस आंदोलन को समर्पित हो गए हैं। यह शेखी भी जताई जाती है कि अरब देशों में जहां बदलाव के लिए हिंसा हो रही है, वहां यह आंदोलन पूरी तरह अहिंसक है। लेकिन यह सच्चाई छिपा ली जाती है कि यह आंदोलन किसी बदलाव के लिए नहीं है। अपने स्वार्थ के लिए अहिंसक और अनुशासित रहना कोई बड़ाई की बात नहीं है। नवउदारवाद के पक्ष में अहिंसा को अगवा किया गया है। और उसके विरोध के लिए हिंसा का रास्ता छोड़ा गया है। मनमेाहन सिंह और चिदंबरम यही चाहते हैं। हमने पीछे लिखा था कि अगर अनशनरत अन्ना को कहीं जरा-सी खंरोच या मूच्र्छा आ जाती तो अहिंसकों की हिंसा का जबरदस्त नजारा देखने में आता।
इधर खबर आई है कि टीम अन्ना के एक सदस्य मुफ्ती शहमीम कासमी साहब को स्वामी अग्निवेश बना दिया गया है! वे टीम का मुस्लिम चेहरा थे। टीम अन्ना के सरदार ने कहा है कि कासमी चर्चा के किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले ही उसकी रिकाॅर्डिंग कर रहे थे, जिसे वे चैनलों को देते। अजीब बात है। चर्चा के दौरान रिकाॅर्डिंग करने में भला क्या बुराई हो सकती है। सही फैसला सही चर्चा से ही होकर आता है। इसलिए चर्चा की जानकारी टीम के बाहर भी साझा हो तो इसमें क्या ऐतराज हो सकता है? हालांकि कासमी साहब ने कहा है कि उन्हें रिकाॅर्डिंग करना आता ही नहीं है। मतभेद के कारण दूसरे हैं। जो भी हो, एक रिकाॅर्डिंग आदमी के दिमाग में भी चलती है। आपसी चर्चा के दौरान टीम अन्ना के सदस्यों के दिमाग में भी चलती होगी। क्या टीम अन्ना के सरदार का उसे भी प्रतिबंधित करने का इरादा है? लोकतंत्र और पारदर्शिता के पहरेदार इस पर क्या कहते हैं, अभी तक सुनने में नहीं आया है। कौन नहीं जानता कि विदेशी धन खाने वाले एनजीओ और उन्हें चलाने वाले ऐसे ही फर्जीवाड़े पर पलते हैं।
मीडिया और सिविल सोसायटी के समर्थन का जो नशा टीम अन्ना को हुआ है, वह जल्दी नहीं टूटने वाला है। ‘हम एक हैं’ की घोषणा करते हुए रामदेव और अन्ना फिर साझी हो गए हैं। वे अलग कभी थे ही नहीं। हमने कहा था कि कांग्रेस समेत ये सब एक पूरी टीम हैं। इस टीम का कारोबार आगे और चलेगा।
प्रधानमंत्री के प्रमुख आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने पिछले दिनों कहा है कि अब से आगे 2014 के आम चुनाव तक आर्थिक सुधारों की गति धीमी रहेगी। लेकिन आम चुनाव के बाद सुधारों में यथावत और विधिवत तेजी आ जाएगी। यानी सरकार किसी की भी हो, नवउदारवादी व्यवस्था इसी रूप में जारी रहेगी। कभी मनमोहन सिंह और कभी अटल बिहारी वाजेपयी द्वारा उछाला गया जुमला - ‘आर्थिक सुधारों का मानवीय चेहरा’ - कभी का फालतू हो चुका है। अफसोस की बात है दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में यह तय हो चुका है कि चुनावी महाभारतों का देश की व्यवस्था के संदर्भ में कोई मायना नहीं रह गया है। आर्थिक सलाहकार के बयान पर सबसे पहले और सबसे तीखी प्रतिक्रिया भाजपा की थी। उसने कहा कि आर्थिक सुधारों की तेजी पर ब्रेक सरकार की असपफलता की निशानी है।
नवउदारवाद बढ़ेगा, कांग्रेस के राज में भी और भाजपा के राज में भी। जाहिरा तौर पर उसके दो नतीजे होंगे। एक तरफ पहले से बदहाल आबादी की बदहाली में तेजी आएगी और दूसरी तरफ पहले से विकराल भ्रष्टाचार और तेज होगा। इसके साथ यह भी होगा कि जनता की बदहाली के अंधकार को लूट के माल से मालामाल होने वाले ‘शाहनिंग इंडिया’ की चमक से ओट करने की कोशिश की जाएगी और दूसरी ओर कठोर कानून बनाने की मांग करके भ्रष्टाचार पैदा करने और बढ़ाने वाली व्यवस्था पर परदा डालने का खेल रचा जाता रहेगा। जन लोकपाल कानून यथारूप में बन जाने पर आगे और कड़े कानून की जरूरत उसके पैरोकार और वारिस बताएंगे। भले ही अभी तक कड़े कानूनों की दौड़ का अंत सैनिक तानाशाही में होता रहा है।
नवउदारवाद ने टीम अन्ना का रूप धर कर जनांदोलनकारियों का अपने हिसाब से पूरा इस्तेमाल कर लिया है। मुख्यधारा राजनीति के अंतर्गत फर्क होने का दावा करने वाले भी उस रूप के चक्कर में आ गए। हमें आश्चर्य भी हुआ और आघात भी लगा जब भाकपा के वयोवृद्ध नेता एबी बर्द्धन रामलीला मैदान में हाजिरी लगाने पहुंच गए। ऐसे में नवउदारवाद के विरोध में अभियान जीरो से शुरू होगा।
तो टीम अन्ना भारत माता को घेरने वाले कपूतों की साथी है। निर्लज्जों ने भारत माता की लाज बचाने का ठेका उठा लिया है! इसके अलावा उसका कोई और चरित्र होता या कुछ अच्छे लोगों के उसमें शामिल होने के चलते बन पाता तो वह सामने आ चुका होता। यही सच्चाई है। इसका विश्लेषण जैसे और जितना चाहें कर सकते हैं।

भारत माता धरती माता
हम यह नहीं कहते कि सोना अपने घर, गांव, कस्बे, शहर तक महदूद रहे। लोहिया ने कहा था देश माता के साथ हर इंसान की एक धरती माता होती है। लोहिया ने स्टालिन की बेटी स्वेतलाना के भारत में बसने के अनुरोध का समर्थन किया था। यह कितनी सुंदर बात होगी कि सोना भारत माता के साथ धरती माता की बेटी बने। दुनिया के किसी भी कोने में जाए। घूमे, काम करे, सीखे, सिखाए, मित्र बनाए, मन करे तो वहीं शादी करे, भले ही बस जाए। ऐसा होने पर वह भारत माता के ज्यादा फेरे में न पड़े तो ही अच्छा है। बाहर अगर उसका निधन होता है तो अंतिम क्रिया वहीं संपन्न हो।
अभी तक देश-विदेश के इक्का-दुक्का लोगों ने आदिवासी क्षेत्रों में रह कर वहां की लड़कियों से शादी की है। आदिवासी लड़कियां बाहर जा कर ऐसा करें तो बराबर की बात बनेगी। हम किसानों और मजदूरों की लड़कियों के लिए भी ऐसा सपना देखते हैं कि वे स्वतंत्रतापूर्वक बड़ी हों और और देश-दुनिया में अपनी जगह बनाएं। लेकिन समस्या यही है कि जब तक वे भारत माता की गोद से बहिष्कृत हैं, धरती माता की गोद उन्हें नसीब नहीं हो सकती।
हमने ऊपर देखा कि भारत माता किस कदर घिर गई है। यह घेरा टूटे, इसके लिए हिंदुस्तान में एक बड़ी और बहुआयामी क्रांति की सख्त और तत्काल जरूरत है। उस क्रांति के कुछ सूत्र लोहिया ने दिए थे। लेकिन शासक वर्ग और उसका क्रीतदास बौद्धिक वर्ग प्रतिक्रांति पर डटा रहा। सत्ता के साथ मिल कर लोहिया के राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक-दार्शनिक-सांस्कृतिक चिंतन को स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा तक बहिष्कृत करके अपना ‘वाद’ बचा और चला लेने की खुशी पालने वाले लोगों ने हिंदुस्तान की क्रांति के साथ गहरी दगाबाजी की है। देश में उथल-पुथल है, उसका फायदा लेना चाहिए, कह कर टीम अन्ना और उसके आंदोलन में जुटे लोग भी जाने-अनजाने वही कर रहे हैं।  

26 अप्रैल 2012

घिर गई है भारत माता


(प्रिय साथी हमने नवंबर 2015 में डॉ प्रेम सिंह का पूर्व-प्रकाशित लेख ‘ताकि सनद रहे …. ‘ जारी किया था। उस समय हमने कहा था कि समय-समय पर उनके अन्‍य लेख जारी किए जाएंगे। उसी क्रम में उनका लंबा लेख ‘घिर गई है भारत माता’ जारी किया जा रहा है। यह लेख ‘युवा संवाद’ (अंक मई 2012) में प्रकाशित हुआ था और अब उनकी पुस्‍तक ‘भ्रष्‍टाचार विरोध : विभ्रम और यथार्थ’ (वाणी प्रकाशन) में संकलित है। हम यह इसलिए कर रहे हैं कि डा प्रेम सिंह अकेले विचारक और कार्यकर्ता हैं जो स्थितियों का हमेशा सही विश्‍लेषण प्रस्‍तुत करते हैं। आशा है देशभक्ति के छलछंद भरे कोलाहल में यह मार्मिक लेख आपको अच्‍छा लगेगा।)

घिर गई है भारत माता

प्रेम सिंह


ये भी तो मादरे हिंद की बेटी है!
करीब पांच साल पहले की बात है। हम परिवार के साथ कार में रात के करीब साढ़े ग्यारह बजे नोएडा से एक शादी से लौट रहे थे। गाजीपुर चैराहे पर अंधेरा था और कड़ाके की ठंड थी। करीब पंद्रह साल की एक लड़की लाल बत्ती पर गजरा बेच रही थी। लिबास से वह खानाबदोश या फिर आदिवासी समाज से लग रही थी। वह थोड़ी ही दूरी पर खड़ी थी लेकिन धूसर शरीर और कपड़ों में उसकी शक्ल साफ नहीं दिख रही थी। हालांकि यह साफ था कि वह कुपोषण के चलते पतली-दुबली है और कुदरत की ताकत के सहारे जिंदा (दिल) है। हमने इधर-उधर नजर दौड़ाई। उसके साथियों में और कोई नजर नहीं आया। वह चैराहा शहर के बाहर और सुनसान था, जहां लड़की के साथ कुछ भी हो सकता था। हमने यह मान कर मन को तसल्ली दी कि उसके कोई न कोई साथी जरूर आस-पास कहीं होंगे, लड़की अकेली नहीं है। इतनी रात गए अकेली कैसे हो सकती है?
वह लड़की थोड़ा हमारी कार के पास आई। देखा, वह वैसी चिंतित और डरी हुई नहीं थी जैसा हम उसको लेकर सोच रहे थे। अपनी जड़ों से वह उखड़ी हुइ जरूर थी, लेकिन उसके बावजूद जीवन पर उसकी गिरफ्त मजबूत लगी। हजारों साल का सामंतवाद उसकी स्वायत्तता और स्वच्छंदता को नष्ट नहीं कर पाया था। उसी ताकत के बल पर वह पूंजीवाद से लोहा ले रही थी। हमने महसूस किया कि उस लड़की और हमारे बीच गहरा फासला है। उसका मन-मानस हमसे अलग और आज भी स्वच्छंद है। हमें तब नागार्जुन की उपर्युक्त काव्य-पंक्ति अनायास याद आई थी। हल्की मुस्कुराहट के साथ - मादरे हिंद की एक बेटी यह भी है!
आधुनिक कलाकारों को सामंती/पूंजीवादी शोषण के शिकार लोगों पर रचना करने की आदत पड़ चुकी है। आदत के वशीभूत हम कई दिनों तक उस लड़की की दशा पर कोई लेख या कविता लिखने की सोचते रहे। हालांकि लिखा नहीं गया। यह सोच में पड़ कर कि लोग कब से गरीबों, वंचितों, शोषितों को विषय बना कर लिखते आ रहे हैं। उसे मुक्ति का, क्रांति का साहित्य कह कर उसका संघर्ष और सौंदर्य मूल्य भी सिद्ध कर दिया जाता है। लेकिन भारत के शहरों की गंदी बस्तियों, झुग्गियों, लाल बत्तियों, फुटपाथों पर भीड़, कितना ही खदेड़ो, बढ़ती ही जाती है। यह रोज का किस्सा है, कोई कितनी कविता करेगा! महाकवि को इलाहाबाद के पथ पर जो पत्थर तोड़ती दिखी थी, उसकी पोतियों-नातिनों की इतनी ही तरक्की हुई है कि वे एक के बाद एक और नए से नए बनने वाले एक्सप्रैस रास्तों पर पत्थर तोड़ रही हैं। वे इस देश और दुनिया की कभी नागरिक नहीं बन सकती, उन्हें मानव कहना मुश्किल लगता है। उस दिन खास बात थी तो बस यही कि वह अकेली लड़की एक-दो रुपये के लिए इतनी रात गए वहां थी।
हमें लगा कि जिस तरह पूंजीवादी कंपनियों के लिए जल, जंगल, जमीन संसाधन हैं, आधुनिक और तरक्कीपसंद कलाकारों/लेखकों के लिए कंपनियों द्वारा जड़ों से उजाड़ा गया जीवन भी संसाधन है। कंपनियों को जैसे ज्यादा से ज्यादा मुनाफा चाहिए, रचना के बदले लेखकों को भी नाम और नकद पुरस्कार चाहिए - ज्यादा से ज्यादा और बड़ा से बड़ा। जो सरकार कंपनियों को ठेके देती हैं, वही रचनाकारों को पद और पुरस्कार देती हैं। इधर कंपनियां भी अपने पुरस्कार देने लगी हैं। ‘रचना सत्ता का प्रतिपक्ष होती है’, ‘सत्ता रचना/रचनाकार से भय खाती है’ - इस तरह की टेक को ऊंचा उठाए रखते हुए रचनाकारों ने वे पुरस्कार लेने भी शुरू कर दिए हैं। आने वाले समय में कंपनियों की ओर से कुछ पद भी आॅफर किए जा सकते हैं। आखिर कंपनियों का भी कोई सामाजिक-सांस्कृतिक दायित्व बनता है! यूरोप और अमेरिका में लंबे समय से यह चल रहा है।
बहरहाल, हमने उस लड़की पर कुछ लिखा नहीं। उसे रात के अंधेरे में वहां देख कर सहानुभूति का एक तीव्र ज्वार उठा था। आज साफ लगता है कि उसके बारे में लिखे जाने पर जो भी मुक्ति होती, वह अपनी ही होती। उस लड़की की मुक्ति से उसका कोई साझा नहीं होता। हमारा कभी उससे मिलना या बातचीत नहीं होनी थी। पांच साल बाद देखते हैं कि वह लड़की और ज्यादा अकेली होती और अमानवीय परिस्थितियों में घिरती जा रही है। चिंता की जाती है कि इतिहास, विचारधारा, मुक्ति, प्रतिबद्धता, सरोकार, सहानुभूति आदि पद निकम्मे घोषित हो चुके हैं। उस लड़की के संदर्भ उन्हें एक दिन निकम्मे साबित होना ही था। क्योंके वे पूंजीवाद के पेट से उठाए गए थे। जिस दिन पूंजीवाद को मानव सभ्यता के विकास में क्रांतिकारी चरण होने का प्रमाणपत्र मिला था, उसी दिन यह तय हो गया था कि वह लड़की महानगर के चैराहे पर, रात के अंधेरे में, अकेली गुबारा या गजरा जैसा कोई सामान बेचेगी। और उसकी एक अन्य बहन को उसका मालिक ताले में बंद करके सपरिवार निश्चिंत विदेश घूमने निकल जाएगा। यह तय हो गया था कि यह भारत सहित पूरी दुनिया में अनेक जगहों पर अनेक रूपों में अनेक बार और लगातार होगा। भारत में पिछले 20-25 सालों में इस प्रक्रिया में खासी तेजी आई है।    
पिछले दिनों देश की राजधानी दिल्ली की मध्यवर्गीय आवास काॅलोनी द्वारिका के एक मकान से पुलिस ने एक 13 साल की घरेलू नौकरानी को डाॅक्टर दंपत्ति के घर की कैद से छुड़ाया। डाॅक्टर दंपत्ति मार्च के अंतिम सप्ताह में उसे घर में बंद करके अपनी बेटी के साथ थाईलैंड की सैर पर गए थे। 6 दिन बाद बालकनी से पड़ोसियों ने लड़की की पुकार सुनी। वह पहले भी पुकार करती रही थी, लेकिन किसी ने उसकी मदद नहीं की। 30 मार्च को एक एनजीओ की मदद से पुलिस को बुलाया गया। पुलिस ने फायर इंजिन बुला कर लड़की को कैद से बाहर निकाला। यह मामला मीडिया में काफी र्चिर्चत रहा। खबरों में आया कि लड़की भूखी, डरी हुई और बेहाल थी। मालिकों ने लड़की को उसके लिए छोड़े गए खाने के अलावा रसोई से कुछ और नहीं खाने के लिए सख्ती से मना किया था। खबरों के मुताबिक लड़की ने मालिकों द्वारा अक्सर प्रताडि़त किए जाने की बात भी कही।
मामला टीवी और अखबारों में आने से, जाहिर है, डाॅक्टर दंपत्ति के रिश्तेदारों ने उन्हें बैंकाॅक में सूचित कर दिया। वे आए और पुलिस से बचते रहे। उन्होंने कहा कि उनकी नौकरानी बच्ची नहीं, 18 साल की बालिग है और उसके साथ कोई दुव्र्यवहार नहीं किया जाता रहा है। वे उसे साथ ले जाना चाहते थे, लेकिन लड़की ने जाने से इंकार कर दिया। जो भी हो, मामला पकड़ में आ गया था, पुलिस ने डाॅक्टर दंपत्ति को न्यायिक हिरासत में ले लिया। अब वे जमानत पर हैं और अदालत में केस दायर है। वाकये को ज्यादा दिन नहीं हुए हैं लेकिन लोग अभी से उसके बारे में भूल चुके हैं। हो सकता है कोई गंभीर पत्रकार मामले में आगे रुचि ले और केस की प्रगति और नतीजे के बारे में बताए। और उस लड़की के बारे में भी कि उसका क्या हुआ? उसे क्या न्याय मिला?
जैसा कि अक्सर होता है, इस मामले में भी मीडिया की खबरों में लड़की को मेड (उंपक) अथवा घरेलू नौकरानी लिखा/कहा गया है। लड़की का उत्पीड़न करने वाले डाॅक्टर दंपत्ति का नाम - संजय वर्मा, सुमित्रा वर्मा - हर खबर में पढ़ने/सुनने में आया। काफी खोजने पर हमें लड़की का नाम एक जगह सोना लिखा मिला। हालांकि हमें यह नाम असली नहीं लगता। लड़की की मां जब झारखंड से आई तो उसका नाम भी मीडिया में पढ़ने को नहीं मिला। उसे लड़की की मां लिखा और कहा गया। भारत का मध्यवर्ग अपने बच्चों के नामकरण के पीछे कितना पागल होता है, इसकी एक झलक अशोक सेकसरिया की करीब 15 साल पहले छपी कहानी ‘राइजिंग टू द अकेजन’ में देखी जा सकती है। पिछले, विशेषकर 25 सालों में सुंदर-सुंदर संस्कृतनिष्ठ नाम रखने की देश में जबरदस्त चल्ला चली हुई है। केवल द्विज जातियां ही नहीं, शूद्र और अनुसूचित जाति और जनजाति से मध्यवर्ग में प्रवेश पाने वाले दूसरी-तीसरी पीढ़ी के लोग द्विजों की देखा-देखी यह करते हैं। लाड़लों पर लाड़ तो उंड़ेला जाता ही है, जो स्वाभाविक है, भारत का मध्यवर्ग अपने सांस्कृतिक खोखल को सांस्कृतिक किस्म के नामों से भरने की कोशिश करता है। इस समाज में झारखंड के आदिवासी इलाके से आने वाली निरक्षर मां-बेटियों का नाम नहीं होता।
द्वारिका काॅलोनी का यह मामला सुख्रियों में आने पर नागरिक समाज ने ऐसा भाव प्रदर्शित किया मानो वे स्वयं ऐसा कुछ नहीं करते जो डाॅक्टर दंपत्ति ने किया। मानो वह द्वारिका काॅलोनी, दिल्ली या देश में एक विरल मामला था जो भले पड़ोसियों के चलते समय पर सामने आ गया। कानून तोड़ने और लड़की के साथ अमानवीय व्यवहार करने वाले शख्स को गिरफ्तार कर लिया गया। अब पुलिस और कानून अपना काम करेगा। ऐसा सोचने में उसका पीडि़ता से कोई सरोकार नहीं, खुद से है। ऐसा सोच कर वह अपने को कानून का पाबंद नागरिक और परम मानवीय इंसान मानने की तसल्ली पा लेता है। इस तसल्ली में अगर कुछ कमी रह जाती है तो वह बाबाओं के दर्शन और प्रवचन से पूरी करता है। इस झूठी तसल्ली में वह इतना सच्चा हो जाता है कि गंदी राजनीति और राजनेताओं पर अक्सर तीखे हमले बोलता है। उनके द्वारा कर दी गई देश की दुर्दशा पर आक्रोश व्यक्त करता है। राजनीति को बुरा बताते वक्त भी राजनैतिक सुधार उसकी इच्छा नहीं होती, वैसा करके वह अपने अच्छा होने का भ्रम पालता है। यह सच्ची बात है कि भारत की मौजूदा राजनीति बुरी बन चुकी है। लेकिन इस बुरी राजनीति की मलाई काटने की सच्चाई मध्यवर्ग छिपा लेता है।
हम सब जानते हैं भारत में कारखानों, ढाबों, दुकानों से लेकर घरों तक में बाल मजदूरों की भरमार है। शहर की लाल बत्तियों पर छोटे-छोटे लड़के-लड़कियां तमाशा दिखाते, कोई सामान बेचते या भीख मांगते मिलते हैं। जो 14 साल से ऊपर हो जाते हैं उन्हें भी हाड़तोड़ श्रम के बदले सही से दो वक्त पेट भरने लायक मेहनताना नहीं मिलता। सुबह 6 बजे से रात 8 बजे तक माइयां काॅलोनियों में इस घर से उस घर चैका-बर्तन, झाड़ु-बुहारू, कपड़े धोने, बच्चे सम्हालने और खाना बनाने के काम में चकरी की तरह घूमती हैं। वे दस-बीस रुपया बढ़ाने को कह दें तो सारे मोहल्ले में हल्ला हो जाता है। उनके मेहनताने - ज्यादा से ज्यादा काम, कम से कम भुगतान - को लेकर पूरे मध्यवर्गीय भारत में गजब का एका है।
दूसरी तरफ, मध्यवर्ग के लोग जिस महकमे, कंपनी या व्यापार में काम करते हैं, अपने सहित पूरे परिवार की हर तरह की सुविधा-सुरक्षा मांगते और प्राप्त करते हैं। इसमें संततियों के लिए ज्यादा से ज्यादा संपत्ति जोड़ना भी शामिल है। फिर भी उनका पूरा नहीं पड़ता। वे कमाई के और जरिए निकालते हैं। रिश्वत लेते हैं। टैक्स बचाते हैं। अपने निजी फायदे के लिए कानून तोड़ते हैं। अभिनेता, खिलाड़ी, विश्व सुंदरियां, कलाकार, जावेद अख्तर जैसे लेखक अपने फन से होने वाली अंधी कमाई से संतुष्ट नहीं रहते। वे विज्ञापन की दुनिया में भी डट कर कमाई करते हैं। सरकारें ऐसी प्रतिभाओं से लोक कल्याण के संदेश भी प्रसारित करवाती हैं। वे अपनी कमाई को लेकर जरा भी शंकित हुए, देश की आन-बान-शान का उपदेश झाड़ते हैं। उनमें कुछ सचमुच बड़े कलाकार हैं! किसानों की आत्महत्याओं, महिलाओं के उत्पीड़न, गरीबों की बेबसी, बच्चों की वलनरेबिलिटी को भी मुनाफे का सामान बना लेते हैं। इस तरह अपनी बड़ी-छोटी सोने की लंका खड़ी करके उसे और मजबूत बनाने में जीवन के अंत काल तक जुटे रहते हैं। इनकी हविस का कोई अंत नहीं है। रोजाना करोड़ों बचपन तिल-तिल दफन होते हैं, तब उनकी यह दुनिया बनती और चलती है।
भोग की लालसा में फंसे मध्यवर्ग का एक और रोचक पहलू है जो फिल्मों और साहित्य में भी देखा जा सकता है। यह सब करते वक्त उन्हें अपनी मजबूरी सोना की मां की मजबूरी से भी बड़ी लगती है, जिसे अपनी नाबालिग लड़की अंधेरे में धकेलनी पड़ती है। ‘पापी पेट की मजबूरी’ में वे झूठ बोलने, धोखा देने, फ्लर्ट करने, प्रपंच रचने की खुली छूट लेते हैं। कई बार यह पैंतरा भी लिया जाता है कि हम भी तो कुछ पाने के लिए अपनी आत्मा को अंधेरे में धकेलते हैं। रोशनी दिखाने वाले बाबा लोग न हों तो जीना कितना मुश्किल हो जाए! यह अकारण नहीं है कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के समर्थन में आम मध्यवर्गीय भारतीय से लेकर बड़े-बड़े उद्योगपति, उनकी संस्थाएं और नवसाम्राज्यवाद का पंजा गड़ाने वाली कुख्यात फंडिंग एजेंसियों का धन खाने वाले बुद्धिजीवी और समाजसेवक शामिल हैं।      
लोग यह भी जानते हैं कि देश में चाइल्ड लेबर (प्रोहिबिशन एंड रेगुलेशन) एक्ट 2006 है। लेकिन उसकी शायद ही कोई परवाह करता है। कुछ एनजीओ और स्वयंसेवी संस्थाएं ही इस मुद्दे पर सक्रिय रहते हैं। बाकी कहीं से कोई आवाज नहीं उठती कि बचपन को कैद और प्रताडि़त करने वालों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई हो, अगर मौजूदा कानून में कमी है तो उसे और प्रभावी बनाया जाए। कड़क लोकपाल की स्वतंत्र संस्था और कानून बनाने के लिए आसमान सिर पर उठाने वाले लोग ये ही हैं। उनके लिए ही बाल मजदूरी और सस्ती मजदूरी की यह ‘प्रथा’ चल रही है। वह न चले तो इनका जीवन भी चलना असंभव हो जाएगा।
आइए सोना की बात करें। सोना अपनी मां की बेटी है। लेकिन क्या वह भारत माता की भी बेटी है? नागार्जुन ने अपनी कविता में जब आराम फरमा मादा सुअर का चित्रण किया तो वे उसकी मस्ती और स्वतंत्र हस्ती पर फिदा हुए लगते हैं - देखो मादरे हिंद की गोद में उसकी कैसी-कैसी बेटियां खेलती हैं! कविता का शीर्षक ‘पैने दांतों वाली ...’ कविता की अंतिम पंक्ति है। शायद कवि कहना चाहता है कि ‘‘जमना किनारे/मखमली दूबों पर/पूस की गुनगुनी धूप में/पसर कर लेटी .../यह ... मादरे हिंद की बेटी ...’’ अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करने में समर्थ है।
सोना का वह भाग्य नहीं है। उससे भारत माता की गोद छीन ली गई है। भारत माता सोना की मां जैसी ही मजबूर कर दी गई है, जिसे अपनी बेटी अनजाने देश भेजनी पड़ती है, जहां वह सीधे वेश्यावृत्ति के धंधे में भी धकेली जा सकती है। वह चाह कर भी अपनी बेटी को अपने पास नहीं रख सकती। पूंजीवादी आधुनिक सभ्यता आदिवासियों को उनके घर-परिवेश-परिजनों से उखाड़ कर जमती है। ऐसा नहीं है कि नागरिक समाज में ईमानदार और दयालु लोग नहीं हैं या नवउदारवाद के चलते आगे नहीं रहेंगे। लेकिन उससे अनेकार्थी विषमताजनित शोषण नहीं रुकेगा। आदिवासी लड़कियों, महिलाओं, लड़कों, पुरुषों को अपने घर-परिवेश से निकल कर हमारे घरों और निर्माण स्थलों पर आना ही होगा। उन्हें कुदरत का भी श्राप है। उनकी घर-धरती के नीचे जो खनिज संपदा जमा है, उसे निकाले बगैर पूंजीवाद का एक कदम काम नहीं चल सकता।      
आपको याद होगा अन्ना आंदोलन के दौरान दिल्ली में पोस्टर लगे थे - ‘देश की बेटी कैसी हो, किरण बेदी जैसी हो।’ किरण बेदी काफी चर्चा में रहती हैं। कहती हैं, जो भी करती हैं, देश की सेवा में करती हैं। हमें किरण बेदी की कारगुजारियों से यहां मतलब नहीं है। सवाल है - मादरे हिंद की बेटी कौन है? किरण बेदी या सोना? आप कह सकते हैं दोनों हैं। लेकिन हम सोना को मादरे हिंद की बेटी मानते हैं। इसलिए नहीं कि हमारी ज्यादा सही समझ और पक्षधरता है। सोनाएं किरण बेदियों के मुकाबले भारी सख्या में हैं और किसी का बिना शोषण किए, बिना बेईमानी किए, बिना देश सेवा का ढिंढोरा पीटे, दिन-रात श्रम करके, किफायत करके अपना जीवन चलाती हैं। यौन शोषण समेत अनेक तरह की प्रताड़नाएं सहती हैं। अपनी ऐसी गरीब बेटियों के लिए हर मां मरती-पचती और आंसू बहाती है। सोनाओं की मांओं के समुच्चय का नाम ही भारत माता है। इस भारत माता को कपूतों ने एकजुट होकर अपनी कैद में कर लिया है।

कपूतों की करतूत
हमारे गांव के पंडित लिखी राम अब दुनिया में नहीं हैं। वे एक स्वरचित गीत गाते थे। गीत के बोल बड़े मार्मिक और रोमांच पैदा करने वाले थे। गीत की टेक थी - ‘भारत माता रोती जाती निकल हजारों कोस गया’। हजारों कोस का बीहड़ रास्ता हमारी बचपन की नजरों के सामने खिंच जाता था, जिस पर रोती-बिलखती भारत माता नंगे पांव चली जाती थी। गीत सुखांत नहीं था। हमें इससे परेशानी होती थी। भगत सिंह और उनके पहले के क्रांतिकारियों की शहादत, सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज और गांधी जी की हत्या पर गीत समाप्त होता था। तब हमें राष्ट्रवाद, उसकी विचारधारा और वर्ग चरित्र के बारे में जानकारी नहीं थी। हम अपनी जन्म देने वाली मां के अलावा एक और मां - भारत माता - से जुड़ाव का अनुभव करते थे और पाते थे कि वह कष्ट में है। भावना होती थी कि भारत माता के कष्ट का निवारण होना चाहिए। तब हमें भारत माता साड़ी, मुकुट और गहनों में सजी-धजी नहीं दिखाई देती थी। उसके हाथ में तिरंगा भी नहीं होता था। वह दिन-रात खटने वाली गांव की औरतों के वेश में उन्हीं जैसी लगती थी।
बड़े होकर भी हम पंडित लिखी राम का गीत सुनते रहे। भारत माता की विशिष्ट छवि, उससे संबंधित साहित्य और बहसों के बीच बचपन में पंडित लिखी राम द्वारा खींची गई भारत माता की तस्वीर मौजूद रहती रही है। ‘मैला आंचल’ में तैवारी जी का गीत - ‘गंगा रे जमुनवा की धार नवनवा से नीर बही। फूटल भारथिया के भाग भारत माता रोई रही।’’ पढ़ा तो उसकी टान (लय) लिखी राम के गीत की टान के साथ खट से जुड़ गई। तैवारी जी के गीत की टान को सुन कर बावनदास आजादी के आंदोलन में खिंचा चला आया था। उस टान पर वह अपना जीवन आजादी के संघर्ष में बिता देता है। अंत में माफिया द्वारा निर्ममता पूर्वक मारा भी जाता है। उसे मारा ही जाना था, क्योंकि वह यह सच्चाई जान लेता है कि आजादी के बावजूद भारत माता को स्वार्थी तत्वों ने अपने कब्जे में ले लिया है और वह जार-जार रो रही है। बावनदास गांधी का अंधभक्त है। भारत माता अंग्रेजों की कैद से छूट कर कपूतों के हाथ में पड़ गई है - इस सच्चाई पर वह कोई ‘निगोसिएशन’ करने को तैयार नहीं था। उसकी वैसी तैयारी ही नहीं थी। वह राजनैतिक से अधिक नैतिक धरातल पर जीता था। वह अहिंसक क्रातिकारी था। भला भारत माता को लेकर सौदेबाजी की जा सकती है?
हमारे मित्र चमनलाल ने भगत सिंह पर काम किया है। काम को और बढ़ाने के लिए उन्होंने भारत में नवउदारवाद के प्रतिष्ठापक मनमोहन सिंह को मदद के लिए पत्र लिखा था जिसे नेट द्वारा सबको भेजा कि सभी उनकी मांग का समर्थन करें। पता नहीं मनमोहन सिंह ने उनकी बात सुनी या नहीं। एक बार वे कह रहे थे कि भगत सिंह जिंदा रहते तो भारत के लेनिन होते। उनसे कोई पूछ सकता है कि नवउदारवादी मनमोहन सिंह से भगत सिंह पर काम के लिए मदद मांगने का क्या तर्क बनता है, और भगत सिंह लेनिन क्यों होते; भगत सिंह क्यों नहीं होते? किन्हीं रूपकिशोर कपूर द्वारा 1930 के दशक में बनाए गये एक चित्र की प्रतिलिपि मिलती है। उसमें भगत सिंह तलवार से अपना सिर काट कर दोनों हाथों से भारत माता को अर्पित कर रहा है। भारत माता भगत सिंह को हाथ उठा कर रोते हुए आशीर्वाद दे रही है। (संदर्भ: ‘मैप्स, मदर/गोडेस, मार्टिर्डम इन माॅडर्न इंडिया)।    
नवजागरणकालीन चिंतकों, क्रांतिकारियों, कवियों-लेखकों, चित्रकारों ने विविध प्रसंगों में भारत माता की छवि का अंकन किया है। ‘भारत माता ग्रामवासिनी’ से लेकर ‘हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती’ के रूप में उसके गुण गाए गए हैं। भारत माता की छवि की राष्ट्रीय और सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में भूमिका की सीमाएं और अंतर्विरोध आज हम जानते हैं। विद्वानों के लिए शोध का यह एक प्रमुख विषय है। लेकिन हम यह भूल गए हैं कि क्रांतिकारियों का आंदोलन हो या गांधी के नेतृत्व में चलने वाला आंदोलन या इन दोनों से पहले आदिवासियों और किसानों का आंदोलन - उनमें भारत माता को पूंजीवादी बेडि़यों से मुक्त करने की मंशा थी। आजादी के बाद समाजवादी और कम्युनिस्ट आंदोलन की तो टेक ही पूंजीवाद विरोध थी। लेकिन देखते-देखते देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, दवाइयों से लेकर हथियारों तक हर तरह की दलाली करने वालों, बिल्डरों, माफियाओं, नेताओं, बुद्धिजीवियों ने एका बना कर भारत माता को घेर लिया है। सब मिल कर उसे नवउदारवादी हमाम में खींच रहे हैं।
हम यहां टीम अन्ना और उसके आंदोलन पर इसलिए चर्चा करना चाहेंगे क्योंकि वे भारत माता का नाम बढ़-चढ़ कर लेने वालों में हैं। इस विषय में ज्यादातर जो आलोचना या विरोध हुआ, वह यह कि टीम अन्ना ने जंतर-मंतर पर भारत माता की जो तस्वीर लगाई वह आरएसएस लगाता है। यह बहुत ही सतही आलोचना या विरोध है। हमने आलोचकों से पूछा था कि जो आरएसएस की भारत माता से खफा हैं, वे बताएं कि उनकी अपनी भारत माता कौन-सी है? दूसरे, आरएसएस की भारत माता की तस्वीर से क्या परहेज हो सकता है जब पूरा आरएसएस ही आंदोलन में मौजूद है? भारत माता के घिराव में टीम अन्ना की सहभागिता पर थोड़ा विचार करते हैं।
अन्ना आंदोलन के दौरान सबसे ज्यादा अवमूल्यन भाषा का हुआ है। इस आंदोलन की बाबत यह गंभीर मसला है। कहीं से कोई वाकया उठा लीजिए, उसमें बड़बोलापन और खोखलापन एक साथ दिखाई देगा। आंदोलन में कई गंभीर लोग शामिल हुए। कुछ बाहर आ गए, कुछ अभी वहीं हैं। ऐसे लोगों की भाषा पर भी असर आया है। उनकी भाषा पिछली ताकत खो बैठी। जब विरोधी पृष्ठभूमियों के और विरोधी लक्ष्य लेकर चलने वाले व्यक्ति या समूह आंदोलन के उद्देश्य से एक साथ आते हैं तो भाषा में छल-कपट और सतहीपन आता ही है। टीम अन्ना के प्रमुख सदस्यों द्वारा भाषा का अवमूल्यन अभी जारी है। एक उदाहरण लें। उसकी प्रमुख सदस्य किरण बेदी ने हाल में कहा कि अन्ना हजारे, बाबा रामदेव और श्री श्री रविशंकर तीन फकीर हैं, जो देश का कल्याण करने निकले हैं। हमें 1989 का वह नारा - ‘राजा नहीं फकीर है, भारत की तकदीर है’ - याद आ गया जो समर्थकों ने वीपी सिंह के लिए गढ़ा था।  
जिनका नाम किरण बेदी ने लिया है उन तीनों को अगर सबसे ज्यादा प्यार है तो वह धन से है। धन के लिए वे कोई भी धत्कर्म करने के लिए तत्पर हैं। इसीलिए वल्र्ड बैंक से लेकर भारत और विदेश के आला अमीरों तक इनके तार जुड़े हैं। बंदा अमीर होना चाहिए, वह कौन है, कैसे अमीर बना है, इसकी तहकीकात का काम बाबाओं का नहीं होता! यह ‘फकीरी’ खुद किरण बेदी और टीम अन्ना के पीछे मतवाले मीडिया तथा सिविल सोसायटी को भी बड़ी प्यारी है। फकीरी का यह नया अर्थ और ठाठ है, जो नवउदारवाद के पिठ्ठुओं ने गढ़ा है। भारत का भक्ति आंदोलन सर्वव्यापक था, जिसमें अनेक अंतर्धाराएं सक्रिय थीं। फकीर शब्द तभी का है। संत, फकीर, साधु, दरवेश - इनका जनता पर गहरा प्रभाव था। दरअसल, उनके अपने सादगी और त्याग भरे जीवन का उतना महत्व नहीं है। ज्यादा महत्व इसका है कि उन्होंने सामंती ठाठ-बाट के बरक्स विशाल श्रमशील जीवन के दर्शन को वाणी दी।
ऐसा नहीं है उन्हें संसार और बाजार का ज्ञान और सुध नहीं है। ‘पदमावत’ में ऐसे बाजार का चित्रण है जहां एक-एक वस्तु लाखों-करोड़ों में बिकती है। लेकिन भक्त बाजार से नहीं बंधता। भक्तिकाल में फकीरी भक्त होने की कसौटी है। जो फकीर नहीं है, गरीब नहीं है, वह भक्त नहीं हो सकता। फकीरी महज मंगतई नहीं है। वह एक मानसिक गठन है, जिसे संसार में काम करते हुए उत्तरोत्तर, यानी साधना के जरिए पाया जाता है। वह हद (सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक संरचनाओं) से बेहद (जहां ये संरचनाएं प्रभावी नहीं रह जाती) में जाने की साधना है, जहां भक्त केवल प्रभु का रह जाता है। जब गरीब ही भक्त हो सकता है तो प्रभु गरीब नेवाज होगा ही।
यह साधना बिना सच्चे गुरु के संभव नहीं होती। इसीलिए उसे गोविंद से बड़ा बताने का भी चलन है। जाहिर है, फकीरी गुरु होने की भी कसौटी है। दिन-रात भारी-भरकम अनुदान और दान के फेरे में पड़े तथाकथित गुरुओं और संतों को क्या कहेंगे - फकीर या फ्राड! काफी पहले हमने ‘त्याग का भोग’ शीर्षक से एक ‘समय संवाद’ लिखा था। उसमें सोनिया गांधी के ‘त्याग’ का निरूपण किया था। अन्ना हजारे सरीखों के आरएसएस टाइप त्याग के चैतरफा पूंजीवाद और उपभोक्तवाद चलता और फलता है। ऐसे त्यागी महापुरुषों को उस व्यवस्था से कोई परेशानी नहीं होती। क्योंकि वहां दान के धन से ही सामाजिक काम किए जाते हैं। दान सामंत देता है या पूंजीपति या दलाल, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।  
हमारे मित्र जयकुमार ने सुबह की सैर में हमें ‘खुशखबरी’ दी कि बाबा रामदेव डाॅ. लोहिया का नाम ले रहे थे। करीब दो साल पहले साथी हरभगवान मेंहदीरत्ता (अब दिवंगत) ने भी हमें बताया था कि रामदेव के एक कार्यक्रम में उन्हें डाॅ. लोहिया का चित्र दिखा। कुछ दिन बाद हमने उनके चेलों के हाथ में भारत स्वाभिमान अभियान का वह फोल्डर देखा जिस पर एक पूरी चित्रावली बनी थी। लोहिया का चित्र उसमें भी था। इस देश में गांधी के नाम पर कोई भी जबान साफ कर सकता है। न किसी को ऐतराज होता है, न अचरज। लगभग ऐसी ही गति क्रांतिकारियों की बन चुकी है। वे माफियाओं से लेकर बाबाओं तक के हीरो हैं। लेकिन अन्ना के अंबेडकर का और रामदेव के लोहिया का नाम लेने पर किसी को भी कौतुक होगा। अज्ञेय ने लिखा है, ‘कालिदास की पीड़ा थी, अरसिकों को कवित्त निवेदन न करना पड़ जा जाए, केशवदास की पीड़ा थी, च्रद्रबदनि मृगलोचनी बाबा कहि-कहि न चली जाए, अज्ञेय की पीड़ा है, मैं क्या जानता था यह गति होगी कि हिंदी विभागों में हिंदी के अध्यापकों द्वारा पढ़ाया जाऊंगा!’ भारत में आत्मा मरने के पहले भी रहती है और मरने के बाद भी। लोहिया की आत्मा को जरूर कौतुक हुआ होगा कि भारत माता के नाम पर अपने उपभोक्ता उत्पाद बेचने वाले ध्ंाधेबाज उनका नाम ले रहे हैं!
सुना है रामदेव का अपना ‘विचार साहित्य’ भी है। उसके बारे में जो ब्यौरे इधर-उधर पढ़ने को मिलते हैं, उनसे उनकी कुंठित मानसिकता का पता चलता है। वे दरअसल कुंठित मानसिकता के प्रतिनिधि बाबा हैं। भारत के मध्यवर्ग ने पढ़ना-लिखना बिल्कुल छोड़ दिया है। स्कूल स्तर पर की गई विभिन्न विषयों की पढ़ाई भी उसके जीवन में नहीं झलकती। मध्यवर्ग की नई से नई बसने वाली काॅलोनियों में सब कुछ मिलेगा, सिवाय विचार और रचना-साहित्य के। जहां तक पत्रिकाओं का सवाल है, मनोरंजन, खेल, प्रतियोगिता और राजनीतिक खबरों की पत्रिकाओं के अलावा वहां कुछ नहीं मिलता। मध्यवर्ग ने कर्मकांड को संस्कृति और अंधविश्वास को आस्था मान लिया है। ऐसे में कुंठित मानसिकता ही पनपती है, जो मीडिया की मार्फत परवान चढ़ी हुई है। जब ‘पढ़े-लिखे’ मध्यवर्ग का यह हाल है तो गांवों और कस्बों के बारे में अंदाज लगाया जा सकता है। ज्यादातर फिल्में, सीरियल और धार्मिक-आध्यात्मिक प्रवचन कुंठित मानसिकता का प्रतिफलन और उसे पोसने वाले होते हैं। उपभोक्तवाद के शिकंजे में पूरी तरह फंसा भारत का ‘महान’ मध्यवर्ग भावनाओं, संबंधों, मूल्यों आदि को लेकर अजीबो-गरीब आचरण करता है। मध्यवर्ग की इस विशिष्ट परिघटना पर हमें कभी विस्तार से लिखना है।  
यह फंसाव राजनीति में भी देखने को मिलता है। ताजा उदाहरण सीपीएम का ‘देसी समाजवाद’ है। संगठित और अपने को विचारधारात्मक कहने वाली पार्टी कैसे टोटके कर रही है! उससे पूछा जा सकता है कि आचार्य नरेंद्रदेव, जेपी और लोहिया के बाहर देसी समाजवाद के कौन स्रोत हैं? लेकिन यह किसी ने नहीं पूछा और पूरे मीडिया में सीपीएम प्रस्तावित भारतीय समाजवाद की खूब धूम रही। बाबा रामदेव और श्री श्री रविशंकर को नेताओं से और नेताओं को इन दोनों से संबंध बनाने का बड़ा शौक है। रामदेव ‘व्यवस्था परिवर्तन’ के लिए राजनीतिक पार्टी बनाने से पहले लालू यादव और नीतीश कुमार के एक साथ चहेते थे। श्री श्री की हसरतें ‘जीवन की कला’ का कारोबार शुरू करने के समय से ही जवान रही हैं। हमें ज्यादा हैरानी नहीं हुई, जब देखा कि वे दिल्ली विश्वविद्यालय में भी घुस गए हैं। एक रोज हम स्टाफ रूम में बैठे थे। चार-पांच युवक-युवतियां भक्तिभाव से भरे हुए आए और सूचना दी कि श्री श्री फलां तारीख को हिंदू काॅलेज में आ रहे हैं। फिर कहने लगे कि वे श्री श्री और कार्यक्रम के बारे में एम.ए. की क्लास को संबोधित करना चाहते हैं। हमने उन्हें कहा कि अपना पोस्टर लगाइए और जाइए। हमें लगा कि क्या सचमुच हमारा बीमार समाज बाबाओं की बदौलत चल रहा है!  
रामदेव के साथ न्याय करते हुए कहा जा सकता है कि जब अपने को समाजवादी कहने वाले नेता और पार्टियां कारपोरेट घरानों की राजनीति करते हैं तो बाबा के लोहिया को चेला मूंडने पर क्योंकर ऐतराज किया जा सकता है? यूपी के नए मुख्यमंत्री प्रधनमंत्री से मिलने गए तो उन्होंने वही सब बातचीत की जो दूसरे मुख्यमंत्री करते हैं। सोना से उसकी मां और भारत माता की गोद छीन लेने वाले पूंजीवाद और मनमोहन सिंह द्वारा लाई गई नवउदारवादी नीतियों पर उन्होंने जरा भी सवाल नहीं उठाया। इसके बावजूद भाई लोगों को वहां लोहिया का समाजवाद फलीभूत होने की संभावनाएं नजर आ रही हैं। भारतीय समाज और राजनीति में यह जो स्थिति बनी है, उसकी अभिव्यक्ति के लिए विडंबना, विद्रूप, विसंगति जैसे पद अपर्याप्त हैं। जब कोई समाज अंधी गली में प्रवेश कर जाता है तो यही होता है। जिस आंदोलन की पीठ पर उद्योग और व्यापार जगत की हस्तियां/संस्थाएं हैं, बड़े-बड़े एनजीओ हैं, संघियों के उसमें शामिल होने की बात तो समझ आती है, अचरज है कि समाजवादी, गांधीवादी, माक्र्सवादी उसमें डुबकी लगा रहे हैं।
राजनैतिक समझ के अभाव में अन्ना और रामदेव नहीं समझ सकते कि वे क्या कह और कर रहे हैं। दूसरे शब्दों में, वे वही कह और कर रहे हैं जो उनकी समझदारी है। उनकी समझदारी के मेल का समाज बना हुआ है तो उनका कहना और करना रंग लाता है। उनके सिपहसालार उन्हें किसी विशेष नेता या विचारक का नाम लेने और मुद्दा उठाने की सलाह देते हैं। लेकिन किसी के कहने पर नेता या विचारक विशेष का नाम लेना या किसी विशेष मुद्दे को उठाना रंग को चोखा नहीं कर सकता। इसके पीछे एक जिंदगी बीत जाती है। लेकिन जिनकी राजनीतिक समझदारी है, जो महत्वपूर्ण भूमिका या तो निभा चुके हैं या निभा रहे हैं, उन्हें आज नहीं तो कल जवाब देना पड़ेगा।
यह विचारणीय है कि अगर 1990 के पहले के माहौल में पले-बढ़े लोगों का यह आलम है तो आगे आने वाली पीढि़यों का क्या रुख-रवैया होगा? आज अगर भले ही थोड़े लोग, कम से कम संविधान की कसौटी पर, सही हैं तो आगे ज्यादा सही होने की संभावना बनी रहेगी। लेकिन आज अगर सही नहीं हैं, तब आगे भी सही नहीं होंगे। भ्रष्टाचार विरोध की ओट बहुत दिन तक साथ नहीं दे सकती। विदेशी बैंकों में जमा काला धन हो या यहां की लूट, दोनों पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत हैं। काला धन फिर जमा हो जाएगा। जमा करने वालों में बाबाओं के चेले नहीं हैं या होंगे, इसकी क्या गारंटी है?        
आजकल प्रैस परिषद के अध्यक्ष मार्कंडे काटजू साहब खासे चर्चा में रहते हैं। उन्होंने कई मुद्दों, विशेषकर मीडिया से संबंधित, पर दो टूक बात रख कर बहस पैदा की है। कुल मिला कर, बाजार और विचार की बहस में उन्होंने विचार पर बल दिया। उन्होंने यह भी कहा है कि जंतर-मंतर पर तिरंगा लहराने से भ्रष्टाचार दूर नहीं होगा। हमें लगा कि काटजू साहब की वैचारिकता नवउदारवाद विरोधी रुख अख्तियार करेगी। उनके पद और प्रतिष्ठा को देखते हुए उसका लाभ नवउदारवाद विरोधी मुहिम को मिलेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जल्दी ही पता लग गया कि वे शासक वर्ग के साथ खड़े हैं। अंग्रेजी का अंधविश्वास उन पर भी वैसा ही हावी है। उन्होंने अंग्रेजी न जानने वालों को बैलगाड़ी हांकने वाला कहा है। उनका तर्क मानें तो केवल अंग्रेजी जानने वाले ही भारत माता के बेटे-बेटियां हैं। आपको ध्यान होगा, ऐसा ही तर्क सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व प्रमुख न्यायधीश बालाकृष्णन साहब ने भी दिया था। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी नहीं जानने वाले केवल चपरासी बन सकते हैं। जाहिर है, उनकी नजर में चपरासी और उनके बेटे-बेटियां भारत माता के बेटे-बेटियां नहीं हैं, और न ही कभी बन पाएंगे।
काटजू साहब और बालाकृष्णन साहब के हिसाब से सोना का भारत माता पर कोई दावा ही नहीं है। वह बेचारी कभी अंग्रेजी बोल ही नहीं पाएगी। दूरदर्शन पर देहाती महिलाओं को अंग्रेजी में बताया जाता है कि उनकी बेटियां अच्छी पढ़ाई करती हैं, यानी अंग्रेजी बोलती हैं। नवउदारवाद के पिछले 20 सालों में हिंदुस्तान का शासक वर्ग पूरी तरह अंग्रेजी का अंधा हो चुका है। लोहिया इस वर्ग के इसलिए अपराधी हैं कि उन्होंने अंग्रेजी का विरोध कर सभी बच्चों को भारत माता की गोद में बिठाना चाहा था, जो उनका प्राकृतिक हक है।
अन्ना आंदोलन से भाषा के साथ दूसरा अवमूल्यन प्रतिरोध की अहिंसक कार्यप्रणाली, जिसे लोहिया ने सिविल नाफरमानी कहा है, का हुआ है। इस मायने में कि जिस पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था और शोषण के खिलाफ उसका आविष्कार और उपयोग हुआ, उसी के समर्थन में उसे लगाया जा रहा है। इसके गहरे और दूरगामी परिणाम होने हैं। जाहिर है, इससे अहिंसक आंदोलन को गहरा धक्का लगेगा। अहिंसक कार्यप्रणाली में विश्वास करने वाले कई महत्वपूर्ण जनांदोलनकारी और राजनैतिक कार्यकर्ता इस आंदोलन को समर्पित हो गए हैं। यह शेखी भी जताई जाती है कि अरब देशों में जहां बदलाव के लिए हिंसा हो रही है, वहां यह आंदोलन पूरी तरह अहिंसक है। लेकिन यह सच्चाई छिपा ली जाती है कि यह आंदोलन किसी बदलाव के लिए नहीं है। अपने स्वार्थ के लिए अहिंसक और अनुशासित रहना कोई बड़ाई की बात नहीं है। नवउदारवाद के पक्ष में अहिंसा को अगवा किया गया है। और उसके विरोध के लिए हिंसा का रास्ता छोड़ा गया है। मनमेाहन सिंह और चिदंबरम यही चाहते हैं। हमने पीछे लिखा था कि अगर अनशनरत अन्ना को कहीं जरा-सी खंरोच या मूच्र्छा आ जाती तो अहिंसकों की हिंसा का जबरदस्त नजारा देखने में आता।
इधर खबर आई है कि टीम अन्ना के एक सदस्य मुफ्ती शहमीम कासमी साहब को स्वामी अग्निवेश बना दिया गया है! वे टीम का मुस्लिम चेहरा थे। टीम अन्ना के सरदार ने कहा है कि कासमी चर्चा के किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले ही उसकी रिकाॅर्डिंग कर रहे थे, जिसे वे चैनलों को देते। अजीब बात है। चर्चा के दौरान रिकाॅर्डिंग करने में भला क्या बुराई हो सकती है। सही फैसला सही चर्चा से ही होकर आता है। इसलिए चर्चा की जानकारी टीम के बाहर भी साझा हो तो इसमें क्या ऐतराज हो सकता है? हालांकि कासमी साहब ने कहा है कि उन्हें रिकाॅर्डिंग करना आता ही नहीं है। मतभेद के कारण दूसरे हैं। जो भी हो, एक रिकाॅर्डिंग आदमी के दिमाग में भी चलती है। आपसी चर्चा के दौरान टीम अन्ना के सदस्यों के दिमाग में भी चलती होगी। क्या टीम अन्ना के सरदार का उसे भी प्रतिबंधित करने का इरादा है? लोकतंत्र और पारदर्शिता के पहरेदार इस पर क्या कहते हैं, अभी तक सुनने में नहीं आया है। कौन नहीं जानता कि विदेशी धन खाने वाले एनजीओ और उन्हें चलाने वाले ऐसे ही फर्जीवाड़े पर पलते हैं।
मीडिया और सिविल सोसायटी के समर्थन का जो नशा टीम अन्ना को हुआ है, वह जल्दी नहीं टूटने वाला है। ‘हम एक हैं’ की घोषणा करते हुए रामदेव और अन्ना फिर साझी हो गए हैं। वे अलग कभी थे ही नहीं। हमने कहा था कि कांग्रेस समेत ये सब एक पूरी टीम हैं। इस टीम का कारोबार आगे और चलेगा।
प्रधानमंत्री के प्रमुख आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने पिछले दिनों कहा है कि अब से आगे 2014 के आम चुनाव तक आर्थिक सुधारों की गति धीमी रहेगी। लेकिन आम चुनाव के बाद सुधारों में यथावत और विधिवत तेजी आ जाएगी। यानी सरकार किसी की भी हो, नवउदारवादी व्यवस्था इसी रूप में जारी रहेगी। कभी मनमोहन सिंह और कभी अटल बिहारी वाजेपयी द्वारा उछाला गया जुमला - ‘आर्थिक सुधारों का मानवीय चेहरा’ - कभी का फालतू हो चुका है। अफसोस की बात है दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में यह तय हो चुका है कि चुनावी महाभारतों का देश की व्यवस्था के संदर्भ में कोई मायना नहीं रह गया है। आर्थिक सलाहकार के बयान पर सबसे पहले और सबसे तीखी प्रतिक्रिया भाजपा की थी। उसने कहा कि आर्थिक सुधारों की तेजी पर ब्रेक सरकार की असपफलता की निशानी है।
नवउदारवाद बढ़ेगा, कांग्रेस के राज में भी और भाजपा के राज में भी। जाहिरा तौर पर उसके दो नतीजे होंगे। एक तरफ पहले से बदहाल आबादी की बदहाली में तेजी आएगी और दूसरी तरफ पहले से विकराल भ्रष्टाचार और तेज होगा। इसके साथ यह भी होगा कि जनता की बदहाली के अंधकार को लूट के माल से मालामाल होने वाले ‘शाहनिंग इंडिया’ की चमक से ओट करने की कोशिश की जाएगी और दूसरी ओर कठोर कानून बनाने की मांग करके भ्रष्टाचार पैदा करने और बढ़ाने वाली व्यवस्था पर परदा डालने का खेल रचा जाता रहेगा। जन लोकपाल कानून यथारूप में बन जाने पर आगे और कड़े कानून की जरूरत उसके पैरोकार और वारिस बताएंगे। भले ही अभी तक कड़े कानूनों की दौड़ का अंत सैनिक तानाशाही में होता रहा है।
नवउदारवाद ने टीम अन्ना का रूप धर कर जनांदोलनकारियों का अपने हिसाब से पूरा इस्तेमाल कर लिया है। मुख्यधारा राजनीति के अंतर्गत फर्क होने का दावा करने वाले भी उस रूप के चक्कर में आ गए। हमें आश्चर्य भी हुआ और आघात भी लगा जब भाकपा के वयोवृद्ध नेता एबी बर्द्धन रामलीला मैदान में हाजिरी लगाने पहुंच गए। ऐसे में नवउदारवाद के विरोध में अभियान जीरो से शुरू होगा।
तो टीम अन्ना भारत माता को घेरने वाले कपूतों की साथी है। निर्लज्जों ने भारत माता की लाज बचाने का ठेका उठा लिया है! इसके अलावा उसका कोई और चरित्र होता या कुछ अच्छे लोगों के उसमें शामिल होने के चलते बन पाता तो वह सामने आ चुका होता। यही सच्चाई है। इसका विश्लेषण जैसे और जितना चाहें कर सकते हैं।

भारत माता धरती माता
हम यह नहीं कहते कि सोना अपने घर, गांव, कस्बे, शहर तक महदूद रहे। लोहिया ने कहा था देश माता के साथ हर इंसान की एक धरती माता होती है। लोहिया ने स्टालिन की बेटी स्वेतलाना के भारत में बसने के अनुरोध का समर्थन किया था। यह कितनी सुंदर बात होगी कि सोना भारत माता के साथ धरती माता की बेटी बने। दुनिया के किसी भी कोने में जाए। घूमे, काम करे, सीखे, सिखाए, मित्र बनाए, मन करे तो वहीं शादी करे, भले ही बस जाए। ऐसा होने पर वह भारत माता के ज्यादा फेरे में न पड़े तो ही अच्छा है। बाहर अगर उसका निधन होता है तो अंतिम क्रिया वहीं संपन्न हो।
अभी तक देश-विदेश के इक्का-दुक्का लोगों ने आदिवासी क्षेत्रों में रह कर वहां की लड़कियों से शादी की है। आदिवासी लड़कियां बाहर जा कर ऐसा करें तो बराबर की बात बनेगी। हम किसानों और मजदूरों की लड़कियों के लिए भी ऐसा सपना देखते हैं कि वे स्वतंत्रतापूर्वक बड़ी हों और और देश-दुनिया में अपनी जगह बनाएं। लेकिन समस्या यही है कि जब तक वे भारत माता की गोद से बहिष्कृत हैं, धरती माता की गोद उन्हें नसीब नहीं हो सकती।
हमने ऊपर देखा कि भारत माता किस कदर घिर गई है। यह घेरा टूटे, इसके लिए हिंदुस्तान में एक बड़ी और बहुआयामी क्रांति की सख्त और तत्काल जरूरत है। उस क्रांति के कुछ सूत्र लोहिया ने दिए थे। लेकिन शासक वर्ग और उसका क्रीतदास बौद्धिक वर्ग प्रतिक्रांति पर डटा रहा। सत्ता के साथ मिल कर लोहिया के राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक-दार्शनिक-सांस्कृतिक चिंतन को स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा तक बहिष्कृत करके अपना ‘वाद’ बचा और चला लेने की खुशी पालने वाले लोगों ने हिंदुस्तान की क्रांति के साथ गहरी दगाबाजी की है। देश में उथल-पुथल है, उसका फायदा लेना चाहिए, कह कर टीम अन्ना और उसके आंदोलन में जुटे लोग भी जाने-अनजाने वही कर रहे हैं।  

26 अप्रैल 2012

Friday, 11 December 2015

WTO के खिलाफ़

अक्तुबर 2015 में यूजीसी (विश्वविद्धालय अनुदान आयोग) ने तय किया कि केंद्रीय विश्वविद्धालयों में दी जानेवाली 'युजीसी नौन-नेट स्कौलरशिप' बंद कर दी जाएगी | छात्र सन्गठनों ने तुरंत समझ लिया कि यह फैसला समान अवसर देने व सामाजिक न्याय के सम्वैधानिक एजेंडे को खत्म करने के WTO-GATS के मकसद की वजह से लिया गया है | यह शुरुआत होगी छात्र को बाजार से कर्ज लेकर पढने के लिए मजबूर करने की| इसी समझ के तहत 'औक्युपाई यूजीसी' का आंदोलन उक्त स्कौलरशिप के बरकरार रखने, उसमें बढोत्तरी करने और राज्य सरकार के विश्वविद्धालयों तक विस्तारित करने की माँग को लेकर आज भी चल रहा है व देश भर में जडे पकड़ रहा है| और सरकार द्वारा इसे कुचलने का हर संभव कोशिश चल रहा है|
सोशलिस्ट युवजन सभा मानती है कि उच्च शिक्षा के बाजारिकरण की नींव सन 1999 में भारत सरकार ने यूनेस्को को पेश अपने पर्चे में डाल दी थी | इस पर्चे में तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री ने दावा किया था कि उच्च शिक्षा सार्वजनिक हित के लिए नहीं है, वरन यह महज  व्यक्तिगत हित का '(बिकाऊ) माल' है| इसलिए इसकी किमत छात्रों को व्यक्तिगत तौरपर ही चुकानी चाहिए, न कि सरकार को | आगे, सन 2000 में प्रधानमंत्री की 'आर्थिक मामलों की परिसद' को पेश अम्बानी-बिड़ला रपट ने कहा कि सरकार को उच्च शिक्षा को पैसा देना बंद करके इसे पूरी तरह बाज़ार के हवाले कर देना चाहिए और बाज़ार तय करेगा कि क्या पढाया जाए, कैसे पढाया जाए यानी ज्ञान पर बाज़ार का पूरा कब्जा हो जाएगा | इस क्रम को आगे बढाते हुए भारत सरकार ने अगस्त 2005 में विश्व व्यापार संगठन के पटल पर उच्च शिक्षा का अपना 'संसोधित प्रस्ताव' रख दिया यानी उच्च शिक्षा के दरवाजे बाज़ार के लिए खोलने की पेशकश कर दी | अभी तक यह पेशकश 'प्रतिबद्धता' नहीं बनी थी, क्योंकि पिछले दस वर्षो में व्यापार-वर्ताओं में सभी सदस्य देशों के बीच सहमति नहीं बन पायी है, खासकर खेती व खाद्य पदार्थो को दी जानेवाली सब्सिडी को कम करने के सवाल पर | आगे ताकतवर पुंजिवादीं मुल्कों  की योजना यह है कि इन व्यापार-वार्ताओं को जुलाई 2015 के बाद तेजी से आगे बढाया जाए और इसी वर्ष 15 से 18 दिसंबर 2015 को नैरोबी, केन्या में होने वाले दसवें मंत्री-स्तरीय सम्मेलन में हर हाल में पुरा करवाया जाए | स्पष्ट रूप से इस सम्मेलन का उद्देश्य विश्व व्यापार संगठन के दायरे का विस्तार करना है| यदि भारत सरकार ने सम्मेलन के पहले ही उच्च शिक्षा के 'संशोधित प्रस्ताव' को वापस नहीं लिया तो अपने आप ही उच्च शिक्षा हमेशा के लिए प्रतिबद्धता बन जाएगी जिसके देश के लिए दुर्गामी दुष्प्रभाव होंगे |
सोशलिस्ट युवजन सभा अखिल भारत प्रतिरोधक मोर्चा द्वारा 07-14 दिसंबर 2015 तक चलने वाले इस आंदोलन हिस्सा है और इस आंदोलन को आगे जारी रखेगी |
नीरज सिंह
सोशलिस्ट युवजन सभा

शिक्षा के बजारिकरण और निजिकरण के खिलाफ़



 

भारत सरकार ने 15 से 18 दिसम्बर 2015 को नैरोबी(केन्या) में होने वाले विश्व व्यापार संगठन (WTO) के दसवें मंत्री-स्तरीय सम्मेलन में WTO के सभी 161 देशों की शिक्षा का धंधा करने वाली कम्पनियों को हमारे देश में कौलेज, विश्वविद्धालय एवं अन्य तकनिकी व पेशेवर(प्रोफेशनल) संस्थाओं का कारोबार खडा करने की खुली छूट देने की तैयारी कर ली है | सोशलिस्ट युवजन सभा मानती है की ऐसा होते ही जनता का शिक्षा का अधिकार, जिसे सुनिश्चित करना सरकार की लोकतान्त्रिक जिम्मेदारी है, पूरी तरह खत्म हो जायेगा | WTO-GATS ('जनरल एग्रीमेंट ओंन ट्रेड इन सर्विसेज़' यानी 'सेवा क्षेत्र में व्यापार के लिए आम समझौता') की शर्तो के तहत बेलगाम निजिकरण एवं बजारिकरण से शिक्षा न केवल गरिबों और पहले से जाति,धर्म, लिंग व विकलांगता के कारण वंचित तबकों के हाथ से निकल जाएगी, बल्कि जो इसका खर्चा उठा सकते हैं उन्हें भी केवल ना मात्र की शिक्षा ही मिलेगी | ऐसा इसलिए होगा क्योंकि बेतहाशा बाजारिकरण के चलते शिक्षा अपने मूल उद्देश्य से भटक जाएगी और साथ ही पाठ्यक्रम, विषयवस्तु व शिक्षणपद्धति में भी भारी गिरावट होगी| शिक्षा इतनी महँगी हो जाएगी कि मध्यम वर्ग के लिए भी इसका बोझ ढोना मुश्किल हो जाएगा | WTO के मातहत शिक्षा में लोकतांत्रिक व सामाजिक न्याय के एजेंडे को दरकिनार कर दिया जाएगा और इसके अन्तर्गत अब तक किए गए प्रावधानो को जैसे कि आरक्षण, होस्टल, स्कलरशिप, फ़ीस में छूट या मुफ़्त शिक्षा आदि- के लिए भी कोई जगह नहीं बचेगी|
सोशलिस्ट युवजन सभा मानती है की WTO-GATS कानूनी रूप से शिक्षा को बिकाऊ माल और स्टुडेंट्स को खरिदार में बदल देता है | आज 9 दिसम्बर 2015 को सोशलिस्ट युवजन सभा ने अखिल भारत प्रतिरोधक मोर्चा के साथ जन्तर मन्तर दिल्ली में उच्च शिक्षा को WTO के हवाले किए जाने के खिलाफ़ आयोजित कार्यक्रम का हिस्सा रहा | कार्यक्रम में सोशलिस्ट पार्टी के वरिषठ सदस्य और अखिल भारत प्रतिरोधक मोर्चा, स्वागत समिति के अध्यक्ष जस्टिस रजिन्दर सच्चर  ने कहा कि सोशलिस्ट पार्टी शिक्षा के बजारिकरण और निजिकरण के खिलाफ़ लगातार संघर्ष कर रही हैं और इसके खिलाफ़ हो रहे सभी लडाईयों का समर्थन करती है | शिक्षा को WTO के हाथ सौपना देश के छात्रों के भविषय के साथ खिलावाड़ है| 
सोशलिस्ट युवजन सभा के डा. हिरनय हिम्कर ने भी संबोधित किया

“Justice V.R. Krishna Iyer First Human Right Award 2015”

Dated : 09/12/2015

“Justice V.R. Krishna Iyer First Human Right Award 2015”


Mr. Justice Rajindar Sachar (Retd.). Former President Peoples Union for Civil Liberties was presented a Cheque of Rs. 1 Lakh (Rs. 1,00,000/-) for his work for Human Right by Justice Sukumaran of Kerala High Court at a function by Forum for Democracy and Communal Amity (F.D.C.A.) held at Kochi (Kerala) on 4th December, 2015

Mr. Justice Rajindar Sachar while speaking on the occasion recalled his warm association and emphasized the deep commitment of Justice Krishna Iyer to the human Rights and commitment to the cause of Minorities.

Justice Rajindar Sachar announced that in the same spirit he is donating this amount equally (Rs. 50,000/- each) between the two organizations with whom he has had long association.
A.               Socialist party (India)
B.                Peoples Union for Civil Liberties, Delhi.    

संविधान पर चर्चा तथ्‍य–तर्क सम्‍मत हो

संविधान पर चर्चा तथ्‍य–तर्क सम्‍मत हो

प्रेम सिंह

     संविधान दिवस 26 नवंबर को संविधान के प्रति प्रतिबद्धता विषय पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण की हिंदी के कथाकार उदय प्रकाश ने भूरी-भूरी प्रशंसा की है। उदय प्रकाश ने मोदी के साथ वाजपेयी को भी याद किया है,जिनकी जुमलेबाजी की प्रवृत्ति पर संविधान और संसदीय प्रणाली व प्रक्रियाओं के गहरे जानकार मधु लिमये ने एक बार कटाक्ष किया था। भाषा का जादूगर’ कहे जाने वाले इस साहित्‍यकार ने अपनी प्रशंसात्‍मक टिप्‍पणी में भाषा का विवेक नहीं रखा है। लेखकों-कलाकारों को राजनीतिक विषयों पर गंभीरता पूर्वक विचार करके ही अपना मंतव्‍य देना चाहिए। ऐसा किए बगैर की गईं फुटकर टिप्पणियां उनके दरजे को कम करती हैं। साहित्य भाषा की अर्थवत्‍ता कायम रखने और समृद्ध करते जाने का स्थायी माध्‍यम होता है। मौजूदा शासक वर्ग ने भाषा को स्‍तरहीन और कपटपूर्ण बनाने में कोई कसर नहीं रखी है। ऐसे में लेखकों की इस तरह की टिप्पणियों से भाषा का संकट और गहराता है। दृष्‍टा का दर्जा पाने वाले रचनाकार जब इस तरह की अंधी अभिव्यक्तियां करते हैं तो इस समय देश में परिव्‍याप्‍त विमूढ़ता का विराट रूप ज्‍यादा सघन व सर्वव्यापी बनता है।
     यह व्याख्यायित करने की जरूरत नहीं है कि संविधान पर चर्चा विषय-निष्‍ठ एवं तथ्य-तर्क सम्‍मत (रैशनल) ही हो सकती है। विषय संविधान है और तथ्‍य यह है कि डुंकेल प्रस्तावों से लेकर भारत-अमेरिका परमाणु करार (जिसका एक शब्द भी भारत में नहीं लिखा गया) और रक्षा से लेकर शिक्षा तक को कारापेरेट क्षेत्र को सौंपने के नवउदारवादी फैसलों से शासक वर्ग ने संविधान की मूल संकल्पना का हनन कर डाला है। संविधान पर कोई भी गंभीर चर्चा इस तथ्‍य को नजरअंदाज करके नहीं हो सकती। बल्कि उसे अगर सार्थक होना है तो शुरू ही यहां से होना होगा। संविधान के प्रति प्रतिबद्धता का पहला तकाजा बनता है कि उसकी मूल संकल्‍पना की पुनर्बहाली के अविलंब व पुख्‍ता उपाय किए जाएं। अथवा कम से कम इतना संकल्‍प लिया जाए कि आगे संविधान को और ज्‍यादा क्षतिग्रस्‍त नहीं किया जाएगा। मसलन, समाज के लिए सबसे अहम शिक्षा जैसे विषय को कारपोरेट क्षेत्र के लिए कदापि नहीं खोलने का निर्णय लिया जा सकता है। खुद नरेंद्र मोदी अपने भाषण में कम से कम भारत अमेरिका-परमाणु करार और खुदरा में विदेशी निवेश के फैसलों, जिनका भाजपा ने कड़ा विरोध किया था, को निरस्त करने की अपनी सरकार की घोषणा करते तो संविधान के प्रति प्रतिबद्धता का कुछ अर्थ होता। लेकिन उनके देशकाल से विच्छिन्‍न भाषण में संविधान के प्रति कोई सरोकार था ही नहीं।
     उदय प्रकाश ने ऐसे भाषण की प्रशंसा की है। जाहिर है, उदय प्रकाश की तथ्‍य व तर्क से रहित भाषा नरेंद्र मोदी की तथ्‍य व तर्क से रहित भाषा से जा मिलती है। यह स्थिति भाषा के गहरे संकट को दर्शाती है। उदय प्रकाश ने अपनी टिप्पणी के अंत में नरेंद्र मोदी के भाषण के निहितार्थ का अंदेसा भी जताया है। उन्‍होंने कहा है नरेंद्र मोदी के सारगर्भित व प्रभावशाली भाषण के पीछे उनकी कारपोरेट हित के कुछ कानून पारित कराने की मंशा हो सकती है। क्‍या देश के साहित्‍यकार को पता नहीं है कि मनमोहन सिंह के बाद मोदी का चुनाव कारपोरेट प्रतिष्‍ठान ने इसीलिए किया है, और मनमोहन सिंह से लेकर मोदी तक ऐसे संविधान विरोधी कानूनों-अध्‍यादेशों की लंबी सूची है। उनके इस अंदेसे से मोदी की ही मजबूती होती है। लोगों में संदेश जाता है कि इसके पूर्व नवउदारवादी दौर के बाकी कानून कारपोरेट हित में नहीं बनाए हैं।    
     यहां संक्षेप में पांच बातों का उल्‍लेख मुनासिब होगा। पहली, पिछले दिनों कई लेखकों-आलोचकों की यह स्थिति देखने को मिली है। गुजरात के विकास के लिए नरेंद्र मोदी की प्रशंसा करने वाले अण्‍णा हजारे और हजारे का इस्‍तेमाल करने वाले अरविंद केजरीवाल को गांधी बताने वालों में कई लेखक-आलोचक भी शामिल हैं। यानी साहित्‍यकारों की ओर से भी भाषा का अवमूल्‍यन हो रहा है। वे भी नवसाम्राज्‍यवादी गुलामी लाने के गुनाहगारों में शामिल हो रहे हैं। दूसरी,अनेकों बार उधेड़ी जा चुकी बखियाओं को फिर-फिर उधेड़ने का उद्यम अपने भाषण में करने वाले मोदी-विरोधी वक्‍ताओं ने भी संविधान की मूल संकल्‍पना के हनन पर चिंता जाहिर नहीं की। यानी संविधान पर लादा गया नवसाम्राज्यवादी जुआ उन्‍हें स्‍वीकार्य है। हमने पहले भी यह कई बार कहा है कि संविधान में निहित समाजवाद के मूल्‍य को त्‍याग कर अलग से धर्मनिरपेक्षता के मूल्‍य को नहीं बचाया जा सकता। तीसरी, संविधान दिवस का आयोजन डा. अंबेडकर की 125वीं जयंती के अंतर्गत किया गया। चर्चा संविधान के बारे में कम, डा. अंबेडकर पर कब्जे की कवायद ज्यादा थी। संविधान की मूल संकल्‍पना को नष्‍ट करके जिस डा. अंबेडकर को पाया जाएगा, वह एक खोखला नाम अथवा मूर्ति भर होगी। पांचवी, संविधान लागू होने की पचासवीं वर्षगांठ पर संसद में बहस हुई थी। भावनाओं का तेज ज्वार था। आशा थी कि सांसद भावनाओं के ज्वार से बाहर आकर पिछले एक दशक में हुई संविधान की क्षति की मरम्मत करेंगे और आगे क्षतिग्रस्त नहीं होने देंगे। ऐसा नहीं हुआ। उसके पंद्रह साल यह बहस सामने आई है!      


Thursday, 5 November 2015

असहिष्‍णुता के विरुद्ध प्रतिरोध में एक स्‍वर यह भी

असहिष्‍णुता के विरुद्ध प्रतिरोध में एक स्‍वर यह भी

नीरज कुमार

      देश में बढती असहिष्‍णुता के खिलाफ कुछ लेखकोंबुदि़्धजीवियों के प्रतिरोध को लेकर बहस खड़ी हो गई है। लेखकों बुदि़्धजीवियों के समर्थकों के अपने और उनके प्रतिरोध का विरोध करने वालों के अपने तर्क हैं। लेखकोंबुदि़्धजीवियों के प्रतिरोध के तरीके का विरोध करने वाले लेखकबुदि़धजीवी भी हैं और उनके अपने तर्क हैं। इस मामले में चुप रहने वाले लेखकबुदि़धजीवी भी काफी हैं। उनके भी अपने तर्क होंगे। सोशल मीडिया में अनेक लोग अपनाअपना तर्क रख कर बहस कर रहे हैं। सरकार का कोई तर्क नहीं है। क्‍योंकि नरेंद्र मोदी ही सरकार हैं जो तरहतरह की तर्कहीन बातें करके चुनाव जीत चुके हैं। उन्‍हें अरुण शौरी जैसे आरएसएस के बुदि्धजीवियों की जरूरत ही नहीं पड़ी। सेकुलर बुदि्धजीवियों का हमला होने पर भी उन्‍हें याद नहीं किया गया तो उन्‍होंने लेखकोंबुदि़्धजीवियों का पक्ष लेते हुए तर्क दिया है कि असहिष्‍णुता से विदेशी निवेश पर नकारात्‍मक असर पड़ेगा।
      मेरे जैसे सामान्‍य राजनीतिक कार्यकर्ता को यह सब अजीबसा लग रहा है। मुझे इसमें गंभीरता नहीं लगती। केवल तात्‍कालिक प्रतिक्रिया लगती है। मुझे लगता है इससे नरेंद्र मोदी यानी नवउदारवादी और सांप्रदायिक ताकतों का गठजो ही मजबूत होगा। मेरी सीमा हो सकती है। मेरा राजनीतिक प्रशिक्षण किशन पटनायक, सच्चिदानंद सिन्‍हा,सुनील और प्रेम सिंह के विचारों से हुआ है। उनके साथ काम करने का भी मौका मिला है। मैं इनके लेखन के द्वारा ही भारत के समाजवादी चिंतकों के साहित्‍य तक पहुंचा हूं। कुछ विचार साहित्‍य और रचनात्मक साहित्‍य के अध्‍ययन की भी कोशिश करता हूं। यह सत्‍ता की राजनीति में एक छोटीसी धारा है। लेकिन मैं नवउदारवाद और सांप्रदायिकता के गठजो की सबसे सशक्‍त वैकल्पिक धारा मानता हूं। ऐसा मानने वाले बहुतसे युवक युवतियां देश में हैं। वे शोर नहीं मचाते। चुपचाप अपना काम करते हैं। मुख्‍यधारा का मीडिया उस काम का नोटिस नहीं लेता। अपने को क्रांतिकारी कहने वाले संगठन भी उस धारा से बच कर चलते हैं। क्‍योंकि उसमें अभी या बाद में नाम या लाभ मिलने की संभावना नहीं है।
      किशन पटनायक ने अस्‍सी के दशक से ही देश के बुदि्धजीवियों को बारबार आगाह किया था कि वे नई आर्थिक नीतियों यानी नवउदारवाद का विरोध करें। वह देश के संसाधनों और गरीबों के लूट की व्‍यवस्‍था है। लेकिन बुदि्धजीवियों ने उनकी बात पर कान नहीं दिया। किशनजी नेगुलाम दिमाग का छेद जैसा कान खोलने वाल लेख भी लिखा,लेकिन बुदि्धजीवियों को सरकारी संस्‍थानों के पदों और पुरस्‍कारों का लालच पकड़े रहा। वाजपेयी सरकार के दौरान भी वे पदों और पुरस्‍कारों से पीछे नहीं हटे। नवसाम्राज्‍यवादी और सांप्रदायिक ताकतों का गठजो मजबूत होता गया। यदि मनमोहन सिंह के वित्‍तमंत्री या उसके बाद प्रधानमंत्री बनने के समय बुदि्धजीवियों के इस्‍तीफे हो जाते तो नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं बन पाते। वह भी छो‍ि‍ड़ये, बुदि्धजीवी अगर नवउदारवाद को बचाने के लिए इकठठी हुई इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शन की टीम और आंदोलन के साथ नहीं जुटते तो भी मोदी का आना आसान नहीं होता। उस टीम में आरएसएस ही नहीं, सारे कारपोरेट घराने शामिल थे। मोदी को अकेले आरएसएस ने नहीं, कारपोरेट घरानों ने यहां तक पहुंचाया है।
      आप कह सकते हैं कि मेरा तर्क डॉ प्रेम सिंह के विचारों से लिया गया है। यह सही है। डॉ प्रेम सिंह के विचारों को संघी और कांग्रेसी अनदेखा करते हैं तो बात समझी जा सकती है। लेकिन सेकुलर और प्रगतिशील बुदि्धजीवी भी उन्‍हें दबाने की कोशिश करते हैं तो यह एक गंभीर सवाल है। 2013 की शुरुआत में आई उनकी पुस्तिका संविधान पर भारी सांप्रदायिकता’, जिसे जस्टिस सच्‍चर ने सबके पढ़ने के लिए एक जरूरी पुस्तिका बताया है, नरेंद्र मोदी और आरएसएस से अलग उनकी अपनी पीआर टीम के मंसूबों की स्‍पष्‍ट सूचना दे देती है। वह पुस्तिका जस्टिस सच्‍चर के कहने पर उर्दू और अंग्रेजी में भी छापी गई। लेकिन किसी बुदि्धजीवी ने आज तक उसका जिक्र नहीं किया है। अन्‍ना हजारे के नाम से चलाए गए भ्रष्‍टाचार विरोधी आंदोलन, आम आदमी पार्टी के बनने और दिल्‍ली का चुनाव जीतने की घटना का हर पहलू से विवेचन करने वाली पुस्‍तक भ्रष्‍टाचार विरोध विभ्रम और यथार्थ(वाणी प्रकाशन) को छपे एक साल हो गया है। इस पुस्‍तक को भी पूरी तरह अनदेखा कर दिया गया है। मेरी जानकारी में उसकी एक भी समीक्षा किसी पत्रपत्रिका में नहीं आई है। उल्‍टालेखकोंबुदि़धजीवियों के प्रतिरोध की मुहिम में सक्रियजनसत्‍ता के पूर्व संपादक ओम थानवी ने टीवी चर्चाओं में एनजीओ सरगना, आरक्षण विरोधीघोषित रूप से पूंजीवाद समर्थक, ‘केंद्र में प्रधानमंत्री मोदी और दिल्‍ली में मुख्‍यमंत्री केजरीवाल का नारा लगाने वाले अरविंद केजरीवाल के पक्ष में डॉ प्रेम सिंह पर कटाक्ष किए। कौन नहीं जानता कि इस पूरे घटाटोप में अकेले डॉ प्रेम सिंह सही साबित हुए हैं।   
      डॉ प्रेम सिंह ने एक जगह यह लिखा है कि सेकुलर और प्रगतिशील लोगों ने उनकी वाजेपयी की राजनीतिक विचारधारा और शैली का विश्‍लेषण करने वाली पुस्तिकामिलिए योग्‍य प्रधानमंत्री से (2004) तथा 2002 की गुजरात त्रासदी का विश्‍लेषण करने वाली पुस्तिका गुजरात के सबक(2004) की कुछ चर्चा और तारीफ की। लेकिन वे मिलिए हुकुम के गुलाम से’ (2009) पुस्तिका को पूरी तरह अनदेखा कर देते हैं। उसमें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सोनिया गांधी का गुलाम नहीं, दोनों को अमेरिका का गुलाम दिखाया गया है। मैं यहां जोना चाहता हूं कि केंद्र सरकार द्वारा जेएनयू को नष्‍ट करने के इरादों का पूरा विरोध करना चाहिए। लेकिन दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय का पूर्व छात्र होने के नाते में यह भी कहना चाहता हूं कि कपिल सिब्‍बल जैसे कांग्रेसी काफी पहले दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय को लगभग नष्‍ट कर चुके हैं। बड़ेड़ेलोगों ने प्रधानमंत्री और राष्‍ट्रपति को पत्र लिखे, मुलाकातें कीं,लेकिन दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय तबाह कर दिया गया। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय ही क्‍योंइन सभी बुदि्धजीवियों के रहते हुए देश की पूरी शिक्षा व्‍यवस्‍था घटिया और मुनाफे का व्‍यापार बना दी गई है।
      हकीकत की बात यह है कि डॉ प्रेम सिंह का लेखनबुदि़धजीवियों को आइना दिखाता है कि नरेंद्र मोदी को यहां तक लाने में अकेले कारपोरेट घरानों की नहीं, इन बुदि्धजीवियों की भी बड़ी भूमिका है। ढ़ती हुई असहिष्‍णुता के विरोध में लेखकोंबुदि़धजीवियों का प्रतिरोध होना ही चाहिए। बात इतनी है कि वह तात्‍कालिक प्रतिक्रिया बन कर न रह जाए जैसा कि अभी चलने वाली बहस से लग रहा है।
      यहां बहस को गंभीर परिप्रेक्ष्‍य में रखने के लिए डॉ प्रेम सिंह का एक छोटा लेख दिया जा रहा है। इसके बाद उनके कुछ और लेख सोशल मीडिया पर दिए जाएंगे।   

ताकि सनद रहेकारपोरेट के पक्ष में राजनीतिक एका

प्रेम सिंह

      दो फरवरी की शाम को आकाशवाणी से प्रसारित मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का चुनाव प्रसारण सुना। कांग्रेससीपीआईसीपीएम और राष्ट्रवादी कांग्रेस के प्रसारणों में दिल्ली षहर में सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने की कोशिशों का प्रमुखता से जिक्र और सांप्रदायिक ताकतों को चुनाव में परास्त करने की अपील की गई थी। भाजपा और आम आदमी पार्टी (आपके प्रसारण में बाकी जो भी कहा गया होशहर में होने वाली सांप्रदायिक घटनाओं पर एक शब्द भी नहीं था। आप’ का प्रसारण मनीष सिसोदिया ने हिंदू हित’ का पूरा ध्यान रखते हुए पढ़ा और सरकार बनाने की दावेदारी ठोकी। किसी धर्मनिरपेक्षतावादी ने इस नाजिक्री (ओमिशनपर सवाल नहीं उठाया है। बल्कि चुनावपूर्व सर्वेक्षणों में आप’ की जीत की प्रबल संभावना को देखकर अपना पूरा वजन आप’ के पक्ष में डाल दिया है। उन्होंने अरविंद केजरीवाल को हिंदुओं की भावनाओं का खयाल रखने की पूरी आजादी दी हुई है। वे जानते हैंचुनाव अकेले मुसलमानों के वोटों से नहीं जीता जा सकता।   
      हमने चुनाव प्रसारण का यह प्रसंग धर्मनिरपेक्षता-सांप्रदायिकता के सवाल पर चर्चा करने के लिए नहीं लिया है। बल्कि धर्मनिरपेक्षता को बचाने की आड़ में होने वाली एक बड़ी राजनीतिक तब्दीली पर संक्षेप में विचार करने के लिए यह प्रसंग उठाया है। मार्क्‍सवादियोंसमाजवादियोंसामाजिक न्यायवादियों,गांधीवादियों और नागरिक समाज के बहुत-से लोगों की अरविंद केजरीवाल की जीत के पक्ष में एकजुटता भारत और दुनिया के कारपोरेट प्रतिष्ठान की बड़ी उपलब्धि है।
      मनमोहन सिंह के बाद कांग्रेस कारपोरेट प्रतिष्ठान के खास काम की नहीं रह गई है। कांग्रेस राहुल गांधी से चिपकी है और कारपोरेट उन पर मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी जैसा भरोसा नहीं कर सकता। दलितों और आदिवसियों को आर्थिक मुद्दों पर कांग्रेस के साथ जोड़ने के राहुल गांधी के प्रयास कारपेारेट प्रतिष्ठान के रजिस्टर में दर्ज हैं। कारपोरेट प्रतिष्ठान वंचितों के हित की दिखावे की अथवा टोकन राजनीति भी बरदाश्‍त करने को तैयार नहीं है। अलबत्ताउनका सांप्रदायीकरण करने की राजनीति उसे माफिक आती है।
      कारपोरेट प्रतिष्ठान को अब सोनिया गांधी पर भी भरोसा नहीं हैजो सलाहकारों के दबाव’ में गरीबों के लिए थोड़ी-बहुत राहत की व्यवस्था करवा देती हैं। उसे जैसे मनमोहन सिंह के साथ और उनके बाद मोदी चाहिए थेमोदी के साथ और उनके बाद केजरीवाल चाहिए। कारपोरेट पूंजीवाद की कोख से पैदा एक ऐसा शख्स जो देश की मेहनतकश जनता की आंखों में धूल झोंक कर सफलतापूर्वक कारपोरेट प्रतिष्ठान का हित साधन करे। कारपोरेट प्रतिष्ठान को अब अपने बचाव के लिए सेफ्टी वाल्व’ नहींे चाहिए। प्रगतिशील व धर्मनिरपेक्ष खेमा उसके पक्ष में एकजुट हो गया है।
      कारपोरेट प्रतिष्ठान यह जानता है कि कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षतावादियों को प्रश्रय देकर उनका समर्थन पाया है। इस तरह फलाफूला धर्मनिरपेक्षतावादी खेमा मोदी की जीत से एकाएक समाप्त नहीं हो जा सकता। उन्हें कांग्रेस के अलग किसी और के साथ जोड़ना होगा। वे मजबूती से केजरीवाल के साथ जुट गए हैं। कल तक जो सोनिया के सेकुलर सिपाही थेअब निस्संकोच केजरीवाल के सेकुलर सिपाही हैं। कहने की जरूरत नहीं कि धर्मनिरपेक्षतावादियों का केजरीवाल को बिना शर्त समर्थन दिल्ली विधानसभा के इस चुनाव में ही नहीं है। वे शुरू से केजरीवाल के समर्थन में हैं। हालांकि उन्हें मार्क्‍सवादी/समाजवादी/गांधीवादी आदि बताने या बनाने की बात अब वे नहीं करते। उन्हें इसी में तसल्ली है कि केजरीवाल क्रोनी पूंजीवाद के खिलाफ है।
      यह निश्चित नहीं कहा जा सकता कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में आप’ की जीत से सांप्रदायिक भाजपा पर कितनी रोक लगेगी और धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को दूसरे राज्यों के चुनावों में कितना फायदा होगा। लेकिन इतना निश्चित है कि राजनीतिक विमर्श से समाजवादी विचारधारा और ज्यादा हाशिए पर चली जाएगी। विचारधारा विहीनता का तमाशा और तेजी से जोर पकड़ेगा। चुनाव और तेजी से गरीबों के साथ छल-कपट का पर्याय बनेंगे।      

      अभी तो संभावना नजर नहीं आतीलेकिन अगर आगे की किसी पीढ़ी ने नवसाम्राज्यवादी गुलामी की तह में जाकर पता लगाने की कोशिश कीतो उसे पता चलेगा कि अकेले नवउदारवादी इसके लिए जिम्मेदार नहीं थे। देश की मुख्यधारा राजनीतिक में एका बना थाजिसके तहत नवसाम्राज्यवादी गुलामी आयद हुई। भारत के बुद्धिजीवियोंजो सभी प्रगतिशील व धर्मनिरपेक्ष खेमे से आते हैंके गुलाम दिमाग के छेद’ की ओर ध्यान दिलाने वाले किशन पटनायक ने कहा हैमनुष्य के लिए गुलामी की अवस्था सहज स्वीकार्य नहीं होती। हम यह दिल्ली विधानसभा चुनाव की पूर्व संध्या पर नहीं कह रहे हैं। लंबे समय से हमारा कहना है कि इस दौर में भारत की सबसे बड़ी अकलियत की बड़ी भूमिका है। हालांकि मुस्लिम नेतृत्व ने हमारी बात पर गौर नहीं किया है। हमारा अभी भी मानना है कि नवसाम्राज्यवाद के खिलाफ अगर कोई सच्चा संघर्ष होगातो वह अल्पसंख्यक समाज की मजबूती और भागीदारी से होगा। आशा  करनी चाहिए ऐसा जरूर और जल्दी होगा।