Wednesday, 12 September 2018

राफेल विमान सौदा : जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया जाए

12 अगस्त 2018
प्रेस रिलीज़



फ्रांस से राफेल लड़ाकू विमान खरीद का मामला लगातार संदेह के घेरे में बना हुआ है. इस सौदे के बारे में आरोप है कि यह भारत में अब तक का सबसे बड़ा रक्षा घोटाला है। हजारों करोड़ रुपए के आकार के इस घोटाले के सामने 64 करोड़ रुपए का बोफर्स तोप घोटाला कहीं नहीं ठहरता। यह बात निरंतर छन-छन कर आ रहे तथ्यों से प्रमाणित होती जा रही है कि इस सौदे में निर्धारित नियमों का उल्लंघन करके खुद प्रधानमंत्री ने एक उद्योगपति विशेष को फायदा पहुंचाने के लिए देश की रक्षा व्यवस्था के साथ खिलवाड़ किया है और सरकारी खज़ाना लुटाया है। सरकार पर यह भी आरोप है उसने इस पूरे मामले में अंतर्विरोधी बयान दियी हैं और संसद को गुमराह किया है। जो तथ्य प्रथम द्रष्टया आ रहे हैं उनसे लगता है कि इस सौदे के भीतर काफी गड़बड़ है। मोदी सरकार के पास आरोपों का संतोषजनक उत्तर नहीं है। वह सौदे से जुड़े सारे तथ्यों को 2008 के गोपनीयता प्रावधानों के आवरण में ढंकने की कोशिश में लगी है। फ्रांस की सरकार भी ऐसा ही कर रही है।
पिछली यूपीए सरकार अपनी वायुसेना की मजबूती के लिए फ्रांस की कंपनी डसाल्ट से 126 राफेल विमान खरीदना चाहती थी। चूंकि कांग्रेस सरकार बोफर्स तोप सौदे के दूध से जल चुकी थी, इसलिए उसने छाछ को फूंक मारकर पीना उचित समझा। इसीलिए रक्षा सौदों के लिए बाकायदा रक्षा मंत्रालय और सेनाओं के संबंधित विभागों की समितियां बनाई गई थीं, जिनकी संस्तुति के बिना कोई सौदा नहीं हो सकता। इस व्यवस्था के तहत हर रक्षा सौदा कई चरणों से होकर गुजरता है। राफेल विमानों का सौदा इन सभी चरणों से होकर गुजरा था और वायुसेना के छह स्वाड्रनों के नवीकरण की जरूरत को देखते हुए एक साथ 126 विमान खरीदने का फैसला किया गया था। राफेल विमान परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम है और इसमें दो इंजन लगे हैं। इसमें अमेरिका में विकसित राडार भी लगा है।
उस समय सरकार की मंशा घरेलू उद्योगों को रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रौद्योगिकी लाने की भी  थी। उसने वाजिब दरों पर विमान खरीदने के लिए 2012 में लंबी वार्ता चलाई जिसमें तय हुआ कि हर विमान की कीमत 670 करोड़ रुपए पड़ेगी। 18 विमान सीधे फ्रांस से तैयार हालत में लाए जाएंगे और 108 विमान फ्रांस से लाये गए कल-पुर्जों से सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम हिंदुस्तान एअरोनाटिक्स लिमिटेड (एचएएल) भारत में तैयार किये जायेंगे। इस बीच सरकार बदल गई। एनडीए की सरकार ने वार्ता जारी रखी. 2015 में विमान निर्माता कंपनी डसाल्ट के सीईओ भारत आए और उन्होंने कहा कि सारी वार्ताएं खत्म हो गई हैं और दाम की बात भी पक्की हो गई है। लेकिन एक पूंजीपति को फायदा पहुंचाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वायु सेना, रक्षा मंत्रालय और विदेश मंत्रालय को विश्वास में लिए बिना सौदे की समस्त प्रक्रिया और शर्तों को मात्र दो दिनों में पलट दिया। सरकार ने 126 विमानों की जगह 36 विमान लेने का फैसला किया। वह भी 670 करोड़ रुपए प्रति विमान की जगह 1660 करोड़ रुपये प्रतिविमान की दर से। पहले यह तय था कि विमान के कलपुर्जे बाहर से आएंगे और एचएएल उन्हें जोड़ेगा। अब यह तय हुआ कि प्रौद्योगिकी हस्तांतरण होना जरूरी नहीं है। वे 36 विमान डसाल्ट्स ही बनाकर देगा।
'मेक इन इंडिया' का मजाक उड़ाते हुए एचएएल जैसी सार्वजनिक उपक्रम की कंपनी को सौदे की प्रक्रिया से बाहर कर दिया और उसकी जगह अनिल अंबानी की केवल इस सौदे को हथियाने के लिए बनाई गई नई व अनुभवहीन कंपनी रिलायंस डिफेंस लिमिटेड को जोड़ लिया। रिलायंस के मालिक अनिल अम्बानी ने प्रधानमंत्री की मिलीभगत से डलास्टस के साथ एक संयुक्त उपक्रम गठित कर लिया। यह भी तथ्य सामने आया कि रिलायंस ने फ्रांस के राष्ट्रपति होलंदे की अभिनेत्री पार्टनर जूली गैएट की फिल्म के निर्माण के लिए सहयोग करने का 200 करोड़ रुपए का समझौता किया था।
प्रति विमान पर अचानक 1000 करोड़ रुपए बढ़ाए जाने के पीछे दलील दी गई कि इसमें भारत के लिए विशेष प्रकार के उपकरण लगाए गए हैं। लेकिन उन उपकरणों की उपयोगिता को सेना की समितियों ने प्रमाणित नहीं किया है। सोशलिस्ट पार्टी इस विवाद पर सरकार के बचाव में आये एयर चीफ मार्शल और एयर मार्शल के बयानों पर टिप्पणी नहीं करना चाहती। लेकिन उनके द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम एचएएल की जगह निजी कंपनी का खुला पक्ष लेने पर चिंता प्रकट करती है। सरकार ने दूसरी दलील यह दी है कि विमान खऱीदा जाना तत्काल जरूरी है। लेकिन इसके लिए सौदे की प्रक्रिया को पलट देने क्या औचित्य है? सौदे के साथ की गई सारी उठा-पटक के बावजूद पहला विमान सितंबर 2019 में फ्रांस से बन कर आएगा।
सोशलिस्ट पार्टी का मानना है कि संदेह के घेरे में आये राफेल विमान सौदे की सच्चाई देश की जनता के सामने आनी चाहिए. इसके लिए सबसे पहली जिम्मेदारी केंद्र सरकार और खुद प्रधानमन्त्री की है। केंद्र की भाजपानीत सरकार में शामिल राजनैतिक दलों का भी राष्ट्र के प्रति यह दायित्व बनता है कि इस सौदे को लेकर जनता में फैले संदेह का आगे आकर निवारण करें।
सोशलिस्ट पार्टी की मांग है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के लिए सरकार की ओर से तुरंत संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया जाए।

डॉ. प्रेम सिंह
अध्यक्ष

Rafel Aircraft Deal: A Joint Parliamentary Committee should be formed to investigate

August 12, 2018

Press release



The matter of purchase of Rafel fighter aircrafts from France has consistently remained within the realm of suspicion. There are allegations that this deal is the largest defense scam so far in India. The Rs 64-crore Bofors gun scam does not stand anywhere in comparison to the Rs 1000 crore rupees scam of Rafel deal. This is becoming gradually evident  by various facts percolating from various sources that the Prime Minister,  by violating the norms/rules, has taken risk with the country's defense mechanism and has allowed the loot of the government exchequer for the benefit of a particular industrialist. It is also alleged that the government has made contradictory statements in this entire case and has misled the Parliament. Prima facie it seems that there are lots of untoward happenings within the deal. The Modi government does not have a satisfactory answer to the allegations. It has been trying to cover all the facts related to the deal under the cover of 2008's secrecy provisions. The French government is doing the same.

The previous UPA government wanted to buy 126 Rafel aircrafts from the French company Dassault to strength the Air Force. Since the Congress government had suffered  loss of face from the Bofors gun deal, it was over cautious about this deal. That's why, for the defense deals, the committees of Defense Ministry and concerned departments of the armies were formed. The recommendations of these committees were mandatory for making any defense deal. Under this arrangement, every defense deal used to pass through several phases. The deal of the Rafel aircraft passed through all these stages and it was decided to purchase 126 aircrafts considering the need to renew the Air Force's six Squadrons. The Rafel aircraft is capable of carrying nuclear weapons and it has two engines. There is also an inbuilt radar developed in the US.

At that time the government's intention was to bring the technology to the domestic industries to make them self-reliant in defense production. It held long discussions in 2012 to buy the aircraft at reasonable rates. There was a decision that every aircraft will cost Rs 670 crores and18 aircrafts will be brought directly from France, and 108 aircraft will be manufactured in the public sector undertaking, Hindustan Aeronautics Limited (HAL), with the parts brought from France. Meanwhile the government at the center changed. The new NDA government has continued the talks. In 2015, the CEO of Dassault, the aircraft manufacturer, came to India and stated that the talks have ended and the prices have also been confirmed. But to benefit a capitalist, it is alleged, Prime Minister Narendra Modi overturned all the procedures and conditions of the deal in just two days without taking the Air Force, the Ministry of Defense and the Foreign Ministry into confidence. In the 'new deal' the government decided to purchase 36 aircrafts instead of 126. That too at the rate of Rs 1660 crores per aircraft instead of original cost of Rs. 670 crores per aircraft. Earlier it was decided that the components of the aircraft will be brought from the outside and HAL will assemble them. It is now decided that technology transfer should not be necessary. All 36 aircrafts will be made by Dassault only.
Making fun of 'Make In India' slogan , the Public Sector company like HAL was eliminated from the process of the deal and instead Anil Ambani's new and inexperienced company Reliance Defense Ltd was created to grab the deal. Reliance owner Anil Ambani constituted a joint venture with Dassault with the tacit help of the Prime Minister. It also came to light that Reliance had signed an agreement worth 20 million rupees to help the French President Francois Hollende's actress partner Julie Gayet to produce the film.
 

There was a plea by the government to justify a sudden increase of Rs 1,000 crore per aircraft stating that special type of equipments have been fitted up in the aircraft specially for needs  in India. But the utility of those equipments have not been certified by the Army Committees. The Socialist Party does not want to comment on the statements of Air Chief Marshal and Air Marshal, who came to the rescue of the government on this dispute. But it expresses its concern over openly taking the side of private company instead of HAL, a public sector undertaking. The government's  second plea was that it is urgent to get the aircraft right away. But what is the justification in overturning the entire process of the deal for this? Despite the all-out overturn of the deal, the first aircraft will come from France in September 2019.
 

The Socialist Party believes that the truth of the Rafel aircraft deal, that has come under suspicion, should be made known to the people of the country. The first responsibility for this is with the central government and the Prime Minister himself. The political parties, who are part of the BJP-led government, also owe a responsibility to the nation. They should  come forward to dispel the doubts and suspicions spread about this deal. 
The Socialist Party demands that for a fair investigation of the entire matter the government should immediately constitute the Joint Parliamentary Committee.

Dr. Prem Singh

President

Monday, 10 September 2018

नवसाम्राज्यवादी जुए के नीचे राष्ट्र-भक्ति और राष्ट्र-द्रोह की फर्जी जंग





प्रेम सिंह

1
      
भारत का नागरिक जीवन, खास कर पिछले दो दशकों से, राष्ट्र-भक्ति और राष्ट्र-द्रोह के बीच छिड़ी जंग से आक्रांत चल रहा है. लोकतंत्र के तीनों स्तम्भ - विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका सहित चौथा स्तंभ कहा जाने वाला प्रेस-प्रतिष्ठान, शिक्षा एवं शोध-संस्थान, नागरिक समाज (सिविल सोसाइटी) के स्वतंत्र और प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी और अलग-अलग क्षेत्रों के एक्टिविस्ट/जनांदोलनकारी इस जंग में भाग लेते देखे जा सकते हैं. यहां तक कि देश का रक्षा-प्रतिष्ठान भी अक्सर इस जंग में जूझता नज़र आता है. सत्ता-सरंचना में समाज के ऊंचे और मंझोले स्तरों पर दिन-रात जारी यह जंग निचले स्तरों पर अपना का असर न डाले यह संभव नहीं है.   
       मौजूदा सरकार के सत्तासीन होने के बाद से यह जंग ज्यादा तेज़ हुई है. यह स्वाभाविक है. राष्ट्र-भक्ति और राष्ट्र-द्रोह का जुड़ाव राष्ट्रवाद से है. राष्ट्रवाद को पूंजीवाद के साथ जोड़ कर देखा जाता है. उग्र- पूंजीवाद को उग्र-राष्ट्रवाद चाहिए. उग्र-राष्ट्रवाद में राष्ट्रीय अस्मिता/चेतना का पूंजीवादी लूट को सुरक्षित बनाने के लिए अंध-दोहन किया जाता है. इस प्रक्रिया में लोगों के सामने राष्ट्र-द्रोही के रूप में एक फर्जी शत्रु बना कर खड़ा कर दिया जाता है. लोग अपने और राष्ट्र के असली शत्रु (वर्तमान दौर में कार्पोरेट पूंजीवाद) को भूल कर फर्जी शत्रु से भिड़ंत में जीने लगते हैं. भारत और दुनिया के कई देशों में उभरा उग्र-राष्ट्रवाद किसी न किसी रूप में उग्र-पूंजीवाद की अभिव्यक्ति (मेनिफेस्टेशन) है.       
       भारत में छिड़ी राष्ट्र-भक्ति और राष्ट्र-द्रोह की जंग के मूल में राष्ट्र को लेकर कोई सुचिंतित और गंभीर वैचारिक अंतर्वस्तु (कंटेंट) नहीं है. यह सिद्ध करने के लिए इस जंग के विभिन्न वैचारिक-रणनीतिक प्रसंगों और आयामों की लंबी तफसील देने की जरूरत नहीं है. जिस तरह से पक्षों, पात्रों, विचारों, आख्यानों, मुद्दों, प्रतीकों, लक्ष्यों, रणनीतियों आदि का पल-पल पाला बदल होता है, उससे राष्ट्र-भक्ति और राष्ट्र-द्रोह की जंग की विमूढ़ता स्वयंसिद्ध है. राष्ट्र-भक्ति और राष्ट्र-द्रोह की जंग का स्वरुप किस कदर विद्रूप और हास्यास्पद बन गया है, यह महज तीन बिंबों पर नज़र डालने से यह स्पष्ट हो जाता है. एक, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में टैंक रखवाया जाना; दो, कश्मीर में फौजी अफसर का एक नागरिक को जीप के बोनेट से बांध कर प्रतिरोधकर्ताओं के सामने घुमाना; तीन, इस बार हज करने मक्का गए भारतीय मुसलामानों का वहां पर राष्ट्र-ध्वज तिरंगे का अजीबोगरीब प्रदर्शन करना.
       कई विद्वान् इस जंग में राष्ट्र के अलग-अलग आख्यान और उनकी टकराहट खोजते हैं. उस बहस पर मैं यहां गहराई में नहीं जाना चाहता. केवल यह कहना है कि आधुनिक भारत में राष्ट्र की अवधारणा का संबंध अनिवार्यत: उपनिवेशवाद विरोध से जुड़ा हुआ है. राष्ट्र का कोई भी आख्यान अगर नवसाम्राज्यवाद को संबोधित नहीं करता है, तो वह खुद अपने फर्जी होने की सच्चाई स्वीकार करता है. राष्ट्रीय जीवन के केंद्र में राजनीति होती है. राजनीति वास्तविक भी हो सकती है (होनी चाहिए) और फर्जी भी. जहां फर्जी राजनीति समवेत रूप में धड़ल्ले से चलती है, वहां राष्ट्रीय जीवन में सब कुछ फर्जी होता चला जाता है. भारत में पिछले करीब तीन दशकों से यही होता चला आ रहा है. राष्ट्र-द्रोह के आरोपों की बौछार झेलने वाले पक्ष की तरफ से जिस भारतीय-राष्ट्र के तर्क दिए जाते हैं, वे भी प्राय: उतने ही उथले हैं, जितने खुद अपने को राष्ट्र-भक्ति का प्रमाणपत्र देने वाले हिंदू-राष्ट्र के दावेदारों द्वारा दिए जाते हैं.
       एक उदाहरण पर्याप्त होगा. पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के मुख्यालय में भाषण देने जाने पर काफी विवाद हुआ. जब उन्होंने भाषण दे दिया तो उनके जाने का विरोध करने वाले तुरंत पाला बदल कर उनकी प्रशंसा के पुल बांधने लगे. कहा गया कि श्री मुखर्जी ने आरएसएस को उसके मुख्यालय में जाकर भारतीय-राष्ट्र का पाठ अच्छी तरह से पढ़ा दिया है. यह कहते वे मगन हो गए कि भारतीय-राष्ट्र का विचार और उसके प्रणेता कितने महान हैं! और, ज़ाहिर है, उस विचार तथा उसके प्रणेताओं को मानने वाले हम भी!
       यह सवाल उठाया ही नहीं गया कि भारतीय-राष्ट्र के महान विचार और प्रणेताओं के रहते हिंदू-राष्ट्र का इस कदर उभार कैसे हो गया? जबकि वह पिछले 80 सालों, डॉ. लोहिया के 'हिंदू बनाम हिंदू' निबंध का हवाला लें तो हजारों साल से हवा में तैर रहा था. यह सवाल उठता तो यह भी पूछा जाता कि देश के समस्त अकादमिक, शैक्षिक, साहित्यिक, कलात्मक, सांस्कृतिक संस्थानों और बड़े-बड़े एनजीओ की जिम्मेदारी लिए होने के बावजूद देश का साधारण सहित शिक्षित-संपन्न तबका भारत से लेकर विदेशों तक हिंदुत्ववादी-फासीवादी मानसिकता के साथ क्यों चला गया? दरअसल, भारतीय-राष्ट्र के दावेदार अपनी जिम्मेदारी का सवाल बहस में आने ही नहीं देना चाहते. जिम्मेदारी का सवाल बहस में आने से उन्हें आत्मालोचना करनी होगी. आत्मालोचना वही करता है, जो अपने को आलोचना से परे नहीं मानता. भारतीय-राष्ट्र के खास कर मार्क्सवादी, आधुनिकतावादी और इच्छा-स्वातंत्र्यवादी (लिबरटेरीयंस) दावेदार नहीं चाहेंगे कि इस बात पर खुले में चर्चा हो. वे भारतीय-राष्ट्र का हिंदू-राष्ट्र के बरक्स रणनीतिक इस्तेमाल भर करते हैं. वह रणनीति आरएसएस को एक अकेला शत्रु चित्रित करने की है. (यह आरएसएस को माफिक आता है, क्योंकि उसकी भी वही रणनीति है.)
       उपनिवेशवादी वर्चस्व के दौर से लेकर आजादी हासिल करने तक जो भारतीय-राष्ट्र का स्वरुप बना, और जो अपनी खूबियों-कमियों के साथ अभी भी क्षीण रूप में निर्माणाधीन है, मार्क्सवादी, आधुनिकतावादी और इच्छा-स्वातंत्र्यवादी उस स्वरुप को लेकर  स्पष्टता नहीं बरतना चाहते. शायद उनमें से ज्यादातर की निष्ठा उसमें नहीं है. उनका सरोकार अपने बौद्धिक दाव-पेचों से है, जिनके बल पर वे राष्ट्रवाद का खटराग चलाए रखना चाहते हैं, जिसमें एक तरफ भारतीय-राष्ट्र के दावेदार हों और दूसरी तरफ हिंदू-राष्ट्र के दावेदार. ज्यादातर अंग्रेजी में पगे ये बौद्धिक अभिजन यह समझने को तैयार नहीं हैं कि भारत की मेहनतकश जनता ने उनके इन बौद्धिक दाव-पेचों की भारी कीमत चुकाई है; और वह अब तरह-तरह की भ्रांतियों का शिकार हो चुकी है.
       श्री मुखर्जी के भाषण के संदर्भ में भारतीय-राष्ट्र के दावेदारों की ओर से यह सवाल उठाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता कि ये दोनों राष्ट्र ख़ुशी-ख़ुशी नवसाम्राज्यवाद का जुआ खींचने में एक साथ जुते हुए हैं. आरएसएस विरोधी कितना ही लोकतंत्र का वास्ता देकर फासीवाद विरोध का आह्वान करते हों, आरएसएस जानता है भाजपा की सरकार हमेशा नहीं रहनी है. उसने राहुल गांधी को अपने मुख्यालय में आने का निमंत्रण दे दिया है. भारतीय-राष्ट्र के दावेदारों के समर्थन से जब कारपोरेट के किसी और प्यादे की पूरी मज़बूती बन जायेगी, तो आरएसएस उसे भी अपने यहां बुला लेगा. यह अप्रोप्रिएसन नहीं है. नवसाम्राज्यवाद के समर्थन में दो फर्जी पक्षों का एका है, जो 1991 के बाद से अंदरखाने उत्तरोतर मज़बूत होता गया है.

2
       यह अकारण नहीं है. आधुनिक भारत के संदर्भ में राष्ट्रवाद के ये दोनों विचार अवास्तविक हैं. संघियों का 'स्वर्णिम' राष्ट्र सुदूर काल में स्थित है और कम्युनिस्टों, आधुनिकतावादियों और इच्छा स्वातंत्र्यवादियों का 'स्वर्णिम' राष्ट्र सुदूर स्थान में स्थित है, जो सुविधानुसार बदलते रहते हैं. आश्चर्य नहीं कि राष्ट्र के इन दोनों अवास्तविक विचारों की परिणति अनिवार्यत: वर्तमान निगम पूंजीवाद में होती है. उसीका नतीज़ा यह है कि हिंदू-राष्ट्र में डिज़िटल इंडिया के साथ 'मनुवाद' नत्थी कर दिया जाता है. दूसरी तरफ, भारतीय-राष्ट्र के दावेदार डिज़िटल इंडिया में कई वादों (इज्म्स) का विचित्र घालमेल नत्थी करते हैं. उपनिवेशवाद के साथ संघर्ष और संवाद की प्रक्रिया में भारतीयता को पुनर्परिभाषित और पुनर्व्याख्यायित करने का जो ऐतिहासिक उद्यम शुरू हुआ था, उसमें लगभग ठहराव आ चुका है. उस दौर में वैश्विक पटल पर भारत को पुनर्व्यवस्थित करने की वह धारा अब क्षीण रूप में ही बची रह गई है. राष्ट्र का ठहरा हुआ विचार मानसिकता में बदल जाता है, जो एक साथ हिंसावादी, षड्यंत्री और कायर हो सकती है.    
       पूंजीवाद रहता है तो पूंजीवादी दमन के खिलाफ लोग प्रतिरोध करते हैं. लोग प्रतिरोध न करें, या प्रतिरोध में शामिल न हों, इसके लिए पूंजीवादी निजाम ने एनजीओ बनाए हैं. लेकिन विशाल आबादी वाले भारत में पूंजीवादी तबाही का कोई अंत नहीं है. यहां एनजीओ की बाड़ लगा कर लोगों को लड़ने से नहीं रोका जा सकता. लोग नागरिक के तौर पर राजनीतिक लड़ाई नहीं लड़ पाते तो धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा के नाम पर लड़ते हैं. भारतीय-राष्ट्र और हिंदू-राष्ट्र के दावेदारों के बीच सारा झगड़ा प्रतिरोधरत लोगों को अपने-अपने पक्ष में फोड़ने का है. वे कोई बीच का रास्ता नहीं छोड़ना चाहते. ऐसे में भारत एक 'भीड़-राष्ट्र' में तब्दील हो रहा हो तो आश्चर्य नहीं.           
       यह सोचने की बात है कि भारतीय-राष्ट्र के दावेदार सिविल सोसाइटी एक्टिविस्ट फासीवादी हमले के खिलाफ समुदायों (दलित, मुस्लिम, आदिवासी, पिछड़े आदि) को एक मंच पर लाने का आह्वान करते हैं. वे उन्हें 'टेक इट फॉर ग्रांटेड' लेते हुए उनके साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं, जैसा ठेकेदार निर्माण मजदूरों के साथ करते हैं. भारतीय-राष्ट्र के दावेदार बुद्धिजीवी समझते हैं ज्ञान की पूंजी केवल उनके पास है. आरएसएस की रणनीति शुरू से समुदायों को अपने पक्ष में गोलबंद करने की रही है. इस रूप में आरएसएस शुरू से आधुनिक नागरिकता-बोध का सबसे बड़ा अवरोधक बना हुआ है. क्या भारतीय राष्ट्र के दावेदार सिविल सोसाइटी एक्टिविस्टों ने भी फैसला कर लिया है कि हिंदू-राष्ट्र का मुकाबाला नागरिक-राष्ट्र से नहीं करना है? कहां तो 1991 में नई आर्थिक नीतियां लागू की जाने के साथ ही अलग-अलग क्षेत्रों के मुद्दा-आधारित प्रतिरोध आंदोलनों को जोड़ कर नवसाम्राज्यवादी हमले को परास्त करने के लिए वैकल्पिक राजनीति खड़ी करने के प्रयास हो रहे थे, कहां कारपोरेट राजनीति की गोद में बैठ कर समुदायों को एकजुट करने अथवा/और आपस में लड़वाने के आह्वान किये जा रहे हैं!
       एक समय ऐसा माना गया था कि जाति-समीकरण (पिछड़े-दलित-मुसलमान) की राजनीति सांप्रदायिकता की काट है. उसे सामाजिक न्याय की राजनीति जैसा सुंदर नाम दिया गया था. लेकिन आरएसएस ने आगे बढ़ कर उसे अपना हथियार बना लिया. क्योंकि भारतीय-राष्ट्र के दावेदारों ने सामाजिक न्याय की राजनीति को समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र की संवैधानिक विचारधारात्मक धुरी पर कायम नहीं किया. चुनावों में 'सोशल इंजीनियरिंग' तक ही सामाजिक न्याय की राजनीति सीमित रह गई. बाकी रहा-सहा काम जातिवादी-परिवारवादी नेताओं ने कर दिया. कहने की जरूरत नहीं है कि इस भीड़ बनते राष्ट्र में सबसे ज्यादा दुर्गति मुसलमानों की हुई है. राजनीतिकरण की प्रक्रिया से अलग-थलग पड़ा ज्यादातर मुस्लिम समाज इस या उस सामाजिक समुदाय और राजनीतिक पार्टी/नेता का पुछल्ला बनने को बाध्य है. उनके लिए हिंदू-राष्ट्र में जगह नहीं है. कम से कम बराबरी की जगह नहीं है. लेकिन भारतीय-राष्ट्र में भी उनकी जगह बराबरी की हैसियत वाले नागरिकों की नहीं है. वहां उनके साथ रक्षक-भाव से बर्ताव किया जाता है. वह बर्ताव अपने को धर्मनिरपेक्ष दिखाने और उसके बदले में पद-पुरस्कार-अनुदान पाने की नीयत से परिचालित होता है.               

3
       भारतीय-राष्ट्र का दायरा बांध कर राष्ट्र की दावेदारी के जितने आख्यान सक्रिय हैं, उनके एक साझा (कॉमन) पाखण्ड पर ध्यान देने की जरूरत है. वे सभी गांधी के विरोधी हैं. वे गांधी को कभी भगत सिंह की छड़ी से, कभी अम्बेडकर की छड़ी से, कभी सुभाषचंद्र बोस की छड़ी से, कभी जवाहरलाल नेहरू की छड़ी से, कभी जिन्ना की छड़ी से पीटते हैं. लेकिन आरएसएस का सामना होते ही प्राय: वे सभी गांधी की हत्या का रोदन करने लगते हैं. मैं यहां पूंजीवादी औद्योगिक सभ्यता के आपदायी चरित्र को उसकी जययात्रा के दौर में पहचान लेने वाले गांधी; हिंसा-ग्रस्त दुनिया को राजनीति का नया अर्थ और तरीका बताने वाले गांधी; और 'राष्ट्रपिता' गांधी की बात नहीं कर रहा हूं. भारत में गांधी को इन रूपों में याद करने की कोई प्रासंगिकता भी नहीं है. क्योंकि भारतीय-राष्ट्र और हिंदू-राष्ट्र दोनों के दावेदार कारपोरेट पूंजीवाद पर एकमत हैं और उसके साथ ही गांधी के राजनैतिक दर्शन को अमान्य करने पर एकमत हैं. भारतीय-राष्ट्र के दावेदार भले ही खुल कर न कहते हों, हिंदू-राष्ट्र के दावेदारों की तरह 'राष्ट्रपिता' गांधी भी उन्हें स्वीकार नहीं है. भारतीय-राष्ट्र के दावेदारों को चाहिए कि वे गांधी को 'राष्ट्रपिता' की बेड़ियों से भी तुरंत मुक्त कर दें. इस पर सर्वानुमति बनाने में किसी कोने से कोई दिक्कत नहीं आएगी. हिंदू-राष्ट्रवादी मन, जो अभी तक गांधी की हत्या में क्रूरता का सुख लेता है; अथवा गोडसे की जगह गांधी की हत्या करने की अभिलाषा पालता है, इसके लिए तुरंत तैयार होगा.         
       मैं यहां उस गांधी की बात कर रहा हूं जिसने सदियों से वर्ण-जाति-सम्प्रदाय में विभाजित और साम्राज्यवादी लूट से जर्जर विशाल भारतीय समाज की सामूहिक चेतना को साम्राज्यवाद विरोधी चेतना के साथ जोड़ दिया था. गांधी ने आगे बढ़ कर यह भी किया कि तत्कालीन विविध बौद्धिक समूहों को भी जनता की साम्राज्यवाद विरोधी चेतना के साथ एकबद्ध होने को बाध्य कर दिया था. स्वतंत्र आधुनिक भारतीय-राष्ट्र के लिए गांधी की यह अनोखी देन थी कि अपने इस उद्यम में उन्होंने साम्राज्यवादी ब्रिटिश शासकों के प्रति शत्रुता का भाव नहीं रखा, और भारतीयों को भी इसके लिए तैयार करने की कोशिश की. मार्टिन लूथर किंग जूनियर से लेकर नेल्सन मंडेला तक गांधी की इस सीख के प्रति धन्यवादी रहे हैं. अगर भारतीय-राष्ट्र के दावेदारों को वह गांधी भी नहीं चाहिए, तो अपने भारतीय-राष्ट्र से उन्हें गांधी को तुरंत बेदखल कर देना चाहिए. यह काम बुद्धिजीवी ही कर सकते हैं, क्योंकि एक समूह के तौर पर गांधी को लेकर सबसे ज्यादा पाखंड वे ही करते हैं. दुनिया में एक भी ऐसा उदाहरण नहीं मिलता जहां एक ऐसे व्यक्ति के खिलाफ, जिसने स्वतंत्रता संघर्ष में अपना जीवन लगाया, अपनी भली-बुरी भूमिका के एवज़ में स्वतंत्र नवोदित राष्ट्र से न कुछ चाहा, न कुछ लिया, उसे देश के बुद्धजीवियों से अपार घृणा और तिरस्कार मिला हो.
       भारतीय-राष्ट्र के दावेदारों द्वारा गांधी-मुक्त भारत बनाने से एक बड़ा फायदा यह होगा कि शासकवर्ग गांधी को मोहरा बना कर अपनी सत्ता की मज़बूती नहीं बना पायेगा. क्योंकि गांधी को लेकर बुद्धिजीवियों का पाखंड शासकवर्ग द्वारा जनता के खिलाफ उनके नाम के इस्तेमाल में मदद करता है. गांधी-मुक्त भारत होने पर शासकवर्ग द्वारा दुनिया में गांधी को बेचने का धंधा भी एक दिन ख़त्म हो जा सकता है. गांधी ने एक बार अपनी राजनीति में सक्रियता का लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना बताया था. भारतीय-राष्ट्र के दावेदार गांधी-मुक्त भारत बना कर उन्हें सचमुच मुक्ति देने का काम करेंगे!   


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       यह अकारण नहीं है कि भारतीय-राष्ट्र के लगभग सभी दावेदार संकट की गहनता के बावजूद किसी राजनैतिक विकल्प की चर्चा तक नहीं करते. बल्कि उन्होंने 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' (आईसीए) के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और उस आंदोलन की पार्टी के साथ पूर्ण एकजुटता बना कर 1991 के बाद बनी वैकल्पिक राजनीति की समस्त संभावनाओं को सफलता पूर्वक नष्ट कर दिया है. ध्यान दिया जा सकता है कि पब्लिक डोमेन में भारत माता और तिरंगे को राष्ट्र-भक्ति के प्रदर्शन का ब्रांड-उपकरण भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और आम आदमी पार्टी ने ही बनाया था. भारत में बुद्धिजीवियों का काफी तूमार बांधा जाता है. यह विडम्बना ही है कि राष्ट्र के सामने उपस्थित गहन संकट के बावजूद वे कोई नया रास्ता नहीं बनाना चाहते. जबकि आधुनिक युग की यह अलग विशेषता है कि यहां जो भी होता है, उसकी रूपरेखा बुद्धिजीवी तैयार करते हैं; भले ही उनमें कई ऊंचे पाए के नेता भी होते हों.        
       कांग्रेस ने जब 1991 में नई आर्थिक नीतियां थोपीं तो अटलबिहारी वाजपेयी ने कहा था कि अब कांग्रेस ने उनकी विचारधारा और काम अपना लिए हैं. 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में जब भाजपा की गठबंधन सरकार बनी और उसने एक के बाद एक अध्यादेशों के ज़रिये कारपोरेट-हित के फैसले लिये तो किशन पटनायक ने 'राष्ट्रवादी' आरएसएस से जवाब तलब किया था. आरएसएस की असलियत अब खुलकर सामने आ गई है. उसकी सारी 'सांस्कृतिक' और 'राष्ट्रवादी' फू-फां पूंजीवादी बाजारवाद की जूठन पर कब्ज़ा ज़माने के लिए थी. संस्कृति और उस पर उपलब्ध विपुल चिंतन के मद्देनज़र आरएसएस की सांस्कृतिक समझ और प्रतिबद्धता पर चिंता ही की जा सकती है! शिकागो में गरजने वाले आरएसएस के 'हिंदू शेर' मोहन भागवत ने रक्षा-क्षेत्र में सौ प्रतिशत विदेशी निवेश के अपनी सरकार के फैसले पर म्याऊं तक नहीं की. जिन छोटे और मंझोले व्यापारियों ने स्थापना के समय से ही आरएसएस/जनसंघ/भाजपा को तन-मन-धन दिया, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और कारपोरेट घरानों से यारी होते ही आरएसएस ने उन्हें लात लगा कर नीचे गिरा दिया. लिहाज़ा, आरएसएस के 'हिडन अजेंडे' का बार-बार खुलासा और विरोध करने का ज्यादा अर्थ नहीं है.
       लेकिन भारतीय-राष्ट्र के दावेदारों के यहां भारत और दुनिया में पसरी नवसाम्राज्यवाद की परिघटना, भारत में साम्प्रदायिक फासीवाद जिसका उपोत्पाद है, पर अब कोई चर्चा नहीं होती. गोया इतनी कुर्बानियों से हासिल की गई आज़ादी को गंवाना कोई चिंता की बात नहीं है. उनकी मूल चिंता केवल आरएसएस के फासीवाद को परास्त करने की है. इस कवायद में भारतीय-राष्ट्र के दावेदार बुद्धिजीवी पूरी बहस को ही दिग्भ्रमित (मिसगाइड) करने से नहीं हिचकते. वे नवसाम्राज्यवादी शिकंजे से ध्यान हटा कर बहस को कभी फासीवाद बनाम लोकतंत्र, कभी हिंदुत्व बनाम हिंदू-धर्म, कभी ब्राह्मणवाद बनाम दलितवाद, ब्राह्मणवाद बनाम पिछड़ावाद आदि के रूप में पेश करते हैं. उनका सारा जोर इन्हीं संघर्षों (कन्फलिक्ट्स) को तेज़ करने की रणनीतियां बनाने पर रहता है. यह तथ्य है कि लोकतंत्र के चलते कुछ जातिगत-समुदायों की राजनीतिक ताकत बनी है. वे उस ताकत को सुरक्षित रखते हुए और ज्यादा बढ़ाने की जद्दोजहद करते हैं. उनका यह संघर्ष (स्ट्रगल) लोकतांत्रिक धरातल पर ही चलना चाहिए. क्योंकि वहीँ से वह ताकत हासिल की गई है और आगे वहीँ से बढ़ाई जा सकती है. लेकिन देखने में आता है कि कुछ बुद्धिजीवी अपनी रणनीति के तहत इन समुदायों में 'मिलिटेंट' तत्वों की तलाश करके उन्हें भारतीय राज्य के विरुद्ध हिंसक प्रतिरोध से जोड़ना चाहते हैं. क्या फासीवाद के मुकाबले की इस तरह की रणनीति के पीछे की मंशा को ईमानदार कहा जा सकता है?    


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       देश पर 1991 में नई आर्थिक नीतियां थोपे जाने पर समाजवादी चिंतक किशन पटनायक ने राष्ट्र-भक्ति और राष्ट्र-द्रोह की बहस को एक उचित परिप्रेक्ष्य और दिशा देने की कोशिश की थी. उन्होंने भारत पर दो सदियों के उपनिवेशवादी आधिपत्य के अनुभव को अपने चिंतन का मुख्य आधार बनाया है. वे भारत में नवउदारवाद की शुरुआत को गुलामी की शुरुआत से जोड़ कर देखते हैं और इसके लिए भारत के बुद्धिजीवियों को जिम्मेदार ठहराते हैं. उनकी स्थापना है कि नवउदारवाद/नवसाम्राज्यवाद के बरक्स भारतीय बुद्धिजीवियों का दिमाग स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर पाता है. किशन पटनायक नवउदारवाद/नवसाम्राज्यवाद का मुकाबला करने के लिए आर्थिक राष्ट्रवाद का सूत्र प्रस्तावित करते हैं. उनके अनुसार देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों की भारत के संसाधनों की लूट का निर्णायक विरोध करते हुए नवउदारवाद के विकल्प का रास्ता तैयार करने वाले राष्ट्र-भक्त की कोटि में आते हैं. उन्होंने स्पष्ट कहा नहीं है, लेकिन नवउदारवाद/नवसाम्राज्यवाद के समर्थक अपने आप राष्ट्र-द्रोही की कोटि में आ जाते हैं.  (इस विषय पर विस्तृत विवेचन के लिए उनकी पुस्तकें - 'भारत शूद्रों का होगा', 'विकल्पहीन नहीं है दुनिया', 'भारतीय राजनीति पर एक दृष्टि' तथा 'सामयिक वार्ता' व अन्य पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उनके लेख देखे जा सकते हैं)
       अंत में : उग्र-पूंजीवाद हमारे संसाधनों और श्रम को ही नहीं लूट रहा है, हमारे राष्ट्रीय बोध को भी खोखला कर रहा है. बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि हमारा राष्ट्रीय बोध खोखला हो चुका है, तभी देश के संसाधनों और श्रम की इस कदर खुली लूट संभव हो पा रही है. राष्ट्रीय बोध नहीं रहने पर हमारा राष्ट्रीय जीवन समृद्ध बना नहीं रह सकता. जैसा कि हम देख रहे हैं, वह सतही और कलही होने के लिए अभिशप्त है. दरअसल, यह जो उग्र-राष्ट्रवाद दिखाई दे रहा है, वह राष्ट्रीय बोध के खोखलेपन को भरने की एक निरर्थक कवायद है. इसके तहत येन-केन प्रकारेण ज्यादा से ज्यादा राजनीतिक सत्ता हथिया कर नवउदारवादी लूट की ज्यादा से ज्यादा जूठन बीनने की छीना-झपटी चलती है. लगता है यह दौर कुछ समय तक ऐसे ही चलेगा. लेकिन यह स्वीकार करना चाहिए कि हमेशा यह स्थिति नहीं रहेगी. समय आयेगा जब किसी पीढ़ी में वास्तविक (जेनुइन) राष्ट्रीय बोध की भूख जागृत होगी. अगर भारत के राष्ट्रीय जीवन में वह समय नहीं आता है, तो मान लेना चाहिए कि हम राष्ट्र होने के लायक नहीं हैं. आधुनिक विश्व में गुलामी हमारी नियति है!

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी का शिक्षक और सोशलिस्ट पार्टी (भारत) का अध्यक्ष है)    




Wednesday, 5 September 2018

Political Resolution of SPI adopted in its National Executive Committee meeting held in Delhi on 8 August 2018.

Socialist Party (India)
National Executive Committee Meeting, Delhi
8 August 2018


            Political Resolution

            The Indian Constitution is passing through the crisis of a serious threat from the ruling establishment of the country. The present government is not only destroying the basic values of socialism, secularism and democracy embedded in the Constitution, but its leaders are also openly declaring that they are working in the government to make changes in the Constitution. They are openly advocating for a pro-corporate, theocratic and dictatorial India which is against the very nature of the Constitution that ensures a socialist, secular and democratic India. It is not only the Muslim minority but the right to life and dignity of other minorities and vulnerable sections of the society such as dalits, adivasis and women too are under threat. Those who oppose this anti-constitutional design of the government are killed in broad day light and no action is taken against killers.

            The Modi government is promoting the private sector at the cost of public sector and diluting the labour laws in favour of industrialists. The Government is determined to dismantle public sector, the basic anchor to a socialist society. The centralisation of power in the Prime Minister's Office (PMO) is another example of crushing the constitutional spirit of democracy and decentralisation. Now this government is promoting the 'one nation one election' campaign. This idea is against the federal and democratic spirit of the Constitution.

            In such a challenging situation every Indian citizen who believes in the propriety of the Constitution must give a serious thought to the dangerous developments taking place in the country.   The Socialist Party condemns this unconstitutional, inhuman and undemocratic attitude of the government in strongest terms.

            This government has completely failed in its economic policies. The government's favorite corporate houses are grabbing the country's wealth. People associated with BJP, the government and Prime Minister Narendra Modi are fleeing the country by robbing the country's wealth. Many incentives/facilities are being given to foreign capital, but neither economy is benefiting nor employment is being created. The government has adopted an unsteady attitude towards farmers' debt waiver and beneficial prices of agriculture produce. By changing the labor law, the life of the laborers has been made completely insecure. With the government's anti-permanent employment-related policies, the number of educated unemployed is increasing steadily. Modi's election promise to give employment to 20 million youths has proved to be hollow. In the Government departments, the posts of third and fourth grade employees are not filled even there are vacancies. There are about 25 lakh posts are lying vacant in government departments. Moreover, the government is working on the designs to place the senior executives of private companies in the position of Joint Secretary in the Indian Administrative Service (IAS) directly.

            The focus of the government is not to provide basic facilities like roads, water, electricity, transport, hospital, school/college in the rural India/small towns. On the contrary it is indulged in developing smart cities, large airports, flyovers, bullet trains etc. The government took a loan of Rs one lakh crore from Japan for the Mumbai-Ahmedabad bullet train. About 12 thousand km of rail lines can be set up at such expenditure.

       The Government is responsible for providing common, quality and free education to all children of the country under its constitutional obligation. But the Modi government has closed thousands of government schools. Higher education is being privatized rapidly. The existing scholarships for tribal and dalit students are being either cut or  delayed. In addition to privatization, this government is rapidly promoting communalisation of syllabus/courses.

            Modi government's foreign policy has not succeeded in South Asia and other parts of the world. Modi spends billions of rupees out of the public exchequer in his frequent foreign tours. But his foreign policy has failed to protect national interests. Neighbouring countries Nepal and Sri Lanka are being dissatisfied with India and going closer to China. Myanmar's attitude is also of indifference. The relationship with Bangladesh is friendly at present, but the anti-Muslim statements of the RSS/BJP leaders and the government's tactics of communal polarization is itself spoiling the environment. The government also appears to be working under American pressure regarding the old allies like Iran and Palestine. Indonesia and Egypt too are not happy with India. China's ambitions are increasing. The US, Russia and Japan are also experiencing difficulties in front of her. In this way, no friend of India is seen around the world. There is no say of India in global affairs.

            The problem of presence of illegal Bangladeshi nationals in Assam is quite complex and old. When the students movement against the Bangladeshi infiltration in Assam held in the eighties, they were supported by socialists and Gandhians of the country. The National Register of Citizenship (NRC) recently issued by the present government excludes names of over 40 lakh people. If their families are added then this number will be more than one crore. It is being said that most of the 4 million people out of the National Citizen Register are Indian citizens. These include both Hindus and Muslims. Putting such a large number of people in one state of insecurity shows that the duty to prepare the NRC has not been fulfilled properly. It seems that the government was quick to issue a NRC for electoral gains rather than a proper solution to the problem. This essential work of national interest should have been done in a non-political manner. But the Bharatiya Janata Party (BJP) leadership did not act maturity.

            The Socialist Party (India) urges the country's political leadership to ensure that instead of doing vote politics on this sensitive issue, make sure that no single Indian citizen is left out of the National Register of Citizens whether they belong to any religion, caste and state.

            Citizens of Jammu & Kashmir state had observed two-day bandh to support the demand that Article 35 A, an addition to the Article 370 made by the relevant Presidential Proclamation in 1954,  be protected. The SPI extends its support to this demand on the ground that the people, who were inhabitants of the area occupied by Pakistan after its aggression in 1947, were to be treated as original residents of J&K state and be allowed to enjoy the rights like purchasing immovable property. People in the days between 1947 and 1954, belonging to the Pak-occupied Kashmir, while returning to J&K state had faced legal difficulty because they were deemed to be citizen belonging to a foreign country called Pakistan. With a view to overcome this legal hitch, a provision was made in the relevant Presidential Proclamation. The matter is directly relevant for a few thousand families who had returned to J&K state from Pak-occupied Kashmir. The SPI appeals to the honourable Supreme Court and the Government of India to uphold the validity of Article 35 A. The party does not accept the argument of the BJP that the Article 35 A is not legitimate part of the Constitution, and therefore to be treated as null and void, because it was not enacted in the Parliament.    

            The SPI once again demands that the long-pending Women Reservation Bill should be  implemented without further delay.   

            Both Modi and Amit Shah are supreme in the affairs of the BJP and the government. Both of them have come to know that the people of the country are not happy and the trust of youth has broken up with the present government. In order to win the election of 2019, they both are working on mainly three strategies - first, communal polarization, secondly, talking about the leader instead of policies, third, winning over the young voters in their favor who would cast their votes first time in 2019 election.

            This is a challenging situation in front of the public and the opposition of the country. They should emphasize the policies, and not the leaders in the 2019 elections. The nature of opposition unity should be such that there is no division of votes against the National Democratic Alliance. The SPI will play a positive role in this direction.

(Prepared by Dr. Prem Singh, president, presented by Manju Mohan, general secretary, supported by Rambabu Aggarwal, vice president.) 


सोशलिस्ट पार्टी राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति बैठक (8 अगस्त 2018), दिल्ली में पास राजनीतिक प्रस्ताव

सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया)
राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति बैठकदिल्ली
8 अगस्त 2018



        राजनीतिक प्रस्ताव  

        भारत का संविधान देश के शासक-वर्ग की ओर से खड़े किये गए गंभीर खतरों के संकट से गुजर रहा है। वर्तमान सरकार न सिर्फ संविधान में शामिल समाजवादधर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के बुनियादी मूल्यों को नष्ट कर रही हैबल्कि सरकार में शामिल इसके नेता खुलेआम घोषणा कर रहे हैं कि वे संविधान बदलने के लिए यह सरकार चला रहे हैं। वे संविधान की मूल प्रकृति के खिलाफ खुले तौर पर एक कॉर्पोरेट परस्त,धर्म-आधारित और तानाशाही भारत बनाने की वकालत कर रहे हैं। इस सरकार ने न केवल सबसे बड़े अल्पसंख्यक मुस्लिम समाज पर हमला बोल दिया है, बल्कि अन्य अल्पसंख्यकों तथा दलितोंआदिवासियोंमहिलाओं जैसे समाज के कमजोर समूहों के जीवन के अधिकार और गरिमा का भी हनन करने में लगी है। जो लोग सरकार के इस संवैधानिक-विरोधी मंसूबों का विरोध करते हैं, उनकी सरेआम हत्या कर दी जाती है और हत्यारों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाती।
        मोदी सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की कीमत पर निजी क्षेत्र को बढ़ावा दे रही है और उद्योगपतियों के पक्ष में श्रम कानूनों को बदल रही है। सरकार सार्वजनिक क्षेत्र, जो समाजवादी व्यवस्था की दिशा में बढ़ने का मूलाधार है, को नष्ट करने पर आमादा है। प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में सत्ता का केंद्रीकरण लोकतंत्र और विकेंद्रीकरण की संवैधानिक भावना को कुचलने का एक और उदाहरण है। अब यह सरकार 'एक राष्ट्र एक चुनावअभियान का प्रचार कर रही है। यह विचार संविधान की संघीय और लोकतांत्रिक भावना के खिलाफ है।
        प्रत्येक भारतीय नागरिक, जो संविधान की सत्ता में विश्वास करता है, उसे देश में बढ़ रहीं इन खतरनाक प्रवृत्तियों के बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए। सोशलिस्ट पार्टी कड़े शब्दों में सरकार के असंवैधानिकअमानवीय और लोकतंत्र विरोधी कृत्यों की निंदा करती है।
        यह सरकार आर्थिक क्षेत्र में में पूरी तरह से विफल रही है। सरकार के चहेते कार्पोरेट घराने देश की दौलत को हड़प रहे हैं। भाजपा, सरकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से जुड़े लोग देश की दौलत लूट कर विदेश भाग रहे हैं। विदेशी पूँजी को अनेक सहूलियतें दी जा रही हैं, लेकिन न अर्थव्यवस्था को फायदा हो रहा है न रोजगार पैदा हो रहा है। किसानों की कर्जमाफी और उपज के किफायती दामों को लेकर सरकार ढुलमुल रवैया अपनाये हुए। श्रम कानून बदल कर मजदूरों का जीवन पूरी तरह असुरक्षित बना दिया गया है।
        सरकार की स्थायी रोजगार विरोधी नीतियों के चलते शिक्षित बेरोजगारों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। दो करोड़ युवाओं को रोजगार देने का मोदी का चुनावी वादा खोखला साबित हो चुका है। सरकरी विभागों में तीसरी और चौथी श्रेणी के पद खाली होने पर भरे नहीं जाते। सरकारी विभागों में करीब 25 लाख रिक्त पद हैं। ऊपर से सरकार प्राइवेट कंपनियों के उच्चाधिकारियों को भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में सीधे संयुक्त सचिव के पद पर बिठाने के मंसूबे पर काम कर रही है। सरकार का ध्यान देहातों/कस्बों में सड़क, पानी, बिजली, परिवहन, अस्पताल, स्कूल/कॉलेज जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने पर नहीं है। वह स्मार्ट सिटी, बड़े-बड़े हवाई अड्डे, फ्लाई ओवर, बुलेट ट्रेन बनाने में ही सबका विकास मानती। सरकार ने मुंबई-अहमदबाद बुलेट ट्रेन के लिए एक लाख करोड़ का क़र्ज़ जापान से लिया। इतने खर्च में करीब 12 हज़ार किमी रेल लाइन बिछाई जा सकती है।
       देश के सभी बच्चों को समान, गुणवत्तायुक्त और मुफ्त शिक्षा देने का दायित्व सरकार का है। लेकिन मोदी सरकार ने हजारों सरकारी स्कूल बंद कर दिए हैं। उच्च शिक्षा का तेज़ी से निजीकरण किया जा रहा है। आदिवासी और दलित छात्रों को पहले से मिलने वाली छात्रवृत्तियों में कटौती की जा रही है और छात्रवृत्तियां देने में विलम्ब किया जा रहा है। निजीकरण के अलावा यह सरकार तेज़ी से पाठ्यक्रमों का साम्प्रदायिकरण कर रही है।
        मोदी सरकार की विदेश-नीति को दक्षिण-एशिया और विश्व के अन्य भागों में कामयाबी नहीं मिली है। मोदी ने देश की जनता का अरबों रूपया खर्च करके एक के बाद एक विदेश दौरे किये। लेकिन उनकी विदेश-नीति राष्ट्र-हित को सुरक्षित रखने में असफल रही है। पड़ोसी नेपाल और श्रीलंका भारत से असंतुष्ट होकर चीन के करीब जा रहे हैं। म्यांमार का रवैया भी वैसा ही बना हुआ है। बांग्लादेश के साथ सम्बन्ध कुछ ठीक हैं, लेकिन आरएसएस/भाजपा नेताओं के मुस्लिम-विरोधी बयानों और खुद सरकार की साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की रणनीति के चलते वातावरण बिगड़ रहा है। ईरान और फिलिस्तीन सरीखे पुराने सहयोगियों को लेकर भी सरकार अमेरिकी दबाव में काम करती नज़र आती है। इंडोनेशिया और मिश्र भी भारत से खुश नहीं हैं। चीन की महत्वाकांक्षाएं बढ़ती जा रही हैं। अमेरिका, रूस और जापान भी उसके सामने परेशानी का अनुभव कर रहे हैं। ऐसे में पूरे विश्व में भारत का कोई दोस्त नज़र नहीं आता। वैश्विक मामलों में भारत की कोई पूछ नहीं होती है।
        असम में अवैध रूप से रहने वाले बंग्लादेशी नागरिकों की मौजूदगी की समस्या काफी जटिल और पुरानी है। असम में बांग्लादेशी घुसपैठ के विरुद्ध अस्सी के दशक में जब वहां के छात्रों ने आंदोलन किया था तो उनका समर्थन पूरे देश के समाजवादियों और गांधीवादियों ने किया था। मौजूदा सरकार ने जो राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर जारी किया हैउसमें 40 लाख से ऊपर लोगों के नाम नहीं हैं। उनके परिवारों को जोड़ा जाए तो यह संख्या एक करोड़ से ज्यादा होगी। ऐसा बताया जा रहा है कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर से बाहर किये गए 40 लाख लोगों में से ज्यादातर भारतीय नागरिक हैं। इनमें हिंदू और मुसलमान दोनों शामिल हैं। एक राज्य में इतनी बड़ी संख्या में लोगों को असुरक्षा की स्थिति में डाल देना बताता है कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर तैयार करने में कर्तव्य का सही तरह से निर्वाह नहीं किया गया है। ऐसा लगता है कि सरकार को समस्या के समुचित समाधान के बजाय चुनावी फायदे के लिए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर जारी करने की जल्दी थी। इस आवश्यक कार्य को गैर-राजनीतिक तरीके से किया जाना चाहिए था। लेकिन भाजपा नेतृत्व ने वैसी परिपक्वता का प्रमाण नहीं दिया।
        सोशलिस्ट पार्टी देश के राजनैतिक नेतृत्व से अपील करती है कि इस संवेदनशील मुद्दे पर वोट की राजनीति करने के बजाय मिल कर सुनिश्चित करें कि एक भी भारतीय नागरिक राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर से बाहर नहीं रहे। चाहे वह किसी भी धर्मजाति अथवा प्रदेश का हो.    
        जम्मू और कश्मीर राज्य के नागरिकों ने संविधान के अनुच्छेद 35ए, जिसे 1954 में राष्ट्रपति की अधिघोषणा द्वारा धारा 370 के साथ रखा गया था, को बचाने की मांग के समर्थन में 2 दिन का बंद रखा. सोशलिस्ट पार्टी जम्मू और कश्मीर राज्य के नागरिकों की मांग का इस आधार पर समर्थन करती है कि राज्य में रहने वाले जो लोग 1947 में पाकिस्तानी हमले के पहले पाक-अधिकृत कश्मीर में रहते थे, उन्हें इस अनुच्छेद द्वारा जम्मू और कश्मीर राज्य का स्थायी नागरिक का दर्ज़ा दिया गया था, और जिन्हें स्थायी संपत्ति खरीदने जैसे अधिकार दिए जाएं. जो लोग 1947 और 1954 के बीच की अवधि में पाक-अधिकृत कश्मीर से जम्मू और कश्मीर राज्य में आकर बसे उन्हें विदेशी (पकिस्तानी) नागरिक समझ कर कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ता था. इस कानूनी अड़चन को दूर करने के लिए राष्ट्रपति की अधिघोषणा में उनकी नागरिकता का प्रावधान किया गया. यह प्रावधान उन कुछ हज़ार परिवारों के लिए सीधे प्रासंगिक है जो पाक-अधिकृत कश्मीर से जम्मू और कश्मीर राज्य में लौट कर आये थे. सोशलिस्ट पार्टी माननीय उच्चतम न्यायालय और भारत सरकार से अपील करती है कि अनुच्छेद 35ए की वैधता को बरकरार रखा जाए.
        सोशलिस्ट पार्टी एक बार फिर अपनी यह मांग दोहराती है कि लम्बे से समय ले लटके महिला आरक्षण विधेयक को अविलम्ब पारित किया जाए.   
        भाजपा और सरकार दोनों जगह मोदी और अमित शाह की चलती है। इन दोनों को पता चल गया है कि देश की जनता सरकार से खुश नहीं है। नौजवानों का भरोसा सरकार से टूट चुका है। 2019 का चुनाव जीतने के लिए ये दोनों तीन रणनीतियों पर काम कर रहे हैं - पहली, साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करना, दूसरी, नीतियों की जगह नेता की बात करना, तीसरी, 2019 में पहली बार वोट डालने वाले नवयुवकों को अपने पक्ष में करना।  
        देश की जनता और विपक्ष के सामने यह चुनौतीपूर्ण स्थिति है। उन्हें आगामी चुनाव में नेता नहीं, नीतियों पर जोर देना चाहिए। विपक्षी एकता का स्वरुप ऐसा होना चाहिए कि एनडीए विरोधी वोटों का बंटवारा न हो। सोशलिस्ट पार्टी इस दिशा में सकारात्मक भूमिका निभाएगी।      

(डॉ. प्रेम सिंह, अध्यक्ष, द्वारा तैयार, बैठक में मंजू मोहन, महासचिव, द्वारा पेशरामबाबू अग्रवाल, उपाध्यक्ष, द्वारा समर्थित.) 

Kuldip Nayar passes away: A burning torch in the darkness has gone out


23 August 2018
Press Release



Kuldip Nayar was one of the strongest symbols of trust in the Indian civil society. He was among the few persons who could not compromise on basic constitutional and human values even in front of biggest troubles or temptations. His demise is to extinguish a burning torch in today's dark phase for the Indian society and polity.

At the time of the re-establishment of the Socialist Party in 2011 Kuldip Nayar stated that this is the toughest period in the Indian politics after the independence. If the party is revived then do not close it for the sake of future India. He was a special invitee to the National Executive of the Socialist Party since its re-establishment. He used to attend most of the meetings, conferences, conventions and programs of the party and would give his views and suggestions. He was agreed with the socialist party's belief that secularism and democracy cannot be saved after abandoning the socialist goal of the Constitution for neo-liberal policies.

Kuldip Nayar's demise is an irreparable loss to the Socialist Party. The Socialist Party offers humble tributes and the last salute to its special member and guide.

Dr. Prem Singh
President

कुलदीप नैयर का निधन : बुझ गई अंधेरे में जलती मशाल

23 अगस्त 2018
प्रेस रिलीज़



कुलदीप नैयर भारतीय नागरिक समाज में भरोसे के सशक्त प्रतीकों में से एक थे. वे उन गिने-चुने लोगों में थे जो बड़ी से बड़ी मुसीबतों या प्रलोभनों के सामने आधारभूत संवैधानिक और मानव मूल्यों पर समझौता नहीं कर सकते थे. उनका निधन भारतीय समाज और राजनीति के लिए आज के अंधकारमय दौर में एक जलती हुई मशाल का बुझ जाना है.

कुलदीप नैयर ने 2011 में सोशलिस्ट पार्टी की पुनर्स्थापना के समय कहा था कि आज़ादी के बाद भारत की राजनीति में यह सबसे कठिन दौर है. अगर पार्टी फिर से खोली है तो देश के भविष्य की खातिर उसे बंद मत करना. वे सोशलिस्ट पार्टी की पुनर्स्थापना के समय से ही उसकी राष्ट्रीय कार्यकारिणी के विशेष आमंत्रित सदस्य थे. वे पार्टी की ज्यादातर बैठकों, सभाओं, सम्मेलनों और कार्यक्रमों में शामिल होते थे और अपने विचार व सुझाव देते थे. कुलदीप नैयर सोशलिस्ट पार्टी की इस मान्यता से सहमत थे कि नवउदारवादी नीतियों के लिए संविधान के समाजवादी लक्ष्य को त्यागने के बाद धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र को नहीं बचाया जा सकता.

कुलदीप नैयर जाना सोशलिस्ट पार्टी के लिए अपूरणीय क्षति है. अपने विशेष सदस्य और मार्गदर्शक को सोशलिस्ट पार्टी की विनम्र श्रद्धांजलि और आखिरी सलाम.

डॉ. प्रेम सिंह
अध्यक्ष            

राफेल विमान सौदा : जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया जाए

12 अगस्त 2018 प्रेस रिलीज़ फ्रांस से राफेल लड़ाकू विमान खरीद का मामला लगातार संदेह के घेरे में बना हुआ है. इस सौदे के बारे में ...