Wednesday, 17 July 2019

समाजवाद : सफलता विफलता और संभावनाएं



श्याम गंभीर

          जब भारतीय राष्ट्रिय आन्दोलन चल रहा था तो उसमें समाजवादी धारा के नेताओं आचार्य नरेन्द्र देव, डॉ. राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, युसूफ मेहर अली, अशोक मेहता, एस. एम. जोशी, मीनू मसानी, उषा मेहता आदि नेताओं के नेतृत्व में समाजवादियों ने बड़ी भूमिका अदा की |  जब देश आजाद होगा तब देश की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्थिति क्या होगी इसी विचार मंथन के रूप में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की  स्थापना 1934 में हुई, तभी से समाजवादी नेताओं ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के माध्यम से आजाद  भारत की आर्थिक और राजनीतिक स्थिति क्या हो उसके लिए नीतियां बनाना और काम करना शुरू किया | साथ ही साथ वो आजादी के आन्दोलन को भी गति देते रहे | 1942 के भारत छोडो आन्दोलन में जब सभी वरिष्ठ नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया तब आन्दोलन को समाजवादी नेता ही लंबे अरसे तक चलाते रहे | परिणाम स्वरुप 15 अगस्त 1947 को देश आज़ाद हुआ |  इसके बाद जब कांग्रेस ने अपनी सदस्यता के नियम में संसोधन किया कि कांग्रेस का सदस्य किसी दुसरे संगठन का सदस्य नहीं हो सकता तब सभी बड़े समाजवादी नेताओं ने कांग्रेस छोड़ कर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की | 1952 के चुनाव में भारी पराजय के बाद समाजवादियों के बिच निराशा फैली, लेकिन समाजवादी नेता आम जानता के जुड़े हुए मुद्दे पर निरंतर संघर्ष करते रहे | जब पहली बार डॉ. लोहिया 1963 में संसद में पहुंचे तब संख्या में कम होते हुए भी समाजवादियों ने यह एहसास कराया कि प्रतिपक्ष को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता | डॉ. लोहिया, मधु लिमये जैसे नेताओं ने विपक्ष कि क्या भूमिका हो सकती हैं और विपक्ष का होना क्यों जरुरी हैं इसका भी एहसास कराया |  कम सदस्य होते हुए भी जनता से जुड़े हुए हर मुद्दे को समाजवादियों ने पूरी ताकत से सदन में उठाया | लोहिया के गैर कांग्रेसवाद के नीति ने 1967 में कांग्रेस को कई राज्यों में  हराया और विपक्ष की सरकार बनी | संभवतः यह समाजवादियों का स्वर्ण काल था | समाज को बदलने और समता व समृद्धि पर आधारित समाज का निर्माण करने के लिए समाजवादी निरंतर संघर्षशील रहते थे और अगर गुलाम भारत में अंग्रेजों ने समाजवादियों को कई  बार गिरफ्तार किया तो आजाद भारत की सरकार ने उससे भी ज्यादा बार गिरफ्तार किया | लेकिन समाजवादी पुरे साहस के साथ हर तरह के शोषण और दमन का प्रतिकार करते थे फिर कीमत चाहे जो चुकानी पड़े | इसीलिए डॉ. लोहिया ने  जेल,फावड़ा और वोट जैसे प्रतीक दिए थे | इसमें जेल संघर्ष का प्रतीक था तो फावड़ा रचना का और वोट लोकतान्त्रिक तरीके से सत्ता का |  
          डॉ. लोहिया के अकास्मिक निधन के बाद 1972 में जन असंतोष का नेतृत्व लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने किया | परिणाम स्वरुप 1975 में आपातकाल लगा और 1977  के लोकसभा चुनाव में  कांग्रेस को भारी पराजय का सामना करना पड़ा | समाजवादियों को केंद्र और प्रदेशों में सरकार का नेतृत्व करने का अवसर भी मिला | कुछ समय के बाद ही समाजवादियो के समर्थन से देश को प्रधानमंत्री का पद भी प्राप्त हुआ | समाजवादी नीतियों को लागू करने का यही सही समय था लेकिन सत्ता मिलने के बाद भी इन नीतियों को लागू करने से समाजवादी चुक गए | ऐसा प्रतीत होता हैं कि समाजवादी नीतियों को लागू करने के बजाए उनमें सत्ता भोग कि प्रवृति ने जगह बना ली | लम्बें समय तक नीतियों कि जगह खुद को स्थापित करने का मोह भी कुछ नेताओं ने पाल लिया | सत्ता को बनाए रखने के लिए  वंशवाद और जातिवाद का गठजोड़  समाजवादी नेता करते रहे,  2000 आते-आते सत्ता में रहने के लिए कई नेताओं ने फासीवादी और सांप्रदायिक ताकतों से हाथ मिलाने में भी गुरेज नहीं किया | अधिकतर नेता जो एक बार विधायक या संसद बना सभी विचारों और नीतियों को त्याग कर दोबारा बनने के लिए हर तरह के गठजोड़ करने लगा | इसमें सफलता न मिलने पर समाजवादी शब्द के साथ सभी अपने-अपने राजनीतिक दल बनाने में लग गये, फलस्वरूप आज दो दर्जन से भी अधिक समाजवादी दल बने हुए हैं | जो अस्तित्वहीन हालत में हैं |
          डॉ. लोहिया के जेल, फावड़ा और वोट के आधार पर संगठन कार्य करे | इसके लिए अपनी शक्ति और सामर्थ्य को ध्यान में रख कर हम छोटी-छोटी इकाइयों का पहले गठन करें | यह इकाइयां गाँव, क़स्बा या तहसील का हो सकता हैं | हमें उस गाँव, कस्बे या तहसील के समस्याओं को ध्यान में रखते हुए वहीं पर रचना और संघर्ष के कार्यक्रम करने चाहिए | जब वहां के इकाइयों में इन कामों का नतीजा दिखाई दे तो जिले में इन कार्यों को पूरा विस्तार दिया जाए और इसी प्रकार से राज्य व्यापी संगठन खड़ा किया जाए | इसके लिए सभागारों से निकल कर जनता के बीच आना होगा और आम कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहन देकर दुसरे पंक्ति के नेता तैयार करना होगा | डॉ. लोहिया के एक सूत्री कार्यक्रम जैसे दाम बंधों, जाति तोड़ो, हिमालय बचाओ इत्यादि कार्यक्रमों के लिए अन्य सामान धर्मी दलों को भी साथ जोड़ा जा सकता हैं | संगठन निर्माण के लिए युवा, मजदूर किसान, अल्पसंख्यक, दलित, महिलाओं के बीच रहकर और उन्हीं के नेतृत्व में संघर्ष चलाकर संगठन को विस्तार दिया जाए |
          आज कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दल आम जनता के दुःख तकलीफों से मुह मोड़ कर वंशवाद और जातिवाद की राजनीति कर रहे हैं जिसके फलस्वरूप जनता उनसे दूर हो रही हैं और वो सिकुड़ते जा रहे हैं और अपना अस्तित्व भी बचाने में नाकामयाब हो रहे हैं | दूसरी ओर फासीवादी ताकतें भाजपा के नेतृत्व में पूरी तरह अपनी पकड़ मजबूत करता जा रहा है | संवैधानिक संस्थाओं पर हमले हो रहे हैं | जनतंत्र और आजादी खतरे में हैं | ऐसे में विपक्ष का खाली होता हुआ स्थान  सिर्फ समाजवादी नीतियों से ही भारा जा सकता हैं और यह तब संभव होगा जब हम कार्यकर्ताओं में मजबूत निष्ठां, विचार और संकल्प भर सकेंगे | युवाओं के बीच हमें काम करने की आवश्यकता अधिक हैं | युवा समाजवादी विचारधारा से नहीं जुड़ पा रहा है उन्हें हमें भरोसा दिलाना होगा कि समजावाद ही हर समस्या का समाधान कर सकता हैं और अधिक से अधिक युवाओं को नेतृत्व देना होगा |  एक आशावान व्यक्ति होने के नाते मुझे विशवास हैं कि समाजवादी कार्यकर्ता इस स्थान को भरने में सफल होंगे और समजावाद का स्वर्णकाल भविष्य में अवश्य आएगा |  

(लेखक वरिष्ठ समाजवादी नेता हैं)

Thursday, 6 June 2019

Official Language Vs Social Justice

(The language-question is again under discussion spotlight after the publication of the draft of National Education Policy (NEP) 2018. In the context, l recollect the day when of one of my articles titled ‘Official Language Vs Social Justice’, originally written in Hindi on the same subject, was to be presented at a five-day conference on ‘Indian Constitution and Social Justice’. The conference was held in Mysore under the joint auspices of Indian Institute of Advanced Study, Shimla and Dhwanyalok Center for Indian Studies, Mysore in 1995.
The session in which I was scheduled to present my article was to be chaired by the senior scholar of English literary criticism, Prof. CD Narasimhaiah. As I started reading my paper he got furious, naming me a Hindi fanatic! I was shocked. I however, pleaded to him and to the audience that I had already circulated the summery of my article in English for the benefit of non-Hindi speaking scholars. But Prof. Narasimhaiah was not convinced and insisted that l speak in English. I replied to him that I would have read my paper in Bangla or Tamil if I were a Bangla speaking or Tamil speaking person.
Prof. Mrinal Miri, IIAS’s director, intervened and suggested to me to make my presentation in Hindi as well as English. I read my paper in Hindi. As soon as I finished Prof. CD Narasimhaiah hurriedly spoke some sentences in Kannada and got up ending the session abruptly. No question-answer session followed. Later on in the day he came to me and submitted in an apologetic tone that he was not aware that I was a teacher of Hindi.
It was made clear from that incident that to be accepted in an ‘academic’ seminar, other than one on Hindi literature, one needs to tag an English version of the paper, whatever the original language might be!
However, the proceedings of that conference were brought out in book form titled ‘Social Justice and Constitution’ edited by veteran journalist Ajit Bhattacharjea. He included the English translation of my article in the book.
In the light of the controversy generated by NEP 2018 the same is given below for your kind reading and comments.-Author)
I
The pledge to make “social, economic and political justice,” that is ‘social justice’ available to all the citizens of the country, is the pledge expressed in the Preamble of the Indian Constitution. Constitution makers have made provisions to facilitate the availability of social justice to all people and groups, without “discrimination on the grounds of religion, race, caste, sex or place of birth”. The intention behind this arrangement is the creation of an egalitarian society. Ideas of social justice witnessed on the international political scene contain sharper and revolutionary perceptions as compared to the Indian Constitution. The revolutionary parties within India itself are not completely satisfied with this constitutional delineation of social justice. The scope of this paper does not allow one to go into the details of the other concepts of social justice.
The deprived and the oppressed sections of Indian society for whom the Constitution’s provision for social justice was specially formulated, really are the ones who are denied the same. The general opinion after forty-five years of the implementation of the Constitution is that the ‘development’ and the ‘progress’ which free India has made, has only resulted in making the rich, richer and the poor, poorer. The causes for this are complex and multifaceted. Significant among these is the constitutional acceptance given to English as the Official Language of the country. The Constitution makers obstructed the process of social justice in the very beginning by bestowing upon English the position of Official Language in the country though after independence, Gandhi voiced his apprehensions about this: “Unless the government and their secretariats take care the English language is likely to usurp the place of Hindustani. This must do infinite harm to the millions of Indians who would never be able to understand English.”1 In free India, Lohia after Gandhi, argued consistently that the language issue has a direct bearing upon the social justice and democratic process.
A long ‘Mahabharata’ has been fought on the multifaceted language problem in the country. But the entire focus of the discussions gets suffocated and killed in limiting the argument to merely Hindi versus English, and Hindi versus other Indian languages. Like the monkey in the fable who devoured the loaf while meting out ‘monkey-justice’ to the quarrelsome cats, English has kept winning at the cost of Indian languages which are unable to arrive at any solution among themselves.
English was given the status of the Official Language of India for the first fifteen years of the country’s independence. But the position has not changed till today. English has also achieved the position of a language which commands power and social status. Deeply responsible for this are those English-knowing elite who keep the common public away from socio-political processes. Also responsible for this are those who practice political games in the name of the language issue. Responsibility rests upon those ‘progressive’ thinkers too, who believe that English is necessary for the development of both capitalism as well as socialism. Commenting on such thinkers, Ram Vilas Sharma, the Marxist thinker and linguist, writes: “some progressive thinkers like to quote with pride Gandhi’s ideas on the subject of state formation on language basis. But they very conveniently ignore what Gandhi said about doing away with English. These thinkers represent those middle class intellectuals who are hopeful of being admitted into official positions at all-India level by allowing English to continue at the Centre”.2 Gandhi and Ram Vilas Sharma, both advocate the use of Hindi-Hindustani in the place of English. The reference to them has been made not to prove the validity of their argument in favour of Hindi-Hindustani, but in order to underline the fact that they both consider English to be a weapon in the hands of a particular class which they use against the remaining common public.
II
It was argued at the time of Independence that the Indian languages were, for the time being, incapable of functioning as vehicles of communication and knowledge. And English ‘as one of the major achievements made by the country during the foreign rule’, was capable of building up national integration and bringing the country at par with the international scene of science and technology. The first two Education Commissions, the Radhakrishnan Commission (1947) and the Kothari Commission (1966) agreed that Indian languages should be the medium of instruction at universities, so that the chasm between the English knowing elite and the common masses is obliterated. The advocates of English however refused to believe that English could be the cause for this gap. The progressive writer, Mulk Raj Anand, considering English to be synonymous with knowledge itself, said that the “brown-sahibs” apart, the country has a “sincere English-knowing intelligentsia” which can make social justice and human dignity possible not only at the national level but also at the international level. The intelligentsia, committed to giving concrete shape to the India of Nehru’s dream, cautions us against the usage of Indian languages, which they believe, confine us to being mere “suburbans, provincials and village idiots”.3 As per the wishes of this “sincere intelligentsia” consisting of scholars like Mulk Raj Anand and other supporters of the English language, most of the work in advanced education and research institutions (except the work being done in academies of Indian languages), is in the English language. Consequently, the maximum of research and scholarship in the country is done only in English language. The natural fallout of the situation is that English alone becomes the yardstick of excellence. Universities and institutions are laden with English texts and journals. This includes work done on the subject of social justice and revolution. All the political parties in India committed to the ideology of social justice carry out their work in the English language. There is hardly any national or regional political party which has its manifesto, policy etc. written down originally in Indian languages. This includes the party led by Ram Manohar Lohia who had pledged to do away with English “today and now” because it hampered social justice in the country. The Marxist parties inspired by the revolutionary goal, the highest form of social justice, carry out all their official proceedings in English. English, already endowed with the responsibility of unifying the country as a ‘nation state’ is also burdened with the responsibility of organizing ‘revolution’ in the country. Prakash Karat maintains that after the formation of states on language basis “one of the obstacles to communist leadership links between states could be the gradual displacement of English…”4
The mere knowledge of English has come to be accepted as the touchstone of knowledge for achieving distinctive positions in the field of education, administration, judiciary and defense services. The same is true in the private sector as well. But what has been the outcome of all this? The result is simply the formation of a powerful and well-cushioned elite class on the one hand, and the deprived, oppressed common public on the other. The masses are unable to comprehend complex ideas regarding humanism, liberalism, socialism, communism, nationalism, pluralism etc. and the elite are victims of alienation unable to identify with the cultural roots and the common man.
Language is a medium of exchanging views. In India, the English language performs this function only within a very limited circle. For the remaining people, its role is that of a barrier which has a deep and long-term effect in delaying the process of social justice. English, from the very beginning has been present as a dark shadow between the common man and the constitutional promise of social justice. Viewed in the light of Lohia’s words English divides the nation into “Two Castes” and to quote Rajni Kothari, into “Two Indias”: English knowing elite India and the poor, oppressed masses.
The ‘international language’ thus accomplishes the job of keeping the majority of India’s population away from the social and political processes. Since all projects, programs and plans are drafted in English by English-knowing people, the non-English knowing public is unable to partake in the conception and implementation of any of these programs and projects. Public opinion is limited to just elections. This, then, is the plight of the ‘largest democracy’ of the world – one, in which two to four percent people reign over the remaining ninety-eight percent.
III
It has been assumed that the rich indigenous experience and institutions, distanced from the elitist India are worthless for the work of ‘nation-building’. It is not merely a coincidence that Gandhi who supported the ‘local’ in form of village panchayats and Lohia upheld the same in the form of ‘Chowkhamba Raj’ were also opposed to English and those leaders who uphold ‘universal’ in the form of centralized governance also uphold the use of English in the country. Nehru maintained that “A village normally speaking is backward intellectually and culturally and no progress can be made from a backward environment. Narrow minded people are much more likely to be untruthful and violent”.3 Ambedkar too, wrote off the villages as “a den of ignorance and illiteracy, a habitat which perpetuates both physical and mental ill health”.6 Thus responsibility of nation-building was placed on the progressive intelligentsia whose minds have been illuminated by English. However the class interest which lies behind this apparent national interest is no more a concealed truth.
The acceptance of English as the Official Language by the supporters of the language and our Constitution-makers has proved to be the secret door from which the entry of the neo-imperialism has been made possible. The New Economic Policies, liberalisation, the GATT agreement etc. is a slap on the face of the same “sincere English-knowing intelligentsia” who upheld the use of English in the name of social justice, human dignity, national integration, abundance of knowledge, international relations and so on. The extent to which English has contributed to the wisdom within the country, is proven by the fact that the larger section of the intelligentsia is content with simply circling around the synthetic-cosmetic socio-cultural and economic-political questions thrown up by the developed nations.
The documents regarding the blue-prints of the future of India is being prepared abroad by the officials in world institutions. The ‘Bhagiraths’ who claimed to flood India with the Ganges of wisdom brought in through the medium of English are now searching for their new roles in this new-fangled press-button technique of nation building. The country is endangered once again by the shadows of slavery. This time, tagging alongwith political servility is the threat of a sub-culture. Will the intellectuals who propound ‘universal’ ever pause and think about the possibilities of the ‘local’? This is the area in which live crores and crores of people whose hands have not yet reached the basic requirements of life and whose feet have been uprooted from their soil. These are the people whose intervention and participation in the socio-political processes have been almost blocked.
If those who plead for the alternative ideology of ‘humane governance’ or those thinkers and leaders who strive towards the ideology of ‘revolutionary democracy’ actually wish to make people’s participation in the socio-political processes a reality, then they must learn from the mistakes made in the past. The philosophy and politics of the liberation of the masses is possible only in the languages used by the masses. This is the bare, hard lesson of which history is the proof.
REFERENCES
  1. Gandhi, Thoughts on National Language, Navjivan Publishing House, Ahmedabad, 1956, p. 168.
  2. Ram Vilas Sharma, “Bhasha Niti aur Gandhiji”, Pratipaksh, New Delhi, June 1990.
  3. Mulk Raj Anand, “A Plea for English for Higher Education”, Language and Society in India, Indian Institute of Advanced Study, Shimla, 1968.
  4. Prakash Karat, Language and Nationality Politics in India, Orient Longman, New Delhi, 1973, p. 73.
  5. Pyare Lal, Towards New Horizons, Navjivan Publishing House, Ahmedabad, 1959, p. 5.
  6. Dharam Pal, Constituents Assembly Debates on Panchayati Raj, Award, New Delhi, 1961.
Dr. Prem Singh, Dept. of Hindi, University of Delhi

Thursday, 16 May 2019

कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की विरासत


प्रेम सिंह
भारतीय समाजवादी आंदोलन के पितामह आचार्य नरेंद्रदेव की अध्यक्षता में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (सीएसपी) के गठन (17 मई 1934,पटना) के समय दो लक्ष्य स्पष्‍ट थे: देश की आजादी हासिल करने और समाजवादी व्यवस्था कायम करने की दिशा में संगठित प्रयासों को तेज करना। इन दोनों लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सच्ची साम्राज्यवाद विरोधी चेतना को मजबूत बनाना जरूरी था। 21-22 अक्तूबर 1934 को बंबई में हुए अखिल भारतीय कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के पहले सम्मेलन में,जहां समाजवादी समाज बनाने की दिशा में विस्तृत कार्यक्रम की रूपरेखा स्वीकृत की गई, जेपी ने कहा था ‘‘हमारा काम कांग्रेस के भीतर एक सच्ची साम्राज्यवाद विरोधी संस्था विकसित करने की नीति से अनुशासित है।’’जैसा कि आगे चल कर देखने में आता है, सीएसपी के संस्थापक नेता मार्क्‍सवाद और गांधीवाद के साथ फलप्रद संवाद बना कर समाजवादी व्यवस्था की निर्मिती करने के पक्षधर थे। गांधी ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के गठन का विरोध किया था। लेकिन संस्थापक नेताओं ने उलट कर गांधी पर हमला नहीं बोला। दोनों के बीच संबंध और संवाद गांधी की मृत्यु तक चलता रहा। उसके बाद भी यह सिलसिला रुका नहीं : कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना पर ‘‘गांधीवाद अपनी भूमिका पूरी कर चुका है’’ कहने वाले जेपी सर्वोदय में शामिल हुए और लोहिया ने गांधीवाद की क्रांतिकारी व्याख्या प्रस्तुत की। इस क्रम में आजादी के बाद डाॅ. अंबेडकर से भी संवाद कायम किया गया, हालांकि बीच में ही अंबेडकर की मृत्यु हो गई।
सीएसपी के संस्थापक नेता मार्क्‍सवादी थे, लेकिन अंतरराष्‍ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन के तहत कोरे कम्युनिस्ट नहीं थे। वे स्वतंत्रता आंदोलन के बीचों-बीच थे; उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में लंबी जेलें काटी थीं। संस्थापक नेताओं के सामने यह स्पष्‍ट था कि स्वतंत्रता (देश, समाज, व्यक्ति की) सच्ची साम्राज्यवाद विरोधी चेतना की पूर्व-शर्त है।
बाह्य आदेशों पर चलने वाला समाजवाद, एक पार्टी की तानाशाही वाला ‘क्रांतिकारी’ लोकतंत्र सीएसपी के संस्थापक नेताओं को काम्य नहीं था। आजादी के बाद कांग्रेस से अलग सोशलिस्ट पार्टी बनाने का निर्णय लोकतंत्र और संसदीय प्रणाली की मजबूती की दिशा में उठाया गया दूरगामी महत्व का निर्णय था। सोशलिस्ट नेताओं के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सेदारी रणनीतिक नहीं थी। भारतीय सामाजिक और आर्थिक संरचना में हाशिए पर धकेले गए तबकों - दलित, आदिवासी, पिछड़े,महिलाएं, गरीब मुसलमान - की सक्रिय राजनीतिक-सांस्कृतिक-बौद्धिक हिस्सेदारी से समाजवाद की दिशा में बढ़ने की पेशकश में ऐसे स्वतंत्र राष्‍ट्र का स्वप्न निहित था जो फिर कभी गुलाम नहीं होगा। कांग्रेस के नेताओं ने गांधी के कहने बावजूद कांग्रेस को लक्ष्य-प्राप्ति के बाद विसर्जित नहीं किया; लेकिन सोशलिस्ट नेताओं ने शुरुआती उहापोह के बाद कांग्रेस के बाहर आकर कांग्रेस को अपनी तरफ से तिलांजलि दे दी। दो दशक के लंबे संघर्ष के बाद वे कांग्रेस की सत्ता हिलाने में कुछ हद तक कामयाब हुए। सर्वोदय में चले गए जेपी के आपाताकल विरोधी आंदोलन की अन्य कोई उपलब्धि न भी स्वीकार की जाए, लोकतंत्र की पुनर्बहाली उसकी एक स्थायी उपलब्धि है, जो आज तक हमारा साथ दे रही है। पिछले करीब तीन दशकों से चल रहे नवसाम्राज्यवादी हमले की चेतावनी सबसे पहले समाजवादी नेता/विचारक किशन पटनायक ने दी थी।
वर्तमान भारतीय राजनीति के सामने भी दो लक्ष्य हैं : नवसाम्राज्यवादी हमले से आजादी की रक्षा और समाजवादी समाज की स्थापना। यह काम भारत के समाजवादी आंदोलन की विरासत से जुड़ कर ही हो सकता है, जिसकी बुनियाद 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना के साथ पड़ी थी। इस संकल्प और पहलकदमी के बिना 82वें स्थापना दिवस का उत्सव रस्मअदायगी होगा। हालांकि रस्मअदायगी के लिए किए जाने वाले कार्यक्रमों के पीछे कुछ न कुछ भावना होती है; लेकिन इसका नुकसान बहुत होता है। कांग्रेस-भाजपा से लेकर अन्ना हजारे,केजरीवाल-सिसोदिया, रामदेव-श्रीश्री, वीके सिंह जैसों तक आवाजाही करने वाले सभी समाजवादी हैं - इसका नई पीढ़ी को केवल नकारात्मक संदेश जाता है। यही कारण है कि समाजवादी आंदोलन में नए युवक-युवतियां नहीं आते हैं। उन्हें यही लगता है कि समाजवाद के नाम पर ज्यादातर लोग निजी राजनीति का कारोबार चलाने वाले हैं। यह कारोबार वैश्विक स्तर पर जारी नवउदारवादी कारोबार के तहत चलता है और इस तरह नवसाम्राज्‍यवाद का शिकंजा और मजबूत होता जाता है।
इस मंजर पर सर्वेश्‍वर दयाल सक्सेना की कविता, जो उन्होंने लोहिया के निधन पर लिखी थी, की पहली पंक्तियां स्मरणीय हैं : लो, और तेज हो गया उनका रोजगार/ जो कहते आ रहे/ पैसे लेकर उतार देंगे पार।
(21 अप्रैल 2016)

Friday, 10 May 2019

नरेंद्र मोदी : पात्रता की पड़ताल



प्रेम सिंह

नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में अपनी पात्रता के पक्ष में विभिन्न कोनों/स्रोतों से लगातार स्वीकृति और समर्थन हासिल किया है. हालांकि पांच साल प्रधानमंत्री रह चुकने के बाद काफी लोग मोदी-मोह से बाहर आ चुके हैं. फिर भी यह हवा बनाई जा रही है कि अगले प्रधानमंत्री मोदी ही होंगे. ज्यादातर मतदाता इस हवा के साथ हैं या नहीं, इसका पता 23 मई को चुनाव नतीजे आने पर चलेगा. फिलहाल की सच्चाई यही है कि टीम मोदी, कारपोरेट घराने, आरएसएस/भाजपा, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए), मुख्यधारा मीडिया और 'स्वतंत्र' मोदी-समर्थक उनकी एकमात्र पात्रता के समर्थन में डटे हैं. नरेंद्र मोदी की पात्रता के कोरसगान में खुद नरेंद्र मोदी का स्वर सबसे ऊंचा रहता है. मोदी की पात्रता के प्रति यह जबरदस्त आग्रह अकारण नहीं हो सकता है. इस परिघटना के पीछे निहित जटिल कारणों को सुलझा कर रखना आसान नहीं है. फिर भी मुख्य कारणों का पता लगाने कोशिश की जा सकती है.  

उन कमजोर आत्माओं को इस विश्लेषण से अलग गया है, जो अभी भी मोदी को अवतार मानने के भावावेश में जीती हैं. साधारण मेहनतकश जनता को भी शामिल नहीं किया गया है, जो उसका शोषण करने वाले वर्ग द्वारा तैयार आख्यान का अनुकरण करने को अभिशप्त है. इस लेख में मोदी की समस्त गलत बयानियों (जिनमें वैवाहिक स्टेटस से लेकर शैक्षिणक योग्यता तक की गईं गलतबयानियां शामिल हैं), मिथ्या कथनों, अज्ञान, अंधविश्वास और घृणा के सतत प्रदर्शन के बावजूद उनकी पात्रता का समर्थन करने वालों की पड़ताल की कोशिश है. देश-विदेश में फैले ये मोदी-समर्थक समाज के पढ़े-लिखे, सफल और सशक्त लोग हैं. या उस पथ पर अग्रसर हैं.

पहले कोरपोरेट घरानों को लें. मोदी का अपने पिछले चुनाव प्रचार में कारपोरेट घरानों के अकूत धन का इस्तेमाल करना, बतौर प्रधानमंत्री अपनी छवि-निर्माण में अकूत सरकारी धन झोंकना, जियो सिम का विज्ञापन करना, नीरव मोदी का विश्व आर्थिक मंच के प्रतिनिधि मंडल में उनके साथ शामिल होना, विजय माल्या और मेहुल चौकसी का सरकारी मशीनरी की मदद से देश छोड़ कर भागना, राजनीतिक पार्टियों को मिलाने वाली कारपोरेट फंडिंग को गुप्त रखने का कानून बनाना, लघु व्यापारियों और छोटे किसानों की आर्थिक कमर तोड़ने के लिए नोटबंदी करना, महज कागज़ पर मौजूद रिलायंस जियो इंस्टिट्यूट को 'एमिनेंट' संस्थान का दर्ज़ा देना, विमान बनाने का 70 साल का अनुभव रखने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम हिंदुस्तान एअरोनाटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के बजाय राफेल सौदे को हथियाने की नीयत से बनाई गई कागज़ी कंपनी रिलायंस डिफेंस लिमिटेड को फ़्रांसिसी कंपनी डसाल्ट का पार्टनर बनाना, विभिन्न सरकारी विभागों में संयुक्त सचिव के रैंक पर निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों की सीधी नियुक्ति करना, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों सहित प्रत्येक क्षेत्र में निजीकरण की प्रक्रिया को बेलगाम रफ़्तार देना ... जैसी अनेक छवियां और निर्णय यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि कारपोरेट घरानों के लिए मोदी की पात्रता स्वयंसिद्ध है.

आरएसएस/भाजपा की नज़र में मोदी की पात्रता के बारे में इतना देखना पर्याप्त है कि उनके किसी नेता ने मोदी की कारपोरेटपरस्त नीतियों का परोक्ष विरोध तक नहीं किया है. क्योंकि आरएसएस/भाजपा संतुष्ट हैं कि मोदी ने दिल्ली में एक हजार करोड़ की लागत वाला केंद्रीय कार्यालय बनवा दिया है, नागपुर मुख्यालय गुलज़ार है और बराबर राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय खबरों में रहता है, वर्तमान और भविष्य की सुरक्षा के लिए अकूत दौलत का इंतजाम कर दिया है. आरएसएस विचारक मग्न हैं कि मोदी के राज में वे सरकारी पदों-पदवियों-पुरस्कारों के अकेले भोक्ता हैं. पूरे संघ परिवार ने स्वीकार कर लिया है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का कमल मोदी के नेतृत्व में भ्रष्ट और अश्लील पूंजीवाद के कीचड़ में खिलता है. यह वही आरएसएस/भाजपा हैं जिन्होंने दिवंगत मोहम्मद अली जिन्ना को सेकुलर बताने पर लालकृष्ण आडवाणी से पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा ले लिया था. लेकिन मोदी के पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ से बिना राजकीय कार्यक्रम के अचानक जाकर मिलने पर कोई एतराज नहीं उठाया. क्योंकि वे समझते हैं कि मोदी 'मुस्लिम तुष्टिकरण' के लिए नवाज़ शरीफ से मिलने नहीं गए थे. वे जरूर किन्हीं बड़े व्यापारियों का हित-साधन करने गए होंगे!      

मोदी के समर्थक पढ़े-लिखे, सफल और सशक्त लोगों को गहरा नशा है कि मोदी ने मुसलमानों को हमेशा के लिए ठीक कर दिया. जब मोदी पाकिस्तान और आतंकवादियों को ठिकाने लगा देने की बात करते हैं, तब उनके समर्थकों के जेहन में मोदी की तरह भारतीय मुसलमान ही होते हैं. उन्होंने मोदी से सीख ली है, जिसे वे दुर्भाग्य से अपने बच्चों में भी संक्रमित कर रहे हैं, कि मुसलामानों से लगातार घृणा में जीना ही जीवन में 'हिंदुत्व' की उपलब्धि है, और वही 'सच्ची राष्ट्रभक्ति' भी है. इन लोगों को मोदी की पात्रता का अंध-समर्थक होना ही है. यह बताने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि 'कांग्रेसी राज' में शिक्षा, रोजगार और व्यापार की सुविधाएं पाने वाला यह मध्यवर्गीय तबका नवउदारीकरण के दौर में काफी समृद्ध हो चुका है.      

थोड़ी बात नरेंद्र मोदी की करें कि वे अपनी पात्रता के बारे में क्या सोचते हैं? इधर एक फिल्म एक्टर को दिए अपने इंटरव्यू में मोदी ने कहा बताते हैं कि वे कभी-कभी कुछ दिनों के लिए जंगल में निकल जाते थे. वहां जाकर वे केवल अपने आप से बातें करते थे. उनका जुमला 'मेरा क्या है, जब चाहूं झोला उठा कर चल दूंगा' काफी मशहूर हो चुका है. यानी वे इन बातों से अपने वजूद में वैराग्य भाव की मौजूदगी जताते हैं. भारत समेत पूरी दुनिया के चिंतन में वैराग्य की चर्चा मिलती है. शमशान घाट का वैराग्य मशहूर है. कुछ ख़ास मौकों और परिस्थितियों में जीवन की निस्सारता का बोध होने पर व्यक्ति में वैराग्य भाव जग जाता है. वैराग्य की भावदशा में व्यक्ति सांसारिकता से हट कर सच्ची आत्मोपलब्धि (रिकवरी ऑफ़ ट्रू सेल्फ) की ओर उन्मुख होता है. हालांकि वह जल्दी ही दुनियादारी में लौट आता है. लेकिन इस तरह का क्षणिक वैराग्य और उस दौरान आत्मोपलब्धि का प्रयास हमेशा निरर्थक नहीं जाता. व्यक्ति अपनी संकीर्णताओं और कमियों से ऊपर उठते हुए जीवन को नए सिरे से देखने और जीने की कोशिश करता है.

लगता यही है कि नरेंद्र मोदी के आत्मालाप ने उन्हें केवल आत्मव्यामोहित बनाया है. वरना सामान्यत: इंसान के मुंह से कोई गलत तथ्य, व्याख्या अथवा किसी के लिए कटु वचन निकल जाए तो वह बात उसे सालती रहती है. वह अपनी गलती के सुधार के लिए बेचैन बना रहता है. अवसर पाकर अपने ढंग से गलती का सुधार भी करता है. मोदी के साथ ऐसा नहीं है. वे एक अवसर पर अज्ञान, मिथ्यात्व और घृणा से भरी बातें करने के बाद उसी उत्साह से अगले अवसर के आयोजन में लग जाते हैं. ज़ाहिर है, वे अपनी नज़र में अपनी पात्रता को संदेह और सवाल से परे मानते हैं. इसीलिए उन पर संदेह और सवाल उठाने वालों पर उन्हें केवल क्रोध आता है. मोदी ने अपना यह 'गुण' अपने समर्थकों में भी भलीभांति संक्रमित कर दिया है. दोनों संदेह और सवाल उठाने वाले 'खल' पात्रों को ठिकाने लगाने में विश्वास करते हैं.   

मोदी सबसे पहले खुद अपने गुण-ग्राहक हैं. उनकी कामयाबी यह है कि अपने 'गुणों' को प्रचारित-प्रसारित करने के लिए वे अभी तक के सबसे बड़े इवेंट मैनेजर बन कर उभरे हैं. कहना न होगा कि अपने 'गुणों' को प्रचारित-प्रसारित करने का यह फन उनके कारपोरेटपरस्त चरित्र से अभिन्न है. मोदी आत्ममुग्धता में यह मान सकते हैं कि कारपोरेट घराने उनके खिलोने हैं. जबकि सच्चाई यही है कि वे खुद कारपोरेट घरानों के हाथ का खिलौना हैं. साहित्य, विशेषकर यूरोपीय उपन्यास में, आत्मव्यामोहित नायकों की खासी उपस्थिति मिलती है. अपनी समस्त आत्ममुग्धता के बावजूद वे वास्तव में यथास्थितिवाद का खिलौना मात्र होते हैं. इन नायकों की परिणति गहरे अवसाद और कई बार आत्महत्या में होती है. बहरहाल, जिस तरह कारपोरेट पूंजीवाद के लिए मोदी की पात्रता स्वयंसिद्ध है, मोदी के लिए भी वैसा ही है - वे कारपोरेट पूंजीवाद के स्वयंसिद्ध सर्वश्रेष्ठ पात्र हैं.             

मोदी की पात्रता की स्वीकृति का एक महत्वपूर्ण कोना/स्रोत अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति का है. अमेरिका, रूस, इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, चीन जैसे आर्थिक, राजनीतिक और सैन्य दबदबे वाले देश दुनिया के सत्ता पक्ष और विपक्ष के महत्वपूर्ण नेताओं की पूरी जानकारी रखते हैं. ऐसा नहीं है कि ये देश मोदी के इतिहास और विज्ञान के ज्ञान के बारे में नहीं जानते हैं. मोदी के साम्प्रदायिक फासीवादी होने समेत उन्हें सब कुछ पता है. अमेरिका ने गुजरात के 2002 के साम्प्रदायिक दंगों को धार्मिक स्वतंत्रता का हनन बताते हुए 2005 में मोदी के अपने देश में प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा दिया था. ब्रिटेन ने 2002 के दंगों के बाद गुजरात की मोदी सरकार से 10 साल तक आधिकारिक सम्बन्ध तोड़ लिए थे. अन्य कई देशों ने दंगों के लिए नरेंद्र मोदी की तीखी भर्त्सना की थी.

लेकिन जैसे ही मनमोहन सिंह के बाद निगम पूंजीवाद के स्वाभाविक ताबेदार नेता की खोज शुरु हुई, उनकी नज़र मोदी पर गई जो पहले से गुजरात में नवउदारवाद की विशेष प्रयोगशाला चला रहे थे और इस नाते कुछ देशी कारपोरेट घरानों की पहली पसंद बन चुके थे. एक विदेशी प्रतिनिधि मंडल ने प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी से दिल्ली में मुलाकात की. प्रधानमंत्री बनने पर अमेरिका ने उनका वीजा बहाल कर दिया. राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उन्हें कांग्रेस का संयुक्त अधिवेशन संबोधित करने के लिए बुलाया और अपने साथ प्राइवेट डिनर का मौका प्रदान किया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण पर ओबामा भारत के गणतंत्र दिवस पर विशिष्ट अतिथि के रूप शामिल हुए. आगे की कहानी सबको मालूम है. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व में खुदरा से लेकर रक्षा क्षेत्र तक - सब कुछ सौ प्रतिशत विदेशी निवेश के लिए खोल दिया गया. दरअसल, नवसाम्राज्यवादी शक्तियों का एक एजेंडा भारत से साम्राज्यवाद विरोध की चेतना और विरासत को नष्ट करना है. ये शक्तियां जानती हैं आरएसएस और मोदी के सत्ता में रहने से यह काम ज्यादा आसानी और तेजी से हो सकता है. नवसाम्राज्यवादी शक्तियों की नज़र में मोदी की पात्रता का यह विशिष्ट आयाम गौरतलब है.   

मोदी की पात्रता की पड़ताल करने वाली यह चर्चा अधूरी रहेगी अगर इसमें प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष खेमे की भूमिका को अनदेखा किया जाए. इस विषय में विस्तार में जाए बगैर केवल इतना कहना है कि इंडिया अगेंस्ट करप्शन (आईएसी) के तत्वावधान में चले भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले सारा सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य गड्डमड्ड कर दिया था. उसकी पूरी तफसील 'भ्रष्टाचार विरोध : विभ्रम और यथार्थ' (वाणी प्रकाशन, 2015) पुस्तक में दी गयी है. नवउदारवाद के वैकल्पिक प्रतिरोध को नष्ट करके उसे (नवउदारवाद को) मजबूती के साथ अगले चरण में पहुँचाने के लक्ष्य से चलाया गया वह आंदोलन नवउदारवाद के अगले चरण के नेता को भी ले आया. विचारधारात्मक नकारवाद के उस शोर में सरकारी कम्युनिस्टों ने केजरीवाल नाम के एनजीओ सरगना में लेनिन देख लिया था और उसे मोदी का विकल्प बनाने में जुट गए थे. (मोदी के कांग्रेस-मुक्त भारत के आह्वान के पहले ही भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के कर्ताओं ने अपनी तरफ से कांग्रेस का मृत्यु-लेख लिख दिया था.) इस तरह विकल्प का संघर्ष भी अगले चरण में प्रवेश कर गया! भारतीय राजनीति में हमेशा के लिए यह तय हो गया कि अब लड़ाई नवउदारवाद और नवउदारवाद के बीच है. अर्थात नवउदारवाद के साथ कोई लड़ाई नहीं है. जो भी झगड़ा है वह जाति, धर्म, क्षेत्र, परिवार और व्यक्ति को लेकर है. या फिर देश के संसाधनों और श्रम की नवउदारवादी लूट में ज्यादा से ज्यादा हिस्सा पाने को लेकर है. वही पूरे देश में हो रहा है. यह सही है कि मोदी भ्रष्ट और अश्लील पूंजीवाद का खिलौना भर हैं, लेकिन इस रूप में वे भारत के शासक वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के शिक्षक और सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष हैं) 

कांग्रेस-विरोध का आख्यान : सच और झूठ की पहचान!



प्रेम सिंह

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नरेंद्र मोदी ने 2014 के चुनाव प्रचार के दौरान खासतौर तौर पर दो बातें जोर देकर कही थीं : पहली, पिछले 65 सालों के कांग्रेसी राज में देश में कुछ नहीं हुआ. 65 साल की नाकामियों के लिए कांग्रेस को कोसते हुए उन्होंने दावा किया कि वे मात्र 65 दिन में पिछले 65 साल का काम पूरा कर डालेंगे. केवल उन्हें सत्ता दे दी जाए. दूसरी, वे विदेशों में जमा देश का काला धन वापस लाएंगे और प्रत्येक भारतीय के खाते में 15 लाख रूपया जमा कराएंगे. प्रत्येक भारतीय के खाते में 15 लाख रूपया जमा कराने के वादे को खुद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह एक चुनावी जुमला बता चुके हैं. लेकिन 65 साल के कांग्रेसी राज की नाकामी को लेकर मोदी और इस विषय पर उनका अंध-समर्थन करने वालों ने एक पूरा आख्यान गढ़ कर तैयार कर दिया है. ये मोदी-समर्थक केवल आरएसएस के सदस्यों तक सीमित नहीं हैं. वे बड़ी संख्या में पूरे देश में और विदेश में फैले हैं. पिछले चुनाव प्रचार से लेकर अभी के चुनाव प्रचार तक मोदी ने प्रत्येक अवसर, चाहे वह किसी भी विषय से सबंधित रहा हो, कांग्रेस विरोध का अवसर बना लिया है. स्वतंत्रता सेनानी और भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को इस आख्यान का 'खलनायक' बनाया गया है. 'नायक' की भूमिका में खुद मोदी हैं.

इस आख्यान के शुरू में ही समर्थकों द्वारा यह संदेश देने की कोशिश की गई कि देश को असली आजादी मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर मिली है. इसके गहरे निहितार्थ हैं. यानी कांग्रेस ने आज़ादी की लड़ाई नहीं लड़ी. वह देश पर एक बोझ है. लिहाज़ा, भारत को कांग्रेस-मुक्त किया जाना चाहिए. भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के कर्ताओं और समर्थकों ने भी यह धारणा व्यक्त की कि कांग्रेस भारत से समाप्ती की ओर है. इस धारणा के पीछे भी समझ यही थी कि आज़ादी के संघर्ष, मूल्यों और विचारधारा को तिलांजलि देने का समय आ गया है. हालांकि आज़ादी की चेतना से कांग्रेस खुद काफी पहले रिश्ता तोड़ चुकी थी, लेकिन उसके खोखल को भी बर्दाश्त करने को ये लोग तैयार नहीं थे. बहरहाल, इस आख्यान के तहत कश्मीर से लेकर रोजगार तक, देश की तमाम समस्याओं के लिए कांग्रेस पर दोषारोपण किया जाता है. मौजूदा सरकार की गलत नीतियों और फैसलों पर आवाज़ उठाने वालों को कह दिया जाता है कि जब कांग्रेसी राज में यह सब होता था तब वे कहां थे? मोदी और उनके मंत्रिमंडल के महत्वपूर्ण लोगों ने न केवल संविधान को लेकर अनर्गल बयान दिए हैं, रोजगार समेत अर्थव्यवस्था सम्बंधी विभिन्न आंकड़ों के बारे में भी बार-बार गलत और भ्रमित करने वाले बयान दिए हैं. लेकिन मोदी-समर्थक सब कुछ 65 साल के कांग्रेस राज के मत्थे मढ़ कर मोदी और अपने को सही होने का प्रमाणपत्र दे देते हैं. अगर कोई 2014 के बाद की समस्याओं के लिए मोदी और उनकी सरकार पर सवाल उठाता है या पूछता है कि मोदी ने सत्ता मिलने पर 65 दिनों में तस्वीर बदल देने का वादा किया था, तो इस आख्यान के तहत उसे तुरंत देशद्रोही घोषित कर दिया जाता है. मोदी और उनके समर्थकों का कांग्रेस-विरोध का महज पांच साल में गढ़ा गया आख्यान मोदी सरकार की समस्त संविधान और जन-विरोधी नीतियों, गलतबयानियों, झूठों के बावजूद प्रभावी बना हुआ है.   

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मोदी और उनके समर्थकों द्वारा गढ़े गए इस आख्यान के पहले भाजपा ने एक राजनीतिक पार्टी के बतौर कभी यह नहीं कहा था कि देश में पिछले 65 सालों में कुछ नहीं हुआ है. जनसंघ और बाद में भाजपा के शीर्ष नेताओं ने अक्सर नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक, कांग्रेसी नेताओं की भूरी-भूरी प्रशंसा की है. नेहरू के प्रशंसक अटलबिहारी वाजपेयी ने इंदिरा गांधी को दुर्गा कह कर उनकी दृढ़ इच्छा शक्ति के प्रति सम्मान प्रकट किया था. भाजपा की पितृसंस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी कभी ऐसा दावा नहीं किया. यह एक खुली सच्चाई है कि आरएसएस की परवरिश जनसंघ से ज्यादा कांग्रेसी कांख में हुई है. उसने समय-समय पर चुनावों में कांग्रेस का समर्थन करके कर्ज़ भी चुकाया है.

यह तथ्यत: गलत है कि 2014 के पहले देश में केवल कांग्रेस का शासन रहा है. 20वीं और 21वी सदी के संधि-काल में 6 साल तक वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपानीत राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार रही है. उसके पहले भी केंद्र और राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें रही हैं. दरअसल, बहुदलीय संसदीय लोकतंत्र और संघीय व्यवस्था वाले देश में ज्यादा समय तक एक ही पार्टी की सरकार रहने के बावजूद नाकामियों का ठीकरा अकेले उस पार्टी के सिर नहीं फोड़ा जा सकता. बहुदलीय संसदीय लोकतंत्र में उपलब्धियां और कमियां साझा होती हैं. मोदी के मुताबिक अगर कांग्रेस नाकाम और देश का अहित कर रही थी, तो इसकी उतनी ही जिम्मेदारी उस दौरान सक्रिय राजनीतिक पार्टियों और उनके नेताओं की भी बनती है. क्योंकि वे वैसी सरकार पर सही नीतियों के लिए दबाव बनाने अथवा उसे चुनावों में अपदस्थ करने में नाकाम रहे. अगर यह मान लिया जाए कि कांग्रेस के शासन में कुछ नहीं हुआ, या सब गलत हुआ, तो यह देश की राष्ट्रीय नाकामी का परिचायक है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जो अपने स्थापना काल से 'राष्ट्र-निर्माण' के काम में लगा हुआ है, भी उस नाकामी में शामिल माना जायेगा.

आज़ादी के बाद के लोकतांत्रिक भारत की 65 साल की उपलब्धियां गिनाने से सूची बहुत लंबी हो जाएगी. आज़ादी के बाद संवैधानिक और लोकतांत्रिक संस्थाओं, जिन्हें मोदी सरकार ने काफी हद तक क्षतिग्रस्त कर दिया है, के अलावा शिक्षा, शोध, साहित्य, कला, विज्ञान, वाणिज्य आदि से सम्बद्ध संस्थाओं का बड़े पैमाने पर निर्माण हुआ. पूरी दुनिया के साथ कूटनीतिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक सम्बन्ध कायम किये गए. आधुनिक विकास के लिए जरूरी सामग्री के उत्पादन और उपकरणों के निर्माण के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का विशाल ढांचा खड़ा किया गया. यातायात के लिए केंद्रीय रेलसेवा और प्रत्येक राज्य में पथ परिवहन प्रणाली के तहत बस सेवा का विस्तार किया गया. खेती के लिए सिंचाई, बीज, खाद, आधुनिक उपकरण एवं तकनीक आदि की सुविधाएं हासिल करने का प्रयास किया गया. बड़े पैमाने पर स्कूलों-कालेजों-विश्वविद्यालयोंके साथ स्टेडियमों और खेल परिसरों का निर्माण किया गया. मेडिकल कॉलेज, अस्पताल और प्रोद्योगिकी संस्थान बनाये गए. सेना के तीनों अंगों को मज़बूती और विस्तार दिया गया. ...

इस आख्यान की सच्चाई की पड़ताल के लिए दो स्थितियों को आमने-सामने रख कर देखते हैं. पहली, दिल्ली देश की राजधानी है. यहां तीन-चौथाई आबादी के लिए नागरिक सुविधाओं का अभाव है, सघन और गंदी बस्तियों की भरमार है, छोटे बच्चे-बच्चियां तरह-तरह के खतरनाक पेशों में खटते हैं, पूरे शहर में ट्रैफिक की लाल बत्तियों पर करतब दिखा कर भीख मांगते हैं, पिछले दिनों पूर्वी दिल्ली में तीन बहनों (मानसी 8 साल, शिखा 4 साल, पारो 2 साल) की भूख से मौत हो गई थी ... इस या ऐसी किसी स्थिति की तरफ ध्यान दिलाने पर मोदी और उनके समर्थक बिना शंका कहेंगे कि यह सब 65 साल के कांग्रेसी राज की वजह से है. अब एक दूसरी स्थिति पर नज़र डालते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने परिधानों से लेकर विज्ञापनों और विदेशी दौरों से लेकर जनसभाओं के आयोजनों पर अरबों-खरबों रुपया खर्च करते हैं. अगर कांग्रेसी राज में कुछ नहीं हुआ था तो मोदी यह दौलत कहां से लाते हैं? दूसरे शब्दों में, पहली स्थिति के लिए कांग्रेसी राज जिम्मेदार है तो दूसरी स्थिति, प्रधानमंत्री का ठाट-बाट, भी कांग्रेसी राज की देन है. दरअसल, मोदी और उनके समर्थक कांग्रेस यानी नवउदारवाद का काम ही आगे बढ़ा रहे हैं. डॉ. मनमोहन सिंह, ऊंचे पाए के अर्थशास्त्री होने के नाते कारपोरेट की जो सेवा शास्त्रीय ढंग से कर रहे थे, मोदी वह सेवा ब्लाइंड खेल कर करते हैं. नोटबंदी और अन्य कई अवसरों पर उनके 'नए भारत' के अर्थशास्त्रियों की झलक देश और दुनिया देख ही चुकी है.     

उपरोक्त तथ्यों और विश्लेषण के मद्देनज़र कह सकते हैं कि मोदी और उनके समर्थकों द्वारा गढ़ा गया कांग्रेसी राज की नाकामी का आख्यान झूठ पर टिका है. यह माना जा सकता है कि यह सब उद्यम अपर्याप्त था. यह भी माना जा सकता है कि वह उद्यम गलत नीतियों और नज़रिए के तहत किया गया था. लेकिन पिछले 65 सालों में कोई उद्यम हुआ ही नहीं, यह कहना या मानना झूठ में जीने के सिवाय कुछ नहीं है. कहा जाता है झूठ के पांव नहीं होते. लेकिन मोदी और उनके समर्थकों का यह झूठ पिछले पांच सालों से पांव जमा कर चल रहा है. इस परिघटना की गंभीर पड़ताल अभी तक किसी ने नहीं की है.

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इस लेख में इस परिघटना को नवउदारवाद की अपनी गतिकी (डायनामिक्स) के सन्दर्भ में समझने की कोशिश की गई है. हालांकि समझने के अन्य संदर्भ भी हो सकते हैं. कोई व्यवस्था जब अपने पांव जमा लेती है तो उसकी अपनी गतिकी विकसित हो जाती है. वह अपने को विरोध की वास्तविक चुनौती से बचाने के लिए अपने भीतर से ही विरोध का आंदोलन फेंक सकती है, जिसमें अलग-अलग मान्यताओं वाले स्वर एक मंच पर शामिल हो सकते हैं. 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' (आईएसी) के तहत चला भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन नवउदारवाद ने अपने बचाव और अगले चरण में अधिक मज़बूती पाने के लिए अपने गर्भ से पैदा किया था. इसमें एक से एक सयाने लोग शामिल थे. 'देश में मोदी और दिल्ली में केजरीवाल' को जिताने वाले साथ-साथ थे. उसी आंदोलन से आरएसएस/भाजपा का नया अवतार पैदा होता है और मोदी पूर्ण बहुमत के साथ देश के प्रधानमंत्री बनते हैं. इस तरह प्रकट और प्रछन्न नवउदारावादियों की एकजुट ताकत का इस्तेमाल करके नवउदारवाद पूरी मज़बूती के साथ अगले चरण में प्रवेश कर जाता है. नवउदारवादी व्यवस्था, भ्रष्टाचार जिसमें बद्धमूल है, के चलते भ्रष्टाचार विरोध का कोई अर्थ नहीं है. भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के कर्ताओं और समर्थकों ने यह सवाल नहीं उठाने दिया, क्योंकि उन सबका हित नवउदारवादी व्यवस्था के साथ जुड़ा हुआ है. कहना न होगा कि नवउदारवाद की यह गतिकी भारत के शासक वर्ग के साथ तालमेल से परिचालित होती है. यह अकारण नहीं है कि उस आंदोलन में शामिल लोगों ने आज तक अपनी भूमिका को लेकर खेद प्रकट नहीं किया है. बल्कि ज्यादातर वामपंथी और लिबरल केजरीवाल की पालकी के कहार बने हुए हैं.   

जिस तरह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के कर्ता वही लोग थे, जिन्होंने दो दशक के नवउदारवादी दौर में मज़बूती हासिल की थी, कांग्रेसी राज का विरोध करने वाले भी मोदी सहित वही लोग हैं, जिनकी हैसियत कांग्रेसी राज में बनी है. इसे थोड़ा पीछे से समझने का प्रयास करें. 1991 में लागू की गईं नई आर्थिक नीतियों से पिछले तीन दशकों में सबसे ज्यादा वे लोग लाभान्वित हुए हैं, जो पहले से शिक्षा और रोजगार संपन्न थे. यानी जिन्हें आज़ादी के बाद सरकार की ओर से किसी समय शिक्षा और रोजगार के अवसर प्राप्त हुए थे. सरकारी क्षेत्र में शिक्षा सस्ती थी और छोटे से लेकर बड़े रोजगार के साथ इलाज, मकान, बच्चों की शिक्षा, पेंशन आदि की सुविधा जुड़ी हुई थी. ऊपरी कमाई तो थी ही. नई आर्थिक नीतियों के आने से इस तबके को पंख लग गए. सरकार की ओर से उपलब्ध कराई गई सस्ती जमीन और कर्ज (हाउस लोन) से इनके मकान पहले ही बन चुके थे. सरकारी खर्चे पर विदेशों में आवा-जाही भी शुरू हो चुकी थी. प्रत्येक विभाग की अपनी ट्रेड यूनियनें थीं जो अड़ कर सरकार से अपनी मांगें मनवाती थीं. बड़े अफसरों ने पूरे देश में अपने ठहरने और मनोरंजन के लिए अतिथि गृह और क्लब बनवाये हुए थे. उनके बच्चे सरकारी सुविधा से मेडिकल और इंजिनियरी की शिक्षा पाकर विदेश में जाकर बस चुके थे.

नई आर्थिक नीतियां आने के बाद छठे और सातवें वेतन आयोग ने आर्थिक रूप से उन्हें काफी मजबूत बना दिया. उनके बच्चे महंगी से महंगी शिक्षा खरीद कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों में नियुक्त होकर भारत के महानगरों और यूरोप-अमेरिका में फ़ैल गए. सरकारी योजनाओं के तहत बने इनके मकानों की कीमत करोड़ों रुपयों में हो गई. ये मकानों का तरह-तरह से कमर्शियल इस्तेमाल करने लगे. ज्यादातर ने पुराना मकान तोड़ कर बिल्डर से लिफ्ट के साथ चार मंजिलें बनवा लीं. बदले में एक मंजिल बिल्डर को बेचने के लिए दे दी और दो मंजिलें खुद बेच दीं. इनके एशोआराम के लिए महानगरों/नगरों के चारों ओर फार्म हाउस, कारों के शोरूम, लग्जरी विला, होटल, मोटेल, बैंक्विट हाल, बहुमंजिली रिहायशी इमारत, कमर्शियल काम्प्लेक्स, मॉल, एअरपोर्ट, प्राइवेट स्कूल/कॉलेज/यूनिवर्सिटी आदि बनते चले गए. विदेशी शराबों सहित सभी उपभोक्ता वस्तुओं की घर बैठे उपलब्धता हो गई. सोवियत रूस का विघटन हो जाने से पूर्वी यूरोप और मध्य एशियाई देशों की महिलाएं इन्हीं लोगों के भरोसे भारत के महानगरों में वेश्यावृत्ति के लिए आने लगीं. ...

कांग्रेसी राज के दोनों चरणों का अधिकतम फायदा उठाने वाले ये लोग सबसे ऊंचे स्वर में कहते हैं कि पिछले 65 सालों में कुछ नहीं हुआ. दरअसल ये नवउदारवाद के तहत होने वाली संसाधनों और श्रम की लूट से गिरने वाली जूठन पर हमेशा के लिए अपनी संततियों का कब्ज़ा रखना चाहते हैं. ये लोग ओपिनियन मेकर हैं. नवउदारवाद के पक्ष में सहमति निर्माण का काम करते हैं. मोदी के नेतृत्व में 'पिछले 65 सालों में कुछ नहीं हुआ' का संदेश इन्होंने सबसे निचले स्तरों तक पहुंचा दिया. तीस साल से नवउदारवाद की कड़ी मार झेलने वाले मेहनतकश भी कहने लगे कि पिछले 65 सालों में कुछ नहीं हुआ. ऐसा वे अपने लिए नहीं कहते, जबकि उन्हें कहना चाहिए. बल्कि वे, वाया नवउदारवाद, कांग्रेस राज के लाभार्थियों के लिए ऐसा कहते हैं. मोदी राज में बड़े लोगों को उनका हक़ मिलेगा तो मुमकिन है उनकी भी बारी आए! क्योंकि 'मोदी है तो मुमकिन है'. भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की तरह मोदी-लहर ने भी नवउदारवाद को एक बार फिर मज़बूत आधार दे दिया है. नवउदारवाद के लिए इससे बड़ी उपलब्धि क्या हो सकती है कि उसके शिकार मान रहे हैं कि कोठी-कार वालों के लिए पिछले 65 साल में कुछ नहीं हुआ! बहुजन क्रांति से लेकर खूनी क्रांति तक की बात करने वाले, यदि पूरी तरह राजनीतिक निरक्षरता का शिकार नहीं हुए हैं, प्रतिक्रांति की यह ताकत देख-समझ लें.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के शिक्षक और सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष हैं)         

Narendra Modi : Investigating Eligibility



Prem Singh


Narendra Modi has been a recipient of consistent acceptance and support from various corners/ sources which favours his eligibility as the Prime Minister. Although after five years of being Prime Minister, a lot of people have come out of the lure of Modi, yet an unreal aura is being created about his future Prime Ministerial role, as if it is a certain occurrence. Whether or not the voters are in agreement with this aura, will be revealed on May 23, 2019, when the results will be announced. The truth is that Team Modi, corporate houses, RSS/BJP, National Democratic Alliance (NDA), mainstream media, and above all blind and 'independent' Modi supporters  stand firm in certification of his eligibility. Narendra Modi's own voice, however, echoes the highest in the chorus of Narendra Modi's eligibility. This tremendous urge for Modi's eligibility cannot be without reason. It is also not easy to unravel the underlying complex reasons behind this phenomenon. Yet the main reasons can be attempted to be culled out.

Those weak souls have been kept apart from these analyses, who still believe the preposterous notions built around Modi as if he is some kind of an incarnation. The ordinary working masses also have not been included, as they are cursed to follow the narrative prepared by the class exploiting them. In this write up an attempt has been made to investigate those people who endorse Modi's eligibility despite of a compendium of false statements (including those pertaining to his marital status as well as educational qualifications), lies, ignorance, superstition, hatred constantly demonstrated by him. These are the very same people who are educated, successful and empowered spread over in the country and abroad. Or at least are moving on that path.

Let’s begin with the corporate houses. Modi's use of the vast wealth of corporate houses in his last election campaign, his use of government funds for his image building projects as a prime minister, advertising for Jio SIM, joining of Neerav Modi in the delegation at World Economic Forum, misusing the state machinery in aiding Vijay Mallya and Mehul Choksi to flee the country, making law which helps in keeping corporate funding to political parties covert, implementing demonetization to break the financial backbone of small traders and small farmers, imparting anticipatory eminent status to Reliance Jio Institute which exists only on paper at the moment, ignoring the public sector undertaking aircraft maker Hindustan Aeronautics Limited (HAL) which has over 60 years of experience in aircraft manufacturing and instead making Reliance Defense Limited a partner of French company Dassault with the intention of grabbing the Rafael deal, direct appointment of private sector experts on the rank of Joint Secretary in various government departments, accelerating unregulated privatization process in every region including public sector undertakings ... are enough evidences to expose that Modi's eligibility for corporate houses is axiomatic.

It is a sufficient proof of Modi's eligibility even in the eyes of the RSS/BJP that none of his leaders can oppose Modi's corporate-based policies. Because the RSS/ BJP are satisfied that Modi has made a central office costing around Rs 1000 crore in Delhi, the headquarters in Nagpur is bursting with prosperity and enjoys coverage in national-international news, and also because unprecedented wealth has been arranged both for present and future security. RSS thinkers are absolutely aware that in Modi's reign, they are the only people who are beneficiaries of government posts and government sponsored awards. The entire Sangh Parivar has accepted that the 'lotus' of 'cultural nationalism' blossomed in the slopes of corrupt and vulgar capitalism under the leadership of Modi. This is the same RSS/ BJP which extracted resignation from L.K Advani from the Presidency of the party for he called Late Muhammad Ali Jinnah as secular while travelling in Pakistan. But it is the same party which didn’t even raise an eyebrow regarding Modi's extraordinary visit to Pakistan’s Prime Minister Nawaz Sharif without any official program. Because they understand that Modi did not go to meet Nawaz Sharif for 'Muslim appeasement'. He must have gone to further the interests of some big businessmen!

Modi's educated, successful and empowered supporters are people who are deeply intoxicated with the idea that Modi has cured Muslims forever. When Modi talks about destroying Pakistan and terrorists, then in their consciousness, just like Modi, are Indian Muslims. They have learned from Modi, which they are unknowingly infecting in their children too, that living in constant hatred for Muslims is the achievement of 'Hindutva' in life, and that is also the 'true patriotism'. These people have to be blind supporter of Modi's eligibility. There should be no need to say that this middle-class section, which has education, employment and business facilities in 'Congress Raj', has become very prosperous during the neo-liberalization period.

Let’s engage a little bit in what Narendra Modi himself thinks about his eligibility? Here in his interview to a film actor, Modi said that he would sometimes go to the forests for a few days. There he used to engage in conversations with the self. His jumla 'What is mine, I will walk away picking up my bag when there will be time', has gained currency. By such occurrences he perhaps tries to show that his personality preserves a sense of renunciation (vairagya). Discussions pertaining to renunciation can be found in contemplations around the world including India. The renunciation of Shamshan Ghat is famous. Certain occasions and situations lead to the realization of insipidness of life. In this state the person drifts away from worldliness and is oriented toward self-realization (Recovery of True Self). Though he soon returns to worldly life, but such momentary sense of renunciation and efforts of self-realization are not always meaningless. The person tries to see life renewed and live by rising above his shortcomings and weaknesses.

It seems that Narendra Modi's soul-searching has not led him towards self-realization, rather it has made him more and more self-indulged. Otherwise, if a person states a wrong fact, interpretation, or utters bitter word for someone, it bothers him and he becomes restless to rectify his mistake. Given the opportunity, the person tries to correct his mistake at his level. Not so with Modi. After propagating ignorance, frenzy and hatred, he starts organizing the next opportunity with the same enthusiasm. Of course, in his own eyes his eligibility is above doubts and suspicion. That is why his anger is directed at those who raise doubts and suspicions over his credibility. Modi has infected this 'virtue' in his supporters too well. Both (Modi and his supporters) believe in disposing those who suspect and question him.

Modi is the first person to be his own merit admirer. His success is that he has emerged as the biggest event manager to propagate his 'qualities'. It goes without saying that this function of propagating his qualities is integral to his corporate character. In such narcissism Modi might be, and quite erroneously, led to believe that corporate houses are his toys. While the truth is that he himself is the pawn of corporate houses. Literature, especially the European novel, is replete with such narcissistic heroes. In spite of all their self-grandeur, they are actually mere toys of status quo. The culmination of these heroes is characterized with depression and suicides. However, just as Modi's eligibility for corporate capitalism is axiomatic, it is the same for Modi - he is the axiom of corporate capitalism.

An important source of the acceptance of Modi’s eligibility is international politics and diplomacy. Countries with economic, political and military domination, such as America, Russia, England, France, Germany, China, keep full knowledge of the leaders of the world - be they are in power or opposition. It is not that these countries do not know about Modi's knowledge of 'history' and 'science'. They are very much aware of communal fascist history of Modi. In 2005, the US banned Modi's entry into the country due to 2002 Gujarat's communal riots which the Americans termed as a trampling of religious freedom. After the 2002 riots, Britain broke official affiliation with the Modi government of Gujarat for 10 years. Many other countries strongly condemned Narendra Modi for the riots.

But soon after Manmohan Singh the search for a natural leader of corporate  capitalism led them to Modi, who was already running a special laboratory of neo-liberalism in Gujarat, and in this way he had become the first choice of some of the country's corporate houses. A foreign delegation met prime ministerial candidate Narendra Modi in Delhi. After becoming the Prime Minister, the US restored his visa. President Barack Obama called him to address the joint session of the Congress and provided him with a private dinner. On the invitation of Prime Minister Narendra Modi, Obama accepted to become a special guest on Republic Day of India. The next story is known to all. Prime Minister Narendra Modi opened up various sectors, from retail to defense, for hundred percent Direct Foreign Investment (FDI). In fact, an agenda of these neo-imperialist powers is to destroy the spirit and heritage of opposing imperialism from India. These powers know that if the power remains entrenched in RSS and Modi it can achieve this goal much easier and faster. This specific dimension of Modi's eligibility in the eyes of the neo-imperialist powers is significant  and worth considering.

This discussion, which examines Modi's eligibility, will remain incomplete if it ignores the role of progressive and secular camp. Without elaborating on this subject, it can only be said that the anti-corruption movement under the aegis of India Against Corruption (IAC) spoiled the entire socio-political scenario before the 2014 Lok Sabha elections. This entire story has been captured in the book 'Bhrashtachar Virodh : Vibhram Aur Yatharth’ (Vani Prakashan, 2015). The movement, which was launched with the aim of destroying the alternative resistance to neo-liberalism in order to promote it to the next phase, also brought the leader (Narendra Modi) of the next phase. In that noise of ideological nihilism, the governmental communists had seen a Lenin in the NGO don named Kejriwal and had gathered to make him an alternative to Modi. (Before Modi's call for a  Congress-free India, the players of anti-corruption movement had written Congress's obituary on their behalf.) In this way the struggle of alternative also entered the next phase! In the mainstream Indian politics it was decided that the battle is now between neo-liberalism and neo-liberalism. That means there is no fight with neo-liberalism. Whatever the quarrel is, it is about caste, religion, region, family and person. Or, to get maximum share in the neo-liberal loot of country's resources and the labour. That's happening in the whole country. It right to say that Modi is a mere pawn in the hands of the corrupt and vulgar capitalist forces. But,  in this form, he represents the ruling class of India.

(The author teaches Hindi at University of Delhi and president of Socialist Party)

The Anti-Congress Narrative : Identifying Truth and Falsehood



Prem Singh

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Narendra Modi, during the campaigning for 2014 Lok Sabha elections, had specifically emphasized two things : First, nothing has happened in the country during the Congress rule of the last 65 years. He, accusing the Congress of failures during its 65 years rule, had then claimed that he would complete 65 years of task in just 65 days if he is given power. Second, he will bring the black money, deposited in foreign countries, back to the country and deposit 15 lakhs in each Indian's account. The promise of depositing 15 lakh rupees in each Indian's account has been declared as an election jumla by BJP President Amit Shah himself. Modi and his blind supporters have constructed a long narrative about failure of 65 years of Congress rule. These Modi supporters are not limited to the members of the Rashtriya Swayamsewak Sangh (RSS) only. They are spread all over the country and abroad in large numbers. From the last election campaign to the current one, Modi has converted every opportunity,  related to any subject, into an opportunity to oppose and criticise the Congress.  Freedom fighter and India's first Prime Minister Jawaharlal Nehru has been labeled a 'villain' of this narrative. Modi has assigned the role of the 'hero' to himself.

At the beginning of this narrative, it was the intention of Modi supporters to convey the impression that the country got real freedom when Narendra Modi became the Prime Minister of India. This message has deep implications the primary one being that the Congress did not fight for the independence of the country and that it has been a burden upon the country. Therefore, India should be made Congress-free. The actors and supporters of the anti-corruption movement also expressed the impression that Congress is heading towards its end in the political spectrum of India. The implication behind this assumption was also that the time has come to discard the struggle, the values, the ideals and the ideology of the Independence Movement. Though the Congress itself had got rid of the true spirit of the Independence Movement long ago, but Modi's people were not prepared to tolerate even the hollow structure of the Congress. Anyway, under this new narrative, allegations were heaped upon the Congress for all the ills confronting the country, starting from Kashmir issue to the problem of unemployment. On the other hand, those who raise voice about the wrong policies and decisions of the present government are snubbed by the Modi supporters with the retort 'where were they during the Congress rule' ? Modi and his cabinet colleagues have not only made unrestrained statements against the Constitution, but also have made false and misleading statements about various statistics/data related to the economy, including employment. Modi and his supporters promptly heap blame on the Congress rule for the failures of even the present government, and award certificates of excellence to Modi and themselves. If someone questions Modi and his government about the specific problems which surfaced after 2014  or reminds them about Modi's promises of great change within 65 days of coming to power, then under this grand narrative, that person is declared to be a traitor.  The anti-Congress narrative constructed in the last five years by Modi and his supporters has remained an effective strategy despite all the anti-Constitution and anti-people policies, falsehoods and lies of the Modi government.

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Before this narrative was constructed by Modi and his supporters, the BJP, as a political party, had never mentioned the opinion that no development took place in the country in the last 65 years. Initially Jana Sangh and later the BJP's top leaders have praised the leaders of the Congress, from Nehru to Rajiv Gandhi. Nehru's admirer, Atal Bihari Vajpayee, expressed his respect for Indira Gandhi for her strong will power by calling her Durga. The BJP's paternal organisation RSS  too had never questioned the alleged no-progress role of the Congress. It is an open truth that the RSS has been nurtured more in the care of the Congress than by the Jan Sangh/BJP. From time to time, it has in its turn repaid the debt by supporting Congress in the elections.

It is factually wrong to say that only the Congress ruled the country before 2014. There was a BJP-led National Democratic Alliance (NDA) government at the Center for 6 years under the leadership of AB Vajpayee at the juncture of 20th and 21st Century. Even before that there were non-Congress governments at the Center and states. In fact, in a multi-party parliamentary democracy and a federal system the rule of a single party cannot be blamed for all the failures even if it had ruled the country for a long time. Achievements and shortcomings are shared in a multi-party parliamentary democracy. If the Congress was a total failure and was harming the country, as Modi repeatedly says, then its equal responsibility lies upon the political parties and their leaders active during that period because they failed to put pressure on the government for the right policies or in failing to overthrow it in elections. If it is assumed that nothing happened during the Congress rule, or all went wrong during its time then it is a sign of a collective national failure. The RSS, which has been engaged in the work of 'nation-building' since its establishment, will also be viewed as party in that grand failure.

Counting the achievements of the democratic India after Independence will make a long list. Apart from the constitutional and democratic institutions, which have been enormously damaged by the Modi government, various institutions related to education, research, literature, arts, science, commerce etc. were erected on a large-scale. Simultaneously diplomatic, business and cultural relations were established with the whole world. A large body of public sector undertakings was erected for the production of essential materials and apparatus required for the modern development of the country. A central network of railways and network of bus services under road transport system in each state was expanded for travel. Efforts were made to develop  facilities for irrigation, seeds, manure, modern equipments and techniques to help agriculture. Schools, colleges and universities were built on a large scale along with stadiums and sports complexes. Medical colleges, hospitals and technology institutes were established. The three components of the Indian  Army were strengthened and expanded ...

Therefore to examine the truth of the current anti-Congress narrative, let's delineate two situations for comparison. First, Delhi is the capital city of the country. There is lack of civic facilities for three-fourths of the population, it is full of densely populated slums, small children are involved in various types of dangerous occupations, they beg on traffic lights throughout the city by performing entertaining acts, in the recent past, three sisters (Manasi, 8 years, Shikha 4 years, Paro 2 years) died of hunger in East Delhi ... About this reality or other similar anxieties , Modi and his supporters would retort without any qualm that all this is basically due to the 65 years of Congress rule. Now look at the second situation. Prime Minister Narendra Modi spends billions of rupees on his image building exercises ranging from his dresses to advertisements and foreign tours to public meetings. If nothing had happened in Congress rule, then where did Modi bring this wealth from? In other words, if the Congress rule is responsible for the first situation, the second situation in which PM Modi functions is also a gift of the Congress rule. Indeed, Modi and his supporters are pushing forward the work of Congress i.e.  neo-liberalism. Dr. Manmohan Singh, being an economist of very high caliber, rendered his services to the corporate in a classical manner. Modi provided that service by playing blind. The country and the world have seen the glimpses of this in Modi's 'New India' and his experiments such as demonetization. 


In view of the above facts one can say that the narrative of failure of the Congress rule constructed by Modi and his supporters is based on lies that support a strategy. It can be said that the ventures during Congress rule were inadequate. It can also be argued that the endeavours  were undertaken with wrong policies and perspectives . But to say or believe that there has been no enterprise in the last 65 years, is nothing but a lie and a calculated misinformation. There is a saying in lndia that a lie does not walk on its feet. But this invention of Modi and his supporters has been going on for five years with strong foot prints. It is time for a serious investigation into this phenomenon.

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This article makes an attempt to understand and to analyse this issue in the context of the dynamics of neo-liberalism. However, there can be other contexts also. When a system finds its firm groundings, it develops its own dynamics for survival and further strength. It can lead to a protest movement from within its own structure in order to save itself from a real challenge, placed by its genuine  opponents, in which different voices with different beliefs can join hands on one platform in its support. The anti-corruption movement, held under the aegis of 'India Against Corruption' (IAC) was born from womb of neo-liberalism in order to defend itself and to get more strength for the next phase. Several wise people were involved in it. They all got together by raising the slogan - 'Modi in the centre and Kejriwal in Delhi'. With this same movement, the new incarnation of the RSS/BJP was  created and Modi became Prime Minister of the country with an absolute  majority. This way neo-liberalism relentlessly entered the next phase in the county by using the combined strength of its veiled and open supporters. There is no logic in opposing corruption if one supports neo-liberal system because within it corruption is inbuilt. The players and supporters of anti-corruption movement did not allow  this question to be raised because their interests are linked to the neo-liberal system. This is how the dynamics of neo-liberalism operates in collaboration with the ruling class of India. It is not without reason that people involved in that movement have not expressed regret about their role till date. Rather, most leftists and liberals are playing role of the bearers of Kejriwal's palanquin!

Just as the players of the anti-corruption movement were the same people who had gained strength in the neo-liberal period of the past two decades, the opponents of the Congress rule today include the very people who enjoyed their empowered status in the 65 years of Congress rule. Let us try to understand this fact by going back to the 50s and 90s. The New Economic Policies, introduced in 1991, benefited mostly those who at some point in time had already achieved good education and employment provided by the government after independence. Education in the public sector was inexpensive and facilities like housing, medical, children's education, pension etc. were attached with all categories - lowest to highest - of employment. This is beside the other perks, both legal and illegal. With the introduction of New Economic Policies, this section of Indian society got newer wings to fly higher. Their houses had already been built with cheap land rates and loans provided by the government. Tours abroad had been undertaken on government expenditure. Each department had its own trade unions which used to fight to get  maximum facilities for the employees. The high rank officers had built guest houses and clubs for their stay and entertainment all over the country. Their children had settled abroad after getting medical and engineering education from government institutions.

The sixth and seventh pay commissions made them financially  stronger, thanks to the New Economic Policies. The new generation of children benefited by purchasing expensive private education and being appointed in the multinational companies spread out in metropolitan cities of India and Europe-American countries. Their houses, built earlier under government schemes, commanded values in crores of rupees. They started next by making commercial use of their houses in a variety of ways. People dismantled their old houses in order to built four floors with lift, parking space and basement through builders who used to get one floor to sell in exchange. The owners sometimes sold two floors, and sometime the basement to able to purchase luxurious farm houses, cars and showrooms. Many luxury villas, hotels, motels, banquet halls, multi-storey residential buildings, commercial complexes, malls, airports, private schools/ colleges/universities etc. propped up around metropolitan cities/cities for their benefit. All the consumer items, including foreign liquor, was made available and was at their disposal. With the disintegration of the Soviet Union, impoverished women from Eastern Europe and Central Asian countries started coming to the metropolitan cities of India for prostitution. 

These people, who had taken the maximum advantage of both the stages of Congress rule, now say in the highest voice that nothing has happened in the last 65 years. In fact, they want to keep their possessions, the investments, the entire margin profit from the loot of resources and labour, only for their own progeny. These people are the country's opinion makers. They manufacture consensus in favor of neo-liberalism. They, under Modi's leadership, have successfully conveyed the message of 'nothing has happened in the last 65 years' to the lowest strata of masses. As a result the hard-working masses, who suffered the most by the effects of neo-liberal policies in last thirty years, also begin to repeat that nothing has happened in the last 65 years. Without realising the truth, they say this for the beneficiaries of the Congress Raj, via neo-liberalism. They have come to believe that if the big people will get their due In Modi Raj, then it is possible that they too will get a chance at some point ! After all 'Modi hai to mumkin hai' (All is possible if Modi is there).

Like the anti-corruption movement, Modi-wave has given a strong base to neo-liberalism once again. What could be a bigger achievement for neo-liberalism now that its victims themselves have been taught to believe that nothing happened in the last 65 years - even for the people who own kothis and cars.

It is a high time for those, who often talk about Bahujan to bloody revolution, to notice this immense strength of the counter-revolution. If there still remain some forces in the country which have not fallen completely into the trap of political illiteracy they should come together to fight this devious trap with an alternative vision.

(The author teaches Hindi at Delhi University and president of Socialist Party) in Delhi)

समाजवाद : सफलता विफलता और संभावनाएं

श्याम गंभीर           जब भारतीय राष्ट्रिय आन्दोलन चल रहा था तो उसमें समाजवादी धारा के नेताओं आचार्य नरेन्द्र देव, डॉ. राममनोहर लोहि...