Tuesday, 15 January 2019

प्रतिक्रांति के हमसफर

(यह टिप्पणी 2014 की है. हस्तक्षेप पर प्रकाशित हुई थी. 5 साल बाद देश और दिल्ली में अब फिर चुनाव होंगे. टिप्पणी फिर से इसलिए दी जा रही है कि प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्षता के पराभव की चिंता करने वाले साथी इस बार समझदारी से काम लेंगे.)  


प्रतिक्रांति के हमसफर

प्रेम सिंह

‘‘इस वक्त समूची दुनिया में जो हो रहा हैवह शायद विश्व इतिहास की सबसे बड़ी प्रतिक्रांति है। यह संगठित हैविश्वव्यापी है और समाज तथा जीवन के हर पहलू को बदल देने वाली है। यहां तक कि प्रकृति और प्राणिजगत को प्रभावित करने वाली है। इक्कीसवीं सदी के बाद भी अगर मानव समाज और सभ्यता की चेतना बची रहेगीतो आज के समय के बारे में इसी तरह का जिक्र इतिहास की पुस्तकों में होगा। डंकेल संधि की तारीख इस प्रतिक्रांति की शुरुआत की तारीख मानी जा सकती है।’’

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‘‘प्रतिक्रांति का मतलब पतन या क्षय नहीं है। पतन या क्षय वहां होता हैजहां परिपक्वता आ चुकी है या चोटी तक पहुंचा जा चुका है। सोवियत रूस का पतन हो गयाया हम कह सकते हैं कि आधुनिक सभ्यता का क्षय एक अरसे से शुरू हो गया है। इससे भिन्न प्रतिक्रांति का रूप क्रांति जैसा ही होता हैसिर्फ उसका उद्देश्य उलटा होता है। यह भी संगठित होता है और एक विचारधारा से लैस रहता है और कई मूल्यों और आधारों को उखाड़ फेंकने का काम करता है। इसकी विचारधारा ही ऐसी होती है कि इसका आंदोलन अति संगठित छोटे समूहों के द्वारा चलाया गया अभियान होता है।’’ (विकल्पहीन नहीं है दुनिया’, किशन पटनायकराजकमल प्रकाशनपृ. 172)   

किशन जी का यह कथन फरवरी 1994 का है। तब से दुनिया और भारत में प्रतिक्रांति का पथ उत्तरोत्तर प्रशस्त होता गया है। राजनीति में पिछले तीन-चार सालों में बनी नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल की केंद्रीयता से प्रतिक्रांति की विचारधारा काफी मजबूत स्थिति में पहुंच गई है। गौरतलब है कि दोनों ने लगभग समान प्रचार शैली अपनाकर यह हैसियत हासिल की है, जिसमें मीडिया और धन की अकूत ताकत झोंकी गई है। बहुत-से मार्क्सवादियोंसमाजवादियोंसामाजिक न्यायवादियोंगांधीवादियों और बुद्धिजीवियों ने अरविंद केजरीवाल का साथ देकर या दिल्ली विधानसभा चुनाव में बिना मांगे समर्थन करके इस प्रतिक्रांति को राजनीतिक स्वीकार्यता प्रदान कर दी है। दिल्ली में आप’ की सरकार बनती है या भाजपा कीइससे इस सच्चाई पर फर्क पड़ने नहीं जा रहा है कि भारत की मुख्यधारा राजनीति में प्रतिक्रांति का सच्चा प्रतिपक्ष नहीं बचा है।
केजरीवाल की राजनीति के समर्थक खुद को यह तसल्ली और दूसरों को यह वास्ता देते रहे हैं कि जल्दी ही केजरीवाल को (अपने पक्ष में) ढब कर लिया जाएगा। हुआ उल्टा है। केजरीवाल ने सबको (अपने पक्ष में) ढब कर लिया है। सुना है किरण बेदी के छोटे गांधी’ कामरेडों के लेनिन हैं! प्रकाश करात ने कहा बताते हैं कि केजरीवाल का विरोध करने वाले मार्क्स को नहीं समझते हैं। प्रतिक्रांति इस कदर सिर चढ़ कर बोल रही है कि मार्क्स को भी उसके समर्थन में घसीट लिया गया है। यह परिघटना भारत की प्रगतिशील राजनीति की थकान और विभ्रम को दर्शाती है।

ऊपर दिए गए किशन जी के दो अनुच्छेदों के बीच का अनुच्छेद इस प्रकार है, ‘‘समूची बीसवीं सदी में क्रांति की चर्चा होती रही। क्रांति का एक विशिष्ट अर्थ आम जनता तक पहुंच गया थाक्रांति का मतलब संगठित आंदोलन द्वारा उग्र परिवर्तनजिससे समाज आगे बढ़ेगा और साधारण आदमी का जीवन बेहतर होगाआखिरी आदमी को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा। साधारण आदमी का केंद्रीय महत्व और आखिरी आदमी का अधिकार बीसवीं सदी की राजनीति और अर्थनीति पर जितना हावी हुआवैसा कभी नहीं हुआ था।’’

यह लिखते वक्त किशन जी को अंदेशा भी नहीं रहा होगा कि एनजीओ सरगनाओं का गिरोह करोड़पतियों को भी आम आदमी बना देगाउनकी समृद्धी बढ़ाने के लिए गरीबों का वोट खींच लेगाऔर समाजवादी क्रांति का दावा करने वाले नेता व बुद्धिजीवी उसके समर्थन में सन्नद्ध हो जाएंगे! किशन जी ने अपने उसी लेख में यह कहा है कि ''1980 के दशक में हिंदुत्व के आवरण में एक प्रतिक्रांति का अध्याय शुरू हुआ है देश की राजनैतिक संस्कृति को बदलने के लिए। इस वक्त विश्व-स्तर पर जो प्रतिक्रांति की लहर प्रवाहित हैउससे इसका मेल है; ... ।"  हम जानते हैं पूंजीवादी प्रतिक्रांति के पेटे में चलने वाली सांप्रदायिक प्रतिक्रांति के तहत 1992 में बाबरी मस्जिद का ध्वंस कर दिया गया।

किशन जी ने डंकेल समझौते के साथ शुरू होने वाली प्रतिक्रांति के मुकाबले में वैकल्पिक राजनीति की विचारधारा और संघर्ष खड़ा किया था। साथ ही उन्होंने विस्तार से धर्मनिरपेक्षता का घोषणापत्र लिखा। उनके साथ शामिल रहे ज्यादातर लोग आज प्रतिक्रांति के साथ हैं। जाहिर हैवे किशन जी के जीवन काल में उन्हें धोखा देते रहे और उनके बाद उनके जीवन भर के राजनीतिक उद्यम को नष्ट करने में लगे हैं।
ऐसे में ज्यादा कुछ कहने-सुनने को नहीं बचा हैकुछ बिंदु अलबत्ता देखे जा सकते हैं :

(1) मोदी का तिलस्मजिसे तोड़ने के लिए केजरीवाल को अनालोचित समर्थन दिया गया हैवास्तव में कारपोरेट पूंजीवाद का तिलस्म है। मार्क्सवादियोंसमाजवादियोंसामाजिक न्यायवादियोंगांधीवादियों और बुद्धिजीवियों ने केजरीवाल का समर्थन करके उस तिलस्म को दीर्घजीवी बना दिया है।

(2) केजरीवाल की जीत में धर्मनिरपेक्षता की जीत नहीं हैजैसा कि अति वामपंथियों से लेकर तरह-तरह के राजनीतिक निरक्षर जता रहे हैं। मुसलमानों के भय की भित्ति पर जमाई गई धर्मनिरपेक्षता न जाने कितनी बार भहरा कर गिर चुकी है। भारत की धर्मनिरपेक्षता मोदी की जीत के पहले कई बार हार का मुंह देख चुकी है। भारत का विभाजनगांधी की हत्याआजादी के बाद अनेक दंगे, 1984 में सिख नागरिकों का कत्लेआम, 1992 में बाबरी मस्जिद का ध्वंस, 2002 का गुजरात कांड - धर्मनिरपेक्षता की हार के अमिट निशान हैं।

(3) धर्मनिरपेक्षता के दावेदार यह सब जानते हैं। लिहाजाकेजरीवाल के समर्थन के पीछे के मनोविज्ञान को समझने की जरूरत है। इनमें से बहुत-से लोग मोदी के हाथों मिली करारी शिकस्त को पचा नहीं पाए हैं। उनका दृढ़ विश्वास था कि मोदी जैसा शख्स भारत का प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। उनका विश्वास टूटा है। खीज मिटाने के लिए वे किसी को भी मोदी को हराता देखना चाहते हैं। केजरीवाल को उनके समर्थन का दूसरा अंतर्निहित कारण घृणा की राजनीति से जुड़ा है। सर्वविदित है कि आरएसएस घृणा की राजनीति करता है। धर्मनिरपेक्षतावादियों में भी संघियों के प्रति तुच्छता से लेकर घृणा तक का भाव रहता है। केजरीवाल की जीत से उनके इस भाव की तुष्टी होती है। तीसरा कारण सरकारी पद-प्रतिष्ठा से जुड़ा है। धर्मनिरपेक्षतावादियों को कांग्रेसी राज में सत्ता की मलाई खाने का चस्का लगा हुआ है। उन्हें पता है कांग्रेस दिल्ली में सत्ता में नहीं आने जा रही है। सीधे भाजपा का न्यौता खाने में उन्हें लाज आती है। दिल्ली राज्य में केजरीवाल की सत्ता होने से विभिन्न निकायों/समितियों में शामिल होने में उन्हें लाज का अनुभव नहीं होगा। हालांकि वे एक भूल करते हैं कि एनजीओ वाले राजनीति में आए हैं तो उनके अपने साथी-सगोती निकायों/समितियों में आएंगे। लिहाजाधर्मनिरपेक्षतावादियों के लिए यहां कांग्रेस जैसी खुली दावत नहीं होने जा रही है। मोदी को हराने के नाम पर किए गए समर्थन को वे प्रतिक्रांति के समर्थन तक खींच कर लाएंगे। देखना होगा तब साथी क्या पैंतरा लेते हैं?  

(4) केजरीवाल को वोट देने वाले दिल्ली के गरीबों से कोई शिकायत नहीं की जा सकती। मीडिया और बुद्धिजीवियों ने आप’ के आर्थिक और गरीब विरोधी विचारधारात्मक स्रोतों की जानकारी उन तक पहुंचने ही नहीं दी। इस मेहनतकश वर्ग को जल्दी ही पता चलेगा कि उनका इस्तेमाल उन्हीं के खिलाफ किया गया है। हालांकि केजरीवाल के दीवाने आदर्शवादी’ नौजवानों को वैसा नादान नहीं कहा जा सकता। प्रतिभावान कहे जाने वाले इन नौजवानों ने प्रतिक्रांति के पदाति की भूमिका बखूबी निभाई है।

(5) दलित पूंजीवाद के पैरोकार देख लेंशूद्रों समेत ज्यादातर सवर्ण नेताप्रशासकविचारकएनआरआई पूंजीवादी प्रतिक्रांति के साथ जुट गए हैं। पूंजीवाद की दौड़ में बराबरी का मुकाम कभी नहीं आता। 

(6) उस अदृश्य एजेंसी का लोहा मानना पड़ेगा जिसने केजरीवाल का यह चुनाव अभियान तैयार किया और चलाया। जनता का सीएम’ कैसे बनता हैयह उस एजेंसी ने बखूबी करके दिखाया है। वह जनता का प्रधान सेवक’ बनाने वाली एजेंसी की टक्कर की ठहरती है।    
अंत में सबक। नई आर्थिक नीतियों के साथ शुरू होने वाली प्रतिक्रांति का लगातार प्रतिरोध हुआ है। अबजबकि सारे भ्रम हट गए हैंक्रांति का संघर्ष निर्णायक जीत की दिशा में तेज होना चाहिए।

अगड़ों को आर्थिक आधार पर 10 प्रतिशत आरक्षण : सोशलिस्ट पार्टी का नज़रिया

12 जनवरी 2019

प्रेस रिलीज़


            लोकसभा सांसद श्री कोठा प्रभाकर रेड्डी ने 8 जनवरी 2019 को सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्रालय में पहले से दर्ज प्रश्न (संख्या 4475) का उत्तर मांगते हुए मंत्री महोदय से पूछा : (अ) क्या सरकार अगड़ी जातियों के गरीब उम्मीदवारों को शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण देने पर विचार कर रही है; (ब) अगर हां, तो उसका विवरण दें, और अगर नहीं तो ऐसा न करने का कारण बताएं; (सी) क्या सरकार को महाराष्ट्र के मराठी, राजस्थान के राजपूत और उत्तर प्रदेश के ठाकुरों की ओर से उनके समुदाय के आर्थिक रूप से पिछड़े सदस्यों को आरक्षण देने की मांग प्राप्त हुई है; (डी) अगर ऐसा है तो उसका विवरण दें, और इस मामले में सरकार ने क्या कार्रवाई की है उसका विवरण दें?
   
                सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्रालय में राज्यमंत्री श्री कृष्णपाल गूजर ने प्रश्न के अ और ब हिस्से का जवाब देते हुए कहा : वर्तमान में ऐसा कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है. प्रश्न सी और डी हिस्से के जवाब में उन्होंने कहा सरकार को ऐसा कोई प्रस्ताव प्राप्त नहीं हुआ है.
               
                7 जनवरी 2019 को सामान्य कोटि के आर्थिक रूप से कमजोर तबकों को शिक्षा और नौकरी में 10 प्रतिशत आरक्षण देने से संबंधित संविधान (124वां संशोधन) विधेयक 2019 को मंत्रिमंडल की स्वीकृति मिलती है. सत्र के अंतिम दिन 8 जनवरी को लोकसभा में और सत्र एक दिन आगे बढ़ा कर 9 जनवरी को राज्यसभा में यह 'ऐतिहासिक' संशोधन विधेयक पारित होकर कानून बनने की मंजिल के करीब बढ़ जाता है. लेकिन सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्रालय के राज्यमंत्री संसद में प्रश्न के उत्तर में 8 जनवरी को करीब 11 बजे उपरोक्त जानकारी  देते हैं!
      सोशलिस्ट पार्टी की नज़र में ये तथ्य बताते हैं कि मोदी सरकार को संसदीय प्रणाली, उसकी गरिमा और पवित्रता की ज़रा भी परवाह नहीं है. सरकार ने विधेयक को न नागरिक बहस में रखा और न ही सेलेक्ट कमिटी जैसी किसी संसदीय संस्था को भेजा. ज़ाहिर है, सरकार ने इस फैसले को पूरी तरह गुप्त रख कर 2019 का लोकसभा चुनाव जीतने की मंशा से 'मास्टर स्ट्रोक' के रूप में घोषित किया है. सरकार के इस 'मास्टर स्ट्रोक' से वीपी सिंह द्वारा एक झटके में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने के फैसले की याद आती है. वीपी सिंह ने अपने मेंटर देवीलाल को राजनैतिक वर्चस्व की लड़ाई में पटखनी देने के लिए वह 'मास्टर स्ट्रोक' लगाया था. लेकिन दोनों फैसलों में अंतर यह है कि मंडल आयोग की स्थापना संसद द्वारा की गई थी; और मंडल आयोग की सिफारिशें संविधान की सामाजिक न्याय की संकल्पना के अनुरूप थीं. मौजूदा सरकार का यह फैसला आरक्षण पर संविधान की मूल सरंचना और सामाजिक न्याय की संवैधानिक संकल्पना के बिलकुल उलट है, जहां आरक्षण की व्यवस्था इतिहास के लम्बे दौर में सामाजिक रूप से पिछड़े समुदायों के लिए की गई है.   
                सोशलिस्ट पार्टी की नज़र में मोदी सरकार का यह फैसला इस मायने में 'ऐतिहासिक' है कि अब भारत की राजनीतिक पार्टियां और सरकारें हमेशा के लिए अपनी नीतियां संविधान में उल्लिखित राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों (यानी समाजवादी व्यवस्था) के तहत देश से आर्थिक विषमता और जातिगत भेदभाव मिटा कर समतामूलक भारत बनाने के लक्ष्य से परिचालित नहीं होंगी. वे निगम पूंजीवाद के तहत मेहनतकशों की कीमत पर अमीरों का 'नया भारत' बनाने का लक्ष्य लेकर चलती रहेंगी. देश के गरीब निगम पूंजीवाद और राजनीतिक पार्टियों के संविधान-विरोधी गठजोड़ का विरोध न करें, इस नीयत से सरकार ने आर्थिक आधार पर सवर्ण आरक्षण का दांव फेंका है. दोनों सदनों में लगभग सभी विपक्षी पार्टियों ने विधेयक का समर्थन किया है. जिन कतिपय लोगों ने विरोध किया है, उनका सरोकार चुनावी राजनीति है. संविधान की मूल सरंचना को खंडित करने की सरकार की चेष्टा से उनका मौलिक विरोध नहीं है.  
                जो लोग राजनीतिक पार्टियों से बाहर इस फैसले का विरोध कर रहे हैं, उनकी प्रामाणिकता की कसौटी है कि वे निगम पूंजीवाद का निर्णायक विरोध करते हैं या नहीं. वे यह सच्चाई समझने को तैयार हैं या नहीं कि ब्राह्मणवाद-मनुवाद पूरी तरह पूंजीवाद में अंतर्भूत हो चुके हैं. इस परिघटना के परिणामस्वरूप खुद सामाजिक न्यायवादियों का चिंतन और व्यवहार पूंजीवाद के साथ ब्राह्मणवाद-मनुवाद से नियंत्रित हो रहा है.
      कुछ लोग यह मान कर आश्वस्त हैं कि इस फैसले से भाजपा को चुनाव में तत्काल फायदा नहीं मिलने जा रहा है, लिहाज़ा, इसे गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है. ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि भाजपा तात्कालिक के साथ दूरगामी लक्ष्य लेकर भी चल रही है. जबकि सामाजिक न्याय और समाजवादी विचारधारा की बात करने वाली पार्टियों, नेताओं और नागरिक समाज एक्टिविस्टों के सामने अपनी सत्ता बचाने के तात्कालिक लक्ष्य के अलावा कोई दूरगामी लक्ष्य नहीं है.
                सोशलिस्ट पार्टी की नज़र में भाजपा ने यह फैसला करके देश के राजनीतिक विमर्श को धर्म के अलावा जाति के साथ मजबूती से नत्थी कर दिया है और इस तरह देश को प्रतिक्रांति के गड्ढे में धकेल दिया है. स्वतंत्रता के 70 साल बाद नागरिकता-बोध का विकास न होकर उत्तरोत्तर विलोप हो रहा है.  नए भारत में व्यक्ति की पहचान नागरिक के रूप में नहीं, धर्म-जाति के आधार पर तय हो रही है. भारत में इसे (संवैधानिक) राजनीति के अंत की घोषणा कहा जा सकता है.
      सोशलिस्ट पार्टी इस संशोधन विधेयक का दो आधारों पर विरोध करती है : 1. यह संविधान निर्माताओं की आरक्षण की संकल्पना के विरुद्ध है; और 2. सरकार का यह फैसला नवउदारवादी नीतियों का रक्षा-कवच है, जिनके तहत शिक्षा का व्यावसायीकरण किया जा रहा है और रोजगार का खात्मा.

डॉ. प्रेम सिंह
अध्यक्ष    

10% Reservation to Economically Weak Sections in General Category : Socialist Party's Perspective

12 January 2019

Press Release



Mr. Kotha Prabhakar Reddy, Member Parliament, on 8th January 2019, seek a reply from Government of India, Ministry of Scial Justice and Empowerment to the question (No. 4475) on 'Reservation for Poor'. Mr. Reddy's question was : (a) whether the Government is exploring the scope of providing reservation for poor candidates from forward communities for education and employment; (b) if so, the details thereof and if not, the reasons therefor; (c) whether the Government has received any demands from sections of forward communities like the Marathis in Maharashtra, Rajputs in Rajasthan and Thakurs in Uttar Pradesh to give reservation for economically weak members of their groups; and (d) if so, the details thereof and the action being taken by the Government in this regard?
The Minister of State for Social Justice and Empowerment Mr. Krishan Pal Gujar replied : (a) and (b) : At present, no such proposal is under consideration. (c) and (d) : No such proposal has been received by the Government.      

On January 7, 2019, the Constitution (124th Amendment) Bill 2019 on 10 percent reservation to the Economically Weaker Sections (EWS) of the general category in education and employment gets approval of the Central Cabinet. On January 8, the last day of the Winter Session this 'historic' Amendment Bill was passed in the Lok Sabha and on January 9 in the Rajya Sabha by extending the Session one day ahead. But the Minister of State for Social Justice and Empowerment gives the above information in response to the question in Parliament around 11 am!

In the view of the Socialist Party, these facts tell us that the Modi government does not care about the parliamentary system, its dignity and its sanctity. The government did not put the Bill for debate in the arena of civil society nor sent it to the Select Committee of the Parliament. Of course, the Government has declared this decision as a 'master stroke' with the intention of winning the 2019 Lok Sabha elections. This 'master stroke' of the government reminds of VP Singh's decision to implement the Mandal Commission's recommendations in one stroke. VP Singh applied that 'master stroke' with the goal to finish his mentor Devi Lal in the battle of political dominance. But the difference in both decisions is that the Mandal Commission was constituted by the Parliament and the Mandal Commission's recommendations on reservation were in line with the basic structure of the Constitution and the concept of social justice as provided in the Constitution. This decision of the present government is totally opposite to the basic structure of the Constitution and the constitutional concept of the social justice, where reservation is arranged for socially backward communities suffered in past history.

The Socialist Party perceives this decision of the Modi Government as "historic" in the sense that now the political parties and the governments in India will not formulate their policies on the basis of the Directive Principals of the State (i.e. socialist system) as enshrined in the Constitution aimed at building an egalitarian India by removing economic disparity and erasing caste discrimination. Rather they will continue to pursue the goal of making 'New India' of the rich at the expense of the working classes under corporate capitalism. The poor of the country is expected not to oppose the anti-constitutional alliance of corporate capitalism and political parties. 

The government has thrown this carrot of reservation on economic basis. Almost all opposition parties have supported the Bill in both the Houses. The political leaders who have opposed it are guided by the electoral politics. They do not have a fundamental opposition to the government's intention of destroying the basic structure of the Constitution.

The authenticity of those who are opposing this decision outside political parties, would be based on the criterion whether they are decisively opposing corporate capitalism or not and whether they are willing to understand the truth that Brahmanism-Manuism have been completely transformed into capitalism. As a result of this phenomenon, the contemplation and behavior of the advocates of social justice is itself  being controlled by Brahmanism-Manuism along with capitalism.

Some people are convinced that this decision by the BJP is not going to award them any immediate benefit in the Lok Sabha elections, so there is no need to take it too seriously. Such people should understand that the BJP is going ahead with an immediate target even as they keep in mind a far-reaching target. While there is no far-reaching goal in addition to the immediate goal of retaining power before the parties, leaders and civil society activists who talk of social justice and socialist ideology.

The Socialist Party would further like to state that with this decision the BJP has embedded the political discourse of the country firmly, apart from religion, with caste; and has therefore pushed the country into the pit of counter-revolution. Even after 70 years of Independence, there is no progress in the meaning of citizenship rather it is progressively disappearing. In the 'New India', the identity of a person will not be recognised as a citizen but on the basis of religion and caste. In India this can be termed as an end of constitutional politics.

The Socialist Party opposes the Amendment Bill on two grounds: 1. This is contrary to the concept of reservation perceived by the makers of the Constitution; And 2. The government's decision is the protection shield for neo-liberal policies under which the commercialization of education and elimination of employment is being done.

Dr. Prem Singh
President

Friday, 11 January 2019

Citizenship Bill: One more step of BJP towards the contempt of Constitution

January 10, 2019

Press Release




      By passing the Citizenship (Amendment) Bill 2016 in the Lok Sabha the Narendra Modi government at the Center has taken up another step towards the contempt of the Constitution. The Bill provides that six non-Muslim communities - Hindu, Sikh, Christian, Buddhist, Jain, Parsi - of Bangladesh, Pakistan and Afghanistan will be granted citizenship of India in the event of religious persecution. The Bill not only lays down the rules of granting citizenship of India to not only Hindus, Sikhs, Christians, Buddhists, Parsis and Jains coming from Bangladesh but also from Pakistan and Afghanistan. There is no such concession for the people of the Muslim community in the Bill. The BJP MPs also have said that the way the population of Hindu community is decreasing in Bangladesh, Pakistan and Afghanistan, this Bill was necessitated. They say that Hindus are being persecuted in those countries and India wants to give them protection.
            The immediate opposition of this Bill is happening in the North-East. The Asom Gana Parishad (AGP) has withdrawn its support from the Sarbadananda Sonowal government in Assam. Meghalaya's Chief Minister, Conard Sangma, an ally in the NDA, has said that his party is against this Bill. The Indigenous Peoples Front of Tripura (IPFT), another ally of the NDA, has also opposed the Bill. Another NDA partner and Mizoram Chief Minister Zormamthanga also opposed this bill. The BJP's 11-party North-East Democratic Alliance (NEDA), which includes regional parties of Tripura, Nagaland and Mizoram, called the Bill a threat to local communities. There have been bandh at several places in northeastern states in protest of the Bill. The BJP office in Shillong has also been attacked by a bomb.
            In fact, the demand of the Assam movement emerged in the North-East in the eighties was that all  foreigners should be taken out of the region, who were spoiling the local identity. There was no discrimination on the basis of Hindu or Muslim. It was a kind of sub-nationality that was found in different ways throughout the North-East. In order to handle that sub-nationality question of the North-East, the Congress leader and then Prime Minister Rajiv Gandhi made the Assam Accord in 1985. In that agreement, a promise was made to identify all the foreigners and get them out. The agreement became a victim of all kinds of hindrances and, as a result, the Congress became weak in the North-East and the BJP formed its own governments in Assam, Manipur, Tripura and Arunachal Pradesh and its allies in Meghalaya, Nagaland and Mizoram
            The BJP has come to power in the North-East on the shoulders of sub-nationality and is now converting the same into its long-cherished dream of Hindu Nation. The BJP believes that the way in which it has extended its expansion by riding on the shoulders of regional parties across the country and is doing its Hinduisation, it will be successful in the North-East as well. That is why the opposition to this Bill is emerging mainly in the North-East. RSS/BJP have been making the issue of preaching and conversion of Christian missionaries in the North-East. But by giving concession to Christians in this Bill, it has tried to save the church's displeasure at the moment. Even if the immediate goal of this Bill is to make Hinduisation of the northeastern states, its effect will not be limited to that region. The Union Ministers in the government have stated openly in the House that its impact will affect the whole country.
            The BJP claimed that what it is doing in this direction is in very much accordance with the sentiment of the Assam Accord. In the Assam Accord the accepted year of entry in Assam was 1971. This Bill has made it 2014. The time limit of settling in India to get citizenship was kept 11 years, which has now been reduced to six years. The main thing is that there was no provision for getting citizenship on the basis of religion in the Assam Accord. India is a secular nation and citizenship is not provided in any secular nation on the basis of religion. Therefore,  this step of amending the Citizenship Law is not only against the Assam Accord, but completely opposite to the basic spirit of the Constitution.
            It is possible that this amendment resulted in a decrease in the number of people (around 40 lakh) who did not find place in the National Register of Citizens (NRC) and a large number of people become citizens of India. But this will lead to the emergence of sub-nationality of the North-East and there will be intense communal polarization in the state like Assam, where Muslims constitute 34 percent of the population. This polarization was also seen during the Assam movement. Nellie massacre is its proof. But at that time the agitating section of Assam was embarrassed with this communal tangle. Today the communal politics of the BJP is creating the same conditions again.
            The Socialist Party believes that this Bill is going to strengthen the principle of a religion-based nation and it has come out of the RSS's thinking of making India a Hindu Nation. While the Constitution makers have granted India an identity of secular nation. The Socialist Party wants that this Bill be prevented from becoming a law by not passing it in the Rajya Sabha.
            The party further believes that this problem of Assam and the North-East should be resolved under the broader idea of constituting a federation (mahasangh) of India-Pakistan and  Bangladesh. Because this sub-continent was divided geographically on religious basis, but its history, culture and economy are connected to each other. Therefore, trying to divide it on the religious basis is creating new problems.

Dr. Prem Singh
President

नागरिकता विधेयक : संविधान की अवमानना की दिशा में भाजपा का एक और कदम

10 जनवरी 2019

प्रेस रिलीज़

               केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने लोकसभा से नागरिकता (संशोधन) विधेयक 2016 पारित करके संविधान की अवमानना की दिशा में एक और कदम बढ़ा दिया है। विधेयक में प्रावधान है कि बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के छह गैर-मुस्लिम समुदायों - हिंदू, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी - को धार्मिक उत्पीड़न की स्थिति में भारत की नागरिकता प्रदान की जाएगी. विधेयक में बांग्लादेश ही नहीं, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आने वाले हिंदुओं, सिखों, ईसाइयों, बौद्धों, पारसियों और जैनों के लिए भारत की नागरिकता देने के नियमों को ढीला किया गया है। विधेयक में मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए किसी प्रकार की रियायत नहीं है। भाजपा के सांसदों ने कहा भी है कि जिस तरह से बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में हिंदू समुदाय की आबादी घट रही है, उसे देखते हुए यह विधेयक जरूरी हो गया था। उनका कहना है कि उन देशों में हिंदुओं को प्रताड़ित किया जा रहा है और भारत उन्हें संरक्षण देना चाहता है। 


       तात्कालिक रूप से इस विधेयक का सबसे ज्यादा विरोध पूर्वोत्तर में हो रहा है। वहां असम गण परिषद ने असम की सरबानंद सोनोवाल सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया है। एनडीए में शामिल मेघालय के मुख्यमंत्री कोनार्ड संगमा ने कहा है कि उनकी पार्टी इस विधेयक के विरुद्ध है। एनडीए के एक और सहयोगी इंडीजिनस पीपुल्स फ्रंट आफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) ने भी बिल का विरोध किया है। एनडीए के एक अन्य सहयोगी व मिजोरम के मुख्यमंत्री जोरमथंगा ने भी इस विधेयक का विरोध किया है। भाजपा के 11 दलीय उत्तर-पूर्व लोकतांत्रिक गठबंधन (नेडा), जिसमें त्रिपुरा, नागालैंड और मिजोरम के क्षेत्रीय दल शामिल हैं, ने विधेयक को स्थानीय निवासियों के लिए खतरा बताया है। विधेयक के विरोध में पूर्वोत्तर में जगह-जगह बंद का आयोजन हुआ है तथा शिलांग में भाजपा के दफ्तर पर बम से हमला भी हुआ है। अन्य विपक्षी पार्टियों ने तो लोकसभा में इस विधेयक का विरोध किया ही है।

       दरअसल, पूर्वोत्तर में अस्सी के दशक में खड़े हुए असम आंदोलन की मांग यह थी कि उन सभी विदेशियों को देश से बाहर किया जाए जो स्थानीय पहचान को बिगाड़ रहे हैं। उसमें हिंदू या मुसलमान के आधार पर भेदभाव नहीं था। यह एक प्रकार की उपराष्ट्रीयता थी जो कि पूरे पूर्वोत्तर में अलग-अलग तरह से पाई जाती है। पूर्वोत्तर की उस उपराष्ट्रीयता को संभालने के लिए कांग्रेस पार्टी के नेता और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 1985 में असम समझौता किया। उस समझौते में भी सारे विदेशियों की पहचान करके उन्हें बाहर करने का वादा किया गया था। वह काम तमाम तरह की अड़चनों का शिकार रहा और उसी का परिणाम है कि पूर्वोत्तर में कांग्रेस कमजोर होती गई और भाजपा ने असम, मणिपुर, त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश में अपनी सरकारें बना लीं और उसके सहयोगी दलों ने मेघालय, नगालैंड और मिजोरम में।

       भाजपा उपराष्ट्रीयता के कंधे पर सवार होकर पूर्वोत्तर में सत्ता में आई है और अब उसे हिंदू राष्ट्र का रूप देने में लगी है। भाजपा को विश्वास है कि जिस तरह से उसने पूरे देश में क्षेत्रीय दलों के कंधे पर सवार होकर अपना विस्तार किया है और उसका हिंदूकरण कर रही है, वैसा ही वह पूर्वोत्तर में करने में कामयाब होगी। इसी से पूर्वोत्तर में विरोध पनप रहा है।  आरएसएस/भाजपा पूर्वोत्तर में ईसाई मिशनरियों के प्रचार और धर्म परिवर्तन को मुद्दा बनाते रहे हैं। लेकिन इस विधेयक में ईसाइयों को रियायत देकर फिलहाल उसने चर्च की नाराजगी बचाने की कोशिश की है। भले ही इस विधेयक का तात्कालिक लक्ष्य पूर्वोत्तर राज्यों का हिंदूकरण करना हो, लेकिन इसका असर वहीं तक सीमित नहीं रहने वाला है। केंद्रीय मंत्रियों ने सदन में इस बात को कहा भी है कि इसका असर पूरे देश पर पड़ेगा।  

       भाजपा का दावा था कि वह इस दिशा में जो कुछ कर रही है, वह असम समझौते की भावना के अनुरूप कर रही है। असम समझौते में वहां आने वालों का स्वीकार्य वर्ष 1971 रखा गया था। विधेयक ने उसे 2014 कर दिया है। पहले नागरिकता पाने के लिए भारत में बसने की समय सीमा 11 वर्ष रखी गई थी, जिसे अब छह साल कर दिया गया है। सबसे बड़ी बात यह कि असम समझौते में धर्म के आधार पर नागरिकता पाने का प्रावधान नहीं है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और किसी भी धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में धर्म के आधार पर नागरिकता प्रदान नहीं की जाती। लिहाज़ा, भाजपा का नागरिकता कानून में संशोधन का कदम असम समझौते की मूल भावना ही नहीं, संविधान की मूल भावना के एकदम विपरीत है।

       संभव है कि इस संशोधन से एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर में बाहर किए जा रहे 40 लाख लोगों की संख्या में कमी आए और काफी संख्या में लोग भारत के नागरिक बन जाएं। लेकिन इससे पूर्वोत्तर की उपराष्ट्रीयता जगेगी और असम जैसे राज्य, जहां मुस्लिमों की आबादी 34 प्रतिशत है, में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण तीव्र होगा। वह ध्रुवीकरण असम आंदोलन में भी देखने को मिला था। नेल्ली नरसंहार उसका प्रमाण है। लेकिन उस समय का असम का आंदोलनकारी तबका उसको लेकर शर्मिंदा था। आज भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति फिर वही स्थितियां पैदा कर रही है।

       सोशलिस्ट पार्टी की राय में कि यह विधेयक धर्म-आधारित राष्ट्र के सिद्धांत को मजबूत करने वाला है और आरएसएस की मान्यता के अनुरूप भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की सोच पर आधारित है। जबकि संविधान निर्माताओं ने भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र स्वीकृत किया है। सोशलिस्ट पार्टी चाहती है कि इस विधेयक को राज्यसभा में पारित न होने देकर कानून बनने से रोका जाए। पार्टी का मानना है कि असम और पूर्वोत्तर की इस समस्या का समाधान भारत-पाक और बांग्लादेश का महासंघ बनाने के व्यापक विचार में है। क्योंकि यह उपमहाव्दीप धार्मिक आधार पर भौगोलिक रूप से बांट तो दिया गया, लेकिन उसका इतिहास, संस्कृति और अर्थव्यवस्था एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। इसलिए उसे धार्मिक आधार पर बांटने की कोशिश नई-नई समस्या पैदा कर रही है।  

डॉ. प्रेम सिंह
अध्यक्ष  

Friday, 28 December 2018

A 'capital' transformation : Delhi as a symbol of corporate politics advertisement



Prem Singh


            It would have been more pertinent and meaningful if this piece had been written by a journalist friend. Actually, I had waited for some time hoping that one or another journalist friend would turn his attention to this subject and write about it. But unfortunately, journalists who would look into the changing face of Delhi metropolis and speak about the infinite images and social-political implications it carries, are few . And for these few, then, there is little space available in the current newspapers. At one time the journalist Sushil Kumar Singh who worked with 'Jansatta', wrote many interesting pieces on Delhi in the paper. One could also find a reflection of the image of Delhi in the political reporting of Manoj Mishra, again in 'Jansatta'. Dwijendra Kalia, a socialist friend, who was a teacher at the DAV College (Evening) of Delhi University, wrote very informative articles on unique episodes and unknown people of Old Delhi in the little magazine 'Naya Sangharsh' in the late eighties. Professor Nirmala Jain wrote a series in 'Hans', a monthly Hindi literary magazine, delineating an vivid account of the journey of the city ranging over more than half a century (1940 to 2000). These essays are now published in the book form titled 'Dilli Shahar Dar Shahar'. Needless to say that the outer and physical form of a city is the outcome of certain deep socio-political processes which develop and grow at its inner level. 
            One finds that today Delhi as a metropolitan city, is wrapped over with an amalgam of advertisements made through countless posters-hoardings and wall-writings. Governments, political parties, politicians, social-religious organizations, trade unions, and business companies selling consumer products are constantly pouring their advertisements over the face of Delhi. In the last three decades, the country's capital Delhi has turned into a huge advertisement for corporate politics. And, in this form, it has spread still further throughout the country. Now even the villages and small towns are not outside the influence of Delhi. The entire country has become an arena of indiscriminate advertisements. Paper, cloth, plastic and ink, in huge quantities, are continually spent on these advertisements. There is an occasional discussion or two on the economics of the advertising industry, but it is the political science of this phenomenon that needs a serious consideration. 
            While traveling or walking in Delhi, I keep looking at all-pervasive posters-hoardings and wall-writings around and as a political worker, I try to understand the political implications and contents of this phenomenon. The story of Delhi's heartstrings can be understood by studying the different shades of its posters-hoardings and wall-writings. Instead of commenting on each slot of advertisements plasterboard all over the metropolis, l would like to confine my observations here only to the posters and hoardings that go overboard congratulating 'all brothers-sisters' and 'countrymen' on religious occasions and religious festivals ranging from Shardiy Navratra to Deepawali to Chhath Parv.
            It has been the practice in Delhi that the Congress and the Bharatiya Janata Party (BJP) would regularly put up posters-hoardings of greetings on various festivals. Occasionally, a few small posters-hoardings, placed by the Bahujan Samaj Party (BSP), could also be seen, which disappeared soon after the election victory of Aam Aadmi Party (AAP). I noticed a special change especially during this year's festival season. To my utmost surprise, the Congress and its leaders did not seem to be staking a claim in the battle of posters/hoardings, or trying to congratulate people on behalf of the political party and their leaders. This time the wars of congratulatory posters/hoardings waged largely between the BJP and Aam Aadmi Party. Whether it was a well thought out decision of the Congress or a mere coincidence, I do not know. The Congress is the mentor of the current corporate politics in the country and will continue to be its main player for a long time to come. But if it was a conscious decision made by the organizationally largest party of the country, it could be viewed as a positive, even thought-provoking, initiative. It might suggest the probability, that the Congress now considers the vulgar display of corporate politics to be bad, in taste and in morality.
            The Aam Aadmi Party has introduced a new dimension to the war of congratulatory messages during religious festivals. So far, political parties and leaders had not been actively involved in the advertisements meant for organizing Bhagwat Katha, Ram Katha, Ramlila or other Puranic kathas (stories) in the metropolis. About 10-15 days ago l was rather stunned  to see that Aam Aadmi Party had put posters and hoardings for a 'Shrimad Bhagwat Katha Gyan Yagya' to be held in East Delhi. The picture of its candidate for East Delhi Lok Sabha seat was seen flashing in the advertisement along with the photograph of the Kathavachak. That the Party's theatrics was being inspired by the hope of a religious impact on the voters of this candidate, was mentioned in the press some months ago. In the last two-three decades, religious discourse has spread rapidly in Hindu society. The battle to grab this area through advertisement is a new strategy being intensified among political parties. Aam Aadmi Party has made a flying start in this direction.
            The practice of organising Havan in the inaugurations and openings by the party's political office may have been prevalent in the BJP. But the Aam Aadmi Party too had inaugurated the elections office of the East Delhi Lok Sabha constituency a few months ago similarly by performing a Havan. A Havan may have been performed even at other election office inaugurations of some more Lok Sabha constituencies in Delhi as well. One might recollect the Havan performed after  Kejriwal was elected chief minister of Delhi. In Delhi, the advertisements congratulating Manasarovar Yatries on behalf of the other governments and political parties were not too many. But the Aam Aadmi Party had continuously put up huge hoardings of greetings for the Mansarovar Yatries at selected places in the metropolis. Two such hoardings were very clearly visible in front of Gujarati Samaj on the Raj Niwas Marg, and it was a constant sight for months when l travelled to the university.
            In the flow of the festival season, the small posters of 'Eid Mubarak' in Urdu were pasted by Aam Aadmi Party only in Muslim areas. As if exchange of Eid greetings is not welcome and not allowed to the people of other faiths! I do not want to elaborate further by pointing out facts about the attitude of Aam Aadmi Party regarding the religious festivals of the Sikh community. The fact, in brief, is that the leaders of this party see the people of the country not as citizens but recognise them only through their religious identity. This they do openly. One can make a note of the posters in which AAP has questioned the Election Commission for deleating names of Muslims and Baniyas from the voter list.     
            I do not want to go into the debate  whether the flooding of these 'greetings'  advertisements during festive season by political parties has a relationship with the growing trend of communalism in the country. The reason for this is that it would, like on some earlier occasions, not be palatable to Kejriwal's secular supporters who otherwise claim to be fighting against the fascism of RSS/BJP. 
            However, I would beg to discuss this phenomenon in relation to the context of the country's democratic structure. I, with my friend ND Pancholi, were going to Jalandhar from Delhi on 21 December. The next day, on the occasion of the 95th birthday of Justice Rajindar Sachar, a seminar was organised by the Socialist Party on the subject 'How to Save Constitutional Values and Institutions'. In our conversation there was a brief discussion about the impact of the religious advertisements on our democracy. I pointed out that advertisements, whatever category they fall in, take away the freedom of choice of a person as a citizen. The motive of these advertisements is to beguile and mislead the people. While incurring heavy wastage of public money, such advertisements are at the same time, also deeply changing the democratic spirit and process in favor of corporate politics. The greetings on religious festivals do not relate to religious belief at all. Small leaders or those who aspire to become leaders in future put up these congratulating posters-hoardings with an ulterior purpose. They, along with photographs of big leaders, publicise their own selves before the leaders and the public, so that they can find recognition and space in politics. The work that should be done through political hard work and struggle, is accomplished through advertising and that too with public money . Media in India, especially the electronic media, has become fully complicit to it. Therefore, new leaders do not rise out of a struggle, they come by way of clever advertising.
             In such a situation, the hope of the establishing constitutional politics and replacing the current corporate politics, is an uphill, if not impossible task. Similarly, an analysis of other categories of advertisements designed by governments, political parties, social organizations, business companies etc., would lead to the conclusion that they all are connected with corporate politics.
            The way in which the political and intellectual leadership of the country has blended silently in cooperation with corporate politics, it will not be long before the two become indistinguishable, affecting the fate of India. In not too far times, unless it is recognised and checked,  this new fangled democracy of corporate politics, molded into the furnace of Delhi, will flourish in the country. The only snags in this democracy will be that while the three sisters (Manasi 8 years, Shikha 4 years, Paro 2 years) might die of disease and hunger, the country's intellectuals/journalists/ artists/activists will keep shouting in a loud chorus - 'The river of health and education is flowing in Delhi!' There are constant calls for a strong leader and/or a military dictator from the inner core of this democracy, but the NGO masters will continue to beat the drum saying - 'After Independence, people have learned to speak for the first time for their rights!' They will declare with the martyrs' voice - 'Our primary concern is the people of the country, not party politics!'
            The experience of neo-liberalism during the last three decades has made it amply clear that corporate politics is inseparable from communal politics. But the advocates of secularism in the country are not ready to accept it. They want to save secularism while running the country via corporate politics. Those who plead to save democracy visa-vi fascism, are not ready  to even consider the fact that neither democracy nor secularism can be saved in this manner. What can be saved  is their class-interest, and ultimately the same circle keeps rolling. 
This is the story of Delhi, the capital city of lndia. It has metamorphosed into a little more than an advertisement of corporate politics. The other parts of the country can soon decide to follow a similar story. At such a point in time, it is possible for some to narrate a wrong text of the situation to the unsuspecting public. But for the truly cautious it is more important to differ, and to sound the wake up call.

Thursday, 27 December 2018

कारपोरेट राजनीति का विज्ञापन बनी दिल्ली



  
प्रेम सिंह


      यह टिप्पणी कोई पत्रकार साथी लिखता तो अधिक सार्थक होती और ज्यादा लोगों तक पहुंचती. दरअसल मैं इंतज़ार करता रहा कि शायद कोई साथी इस विषय की तरफ ध्यान देगा और लिखेगा. लेकिन दिल्ली महानगर के चहरे-मोहरे, जिसकी अनंत छवियां और सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थ हो सकते हैं, पर गौर करने वाले पत्रकार अब नहीं रहे. अगर हैं तो अखबारों में वैसे लेखन के लिए जगह नहीं रह गई है. एक समय 'जनसत्ता' में पत्रकार सुशील कुमार सिंह ने दिल्ली पर कई दिलचस्प टिप्पणियां लिखी थीं. 'जनसत्ता' के ही मनोज मिश्र की दिल्ली संबंधी राजनीतिक रिपोर्टिंग में दिल्ली शहर का अक्स भी उभर कर आता था. दिल्ली विश्वविद्यालय के डीएवी कॉलेज (संध्या) में शिक्षक रहे समाजवादी साथी द्विजेन्द्र कालिया ने अस्सी के दशक में लघु पत्रिका 'नया संघर्ष' में पुरानी दिल्ली के कुछ प्रसंगों और अनाम लोगों पर रोचक टिप्पणियां लिखी थीं. प्रोफेसर निर्मला जैन ने दिल्ली के आधी सदी से ज्यादा (1940 से 2000) के सफ़र का लेखा-जोखा 'हंस' में धारावाहिक लिखा था, जो 'दिल्ली शहर दर शहर' पुस्तक के रूप में प्रकाशित है. कहने की जरूरत नहीं कि, अगर हम समझ सकें तो, किसी शहर का बाह्य स्वरुप उसके अंदर चलने वाली गहरी सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रियाओं का परिणाम होता है.
      दिल्ली महानगर पोस्टर-होर्डिंग और दीवार-लेखन के जरिये किये जाने वाले विज्ञापनों से पटा रहता है. सरकारों, राजनीतिक पार्टियों, नेताओं, सामाजिक-धार्मिक संगठनों, ट्रेड यूनियनों, उपभोक्ता उत्पाद बेचने वाली कंपनियों के नित नए विज्ञापनों की झड़ी दिल्ली में लगी रहती है. देखते-देखते पिछले करीब तीन दशको में देश की राजधानी दिल्ली एक विशाल विज्ञापन में तब्दील हो गयी है. और इस रूप में यह दिल्ली पूरे देश में फ़ैल चुकी है. अब गांव-कस्बे भी दिल्ली से बाहर नहीं हैं. पूरा देश विज्ञापनबाज़ी का अखाड़ा बन चुका है. इन विज्ञापनों पर अकूत कागज़, कपड़ा, प्लास्टिक और स्याही खर्च की जाती है. विज्ञापन उद्योग के अर्थशास्त्र पर कुछ चर्चा होती है, लेकिन इस परिघटना के राजनीति शास्त्र पर भी गंभीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत है.    
      मेरी आदत है कि दिल्ली में सफ़र करते या पैदल चलते वक्त मैं चौतरफा लगे पोस्टरों-होर्डिंगों और दीवार-लेखन पर नज़र डालते हुए चलता हूं. एक राजनीतिक कार्यकर्ता के नाते मेरी कोशिश इस परिघटना के राजनीतिक निहितार्थ समझने की रहती है. तरह-तरह के पोस्टरों-होर्डिंगों और दीवार-लेखन के अध्ययन से दिल्ली के दिल की बात जानी जा सकती है. सभी तरह के विज्ञापनों की तफसील में न जाकर यह टिप्पणी केवल धार्मिक त्योहारों पर 'सभी भाई-बहनों'/'देशवासियों' को बधाई देने वाले पोस्टरों-होर्डिंगों के बारे में है. वह भी इस साल के शारदीय नवरातों से लेकर छठ पर्व तक चलने वाले फेस्टिवल सीजन को आधार बना कर.   
      दिल्ली में त्योहारों पर बधाई के पोस्टर-होर्डिंग भाजपा और कांग्रेस की ओर से लगाए जाते रहे हैं. कहीं-कहीं बसपा के इक्का-दुक्का पोस्टर-होर्डिंग दिख जाते थे, जो आम आदमी पार्टी की जीत के बाद से लगभग बंद हो गए. दिल्ली में इस बार के शारदीय नवरातों से लेकर छठ पर्व तक चलने वाले फेस्टिवल सीज़न में एक ख़ास बदलाव देखने को मिला. राजनीतिक पार्टियों और उनके नेताओं की ओर से बधाई देने वाले पोस्टरों/होर्डिंगों की जंग में कांग्रेस और उसके नेता शामिल नहीं थे. इस बार बधाई देने वाले पोस्टरों/होर्डिंगों की जंग भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच सीमित थी. कांग्रेस का यह सोचा-समझा फैसला था या महज़ संयोग, नहीं पता. कांग्रेस मौजूदा कारपोरेट राजनीति की जनक है और आगे भी उसकी प्रमुख खिलाड़ी रहेगी. लेकिन सांगठनिक रूप से देश की सबसे बड़ी पार्टी का अगर यह सोचा-समझा फैसला था, तो इसे एक सकारात्मक पहल माना जा सकता है. कम से कम इस रूप में कि वह कारपोरेट राजनीति के वल्गर डिस्प्ले को बुरा समझती है.
      आम आदमी पार्टी ने धार्मिक त्योहारों पर बधाई की जंग में एक नया आयाम जोड़ा है. अभी तक भागवत कथा, रामकथा, रामलीला अथवा अन्य पुराण कथाओं आदि के आयोजन के विज्ञापन पार्टियां और नेता नहीं करते रहे हैं. मुझे देख कर हैरानी हुई कि आम आदमी पार्टी ने करीब 10-15 दिन पहले पूर्वी दिल्ली में 'श्रीमद्भागवत कथाज्ञान यज्ञ' के पोस्टर और होर्डिंग लगाए, जिनमें कथावाचक के साथ उसकी पूर्वी दिल्ली लोकसभा सीट की उम्मीदवार की तस्वीर छपी है. (इस उम्मीदवार के नाम के मतदाताओं पर संभावित धार्मिक प्रभाव को लेकर पिछले दिनों पार्टी ने जो स्वांग रचा, उसकी चर्चा मीडिया में हो चुकी है.) पिछले दो-तीन दशकों में धार्मिक कथावाचन के आयोजन हिंदू समाज में तेज़ी से फैले हैं. राजनीतिक पार्टियों में इस क्षेत्र पर कब्जे की लड़ाई तेज हो सकती है. शुरुआत आम आदमी पार्टी ने कर दी है.   
      पार्टी का राजनीतिक दफ्तर खोलने पर हवन करने का प्रचलन शायद भाजपा में ही रहा हो. आम आदमी पार्टी ने कुछ महीने पहले पूर्वी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र के दफ्तर का उद्घाटन हवन करके किया. हो सकता है दिल्ली की अन्य लोकसभा सीटों के दफ्तर खोलने पर भी हवन किया गया हो. केजरीवाल के दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने पर किया गया हवन सभी को याद होगा! दिल्ली में पहले सरकार और राजनीतिक पार्टियों की तरफ से मानसरोवर यात्रियों को बधाई देने का विज्ञापन ज्यादा देखने को नहीं मिलता था. आम आदमी पार्टी ने मानसरोवर यात्रियों की बधाई के विशाल होर्डिंग महीनों तक स्थायी रूप से कुछ स्थानों पर लगाए रखे. राजनिवास मार्ग पर गुजराती समाज की बिल्डिंग के आगे रखे गए दो विशाल होर्डिंग मैंने यूनिवर्सिटी जाते वक्त महीनों तक देखे.
      फेस्टिवल सीज़न की निरंतरता में आम आदमी पार्टी की ओर से 'ईद मुबारक' के छोटे पोस्टर उर्दू में केवल मुस्लिम इलाकों में चिपकाए गए. गोया ईद की मुबारक बात से बाकी धर्मावलम्बियों का लेना-देना न रहता हो. सिख समुदाय के धार्मिक उत्सवों को लेकर आम आदमी पार्टी के रवैये के बारे में मैं कुछ नहीं कहना चाहता. कुल मिला कर इस पार्टी के नेता देशवासियों को नागरिक के रूप में नहीं, केवल उनकी धार्मिक पहचान के साथ जोड़ कर देखते हैं. ऐसा वे डंके की चोट पर करते हैं.       
      राजनीतिक पार्टियों के धार्मिक त्योहारों पर बधाई के विज्ञापनों की बाढ़ का देश में बढ़ती साम्प्रदायिकता के साथ क्या रिश्ता है, इस सवाल पर मैं चर्चा नहीं करूंगा. इसलिए कि आरएसएस/भाजपा के फासीवाद से लड़ने वाले केजरीवाल के सेकुलर समर्थकों को यह हमेशा की तरह  नागवार गुजरेगा. अलबत्ता इस परिघटना पर लोकतंत्र के सन्दर्भ में थोड़ी चर्चा करना चाहता हूं. मैं 21 दिसंबर को साथी एनडी पंचोली के साथ कार से दिल्ली से जालंधर जा रहा था. वहां अगले दिन जस्टिस राजेंद्र सच्चर के जयंती दिवस पर सोशलिस्ट पार्टी की ओर से संवैधानिक मूल्यों और संस्थाओं को बचाने के उपायों पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया था. उसी सिलसिले में विज्ञापनों की परिघटना का हमारे लोकतंत्र के साथ क्या रिश्ता है, इस पर संक्षेप में उनके साथ चर्चा हुई. मैंने कहा कि विज्ञापन, चाहे वे किसी भी श्रेणी के हों, एक नागरिक के रूप में व्यक्ति की अपने विवेक से चुनाव करने की स्वतंत्रता को बाधित करते हैं. उनका मकसद लोगों को गुमराह करना होता है. जनता के धन की भारी बर्बादी से विज्ञापनों का तूमार लोकतान्त्रिक चेतना और प्रक्रिया को गहराई से कारपोरेट राजनीति के पक्ष में बदल रहा है. त्योहारों पर दी जाने वाली बधाइयों का धार्मिक आस्था से सम्बन्ध नहीं होता. छोटे नेता अथवा नेता बनने के अभिलाषी बधाई के पोस्टरों-होर्डिंगों पर बड़े नेताओं की तस्वीरों के साथ अपनी तस्वीर जनता और पार्टी के नेताओं तक पहुंचाते हैं, ताकि राजनीति में जगह बना सकें. राजनीति में जो काम संघर्ष के माध्यम से होना चाहिए, वह काम वे विज्ञापन के माध्यम से करते हैं. भारत में मीडिया, खास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, इसमें पूरी तरह से शामिल हो गया है. लिहाज़ा, नए नेता संघर्ष के रास्ते नहीं, विज्ञापन के रास्ते आते हैं. ऐसे में कारपोरेट राजनीति को बदल कर संवैधानिक राजनीति की स्थापना का काम असंभव नहीं तो दुर्गम अवश्य है. (इसी तरह सरकारों, पार्टियों, सामाजिक संगठनों, व्यावसायिक कंपनियों आदि के विज्ञापनों का विश्लेषण करें तो सभी के तार कारपोरेट राजनीति से जुड़े नज़र आएंगे.)   
      जिस तरह से देश का राजनीतिक और बौद्धिक नेतृत्व कारपोरेट राजनीति का हमसफ़र हुआ है, उसके चलते आगे लम्बे समय तक यह राजनीति भारत की भाग्य-विधाता बनी रहनी है. दिल्ली की धमन भट्टी में ढलने वाला यह कारपोरेट राजनीति का लोकतंत्र ही आगे फलने-फूलने वाला है. इस लोकतंत्र में तीन बहनों (मानसी 8 साल, शिखा 4 साल, पारो 2 साल) की बीमारी और भूख से मौत हो जाती है, लेकिन बुद्धिजीवी/पत्रकार/कलाकार/एक्टिविस्ट ऊंची आवाज़ में चिल्लाते रहते हैं - 'दिल्ली में स्वास्थ्य और शिक्षा की नदियां बह रही हैं!' इस लोकतंत्र के भीतरी कोनों से मजबूत नेता और/अथवा फौजी तानाशाह के लिए निरंतर पुकार उठती रहती है, लेकिन एनजीओ वाले लगातार ढोल पीटते रहते हैं - 'आज़ादी के बाद लोगों ने पहली बार अपने हकों के लिए बोलना सीखा है!' वे शहीदाना अंदाज़ में कहते हैं - 'हमारा प्राथमिक सरोकार तो देश की जनता है, कोई पार्टी पॉलिटिक्स नहीं!'
      नवउदारवाद के पिछले तीन दशक के अनुभव ने साफ़ कर दिया है कि कारपोरेट राजनीति साम्प्रदायिक राजनीति से अविभाज्य है. लेकिन देश का सेकुलर खेमा यह मानने को कतई तैयार नहीं है. वह कारपोरेट राजनीति को चलाये रख कर धर्मनिरपेक्षता को बचाने का ढोंग करता है. फासीवाद के बरक्स लोकतंत्र को बचाने की दुहाई देने वाले यह सच्चाई स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते कि इस तरह से न धर्मनिरपेक्षता को बचाया जा सकता है, न लोकतंत्र को. जो बचाया जा सकता है, वह वर्ग-स्वार्थ है, और अंतत: वही बच रहता है! कारपोरेट राजनीति के विज्ञापन में तब्दील हुई दिल्ली के चेहरे पर यही इबारत लिखी होती है. कारपोरेट के क्रीत-दास इस इबारत का गलत पाठ जनता को बताते हैं.                 
     
          

प्रतिक्रांति के हमसफर

(यह टिप्पणी 2014 की है. हस्तक्षेप पर प्रकाशित हुई थी. 5 साल बाद देश और दिल्ली में अब फिर चुनाव होंगे. टिप्पणी फिर से इसलिए दी जा रही है ...