Monday, 20 November 2017

बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के साम्प्रदायिक उत्पीड़न पर सोशलिस्ट पार्टी का बयान

17 नवम्बर 2017

प्रेस रिलीज़

बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के साम्प्रदायिक उत्पीड़न पर सोशलिस्ट पार्टी का बयान    

      सोशलिस्ट पार्टी का मानना है कि अल्पसंख्यक नागरिकों की धार्मिक पहचान के साथ जीवन, संपत्ति, सम्मान और व्यवसाय की पूरी हिफाजत करना हर राज्य का कर्तव्य है. साथ ही अल्पसंख्यक आबादी बिना किसी भय और भेदभाव के पूरे नागरिक अधिकारों के साथ स्वतंत्रता पूर्वक रह सके, यह सुनिश्चित करना भी राज्य की जिम्मेदारी है। आधुनिक राष्ट्र-राज्य की अवधारणा और संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्देशों में यह बात अच्छी तरह स्पष्ट की गई है. लेकिन बांग्लादेश की सरकारें यह जिम्मेदारी निभाने में नाकाम रही हैं.

      दुनिया में हिंदू आबादी वाले तीन सबसे बड़े देशों में बांग्लादेश का नाम है. यहाँ भारत और नेपाल के बाद सबसे ज्यादा, क़रीब डेढ़ करोड़ हिंदू रहते हैं। लेकिन इस्लामी कट्टरपंथियों के लगातार हमलों और सरकार की नाकामी के चलते बांग्लादेश में हिंदू आबादी लगातार घट रही है. बांग्लादेश ब्यूरो ऑफ़ स्टेटिस्टिक्स के आंकड़ों के मुताबिक इसका कारण हिन्दुओं का बांग्लादेश से पलायन है. आंकड़ों के मुताबिक 1947 में तब के पूर्वी पाकिस्तान में क़रीब 28  फीसदी हिंदू आबादी थी। 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद 1981 में वहां जो पहली जनगणना हुई उसमें हिंदू आबादी 12 फीसदी रह गई. इसके बाद 2011 की जनगणना के मुताबिक बांग्लादेश में करीब 9 फीसदी हिंदू बचे हैं.

      संयुक्त राष्ट्र संघ, भारत समेत दुनिया के कई देश, नागरिक अधिकार संस्थाएं और स्वतंत्र शोधकर्ता बांग्लादेश सरकार पर हिन्दुओं के खिलाफ जारी साम्प्रदायिक हिंसा को रोकने का दबाव डालते रहे हैं. लेकिन स्थिति में सुधार नहीं हो पा रहा है.  

      बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, खास तौर पर हिन्दुओं का उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर उत्पीड़न करने की घटनाएं अक्सर होती हैं. 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तानी सेना और इस्लामी साम्प्रदायिक तत्वों ने हिन्दुओं को हिंसा का खास निशाना बनाया. 1992 में अयोध्या स्थित बाबरी मस्जिद गिराए जाने पर बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ साम्प्रदायिक दंगे हुए. अंतर्राष्ट्रीय क्राइम्स ट्रिब्यूनल (आईसीटी) ने 2013 में ज़माते इस्लामी के उपाध्यक्ष हुसैन सईदी को युद्ध अपराधी करार देकर फांसी की सजा सुनाई. यह सजा उन्हें 1971 के युद्ध अपराधों के लिए सुनाई गई जिसमें कई लाख निर्दोष नागरिक, ज्यादातर हिन्दू, मारे गए थे. कट्टरपंथी इस्लामी तत्वों ने आईसीटी द्वारा दी गई सजा के लिए हिन्दुओं को ज़िम्मेदार ठहरा कर उनके खिलाफ 20 जिलों में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा की. 2014 के आम चुनावों के दौरान अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर साम्प्रदायिक हमले हुए. यह सिलसिला 2015, 2016 और  2017 में भी जारी रहता है. 

      फेसबुक पर डाली जाने वाली इस्लाम धर्म, पैगम्बर मुहम्मद और कुरआन की निंदा की तस्वीरों और टिप्पणियों के कारण हिन्दुओं के खिलाफ साम्प्रदायिक हिंसा का नया ट्रेंड देखने में आया है. 2012-13 से यह शुरुआत हुई और इसकी आंच बांग्लादेशी बौद्धों पर भी आई. 2012 में एक बौद्ध के नाम से डाली गई आपत्तिजनक फेसबुक पोस्ट की प्रतिक्रिया में करीब 25000 की भीड़ ने 22 बौद्ध मठों और 50 घरों को नष्ट कर दिया. ताज़ा उदाहरण फेसबुक पर लिखी एक आपत्तिजनक टिप्पणी है जिसके चलते 10 नवंबर 2017 को रंगपुर जिले के ठाकुरबाड़ी गांव में 30 से ज्यादा हिंदू परिवारों के घर जला दिए गए। इस तरह की ज्यादातर घटनाओं में माना गया है कि अल्पसंख्यकों को आसान निशाना बनाने के मकसद से इस्लामी कट्टरपंथी खुद फेसबुक के माध्यम का इस्तेमाल करते हैं.    

      अपने को धर्मनिरपेक्ष बताने वाली मौजूदा अवामो लीग सरकार अक्सर कहती है कि हिन्दुओं के खिलाफ हमले निहित राजनीतिक स्वार्थ के चलते कट्टरपंथी तत्व करते हैं. मीडिया और रपटों में इस्लामी कट्टरपंथी तत्वों को संगठित करने और बढ़ावा देने वालों में मुख्यत; जमाते इस्लामी (जेआई), उसके छात्र संगठन इस्लामी छात्र शिबिर (आईसीएस) और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) का नाम लिया जाता है. ईसिस (ISIS) जैसे अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी संगठनों का नाम भी इसमें आता है. बीएनपी की नेता खालेदा जिया 2001 में जमाते इस्लामी के साथ गठबंधन सरकार चला चुकी हैं. हालाँकि जमात और बीएनपी दोनों हिन्दुओं के साम्प्रदायिक उत्पीड़न में अपनी संलिप्तता से इनकार करते हैं.
  
      विशेषज्ञ बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर हमलों के पीछे धार्मिक और राजनीतिक के अलावा आर्थिक कारण भी बताते हैं. उनके मुताबिक विशेष कर 'वेस्टेड प्रॉपर्टी एक्ट' (The Vested Property Act) ने सामाजिक और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली बहुसंख्यक लोगों ने हिन्दुओं की ज़मीन पर कब्जा ज़माने की नीयत से कट्टरपंथी तत्वों को बढ़ावा दिया है.  

      सोशलिस्ट पार्टी का सत्तारूढ़ अवामी लीग और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी, ज़माते इस्लामी समेत सभी विपक्षी राजनीतिक पार्टियों से आग्रह है कि वे अल्पसंख्यक नागरिकों के जीवन, संपत्ति, सम्मान और व्यवसाय की पूरी हिफाजत सुनिश्चित करें. ताकि हिन्दू, बौद्ध और ईसाई बिना भय और भेदभाव के पूरे नागरिक अधिकारों के साथ स्वतंत्रता पूर्वक अपने देश में रह सकें. साथ ही पार्टी की मांग है कि सरकार अभी तक की घटनाओं में संलिप्त अपराधियों को तुरंत गिरफ्तार कर सजा दे.

      सोशलिस्ट पार्टी आगाह करना चाहती है कि बांग्लादेश की यह स्थिति भारत के लिए एक सबक है. भारत के शासक वर्ग को भारतीय संविधान में उल्लिखित धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का ईमानदारी से पालन करना चाहिये. दुर्भाग्य से मौजूदा सरकार में प्रधानमन्त्री और मुख्यमंत्री की हैसियत वाले नेता धर्मनिरपेक्षता की खुले आम अवमानना करते हैं. यहाँ तक कि खिल्ली उड़ाते हैं. यह देश और समाज के लिए बेहद खतरनाक स्थिति है. 1971 में बना बांग्लादेश 1972 में संवैधानिक रूप से धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया गया था. लेकिन फौजी तानाशाह जनरल इरशाद ने 1988 में इस्लाम को बांग्लादेश के राज्य धर्म का दर्ज़ा दिया जो बांग्लादेश के स्वतंत्रता आंदोलन के नारों - धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र - के बिलकुल उलट था. मुहम्मद अली जिन्ना ने भी पकिस्तान को एक धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक देश बनाने का फैसला किया था. लेकिन वहां की स्थिति सबके सामने है. सोशलिस्ट पार्टी का मानना है कि लोकतंत्र बिना धर्मनिरपेक्षता के नहीं चल सकता. भारत के लिए बांग्लादेश और पाकिस्तान इसके निकटतम उदाहरण हैं.  
   
डॉ. अभिजीत वैद्य
प्रवक्ता
मोबाइल : 9822090755 

Socialist Party's statement on communal persecution of minorities in Bangladesh

17 November 2017

Press release

Socialist Party's  statement on communal persecution of minorities in Bangladesh

            The Socialist Party believes that it is the duty of every state to fully protect life, property, dignity and business of minority citizens with their religious identity. It is also the responsibility of the state to ensure that the minority population can live freely enjoying full civil rights without any fear and discrimination. The very concept of modern nation-state and the instructions of the United Nations Organization (UNO) has made it very clear. But Bangladesh's governments have failed to fulfill this responsibility.

            Bangladesh is the third county in the world as far as the  Hindu population is concerned. Here the largest, about 1.5 crore, population of Hindus are living as citizens, after India and Nepal. But due to frequent attacks of Islamist fundamentalists and the failure of the government, the Hindu population is constantly declining in Bangladesh. According to the Bangladesh Bureau of Statistics, the reason for this that  the Hindus have been fleeing from Bangladesh. According to statistics, in 1947 there was about 28 percent Hindu population  in East Pakistan. In 1971, after the formation of Bangladesh, the first census was held in 1981, in which the Hindu population was 12 percent. After this, according to the 2011 census, there are about 9 percent Hindus left in Bangladesh.

          The United Nations, several countries of the world including India, civil rights organizations and independent researchers have been pressurizing the government of Bangladesh to stop communal violence against Hindus. But the situation is not  improving. 

            In Bangladesh, incidents of communal persecution of minorities, especially Hindus takes  place frequently. During the Bangladesh Liberation War in 1971, Pakistani army and Islamist communal elements specifically targeted  the Hindus. In 1992, after the demolition of Babri Masjid in Ayodhya, there were communal riots against Hindus in Bangladesh. International Crimes Tribunal (ICT) in 2013 awarded death sentence to Jamaat-e-Islami vice-president Hussain Sayeedi for committing war crimes in the war of 1971 in which millions of civilians, mostly Hindus, were killed. Radical Islamists have accused the Hindus for the punishment given by the ICT and a widespread communal violence against them was witnessed in 20 districts. There were communal attacks on minority Hindus during the 2014 general elections. This series continues in 2015, 2016 and 2017.

            The new trend of communal violence against Hindus has been seen due to pictures and comments perceived as blasphemy or defamation of Islam, Prophet Muhammad and Quran are uploaded on social site Facebook. This trend started from the year 2012 and its ire came to Bangladeshi Buddhists also. In reaction to a objectionable Facebook post allegedly uploaded by a Buddhist boy in 2012, a crowd of about 25,000 destroyed 22 Buddhist monasteries and 50  houses. The latest example is an objectionable post on Facebook that led to the burning of more than 30 Hindu houses in Thakurbadi village of Rangpur district on 10 November 2017. In most such incidents, it is believed that Islamist fundamentalists themselves use Facebook with an intention to make the minorities their easy target.

            The present Awami League government, which calls itself secular, often says that the attacks against Hindus made by fundamentalist elements are politically motivated. In the national/international media and other reports, mainly Jamaat-e-Islami (JI), its student organization Islamic Chhatra Shibir (ICS) and Bangladesh Nationalist Party (BNP) are named for organizing and promoting Islamist fundamentalist elements. The name of international terrorist organizations like ISIS also comes in. BNP leader Khaleda  Zia formed a coalition government in 2001 with Jamaat-e-Islami. However, Jamaat and BNP both deny their involvement in communal persecution of Hindus.

            Experts also point out the economic reasons  behind the attacks on minority Hindus in Bangladesh, besides religious and political reasons. According to them, particularly due to 'The Vested Property Act', socially and politically influential people of the majority keep encouraging radical elements for communal unrest with the intention to grab the lands of Hindus.

            Socialist Party urges the ruling Awami League and all opposition political parties, particularly Bangladesh Nationalist Party and Jamaat-e-Islami, to ensure full security of life, property, dignity and business of minority citizens in Bangladesh. So that Hindus, Buddhists and Christians can live freely in their country enjoying full civil rights without any fear and discrimination. At the same time, the party demands that the government should immediately arrest and convict the criminals involved in the incidents of communal persecution.

            The Socialist Party would like to warn that the situation in Bangladesh is a lesson for India. The ruling class of India should follow the principle of secularism as outlined in the Indian Constitution. Unfortunately, the leaders of the stature of Prime Minister and Chief Minister in the present government openly show contempt to and ridicule the principal of secularism. This is a very dangerous situation for the country and society. Bangladesh, created in 1971, was declared  constitutionally as a secular state in 1972. But military dictator General Irshad made  Islam the state religion of Bangladesh in 1988 which was totally contrary to the slogans of Bangladesh's freedom movement - secularism and democracy. Muhammad Ali Jinnah also decided to make Pakistan a secular democratic country. But the situation there is obvious for everyone to see . The Socialist Party believes that democracy cannot run without secularism. Bangladesh and Pakistan are the closest examples for India.

Dr. Abhijit Vaidya
Spokesperson
Mobile: 9822090755

Wednesday, 15 November 2017

NEHRU’S ROLE IN INDIA

NEHRU’S ROLE IN INDIA

Rajindar Sachar


Reverence and hero worship for Jawaharlal Nehru was normal not only with the older generation but with our generation as well. My father, Bhim Sen Sachar was a Congressman in 1937 he was elected to the Punjab Legislative Assembly. Nehru campaigned for my father in that election. Even though I was just 14, I got ample opportunity to have a close view of him at meetings and functions.

In May 1949, the Socialist Party under Ram Manohar Lohia’s leadership held a demonstration in front of the Nepal embassy in New Delhi to protest against the Rana government in the Himalayan kingdom. We were arrested (about 50 of us including Lohia) for violating Section 144 CRPC  and remained in jail for a month and a half. It was during that imprisonment that Nehru and Indira sent a basket of mangoes to Lohia. Sardar Patel wrote to Nehru expressing his annoyance for sending mangoes to a person in jail who had violated the law. Nehru in his quiet way told him that politics and personal relationships are two separate things and should not be mixed up.

In 1952, the Congress returned to power with a clear majority in the Punjab Assembly elections. Nehru and Azad appointed my father as the leader of the Congress party and he again became the Chief Minister of Punjab, which then comprised of present-day Haryana and Himachal Pradesh.

Political morality was very high amongst the leaders of 1950s. For instance, when the governor of Punjab invited Vijaya Lakshmi Pandit as a guest for a vacation in Simla (then capital of Punjab) in 1954, she was put up in the government guest house and a bill of Rs. 2064 was sent to the governor because she was his guest. The governor however, didn’t pay the bill and the chief engineer brought this to the notice of my father. On his next visit to Delhi in May 1955, my father brought that matter to Nehru’s notice. Imagine a cm is discussing a small amount of money with his leader. But father was very strict on his principles. And Nehru’s response was equally commendable. He opened his drawer and wrote a cheque of 1000 and said: “I am giving this now. I am going to Europe and once I come back I will pay the remaining amount.” Later on, the governor was so ashamed that he paid the balance from his discretionary fund.

I myself had a personal experience in 1955 when I was the chairperson of the Socialist Party (Punjab) and the general secretary of the Punjab High Court Bar Association. In 1955, the Punjab High Court was shifting from Simla to Chandigarh. It was to be inaugurated by Nehru and he had come to Chandigarh the evening before. My father, who was then the Chief Minister of Punjab, invited Nehru for an informal breakfast at our residence. I was staying with my father though my office was in another sector. It was a rare occasion for a young man like me, who admired Nehru a lot. But, I had grown up by then. Our party was convinced (rightly or wrongly, time alone will tell) that Nehru, who had shown the vision of socialism to us, had not kept that pace following wrong policies. Our differences with his policies were deep. I was a small fry in part of that milieu. So I told my father that I will not be at the breakfast table to receive Nehru, though my wife will be there along with my mother to play the hostess. My father and I had a beautiful understanding and respected each other’s view. He realised my reluctance but mentioned that I was being childish.

I went to my office before Nehru arrived. I continued to admire Nehru and I could not think of being at home and be rude by not joining him for breakfast. Of course, we received Nehru with all the dignity and deference due to him when he came to the high court inauguration.

Now I laugh at my presumptuousness — a chit of boy, whom Nehru will not even notice beating his chest by not attending and denying himself a rare close breakfast meeting with one of the greatest of leaders of India and who had been a hero of our family. But then I take it as the peculiarities of a radical youth, the devil I may I care attitude and the almost fatalistic belief in the rightness of the cause of one’s own party. But then I believe that is the real difference between youth and old age – one may laugh now, but one does not demean conduct because at that time it represented what I like to feel was a youthful, genuine and unshakeable faith in socialism – which fortunately, I have still not lost.

Nehru was indeed doing some inner thinking and so expressed it to Maulana Azad thus: “we should do something for Sachar”. He soon appointed father as the governor of Orissa in 1956 and wrote to the Chief Minister saying “Your governor is a very good administrator and you will find him so.”

Father thereafter left active politics and engaged himself in the Khadi movement. But his spirit of freedom was still strong as ever when he wrote to Indira Gandhi during the Emergency reminding her of what Nehru had said about total freedom of the press.
New Delhi
July 23, 1975

Bhim Sen Sachar 
 “To my mind, the freedom of the press is not just a slogan from the larger point of view but it is an essential attribute of the democratic process. I have no doubt that even if the Government dislikes the liberties taken by the Press and considers them dangerous it is wrong to interfere with the freedom of the Press. By imposing restriction you do not change anything; you merely suppress the public manifestation of certain things, thereby causing the idea and thought underlying them to spread further. Therefore, I would rather have a completely free Press with all the dangers involved in the wrong use of that freedom than a suppressed or regulated Press.”
We must respond to the call. Accordingly we propose, with effect from August 9, 1975 and regardless of consequences to ourselves, to advocate openly the right of public speech and public association and freedom of the Press, for discussing the merits and demerits of the Government arming itself with extraordinary powers.
Yours faithfully,
Bhim Sen Sachar & Ors.


         
Father was arrested soon, and released because his Habeas Corpus petition was accepted by High Court.

Rajindar Sachar

What is RSS?


What is RSS? 

Madhu Limaye.
I entered in political life in 1937. I was quite young then but as I had passed my matriculation examination at a relatively early age, I also entered college quite early. Quite active in Pune in those days were the RSS and the Savarkarites (followers of Vinayak Damodar Savarkar) on the one hand and nationalist, socialist and leftist political organisations on the other. On May 1, 1937 we took out a march to observe May Day. The marchers were attacked by the RSS and Savarkarites when, among others, the well-known revolutionary Senapati Bapat and our socialist leader, SM Joshi, were injured. We have had serious differences with these Hindutva organisations ever since.

Our first difference with the RSS was over the issue of nationalism. We believed that every citizen had equal rights in the Indian nation. But the RSS and the Savarkarites came up with their notion of Hindu Rashtra. Mohammad Ali Jinnah too was a victim of a similar world view. He believed that India was made up of two nations, the Muslim nation and the Hindu nation. Savarkar too said the same thing.

The other major difference between us was that we dreamt of the birth of a democratic republic while the RSS claimed that democracy was a western concept that was not appropriate for India. In those days members of the RSS were full of praise for Adolf Hitler. Guruji (Madhav Sadashiv Golwalkar) was not only the sarsanghchalak (head) of the RSS; he was its ideological guru as well.

There is amazing similarity between the thoughts of Guruji and the Nazis. One of Guruji’s books, we or Our Nationhood Defined, ran into several editions, its fourth edition having been published in 1947. At one point in the book, Guruji says, “The non-Hindu people in Hindustan must adopt the Hindu culture and language, must learn to respect and hold in reverence Hindu religion, must entertain no ideas but those of the glorification of the Hindu race and culture i.e. they must not only give up their attitude of intolerance and ungratefulness towards this land and its age-old traditions but must also cultivate the positive attitude of love and devotion instead – in a word, they must cease to be foreigners, or may stay in the country wholly subordinated to the Hindu nation, claiming nothing, deserving no privileges, far less any preferential treatment – not even citizen’s rights.”

In other words, Guruji wanted to see millions of Indians treated as non-citizens. He wanted all their citizenship rights taken away. Incidentally, these ideas of his were not newly formulated. From the time we were in college (in the mid-1930s), members of the RSS were inclined to follow Hitlerian ideals. In their view, Muslims and Christians in India deserved to be treated the same way that Hitler
treated Jews in Germany.

The extent of Guruji’s sympathies for the views of the Nazi Party is evident from the following passage from ‘we or Our Nationhood Defined: “To keep up the purity of the race and its culture, Germany shocked the world by her purging the country of the Semitic races – the Jews. Race pride at its highest has been manifested here. Germany has also shown how well- nigh impossible it is for races and cultures having differences going to the root, to be assimilated into one united whole, a good lesson for us in Hindustan to learn and profit by” (We or Our Nationhood Defined, 1947, p. 42).

You might say that this is an old book, of a time when India was in the throes of the struggle for independence. But then there is his second book, Bunch of Thoughts. I cite below an example from this “popular publication” which was brought out in November 1966. In this book, while discussing India’s internal security problem, Guruji identifies three internal dangers. One is Muslims, the second Christians and the third Communists. In Guruji’s view, every Indian Muslim, every Christian and every Communist is a danger to the nation’s security. Such is his ideology.

Our second major difference with Guruji and the RSS has to do with the caste question. They are supporters of the caste system while a socialist like me is its greatest enemy. I consider myself to be the biggest enemy of Brahmanism and the caste system. I am of the firm view that there can be no economic and social equality in India until the caste system and the inequalities based on it are demolished.

But Guruji says, “Another unique feature of our society was the varna vyavastha (caste system, the former occupation-based classification of society) which is today vilified as jati pratha (a rigid caste system).” He adds, “Society was conceived of in the image of an all-powerful god, of four aspects, who was to be worshipped by different people in their own ways as determined by their different capabilities. The Brahmin was considered great because he was the purveyor of knowledge. The Kshatriya was considered equally great because he destroyed the enemies. The Vaishya was no less important than others because through agriculture and commerce he fulfilled a social need. The Sudra too was important for he served society through his workmanship.” Here it is very shrewdly being asserted that through his workmanship the Sudra is fulfilling an important social need. But Chanakya’s Arthashastra, from which Guruji takes his inspiration, clearly states that it is the religious duty of the Sudras to serve the Brahmins, the Kshatriyas and the Vaishyas. In a clever subterfuge, Guruji replaces service of the upper castes with “service of society”.

The fourth issue on which we differ is that of language. We are in favour of promoting the languages of the people. All regional languages, after all, are indigenous. But what does Guruji have to say on this? Guruji says that for now Hindi should be made the common language for all while the ultimate objective should be to make Sanskrit the national language. He says in his Bunch of Thoughts, “For convenience, Hindi should be given primacy as our link language until such time as Sanskrit is adopted as our national language.” Thus Hindi is merely for convenience, the ultimate link language is to be Sanskrit.

We have had differences over this right from the start. Like Mahatma Gandhi and Lokmanya Tilak, we too have always been in favour of the regional languages. We do not wish to impose Hindi on anyone. We would like to see Tamil as the prevalent language in Tamil Nadu, Telugu in Andhra Pradesh, Marathi in Maharashtra and Bengali in West Bengal. If the non-Hindi speaking states wish to adopt English, it should be up to them. We have no differences with them on this. But Sanskrit is the language of a handful of people, the language of a particular caste. Making Sanskrit the national language means the supremacy of a handful of people over others, something we definitely do not want.

Fifth, the national movement for independence had accepted the idea of a federal state. In a confederation, the centre would definitely have certain powers on specific matters but all others would be a subject matter for the states. But following partition, in a bid to strengthen the centre, the Constitution stipulated a concurrent list. As per this list, several subjects were made concurrent, subjects over which both the centre and the states have equal jurisdiction. What was originally meant to be under the domain of different states was included in the concurrent list only to strengthen the centre. Thus the federal state came into existence.

But the RSS and its chief ideologue, Guru Golwalkar, have been consistently opposed to this basic constitutional provision. These people ridicule the very concept of ‘a union of states’ and maintain that this Constitution, which envisages a confederation of states, should be abolished. Guruji says in his Bunch of Thoughts, “The Constitution must be reviewed and the idea of a unitary state should be written into the new Constitution.” Guruji wants a unitary or, in other words, a centralised state. He says that this system of states should be done away with. What he wants is one nation, one state, one legislature and one executive. In other words, he wants to abolish state legislatures and state ministries. That means they wish to see the rule of the stick. If they were to capture power, they would doubtless bring into existence a centralised state.

Another issue was the tricolour, the flag chosen by the national movement. Hundreds of Indians sacrificed their lives, thousands bore the brunt of lathis for the honour and glory of our chosen national flag. But surprisingly, the RSS has never accepted the tricolour as the national flag. It always swore by the saffron flag, asserting that the saffron flag has been the flag of Hindu Rashtra since time immemorial.

Just as Guruji rejected the concept of a federal state, similarly, he had no faith in a democratic system. He was of the firm view that democracy is a concept imported from the West and the system of parliamentary democracy did not jell with Indian thought and Indian civilization. As for socialism, that for him was a totally alien idea. He repeatedly said that all isms, including socialism and democracy,  were alien ideas which should be rejected, that Indian society should be founded on Indian culture. Speaking for ourselves, we believe in parliamentary democracy, in socialism, and we aspire to establish socialism consistent with Gandhian principles in India through peaceful means.

While we were engaged in a struggle against the Congress party’s autocratic rule, our leader, Dr Rammanohar Lohia, was of the opinion that we should join hands with all opposition forces to save the nation and dislodge from power the Congress party which was responsible for our humiliation at the hands of the Chinese. I had lengthy discussions with Doctor Lohia on the issue. This debate went on for two years. I kept insisting throughout that we cannot have any alliance with the RSS and the Jan Sangh. Ultimately, Doctor Sahib asked me, “Do you accept my leadership or not?” I replied, “Yes, I do.” He said it wasn’t necessary for us to agree on every issue or for him to have to convince me on every issue. Let there be an issue or two on which we disagreed. And since he was only thinking of a political alliance to defeat a major enemy, I should cooperate with him, let his idea be given a “trial”. Perhaps he would be proven right, he said, perhaps I would. I remained convinced however that a clash between the RSS and the Lohiaite ideologies was inevitable.

It is a fact that we formed an alliance with these people (RSS and Jan Sangh) when Mrs. Indira Gandhi imposed the emergency.Lok Nayak Jaiprakashji believed that if the opposition did not unite under the banner of a single party it would be impossible to defeat Mrs. Gandhi. Choudhary Charan Singh was also of the view that we should come together and form a united party. While we were in jail, we were all asked to give our opinions on the need to form such a party and contest elections. I recall sending a message that in my view we must contest elections. 

Millions of people would participate in elections. Elections are a dynamic process. As the electoral tempo builds up, the shackles of emergency are bound to snap and people are bound to exercise their democratic right. Therefore, I stressed, we must participate in elections.

Since Lok Nayak Jaiprakash Narain and other leaders were of the view that without coming together under the banner of one party we could not succeed, we (socialists) too gave it our consent. But I would like to stress that the understanding that was arrived at was between political parties – the Jan Sangh, the Socialist Party, the Congress (O), the Bharatiya Lok Dal (BLD) and some dissident Congress factions. We did not come to any arrangement with the RSS, nor did we accept any of its demands. What is more, through a letter by Manubhai Patel that was circulated among all of us in jail we learnt that on July 7, 1976 Choudhary Charan Singh had raised the issue of a possible clash of interests because of dual membership when members of the RSS also became members of the new party. In response, the then acting general secretary of the Jan Sangh, Om Prakash Tyagi had said that the proposed party should feel free to formulate whatever membership criteria it wanted. He even said that since the RSS, having faced many constraints had been dissolved anyway, the question of RSS membership did not arise.

Later, when the constitution of the proposed Janata Party was being drawn up, the subcommittee appointed to draft the constitution proposed that members of any organisation whose aims, policies and programmes were in conflict with the aims, policies and programmes of the Janata Party should not be given membership to the new party. Given the self-evident meaning of such a membership criterion, there was no question of anyone opposing it. However, it is significant that the sole opposition to this came from Sunder Singh Bhandari (Jan Sangh). At a meeting convened in December 1976 to thrash out issues, reference was made to a letter written by Atal Bihari Vajpayee on behalf of the Jan Sangh and the RSS, stating that a section of leaders of the proposed party had agreed that the RSS issue could not be raised in connection with membership of the Janata Party. But several leaders told me that no such assurances were given because the RSS was nowhere in the picture at the time when the idea of a merger of opposition political parties was mooted. I want to clarify that I was in prison at the time and even if there was some secret understanding, I had no part in it.

I can categorically assert that the election manifesto of the Janata Party did not in any way reflect the concerns of the RSS. In fact, each point in the manifesto was clearly spelt out. Is it not a fact that the manifesto of the Janata Party spoke of a socialist society based on secular, democratic and Gandhian principles and in which there was no mention of Hindu Rashtra? The manifesto also assured the minorities equal citizenship rights and vowed to safeguard their rights. In contrast, Guruji wanted to deny equal citizenship rights to the minorities and wanted them to be subservient subjects in a Hindu Rashtra. The Janata Party was committed to decentralisation while Guruji was a hardcore proponent of centralisation. He wanted to abolish separate states, abolish state legislatures and ministries while the Janata Party emphasized the need for greater decentralisation. In other words, the Janata Party had no desire to snatch away the autonomy of states. The manifesto spoke of socialism, social justice and equality. Did the manifesto state that it upholds the caste system? Did it maintain that the Sudras’ duty was to devote their life in the service of others? On the contrary, the manifesto not only promised that the backward castes would have full opportunity to progress, it pledged special policies for them: 25-33 per cent reservation for them in government jobs.

Yes, it is true that members of the RSS did not genuinely accept the provisions of the party’s election manifesto. It was my contention and I had once even complained in writing to Kushabhau Thakre that during discussions you people (RSS, Jan Sangh) very readily agree on matters that you at heart totally disagree with. That is why your motives are suspect. I wrote this letter to him a long time ago and I have always had doubts about the RSS. I have had these doubts since Doctor Sahib’s time (Dr Rammanohar Lohia died in 1967). But despite this, the fact remains that to Mrs. Indira Gandhi we entered into a political alliance with them.

Since it was Lok Nayak Jaiprakashji’s desire that all parties should merge for a united opposition to dictatorship and since the party manifesto did not make any compromises, I consented to our coming together. At the same time, I would like to say that from the beginning I was very clear in my mind that to emerge as a unified and a credible body the Janata Party would have to do two things. One, the RSS would have to change its ideology and accept the ideal of a secular democratic state. Two, the various organisations that are part of the sangh parivar, such as the Bharatiya Mazdoor Sangh and the Vidyarthi Parishad, would have to dissolve themselves and merge with the secular-minded trade union and student wings of the Janata Party. I was very clear about this from the beginning and as the Janata Party had given me the responsibility to manage the affairs of its trade union and student wings, it was my consistent attempt throughout to ensure that the Vidyarthi Parishad and the Bharatiya Mazdoor Sangh ended their separate existence.

But these people started insisting on their autonomy. In fact, these organisations always function on the dictates of Nagpur (RSS headquarters), they believe in the one leader principle. Take, for example, Guruji himself. Guruji maintained that they create a mind-set which is totally disciplined and where people accept whatever they tell them. This organisation operates on a single principle: one leader. They do not believe in democracy, they have no faith in discussions and debate. They have no economic policy. For example, in his ‘Bunch of Thoughts’, Guruji expressed unhappiness over the abolition of the zamindari system in India. Guruji was deeply saddened, deeply disturbed by the abolition of the zamindari system. But he felt no compassion for the poor.

I told members of the RSS that you must abandon your ideal of organising Hindus alone and find a place for people of all religions within your organisation, that you must merge your different class- based organisations with those of the Janata Party. They responded by saying that this could not be done so soon, that there were very many difficulties involved but they did want to change, bit by bit. They continued to give such evasive replies.

From their behaviour I concluded that they had no intention of changing. Especially after the assembly elections of June 1977, when they managed to gain power in four states and one union territory, after which they began to think that with this newly acquired clout they had no need to change. Now that they had already captured four states, they would gradually also gain control of other states and finally even the centre. The leaders of other political parties in the Janata Party were older leaders who would not live long; and they would ensure that no younger (non-RSS, non-Jan Sangh) leader emerged at the top.

As is evident from the pages of the Organiser and Panchjanya (RSS mouthpieces in English and Hindi), they have not spared a single Janata Party leader who is not from their parivar. I, of course, was their special favourite, the target of special attention. They probably devoted more column space to abusing me than they did even for Mrs. Indira Gandhi.

For a protracted period I persisted in dialogue with these people. I recall an occasion when Balasaheb Deoras (later RSS sarsanghchalak) visited me at my residence in Mumbai. Subsequently, I met him once again after the 1971 polls. I also had discussions with Madhavrao Mule once before the emergency. On the fourth occasion, I met Balasaheb Deoras and Madhavrao Mule together in May 1977. So no one can claim that I made no attempt to talk to them. But I finally reached the conclusion that they have closed minds in which no new idea can germinate.

On the contrary, the RSS specialises in casting young minds in a particular mould from a very young age. The first thing they do is ‘freeze’ the minds of children and of youth, making them impervious. After this they are rendered incapable of responding to other ideas.

Still, I tried. On one occasion I convened a meeting of all trade union leaders. The representatives of all constituents of the Janata Party attended but the Bharatiya Mazdoor Sangh boycotted the meeting. Not just that, they hurled abuses at me for no apparent reason. Similar efforts were made with the Vidyarthi Parishad and the Yuva Morcha but despite all attempts at a merger, they held aloof. This is only because of the RSS’ desire to function as a “super party”.

Their aim is not only to enter into every aspect of people’s life but also to control it. In an article written for The Indian Express around that time, George Fernandes used the example of Dattopant Thengdi to make the same point. Thengdi responded by saying that the RSS intended to have all of society under its sway, it would leave no aspect of a person’s life untouched, it would establish its hegemony in every department of life. Thengdi, of course, was saying nothing new. Similar views have been repeatedly asserted by Guruji in his We or Our Nationhood Defined, as also in Bunch of Thoughts. No totalitarian organisation allows any space for freedom, its tentacles reach everywhere: art, music, economy, culture. This is the essence of any fascist organisation.

The fact is that the RSS wanted to capture the Janata Party and through it to take control of the state apparatus. For this they simultaneously dangled the carrot of the prime minister’s chair before several Janata Party leaders. On the one hand, they went on assuring Morarji Desai to the end that he was their choice for prime minister. Every now and then they would promise Choudhary Charan Singh that they would support his claim to be prime minister. Concurrently, they kept giving similar assurances to Chandra Shekhar, Jagjivan Ram and George Fernandes. Not once did they dare to make me a similar offer. When I once jokingly mentioned this to Vajpayee, he quipped, “Why you, Nanaji (Deshmukh) has never made me such a promise either. They want neither you nor me as prime minister.” Anyway, they never made any such suggestion to me, knowing only too well that I would not deny others their due nor would I allow others to deny mine. Perhaps they think, you can’t fool this man so what’s the point of promising him anything – it will only make him (Limaye) even more cautious. 

What these people (the RSS) do on the odd occasion is however of little importance. Has the RSS ever said that they have abandoned Guruji’s way of thinking? Only Atalji says that we should all accept the principles of composite nationalism, democracy, socialism, social justice, etc because we cannot move forward without them in today’s world. But Atalji is the only one who says this. I do not trust the other sanghis. These people pleaded for pardon while in prison, Balasaheb Deoras congratulated Indira Gandhi when the Supreme Court ruled in her favour in the Raj Narain case. So I have no faith in the utterances of these people. I am of the firm belief that I could only have trusted these people (erstwhile Jan Sangh leaders in the Janata Party) if they had ousted RSS leaders from the party, expelled them from the working committee, placed restrictions on RSS activities and, in particular, expelled people like Nanaji Deshmukh, Sunder Singh Bhandari and company from the party.


(Translated by Javed Anand.)

(May 1st marks the birth anniversary of senior socialist leader, the late Madhu Limaye. The above piece, penned by Madhu Limaye soon after the split in the Janata Party, was published by the Hindi weekly, Ravivar, in 1979. Though dated, many of the issues he raises in the article are relevant even today).


Friday, 10 November 2017

स्वर्गीय लोहिया साहब


स्वर्गीय लोहिया साहब 

रामधारी सिंह 'दिनकर’
डॉक्टर राममनोहर लोहिया से मेरी पहली मुलाकात सन् 1934 या 35 में पटना के सुप्रसिद्घ समाजवादी नेता स्वर्गीय फूलन प्रसाद जी वर्मा के घर पर हुई थी और हम लोगों का परिचय मित्रवर श्री रामवृक्ष बेनीपुरी ने करवाया था। उस समय लोहिया साहब मुझे उद्वेगहीन, सीधे सादे नौजवान के समान लगे थे, क्योकि जितनी देर हम साथ रहे, उहोंने बातें कम और काफी विनम्रता से की थीं। उन दिनों पहली पंक्ति के नेता गांधी जी और जवाहरलाल, राजेन्द्र बाबू और सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस और राजा जी तथा मौलाना आजाद और डॉक्टर अंसारी थे, मगर दूसरी पंक्ति के नेताओं का भी देश में बड़ा नाम था। आचार्य नरेन्द्र देव और जयप्रकाश जी, यूसुफ मेहर अली और अच्युत पटवर्धन, डॉक्टर लोहिया और पं. रामनंदन मिश्र तथा श्री गंगाशरण सिंह और श्री अशोक मेहता, इनमें से प्रत्येक की महिमा तेजस्वी और मेधावी देशसेवक की महिमा थी। आचार्य जी तो उम्र के लिहाज से दोनों पीढिय़ों के बीच की कड़ी के समान थे, मगर नवयुवकों के विचारदाता वे ही थे और हर समय साथ वे नवयुवक समाजवादियों का ही देते थे। लगभग यही भूमिका डॉक्टर सम्पूर्णानंद जी की भी थी। वे भारतीय संस्कृति के पूर्णता होने पर भी समर्थन समाजवाद का करते थे, इससे समाजवादी विचारधारा को बड़ा बल मिलता था। उन दिनों हम लोग विश्वासपूर्वक यह मानते थे कि नेतृत्व का जो बोझ जवाहरलाल जी की पीढ़ी के कंधों से उतरेगा, वह इसी समाजवादी दल के कंधों पर आयेगा। मगर विधि का विधान कुछ और था। यूसुफ मेहर अली तो असमय ही स्वर्गीय हो गये। बाकी जो लोग कायम रहे, उनके भीतर व्यक्तिवाद बहुत अधिक बढ़ गया और वे किसी एक दल के जुए के नीचे अपनी गर्दनें नहीं लगा सके। श्री रामनन्दन मिश्र और श्री अच्युत पटवर्धन को तो आश्रम ने खींच लिया, जयप्रकाश जी सर्वोदय की ओर चले गये और नरेन्द्र देव जी मुख्यत: शिक्षाशास्त्री बन गये। नवयुवकों के इस दल का कोई एक सदस्य अगर आजीवन विस्फोटक बना रहा, तो वे डॉक्टर राममनोहर लोहिया थे।

जिस लोहिया से मेरी मुलाकात सन् 1934 ई. में पटना में हुई थी और जो लोहिया संसद में आये, उन दोनों के बीच भेद था। सन् चौंतीस वाला लोहिया युवक होता हुआ भी विनयी और सुशील था, किन्तु संसद में आने वाले प्रौढ़ लोहिया के भीतर मुझे क्रांन्ति के स्फुलिंग दिखाई देते थे। राजनैतिक जीवन के अनुभवों ने उन्हे कठोर बना दिया था और बुढ़ापे के समीप पहुँचकर वे उग्रवादी बन गये थे। उनका विचार बन गया था कि जवाहरलाल जी से बढ़कर इस देश का अहित और किसी ने नहीं किया है तथा जब तक देश में कांग्रेस का राज है, तब तक देश की हालत बिगड़ती ही जायेगी। अतएव उन्होने अपनी राह बड़ी निर्दयता से तैयार कर ली थी और वह सीधी राह यह थी कि जवाहरलाल जी का जितना ही विरोध किया जाय, वह कम है और कांग्रेस को उखाड़ने के लिए जो भी रास्ते दिखाई पड़ें, उन्हे जरूर आजमाना चाहिए।

स्वराज्य होने पर भी लोहिया जी को कई बार जेल जाना पड़ा। एक बार वे उस जेल में कैद किये गये थे, जिसमें कभी जवाहरलाल जी को काफी दिनों तक कैद रहना पड़ा था। उस जेल में, स्वराज्य के बाद, जवाहरलाल जी की एक मूर्ति स्थापित की गयी थी। जेल से छूटने पर लोहिया जी के मित्रो ने उनसे पूछा, ''कहिए, इस बार का कारावास कैसा रहा?” लोहिया जी ने कहा, ''कुछ मत पूछो! मैं जिस कोठरी में कैद था, उसी के सामने जवाहरलाल जी की मूर्ति खड़ी थी और हर वक्त मेरी नजर उसी मूर्ति पर पड़ जाती थी। जल्दी रिहाई हो गयी, नहीं तो उस मूर्ति को देखते देखते मैं पागल हो जाता।“

वाणी, व्यवहार और कार्यक्रमों में इतनी कठोरता बरतने के बावजूद लोहिया साहब मानते थे कि वे गांधी जी की ही राह पर चल रहे हैं; बल्कि वे मानते थे कि वे गांधी जी के सबसे बड़े अनुयायी हैं। राजनीति की अन्य बातों में उनका यह विश्वास कहाँ तक सही माना जा सकता था, यह विषय चिंत्य है, मगर यह ठीक है कि देश में छाई हुई गरीबी को देखकर उनके हृदय में क्रोध भभकता रहता था और अंग्रेजी को वे एक क्षण भी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं थे। जब से लोहिया साहब संसद के सदस्य हुए, संसद में हिन्दी के सबसे बड़े प्रवक्ता भी वे ही हो गये थे। उन्होने संसद में अपने सारे भाषण हिन्दी में दिये और राजनीति की पेचीदा से पेचीदा बातों का उल्लेख उन्होने हिन्दी में ही किया। उनकी विशेषता यह थी कि भारी से भारी विषयों पर भी वे बहुत सरल हिन्दी में बोलते थे। जहाँ तक मुझे याद है, वे सेना और फौज के बदले पलटन कहना ज्यादा पसन्द करते थे। दिल्ली में हिन्दी के विरोधी तरह-तरह के लोग हैं, मगर लोहिया साहब के भाषणो से उन सभी विरोधियों का यह भ्रम दूर हो गया था कि हिन्दी केवल कठिन ही हो सकती है और अंग्रेजी का सहारा लिये बिना हिन्दी में पेचीदा बातों का बखान नहीं किया जा सकता। मेरा ख्याल है, हम सभी हिन्दी प्रेमियों ने संसद में हिन्दी की जितनी सेवा बारह वर्षों में की थी, उतनी सेवा लोहिया साहब ने अपनी सदस्यता के कुछ ही वर्षों में कर दी। टंडन जी के बाद संसद में वे हिन्दी के सबसे बड़े योद्घा थे।

संसद में आते ही विरोधी नेता के रूप में लोहिया साहब ने जो अप्रतिम निर्भीकता दिखायी थी, उसकी बड़ाई खानगी तौर पर कांग्रेसी सदस्य भी करते थे और उस निर्भीकता के कारण लोहिया साहब पर मेरी भी बड़ी गहरी भक्ति थी। सन् 1962 ई. के अक्तूबर में, चीनी आक्रमण से पूर्व, मैंने 'एनार्की’ नामक जो व्यंग्य काव्य लिखा था, उसमें ये पंक्तियाँ आती हैं- 'तब कहो लोहिया महान है, एक ही तो वीर यहाँ सीना रहा तान है।‘ ये दो पंक्तियाँ लोहिया साहब को बहुत पसन्द थीं, गरचे कभी कभी वे पूछते थे कि ये पंक्तियाँ कहीं तुमने व्यंग्य में तो नहीं लिखी हैं। मैं कहता, ''वैसे तो पूरी कविता ही व्यंग्य की कविता है, मगर व्यंग्य होने पर भी आपके 'सीना तानने’ की तो बड़ाई ही होती है।“ एक दिन मजाक मजाक में उन्होने यह भी कहा था कि ''महाकवि, ये छिटपुट पंक्तियाँ काफी नहीं हैं। तुम्हें मुझ पर कोई वैसी कविता लिखनी चाहिए, जैसी तुमने मेरे दोस्त (जयप्रकाश जी) पर लिखी थी।“ मैंने भी हँसी हँसी में ही जवाब दिया था, ''जिस दिन आप मुझे उस तरह प्रेरित कर देंगे जिस तरह मैं जयप्रकाश जी से प्रेरित हुआ था, उस दिन कविता आपसे आप निकल पड़ेगी।“

लोहिया साहब जितने अच्छे वक्ता थे, उससे अधिक बड़े चिंतक थे, मगर उनकी चिंतन पद्घति का साथ देना अक्सर कठिन होता था, क्योकि उनके तर्क निर्मोही और कराल होते थे। कभी कभी ऐसा भी लगता था कि जिस शत्रु पर वे बाण चला रहे हैं, वह वास्तविक कम, काल्पनिक अधिक है। लोहिया साहब जब आखिरी बार अमरीका गये थे, उन्हे लेखकों ने कुछ किताबें भेंट की थीं। जब वे देश लौटे और मैं उनसे मिलने गया, उन्होने उनमें से दो किताबें मुझे उपहार के तौर पर दीं। उनमें से एक किताब कविता की है और उसकी कवयित्री हैं रूथ स्टीफेन। रूथ स्टीफेन ने यह पुस्तक लोहिया साहब को इस अभिलेख के साथ भेंट की थी-'फॉर राम, हूं रिप्स शेडोज इनटु रैंग्स’। अनुमान होता है कि कवयित्री के साथ लोहिया साहब की जो बातें हुईं, उनसे कवयित्री पर यह प्रभाव पड़ा कि यह आदमी बाल की खाल उधेड़ता है और काल्पनिक छायाओं के चिथड़े उड़ा देता है। अमरीका में लोहिया साहब ने एक ऐसा भी बयान दिया था, जिसका मकसद अमरीकी सभ्यता के खोखलेपन पर प्रहार था।

जब से नवीन जी गुजर गये, संसद का केन्द्रीय हाल मेरे लिए सूना हो गया। मगर जब डॉक्टर राममनोहर लोहिया सदस्य बन संसद में आये, मैं सेन्ट्रल हाल की ओर फिर से जाने लगा, क्योकि लोहिया साहब के साथ बातें करने में मुझे ताजगी महसूस होती थी और मजा आता था। वे अक्सर मुझसे पूछते थे, ''यह कैसी बात है कि कविता में तो तुम क्रांतिकारी हो, मगर संसद में कांग्रेस सदस्य?” इसका जो जवाब मैं दिया करता था उसका निचोड़ मेरी 'दिनचर्या’ नामक कविता में दर्ज है-

तब भी मां की कृपा, मित्र अब भी अनेक छाये हैं, 
बड़ी बात तो यह कि 'लोहिया’ संसद में आये हैं। 
मुझे पूछते हैं, ''दिनकर! कविता में जो लिखते हो, 
वह है सत्य या कि वह जो तुम संसद में दिखते हो?” 
मैं कहता हूँ, ''मित्र, सत्य का मैं भी अन्वेषी हूँ, 
सोशलिस्ट ही हूँ, लेकिन कुछ अधिक जरा देशी हूँ। 
बिल्कुल गलत कम्यून, सही स्वाधीन व्यक्ति का घर है, 
उपयोगी विज्ञान, मगर मालिक सब का ईश्वर है।“ 

इस कविता में एक जगह गरीबी की थोड़ी प्रशंसा सी है-

बेलगाम यदि रहा भोग, निश्चय संहार मचेगा, 
मात्र गरीबी छाप सभ्यता से संसार बचेगा। 

यह बात लोहिया जी को बिल्कुल पसन्द नहीं थी। वे निश्छल आदर्शवादी थे और गरीबी के साथ किसी भी प्रकार का समझौता करने को तैयार नहीं थे। ईश्वर का खंडन तो उन्होने मेरे समक्ष कभी नहीं किया, मगर भाग्यवाद या नियतिवाद के वे प्रबल विरोधी थे। बातचीत के प्रसंग में एक दिन मैंने उनसे कहा था कि ''काम और युवा की जिस समस्या से नयी सभ्यता उलझ रही है, उसका ज्ञान प्राचीनों को भी था। जिस मनुष्य के अस्तित्व से समाज का गौरव बढ़ता है, लोगों को ऊँचा उठने की प्रेरणा मिलती है, उसके साधनों के प्रति प्राचीन सभ्यता भी उदार थी। और नहीं तो पंच कन्याएँ पूजनीया कैसे मान ली गयीं?" और अगर क्षुधा की बात लीजिए तो गांधारी ने भगवान् श्री कृष्ण से कहा था- वासुदेव, जरा कष्टं, कष्टं निर्धन जीवनम् पुत्रशोकं महाकष्टं कष्टातिकष्टं क्षुधा

लोहिया साहब ने उसी समय इस श्लोक को कंठस्थ कर लिया और कई दिन बाद भेंट होने पर उन्होने यह श्लोक मुझे सुनाया, शायद यह बताने को कि श्लोक उन्हे भली भाँति याद है। उनके स्वर्ग गमन से कोई एक मास पूर्व मैंने एक दिन उनसे निवेदन किया था-''आप क्रोध को कम कीजिए, वही अच्छा है। देश आपसे बहुत प्रसन्न है। अब आपको छोटी छोटी बातों को लेकर कटुता नहीं पैदा करनी चाहिए। यह देश बड़ा ही कठिन देश है। कहीं ऐसा न हो कि भार जब आपके कन्धो पर आये, तब आपका अतीत आपकी राह का काँटा बन जाय।" उन्होने उदासी में भर कर कहा, ''तुम क्या समझते हो, उतने दिनों तक मैं जीने वाला हूँ? मेरी आयु बहुत कम है, इसलिए जो बोलता हूँ, उसे बोल लेने दो।" कितने आश्चर्य की बात है कि वे अपने अंत को समीप देख रहे थे।
रामधारी सिंह 'दिनकर’

Wednesday, 8 November 2017

विकास का वैकल्पिक मॉडल

विकास का वैकल्पिक मॉडल 

सच्चिदानंद सिन्हा 

वैकल्पिक विकास के मॉडल की बात करना आज उसी तरह अर्थहीन है जैसे कभी यूटोपिया की बात करना समाजवादी आंदोलन के प्रारंभिक काल में था। कोई भी व्यवस्था सामने की हकीकत के संदर्भ में ही बनती है, बनी-बनाई कल्पना के अनुरूप नहीं। ऐसे किसी भी मनचाही ब्लूप्रिंट को लागू करने का प्रयास या तो धर्मांधता को जन्म देता है या तानाशाही को। आज चूंकि पर्यावरण का संकट विविध रूपों में हमारे अस्तित्व के लिए सर्वाधिक महत्व का बन गया है, इसलिए हमें समाज निर्माण की वैसी दिशा अपनानी होगा जो पर्यावरण के लिए कम से कम नुकसानदेह हो। अगर ऐसे परिवर्तन हमारे बूते के बाहर दिखें तो हम स्वयं सामाजिक जीवन को बदली स्थिति के अनुकूल ढालें। एक बुनियादी बात ध्यान में रखना जरूरी है। शोषणमुक्त समाज में पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने की क्षमता गैरबराबर समाज से अधिक होती है, क्योंकि गैरबराबरी से ही दिखावे के लिए बेजरूरत तामझाम पर खर्च जरूरी होता है, और बाजार आश्रित पूंजीवादी समाज में तो बेजरूरी वस्तुओं के उत्पादन व उपभोग की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण है कि इसे नियंत्रित करने से पूंजीवादी व्यवस्था ध्वस्त हो सकती है। इससे यह तो जरूर कहा जा सकता है कि प्रकृति से तालमेल बिठा कर चलनेवाली कोई भी व्यवस्था समता के मूल्यों पर ही आधारित हो सकती है। इन बातों को ध्यान में रख एक सीमित संदर्भ में ही विकल्प की बात की गयी है। कुछ सीमाओं व कुछ संभावनाओं का संकेत भर।
वैकल्पिक मॉडल की चर्चा करने से पहले वर्तमान में जो मॉडल चल रहा है, उसके मूल तत्व और उसकी दिशा को समझना जरूरी है और इसके उन परिणामों को भी, जिनसे विकल्प की तलाश जरूरी लगती है। विकल्प कैसा होगा, यह बहुत कुछ इन परिणामों की समझ पर ही निर्भर करेगा। आदमी विधाता की तरह मनमाने ढंग से सृष्टि कर नहीं सकता।
किसी भी समाज की मूल संरचना को समझने के लिए उसके आर्थिक पक्ष को यानी आदमी के भोजन, आवास, परिवहन, उनके आपसी आदान-प्रदान में सहयोग और तनाव के तत्व और इन्हें संचालित करनेवाले बलों की पहचान जरूरी है। लेकिन इसके आगे हर समाज का आदर्श लक्ष्य होता है, जो नियामक शक्ति का काम करता है। यहां एक तरह का खिंचाव (टेलियोलॉजी) होता है। सब कुछ वर्तमान बलों के दबाव और संतुलन से निर्धारित नहीं होता, बल्कि इन बलों के परिप्रेक्ष्य में एक काल्पनिक, पर अटल आकर्षक बिंदु होता है जो लगातार समाज को अपनी ओर खींचता रहता है, यूनानी मिथक के 'सायरनों' की तरह।
मार्क्स ने उत्पादन के साधन और इनसे जुड़े उत्पादन संबंधों को विकास की दिशा का नियामक बता कर एक तरह के तकनीकी निर्यातवाद को जन्म दिया। उन्होंने यह भी मान लिया कि एक स्तर पर तकनीक और इससे जुड़े उत्पादन संबंध में विरोध पैदा होता है और इससे क्रांतिकारी बदलाव की शुरुआत होती है। पूर्व काल में यानी पूंजीवादी व्यवस्था के पहले जैसा भी हुआ हो लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था में उत्पादन की तकनीक के उत्पादन संबंध यानी पूंजीपति और मजदूरों के संबंध, उनके बीच के तनाव पर हावी होते दिखते हैं। मजदूर पूंजीपतियों से कुछ बिंदुओं पर तनाव के बावजूद समग्रता में व्यवस्था के मूल्यों को आत्मसात कर उसके विकास के साथ ही अपने हित को जोड़ने लगा है। प्रारंभिक बागी तेवर को छोड़, जिसे समायोजन की पीड़ा कहा जा सकता है, मजदूरों में पूंजीवादी व्यवस्था को पूरी तरह खत्म करने का संकल्प नहीं दिखा। प्रतिस्पर्द्धा आधारित पूंजीवाद मजदूर समेत हर नागरिक को एस्केलेटर की एक सीढ़ी पर खड़ा कर देता है, इस आश्वस्ति के साथ कि वह ऊपर-ऊपर उठता जाएगा। व्यवस्था की सुविधा के हिसाब से तकनीक के नए आयाम विकसित होते रहते हैं। रूस, चीन और वियतनाम, सभी जगह कम्युनिस्ट नेतृत्व में क्रांतियां हुईं; वे तो पूंजीवादी विकास के प्रारंभिक दौर में ही थे और अंत में पूंजीवाद के विरोध की जगह फिर इसे पूर्णता में कबूल कर लिया गया। यह विडंबना ही है कि रूस और चीन की क्रांतियों से अति कठोर तानाशाही राज्य व्यवस्था और अतिउदार पूंजीवादी व्यवस्था पैदा हुई। इस सब से यह जाहिर है कि बीसवीं सदी के शुरू में समतामूलक व्यवस्था की जो आशा जगी थी वह खत्म हो चुकी है। यही नहीं, तकनीकी स्वर्ग पर पहुंचने की राह पर नई बाधाएं खड़ी हो गई हैं। चिंता की बात यह है कि पूंजीवाद के आगे किसी अच्छे भविष्य की कल्पना जो दुनिया को मार्क्सवाद में दिखी थी, संदिग्ध है। इक्कीसवीं सदी के प्रारंभ में हम वैसे ही आश्वस्त नहीं हैं जैसे एक सदी पहले थे।
हम कहां जा रहे हैं, इसके सही आकलन के लिए उस खिंचाव के उद्गम और उसे ऊर्जा देने वाले तत्वों का, जिसका जिक्र पहले हुआ है, आकलन जरूरी है। हमें यह भी देखना है कि यह हमें किसी स्वर्णिम भविष्य की ओर ले जा रहा है या बरबादी के गर्त में।
वर्तमान औद्योगिक समाज के नियामक तत्व अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी से परवान चढ़ी औद्योगिक क्रांति और इसके वे आदर्श हैं जो इसकी गति और अतियों को औचित्य प्रदान करते हैं। इसमें, जैसा कि समाजशास्त्री मैक्स वेबर का मानना था, ईसाई धर्म की प्रोटेस्टेंट धारा की इस स्थापना की विशेष भूमिका थी जो व्यावसायिक सफलता को ईश्वरीय अनुकंपा का प्रमाण मानती है। अपने विकास के क्रम में पूंजीवादी व्यवस्था ने तकनीकी दक्षता और इससे जुड़ी व्यावसायिक सफलता को ईश्वरीय अनुकंपा से आगे बढ़ मानव समाज का सर्वोच्च और सर्वजनीन आदर्श बना डाला। इस मान्यता के सार्वभौम होने से आर्थिक गतिविधियों का क्षेत्र एक वैश्विक अखाड़ा बन गया है, जहां सभी खिलाड़ी ऐसी मार-पछाड़ में लगे हैं जिसमें प्रतिस्पर्द्धा की मौत से ऊर्जा ग्रहण कर अधिक बलिष्ठ बना जाता है। इस प्रक्रिया को अंग्रेजी से उधार शब्दों में ''कॉरपोरेट कैनिबलिज्म'' कहा जा सकता है। फिर इससे प्राप्त बल से विजेता दूसरे प्रतिद्वंद्वियों से भिड़ते रहते हैं। अनेक व्यावसायिक कंपनियों के दिवालिया होते जाने और कुछ के बढ़ते जाने का सिलसिला जारी रहता है। शेयर बाजारों में हर रोज होने वाले उतार-चढ़ाव का खेल इस प्रतिस्पर्धा का एक सौम्य प्रतिबिंब है। जीवन के मैदान में इसका दूसरा पहलू दिखाई देता है, जिसमें कारखानों, खदानों तथा खेत-खलिहानों में मजदूर मालिकों से वेतन भत्ते के लिए या रोजगार की गारंटी के लिए युद्धरत हैं, किसान भुखमरी की कगार पर रहने को मजबूर हैं और समय-समय पर आत्महत्या कर अनवरत चलनेवाले जीवन संघर्ष से छुट्टी पा लेते हैं। समय-समय पर अन्न संकट और अकाल से असंख्य मौतें तब भी होती रहती हैं, जब गोदामों में अनाज इस इंतजार में पड़ा रहता है कि अधिक मुनाफे पर उसे बेचा जा सके। इस समग्र प्रक्रिया को एक सुंदर नाम 'उदारीकृत व्यवस्था' दिया गया है।
यह कहा जा सकता है कि व्यवस्था की ये कमजोरियां तो रही हैं और इनकी आलोचना भी होती रही है लेकिन हमें रहना तो है इसी व्यवस्था से तालमेल या संतुलन बना कर। कुछ सुधार के उपाय समझाए जा सकते हैं। कुछ समायोजन की तलाश हो सकती है। पर नयी उत्पादन तकनीक से जो ऊंचा जीवन स्तर इस व्यवस्था ने दिया है वह तो पुराने समय की किसी कल्पना से परे है। यह ठीक है कि ये सुविधाएं अभी थोड़े से लोगों तक सीमित हैं लेकिन आशा जगती है कि देर सबेर ये सुविधाएं सर्वजनीन हो जाएंगी। यही आशा है जो सारे संसार को एक तकनीकजनित स्वर्ग की आकांक्षा में मुग्ध रखती है और व्यवस्था को एक नियोजित पथ पर चलाती रहती है।
इस व्यवस्था के सुधार की दिशा में कुछ अलग उलझन है। इसके सुधार की तलाश व्यवस्था के उद्गम की ही ओर ले जाएगी और वहां बुनियादी सुधार का अर्थ होगा व्यवस्था की मौत। क्योंकि यह मनुष्य और प्रकृति दोनों के शोषण पर पूरी तरह आश्रित है। अर्थशास्त्र के क्षेत्र में कम्युनिस्ट विचारधारा के आदि स्रोत कार्ल मार्क्स ने पूंजी के विकास में (जो इस व्यवस्था का निर्धारक है) श्रम के शोषण की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित किया और आदिम संचय (प्रिमिटिव एक्युमुलेशन) की क्रूर प्रक्रिया से लेकर परिष्कृत रूप से स्थापित पूंजीवादी प्रतिष्ठानों में अदृश्य रूप से होनेवाले श्रमिकों के शोषण के विविध रूपों का विशद वर्णन किया। उन्होंने यह भी स्थापित किया कि उत्पादन प्रक्रिया में श्रमिकों के शोषण से प्राप्त श्रम का अधिशेष ही पूंजीपति के मुनाफे का स्रोत है। उत्पादन एवं विपणन में मजदूरों से चुराए गए श्रम के अधिशेष के बराबर के उत्पाद की खरीदारी का टोटा बना रहता है। इसी से पूंजीवाद के अनिवार्य संकट की बात की गई। पर, बार-बार मंदी का संकट झेलकर भी पूंजीवादी व्यवस्था ध्वस्त नहीं हुई। यूरोप का 1968 का छात्र विद्रोह या 'ऑकुपाई वाल स्ट्रीट' जैसे सांकेतिक विद्रोह, व्यवस्था के लिए महज सेफ्टीवॉल्व साबित हुए हैं। पूंजीवादी व्यवस्था अपने अंतर्विरोध के साथ उदारीकरण के नाम से ज्यादा विस्तार पाती रही है। जैसा कि पहले कहा गया है, उलटे रूस, चीन आदि में क्रांति के बाद के काल में पूंजीवाद अधिक शक्तिशाली हो फिर स्थापित हो गया। क्यूबा एक अपवाद है और इसका कारण अपनी विशेष परिस्थितियों के अनुरूप विशालता को छोड़ लघुता की अर्थव्यवस्था की ओर मुड़ना था। पर, यह प्रचलित औद्योगिक विकास की मुख्यधारा के विपरीत आचरण है।
श्रमिकों के शोषण और इससे उपजे बाजार के संकट एवं ट्रेड साइकिल यानी उत्पादन की स्फीति और संकुचन के चक्र की समझ मार्क्स के अर्थशास्त्र में दूसरे विचारों से अधिक विश्वसनीय लगती है। लेकिन अनवरत औद्योगिक विकास की जो संभावना पूंजीवादी तकनीक में दिखाई देती थी उसके प्रति मार्क्स में एक सम्मोहन भी था जो 'कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो' में जाहिर होता है जहां पूंजीवाद की उपलब्धियों को इन शब्दों में गरिमा मंडित किया गया है : 'प्रकृति की शक्तियों को मनुष्य के मातहत करना, मशीन व रसायन शास्त्र को उद्योग और कृषि में लगाना, भाप से समुद्री जहाज, रेल और इलेक्ट्रिक टेलीग्राफ चलाना, पूरे महादेशों को खेती के लायक बनाना, नदियों से सिंचाई के लिए नहर, भूमि से हठात पूरी आबादी का उभर आना, किसी पूर्ववर्ती सदियों की कल्पना में भी सामाजिक श्रम की ऐसी उत्पादकता नहीं रही होगी।'
इस सोच में प्रकृति का निर्बाध दोहन दोषरहित दिखाई देता है और इसी से श्रम के मूल्य सिद्धांत में एक बुनियादी बात नजरअंदाज कर दी जाती है। पूंजी श्रम के दोहन से आती है, यह तो मूल्य के श्रम सिद्धांत से स्पष्ट हो जाता है। यह भी दिखाई देता है कि अंततः संचित पूंजी मजदूरों के श्रम के अधिशेष (सरप्लस लेबर) का संचय है। लेकिन इस बात को नजरअंदाज कर दिया गया है कि संचित श्रम सदा किसी उत्पाद का रूप लेता है और यह उत्पाद प्रकृति से प्राप्त कच्चे माल, खनिज आदि के रूपांतरण से एवं ऊर्जा प्रदान करने वाले कोयला, तेल आदि को जलाकर प्राप्त होता है। दरअसल, अत्याधुनिक उद्योगों में मानव श्रम - जो कि ऊर्जा का ही एक परिष्कृत और संचित रूप है - अपना महत्व खोता गया है और मशीन एवं रोबोट धीरे-धीरे इनका काम संभालने लगे हैं। इस कोण से देखने पर यह तुरंत जाहिर होता है कि चूंकि धरती के संसाधन - चाहे वे कच्चे उद्भिज पदार्थ हों, खनिज हों या ऊर्जा देनेवाले कोयला, पेट्रोलियम या प्राकृतिक गैस - इनके अतिदोहन से कुछ दिनों के बाद संकट पैदा होगा। एक तो इसलिए क्योंकि ये जीवाष्म ईंधन हैं और एक तरह से गड़े खजाने जो उतनी ही जल्दी खतम हो जाएंगे जितनी अधिक मात्रा में इनका दोहन होगा। आज का पर्यावरण संकट इन्हीं प्राकृतिक साधनों के अतिदोहन का परिणाम है और ज्यादा बुनियादी है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा का संकट है, जो ऊर्जा प्रदान करनेवाले साधनों के घटते जाने से और फिर इन्हें जलाने से पैदा कार्बन डाइऑक्साइड तथा अन्य गैसों के वायुमंडल में जमा होने से तथा कथित 'ग्रीन हाउस इफेक्ट' से, जिससे धरती का तापमान बढ़ता जा रहा है, पैदा हुआ है।
इसके परिणाम के बारे में इतना कुछ कहा जा रहा है कि यहां कुछ विस्तार से कहना जरूरी नहीं है। लेकिन प्रारंभिक चिंता के बाद अचानक औद्योगिक रूप से समृद्ध देशों में, जो प्रायः समशीतोष्ण या शीत कटिबंधों में पड़ते हैं, अब इस समस्या को नजरअंदाज किया जा रहा है। इससे यह आशंका पैदा होती है कि अब दो अलग-अलग दुनिया बनने जा रही है। एक संपन्न, प्रायः ऊंचे कटिबंध में पड़नेवाले देशों की और दूसरी गरीब व प्रायः विषुवत रेखा के पास के कटिबंधों में पड़नेवाले देशों की जिनमें हमारा देश भारत भी शामिल है।
यों तो ऊर्जा संकट और प्रदूषण के प्रभाव पर ई.एफ. शुमाखर के 'स्मॉल इज ब्यूटीफुल', और 'क्लब ऑफ रोम' के अध्ययन 'द लिमिट्स ऑफ ग्रोथ' के प्रकाशन के बाद से ही पिछली शताब्दी के उत्तरार्द्ध से चर्चा होने लगी थी। लेकिन इस पर दुनिया के राष्ट्रों द्वारा सक्रिय पहल 1992 के ब्राजील के रियोडीजेनेरो में होने वाले शिखर सम्मेलन से शुरू हुई। इसके बाद 1994 में क्योटो प्रोटोकॉल नाम से एक समझौता हुआ और तय हुआ कि औद्योगिक देश ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन 2012 तक 1990 के स्तर से 5.2 प्रतिशत घटा देंगे। इस पर 1905 में मान्यता की मुहर लगी, लेकिन दुनिया के सबसे बड़े औद्योगिक देश और प्रति व्यक्ति सबसे अधिक उत्सर्जन करने वाले अमेरिका ने इस पर अपनी स्वीकृति नहीं दी। कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन 1990 में 22.7 अरब टन था। क्योटो प्रोटोकॉल में इसे घटाकर 21.5 अरब टन करने का लक्ष्य था। लेकिन 2010 में यह बढ़कर 33 अरब टन हो गया। यानी घटने की बजाए डेढ़ गुना अधिक हो गया। दरअसल, औद्योगिक प्रगति के उन्माद में प्रदूषण फैलाने वाले गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लक्ष्य को सदा नजरअंदाज किया गया। अंततः यह सारा संकल्प गायब हो गया। चीन और भारत जैसे देश तेज विकास के लोभ में इसे नजरअंदाज करते रहे और विकसित देशों को अपने विकास का एक वैकल्पिक क्षेत्र दिखने लगा, जहां धरती का बढ़ता ताप नए भूभागों में विकास का दरवाजा खोलता नजर आने लगा है। अमेरिका तो पहले ही क्योटो समझौते से बाहर था। 2011 में कनाडा क्योटो समझौते से बाहर हो गया। सिर्फ यूरोप के देश कटौती करते रहे। कनाडा का बहाना था कि अमेरिका और चीन घटाने के बजाय उत्सर्जन बढ़ाते रहे हैं।
पर्यावरण की रक्षा से पश्चिमी देशों के पीछे हटने का असली कारण दूसरा लगता है। उत्तरी ध्रुव प्रदेश में विशाल पैमाने पर बर्फ के पिघलने से संसाधनों और यातायात का एक नया मार्ग खुल रहा है जो उनके लिए अधिक मुफीद है। अमेरिका और उत्तरी शीत कटिबंध में पड़ने वाले यूरोप के कुछ दूसरे संपन्न देशों को ध्रुव प्रदेश में बर्फ के पिघलने से खनिजों और प्राकृतिक गैसों का नया खजाना हासिल होने की संभावना है और रूस और दूसरे देश इस क्षेत्र में अपनी सामरिक उपस्थिति बढ़ाने में लगे हैं।
2010 के अगस्त महीने में रूस की एक प्राकृतिक गैस कंपनी 'नोवोटेक' ने एक लाख चौहत्तर हजार टन के एक टैंकर 'बाल्टिका' को उतरी ध्रुव प्रदेश के सागर के रास्ते चीन भेजा। उनका अनुमान है कि इस मार्ग के खुल जाने से यूरोपीय देशों के लिए एक छोटा और सस्ता व्यापारिक मार्ग खुलेगा जो प्रायः शीत कटिबंधों से होकर गुजरेगा। यह पथ मुरमास्क से शंघाई तक 10,600 कि.मी. लंबा है, जबकि स्वेज से होकर वहां पहुंचने का मार्ग 17,700 कि.मी. है। उत्तरी मार्ग के खुल जाने से कनाडा, अमेरिका, यूरोप के सभी देश चीन, जापान आदि भी यानी वे सभी देश जो आधुनिक व्यापार की दृष्टि से महत्वपूर्ण है तात्कालिक रूप से ग्लोबल वार्मिंग से लाभान्वित होंगे। आर्कटिक प्रदेश में खनिजों का विशाल भंडार होने का अंदाज है और इसलिए आर्कटिक के पास के देशों यथा - रूस, नार्वे, डेनमार्क, कनाडा, अमेरिका आदि में अभी ही इन खनिजों पर अधिकार जमाने के लिए राजनयिक होड़ शुरू हो गई है। उत्तर और दक्षिण का जो विभाजन पहले ही से उजागर होता आया है अब अधिक गहराएगा और उत्तर और दक्षिण के देश विकास की एक ही दिशा में आगे और पीछे, धीमे और तेज चलने वाले नहीं रह पाएंगे। तथाकथित विकासशील देशों को बिलकुल अलग राह अपनाने की मजबूरी होगी। शीत और समशीतोष्ण कटिबंधों के देश नए संसाधनों के चुकने तक इस अंधी दौड़ में ही रहेंगे। एक अर्थ में फिलहाल ऊंचे अक्षांशों में बसे देश एक ही तरह की 'एस्कॉर्च्ड अर्थ पॉलिसी' में संलग्न हैं और बाकी दुनिया को जलता छोड़ शीतल प्रदेशों की ओर पलायन की मुद्रा में हैं जहां से वे अपनी जरूरत के हिसाब से बाकी जगहों पर पांव पसारते रहेंगे। हम वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन और प्रदूषण पर कोई रोक नहीं लगा सकते और एक हद तक उससे प्रभावित होते रहेंगे।
लेकिन भारत और तथाकथित विकासशील देश अपने लिए एक अलग राह की तलाश तो कर ही सकते हैं जो प्रकृति पर विजय पाने के बजाय प्राकृतिक शक्तियों और परिवेश से सहयोग और प्रकृतिप्रदत्त जीवन की लय से जोड़ कर चलने के संकल्प पर आधारित हो।
जीवन का आधार पोषाहार है। प्रकृति में सहस्त्राब्दियों से एक ''फूड चेन'' (भोजन श्रृंखला) रही है जिसमें एक स्वाभाविक प्रक्रिया से असंख्य वनस्पतियां और जीव जीवन ग्रहण करते रहे हैं। इस फूड चेन का आधार सूरज से प्राप्त होने वाली ऊर्जा है जो अरबों वर्ष तक प्राप्त होती रहेगी, ऐसा वैज्ञानिकों का अनुमान है। शैवाल से लेकर, घास और विशाल वृक्षों के पत्तों तक सूरज की किरणों से प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया होती है जिससे हवा के कार्बन डाइऑक्साइड से कार्बन ग्रहण कर वृक्षों और पौधों की डालियां और तने कार्बन ग्रहण कर सेलुलोज बनाते हैं, जिससे पत्तों और तनों का निर्माण होता है और ऑक्सीजन का उत्सर्जन होता है। इसी प्रक्रिया से असंख्य वनस्पतियों का विकास होता रहा है और इनमें अन्न, फल, मूल लगते रहे हैं। इन्हीं से मनुष्य और अनेक दूसरे जीव पोषण पाते हैं। इन वृक्षों के फूल और पत्तों से अनेक कीट और पतंगे भोजन पाते हैं। फिर इन कीट पतंगों को खाकर मेढ़क या दूसरे कई जीव अपना निरस्तार करते हैं। इनसे मेढ़क जैसे जीव भोजन पाते हैं और फिर इन जीवों से मछलियां आहार पाती हैं और स्वयं मनुष्य या दूसरे जीवों का आहार बनती हैं। वनस्पति से अनेक चौपाये खरगोश और भेड़-बकरियों से लेकर गाय, बैल और घोड़ा और ऊंट तक अपना आहार पाते हैं। फिर इनका शिकार कर शेर, भेड़िये आहार पाते हैं। जब से मनुष्य ने खेती और पशुपालन शुरू किया, कृषि कार्यों के अलावा ये पशु लंबे समय तक उनके भोजन में मांस, दूध आदि प्रदान करते रहे हैं। कुछ सीमित स्थानों पर जलनिकासी और सिंचाई के लिए स्वाभाविक रूप से बहने वाली जलधारा मसलन झरनों या हवा चक्की का भी प्रयोग हुआ, जैसे हॉलैंड में जलनिकासी के लिए। लेकिन ये सब सूरज की ऊर्जा के स्वाभाविक प्रभाव के ही प्रतिफल थे। सहस्राब्दियों से धरती सूरज के ताप की ऊर्जा से लाभान्वित होती रही है ।
फूलों के परागण की प्रक्रिया में सहयोग दे मधुमक्खियां शहद बनाती थीं और तितलियों में कुछ के प्रजनन चक्र द्वरा रेशमी धागों का प्रादुर्भाव हुआ। असंख्य पौधों और वृक्षों से सजावट के विविध रंग और स्वास्थ्य के लिए जरूरी औषध उपलब्ध होते थे। इन सब के पीछे सूरज की अक्षय ऊर्जा थी। इससे न सिर्फ (जैसा ऊपर कहा गया है) प्रकाश संश्लेषण के लिए ऊर्जा मिलती थी बल्कि समुद्र के वाष्पीकरण और हवा को गति देने के लिए ऊर्जा उपलब्ध होती थी।
यह सारी जीवन प्रक्रिया भौतिक शास्त्र के अटल माने गए ''इट्रोपी'' के सिद्धांत को पलटने जैसा चमत्कार रही है। इंट्रोपी का नियम है कि संसार भर में ऊर्जा अबाध रूप से सम स्तर की ओर बढ़ रही है, जहां ऊर्जा के संचरण का अंत हो जाएगा। इसे पूर्ण इंट्रोपी का नाम दिया गया है। लेकिन ''बायोस्फेयर'' में यानी धरती पर व्याप्त जीव जगत में असंख्य जीवों और वनस्पतियों के जीवन चक्र में इसके उलट ऊर्जा विविध स्तरों पर उपस्थित है और उसमें नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे दोनों ही तरफ से ऊर्जा का संचरण जारी रहता है। यह संभव इसलिए हुआ क्योंकि करोड़ों वर्ष से अनेक उथल-पुथल के बावजूद जैव जगत के आस्तित्व में आने के बाद से आज तक इंट्रोपी के नियम का उल्लंघन यानी एक तरह की सविनय अवज्ञा जारी रही है। इंट्रोपी के नियम को अपने छोटे से दायरे में पलटने के लिए जीव जगत को सूरज से ऊर्जा प्राप्त होती है। यह सूरज की ऊर्जा जीव जगत की लघुता के हिसाब से असीम है। जब मनुष्य जीवाश्मों या किसी दूसरे स्रोत से आज मशीन चलाता है तो इंट्रोपी बढ़ाने लगता है। अगर जीवन का कोई रहस्य है तो यही है। उसके पीछे एक व्यापक संवेदनशीलता है जो फूल के एक दल से लेकर मनुष्य तक में मौजूद है। आदमी फूल और तितलियों से लेकर पक्षियों तक पर काव्य की रचना कर सकता है तो इसलिए क्योंकि जीवन के इस रहस्य से सभी बंधे हैं। यह कहा जा सकता है कि मानव चेतना और संवेदना का सारा परिवेश इस फूड चेन पर आधारित है।
ऊपर वर्णित फूड चेन के ठीक उलटा एक दूसरा फूड चेन व्यापक होता जा रहा है। इस फूड चेन के प्रारंभिक सिरे पर अनेक तरह के गोश्त का, जिन्हें विशाल स्लॉटर हाउसों में या पॉल्ट्री फार्मों में कैद गाय, बैल, सूअर एवं मुर्गों को मारकर तैयार किया गया होता है, आयात किया जाता है। फिर यहां से अनेक तरह के वसा में तैयार तले-भुने पकवान, बिस्कुट आदि जिन्हें चटपट खाया जा सकता ह, - लोहे, टीन, एल्मुनियम एवं प्लास्टिक से तैयार डब्बों में भरा जाता है और खर्चीले वाहन से उपभोक्ताओं तक पहुंचाया जाता है। इस प्रक्रिया में व्यवहार में आने वाले हर आइटम को बिजली या गैस की भट्टियों से गुजारा गया होता है, या ऊर्जा गटकनेवाले फ्रिजों में रखा गया होता है। इस फूड चेन की शुरुआत खेत-खलिहान या बागानों से नहीं होती जहां पौधों में अन्न और वृक्षों में फल लगते हैं। बल्कि किसी ख्यात खाद्य व्यवसायी कंपनी जैसे वॉल मार्ट से होती है, और खर्चीले विज्ञापनों एवं परिवहन के माध्यम से इन्हें संसार के हर कोने में फैले उपभोक्ताओं तक पहुंचाया जाता है। इसमें ऊर्जा के अति व्यय से एक तरफ वैश्विक ताप बढ़ता है और दूसरी ओर संपन्न लोगों में मोटापा और उससे जुड़ी बीमारियां, जिनके लिए खर्चीले अस्पतालों की व्यवस्था करनी होती है। विशाल पैमाने पर कोयला, तेल और गैस से बिजली तैयार होती है या फिर बड़ी पनबिजली योजनाओं से जिनमें जंगल और आदमियों के आवास डूबते जाते हैं। डूबते जंगल जो कभी कार्बन डायक्साइड की मात्रा को घटाते थे, अब ऐसे गैसों का उत्सर्जन करते हैं, जिनसे धरती का ताप बढ़ता है।
सबसे चिंता की बात यह है कि नई कृषि व्यवस्था में रोजगार देने की क्षमता नगण्य है। 1885 में अमेरिका की आधी से अधिक आबादी खेती में लगी थी। 1985 में यह संख्या पूरी आबादी के 3 प्रतिशत से कम है। यह भी दिलचस्प है कि जिस चमत्कार से यानी मशीनीकरण से आबादी का सिर्फ 3 प्रतिशत विशाल मात्रा में अन्न उत्पन्न करता है उसी का फल यह भी है कि वहां का काश्तकार विभिन्न यंत्रों पर खर्च किए गए 5 कैलोरी ऊर्जा से सिर्फ 1 कैलोरी देने वाला अनाज पैदा करता है। यानी अपनी क्षमता में यह कृषि ऋणात्मक है। इससे हम समझ सकते हैं कि अमेरिकी कृषि काश्तकारों को भारी सब्सिडी दिए बगैर जिंदा क्यों नहीं रह सकती | इस सब्सिडी को लेकर विश्व व्यापार संगठन में विकासशील देशों से वार्ता में गतिरोध बना हुआ है।
एक और बात ध्यान देने योग्य है | प्रारंभिक कृषि एक प्राकृतिक चक्र से बंधी थी जिसमें घास, वृक्ष आदि का जो अवदान अन्न और मवेशियों को चारा देने में होता था वह काफी कुछ पत्तों, पुआल, भूसा आदि के सड़ने या पशुओं के मल-मूत्र से जमीन में लौट आता था और उत्पादन चक्र को बिना विशेष क्षति के जारी रखता था।
इसके उलट, आधुनिक खेती उर्वरकों विशेषकर नाइट्रोजन देने वाले उर्वरकों पर निर्भरता एक दूसरा संकट करीब ला रही है। नाइट्रोजन प्रदान करने वाले उर्वरक का मूल स्रोत प्राकृतिक गैस है जो परिवहन में खर्च होने वाले ईंधन का भी सबसे आकर्षक स्रोत है क्योंकि यह कोयला या पेट्रोल से कम प्रदूषण फैलाता है। इस तरह हम मोमबत्ती को दोनों छोर पर जला रहे हैं। हमें उर्वरकों के लिए ज्यादा से ज्यादा प्राकृतिक गैस चाहिए और फिर परिवहन के लिए भी। हम कैसे एक संकट से उबरने के लिए दूसरे संकट में फंस रहे हैं, इसका एक उदाहरण पेट्रोलियम के घटते भंडार की आपूर्ति के लिए मक्का, ईख, जेटरोफा आदि से एथानोल तैयार करने का प्रयास है। इन फसलों के लिए भी हमें प्राकृतिक गैस से नाइट्रोजन देनेवाले उर्वरक बनाने पड़ते हैं जो प्राकृतिक गैस की आपूर्ति पर नया बोझ डालता है। ये सब उपाय अंततः समस्याओं को अधिक मुश्किल बनाते हैं।
प्राकृतिक गैस के साथ-साथ दूसरे जीवाश्म ईंधन भी घटते जा रहे हैं। आज दुनिया भर की अनियंत्रित महंगाई के पीछे इन ईंधनों के भंडार का तेजी से घटते जाना है। 1960 के एक या दो डॉलर प्रति बैरल के मुकाबले आज कच्चे पेट्रोल (क्रूड) की कीमत सौ डॉलर के लगभग पहुंच गई है। इनके स्रोत जैसे-जैसे विरल होते जाएंगे ये अधिक महंगे होंगे और चूंकि ये परिवहन से लेकर सभी तरह के उद्योग-धंधों और बिजली उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण हैं ये महंगे होते-होते कृषि समेत अधिकांश गतिविधियों के लिए दुर्लभ हो जाएंगे। आज की अनियंत्रित महंगाई भविष्य के ऐसे ही संकट का संकेत हैं, जहां जीवन के सारे व्यापार ठप हो जाएंगे।
इस समस्या का एक राजनीतिक आयाम भी है जो पार्श्वभूमि से व्यवस्था को टिकाये रखता है और इसको विकाराल बनाता है। यह है औद्योगिक क्रांति और पूंजीवाद के विकास के साथ राष्ट्र-राज्यों का आस्तित्व में आना और वृहत आकार ग्रहण करते जाना। औद्योगिक क्रांति के पहले के दिनों में राज्य व्यवस्थाएं या तो राजाओं की साम्राज्य विस्तार की लालसा का प्रतिफल होती थी या कबीलाई आस्मिता और इसके दायरे की पहचान। सत्ताशीन कबीलाई शिखर पुरुष की शक्ति का प्रतीक इनका फैला हुआ राज्य या इनकी शानो-शौकत का इजहार करने वाली सजावट की वस्तुएं होती थीं। लेकिन राज्य के विस्तार का इनकी समृद्धि से सीधा लगाव नहीं होता था। यूरोप में वर्तमान राष्ट्र-राज्यों की पृष्ठभूमि दूसरी से छठीं शताब्दी तक का वह कबीलाई संक्रमण काल है जिसे ''फॉल्केर वांडरूंग'' का नाम दिया गया है। इसके क्रम में विभिन्न हिस्सों से और विशेषकर उतर-पूर्वी हिस्से से फैक, अलिमानी ग्रोथ, विसी ग्रोथ, वांडल, एंग्लोसैक्सन आदि कबीलाई समूह यूरोप के विभिन्न भागों में आकर बस गए और पहले के निवासियों को या तो विस्थापित किया या उन पर वर्चस्व कायम किया।
यूरोप के ज्यादतर राष्ट्र-राज्यों का विकास इन्हीं के इर्द-गिर्द हुआ। औद्यौगिक क्रांति एवं पूंजीवाद के विकास के साथ इन राष्ट्र-राज्यों के दायरे को विस्तृत और सख्त बनाया गया है, जिससे छोटे-छोटे दायरे को तथा पूंजी या दूसरे अवरोधों को निरस्त कर व्यापारिक गतिविधियां बड़े दायरे में हो सकें । नेपोलियन के सैनिक अभियानों के बाद पूरे यूरोप में राष्ट्रवादी उभार आया और राष्ट्र-राज्यों की शक्ति का संकेंद्रीकरण हुआ। इस संपर्क से संसार भर में राष्ट्रीय भावना का उन्मेष हुआ। पूंजीवादी हित से इसका गहरा रिश्ता इस बात में दिखता है कि इधर, हाल के दिनों में राष्ट्र-राज्य के विखंडन की एक स्वाभाविक प्रक्रिया शुरु हुई है। यूरोपीय यूनियन के अस्तित्व में आने के बाद यूरोप के राष्ट्र-राज्यों का आर्थिक सामरिक महत्व नगण्य हो गया है। इससे इनमें कबीलाई आधार पर विखंडन की प्रक्रिया भी शुरू हुई है। सर्विया के वर्चस्व के विरोध में युगोस्लाविया के क्रोट आदि अलग हो गए हैं । चेकोस्लोवाकिया में चेक और स्लोवाक अलग राष्ट्र बन गए, ब्रिटेन में स्कॉट अलग होने के कगार पर हैं।
राष्ट्र-राज्यों का सबसे महत्वपूर्ण और भयावह पक्ष रहा है मिलिट्री इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स का अस्तित्व में आना। इससे राज्यों के सैनिक तंत्रों और औद्योगिक प्रतिष्ठानों का एक जबरदस्त गठजोड़ हुआ। 19वीं शताब्दी के अंत से लेकर आज तक राज्यों का स्वरूप चाहे जो रहा हो - राजशाही, तानाशाही या लोकशाही, फौज और इसकी जरूरतों को पूरा करनेवाले एक विशाल औद्योगिक तंत्र का गठजोड़ लगातार मजबूत हुआ है। फौज देश में व विदेश में जरूरत होने पर उद्योगों के हितों की रक्षा के लिए तत्पर रहती है और उद्योग उन्हें नवीनतम आयुध और दूसरी उपयोग की वस्तुएं मुहैया कराते रहते हैं। फौज के आयुधों की मांग औद्यौगिक व्यवस्था की मंदी के संकट से उबारने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अत्याधुनिक उपकरण पाने की होड़ में हर पांच दस साल में हथियार पुराने पड़ते जाते हैं और कबाड़ का ढेर बन जाते हैं। पर, चूंकि इन्हें बाजार की जरूरत नहीं होती, इनके रहते हुए भी नित्य नए हथियारों का उत्पादन जारी रहता है। यह सुविधा उत्पादन के किसी दूसरे क्षेत्र में नहीं है क्योंकि स्टॉक का बिकना उत्पादन प्रक्रिया के चलते रहने के लिए जरूरी होता है।
आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था में राष्ट्र-राज्य और फौज के इस गठजोड़ की चर्चाएं इसलिए की गईं क्योंकि शुमाखर के 'स्मॉल इज ब्यूटिफुल' या गांधी के ग्राम गणराज्य की अवधारणा, जो किसी वैकल्पिक मॉडल की निर्देशिका होगी, वर्तमान फौजी राष्ट्र-राज्य के किसी मॉडल के साथ तालमेल नहीं बैठा सकती। अंतरिक्ष यानों पर अनुसंधान या परमाणु हथियारों का विकास धरती के संसाधनों का सबसे खतरनाक और निरर्थक अपव्यय है। जरूरत वैसे विकास की है जहां प्रकृति के स्वाभाविक रुझान, प्राकृतिक ऊर्जा के प्रवाह और धरती की बनावट के साथ कम से कम छेड़छाड़ हो। यह बड़े राष्ट्रों के ढांचों के साथ नहीं हो सकता। इनमें समय-समय पर होने वाली चुनावी कवायद के बावजूद असली सत्ता एवं संसाधनों का नियंत्रण अपने को लगातार फैलाने वाली नौकरशाही के हाथ में होता है। इसका सहज रिश्ता औद्योगिक प्रतिष्ठानों के उस तंत्र से बैठता है, जिसे प्रख्यात अर्थशास्त्री गैलब्रेथ ने टेक्नोस्ट्रक्चर का नाम दिया था। ये राष्ट्र-राज्य कैसे टूटेंगे, यह अभी दिखाई नहीं देता। लेकिन इसके बगैर अतिलघु इकाइयों में जनता के स्वनिर्णय के अधिकार की बात करने का कोई अर्थ नहीं होता। अभी हम जरूरी कदमों की कल्पना ही कर सकते हैं।
सबसे पहले तो वन प्रदेशों या अन्य जगहों में रहने वाले आदिवासियों के परंपरागत जीवन से कोई छेड़छाड़ नहीं होगी। इन्हें सैलानियों के हस्तक्षेप से भी मुक्त रखना होगा। वनप्रदेशों और आदिवासी-बहुल क्षेत्रों में परिवेश से छेड़छाड़ प्रतिबंधित होगी। मसलन, वनों की कटाई, खनिजों के लिए खनन, उनके लिए असुविधाजनक रेल या रोड का विस्तार, क्षेत्र में बहने वाली जलधारा, झरनों, नदियों आदि के प्रवाह को रोकना आदि। ये सब तो उन लोगों की जीवन पद्धति को बचाने के लिए होंगे जो अब तक आधुनिक औद्योगिक सभ्यता की चपेट में नहीं आए हैं। लेकिन इससे आगे बाकी लोगों के जीवन में भी बड़े परिवर्तन की जरूरत होगी। शहरीकरण की प्रक्रिया को पलटना होगा और कृषि और दूसरे उद्यमों को इस तरह वितरित करना होगा कि कृषि और उद्योग एक दूसरे से जुड़े और करीब हों। गांव में ही, जहां खेती होती है, लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए लघु और कुटीर उद्योग लगेंगे।
संपन्न देशों के ध्रुव प्रदेशों की ओर रुख करने और ऊर्जा स्रोतों पर उनकी कंपनियों की लगभग पूरी इजारेदारी का असर कुछ वैसा ही हो सकता है जैसा सेवियत यूनियन के विघटन के बाद क्यूबा की अर्थव्यवस्था पर हुआ था। अचानक सोवियत यूनियन से प्राप्त होने वाले सस्ते पेट्रोलियम पदार्थों का मिलना बंद होने और क्यूबाई चीनी के लिए बाजार खत्म हो जाने से उसे अपनी अर्थव्यवस्था को बिलकुल अलग तरह की दिशा देनी पड़ी। वहां के विशाल कृषि फार्मों को तोड़ छोटे सहयोगी फार्मों में बदल दिया गया। नियोजित ढंग से ट्रैक्टरों एवं पेट्रोल से चलने वाली खेती की दूसरी मशीनों की जगह बैलों से चलने वाले उपक्रम विकसित हुए। इसके लिए बैलों की वंशवृद्धि नियोजित ढंग से की गई। शहरों के इर्दगिर्द एवं शहरों में छोटी क्यारियों में साग-सब्जियों की खेती शुरू हुई जिससे लोगों की फल-सब्जी आदि की जरूरतें पूरी की जा सकें। कृषि और उद्योगों के साथ-साथ और आत्मनिर्भर विकास से परिवर्तन का खर्च बिलकुल कम हो गया।
आज के उन्नत औद्योगिक देशों के ध्रुव प्रदेश की ओर पलायन एवं जीवाश्म ऊर्जा के स्त्रोतों के विरल होने एवं उन पर संपन्न देशों की इजारेदारी के कारण अनुपलब्ध होने से आज के तथाकथित विकासशील देशों की भी वैसी ही स्थिति बनने वाली है, जैसी सोवियत यूनियन के विघटन के बाद क्यूबा की बनी थी। क्यूबा की तरह ही इन गरीब मुल्कों को भी यह सुविधा है कि ये अपेक्षाकृत गर्म प्रदेशों में हैं। इनकी ऊर्जा की जरूरत विकसित देशों की तुलना में काफी कम है। इन्हें अपने घरों को गर्म रखने की जरूरत नहीं होती। इन गर्म प्रदेशों में मौसम के हिसाब से जीवन को गर्मी और सर्दी की अतियों से बचाने की पारंपरिक परिपाटी रही है, जिससे हजारों वर्ष से ये लोग जीवनयापन करते रहे हैं। अति ठंडे संपन्न देशों में भी आधुनिक ढंग से सर्दी झेलने का प्रबंध आदर्श नहीं कहा जा सकता। आर्कटिक प्रदेश के एस्कीमो सैकड़ों या हजारों वर्ष से वहां की भीषण सर्दी में सुविधा से जीने की पद्धति विकसित करने में सफल हुए हैं। इसी से अब तक उनके नजदीक के नार्वे, स्वीडन आदि के आधुनिक लोग ग्रीनलैंड में आधुनिक उपक्रमों के आधार पर रिहाइश बना नहीं पाए हैं। आस्ट्रेलिया के मूल निवासी वहां के मुश्किल रेगिस्तानी इलाकों में अपने छोटे घुमंतू गिरोहों में आखेट और कंद-मूल पर आधारित जीवन जी रहे हैं, जहां आधुनिक उपक्रमों से लैस यूरोप वासियों के लिए जीवन असंभव बना हुआ है। मनुष्य की स्वाभाविक प्रतिभा ऐसी है कि वह कठिन से कठिन परिवेश के अनुरूप जीवन पद्धति विकसित कर हजारों वर्षों से अपना अस्तित्व बचाए रहा है। प्रदूषण व ऊर्जा का नया संकट झेलने की नई प्रविधि वे इसी तर्ज पर विकसित कर लेंगे। मानवजनित पर्यावरण के संकट के पहले मानव के पूर्वज ऊष्मता, सूखा और हिमयुग के कई काल झेल चुके हैं। आज पर्यावरण का संकट प्रलय जैसा इसलिए दिखाई देता है क्योंकि अल्पकालिक तकनीकी सफलता ने यह भ्रम पैदा कर दिया था कि मनुष्य प्रकृति की शक्तियों पर विजय प्राप्त कर सकता है और इसे अपने जीवन को इसके अनुकूल ढालने की कोई विवशता इसके सामने नहीं है। इस अहं से मुक्त हो मनुष्य अपने वैज्ञानिक ज्ञान का इस्तेमाल प्रकृति से सहज साहचर्य स्थापित करने में कर सकता है। अगर कोई विकल्प का मॉडल बनेगा तो उसकी वैचारिकी का यही सार तत्व होगा।
एक बात साफ दिखाई देती है। धरती के संसाधनों का संतुलित व जीवन के लिए जरूरी उपयोग तभी संभव है, जब आदमियों के बीच गैरबराबरी न हो और वे पारस्परिक सहयोग पर आधारित छोटी इकाइयों में रहें जैसे कृषि क्रांति के पहले के दिनों में रहते थे। तब जीवन का आधार फल-मूल जमा करना और आखेट था। आज हम उस अवस्था में नहीं जा सकते। उसका सबसे बड़ा कारण हमारी विशाल जनसंख्या है। इस भीड़ भरी दुनिया में खेती ही जीवन का आधार हो सकती है। कृषि छोटी व सहयोगी होगी। यह एक सोची-समझी बाध्यता होनी चाहिए, नहीं तो हम उन पुराने दिनों की तरफ लौट सकते हैं जब गुलामों व कृषकों का सहारा ले विशाल साम्राज्य कायम हुए। समाज में सब कुछ अनियंत्रित नहीं होता। काफी कुछ मूल्यों के आधार पर मनुष्यों की संस्कृति द्वारा निर्धारित होता है। दस हजार साल के इतिहास का सबक हमें ऐसे समाज के सांस्कृतिक निर्धारण में सहायक होगा और अंततः हममें यह विश्वास दृढ़ करेगा कि प्रकृति और समग्र जीव जगत की रक्षा के साथ ही हमारा अपना अस्तित्व भी जुड़ा है। 'स्काई इज द लिमिट' वाला विज्ञापन बकवास है। आदमी धरती से बंधा है और वह तभी तक जीवित रहेगा जब तक यह बंधन कायम है।

(महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के पंद्रहवें स्थापना दिवस (29 दिसंबर, 2012) पर आयोजित कार्यक्रम का उद्घाटन भाषण)

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