Wednesday, 6 August 2014

केसला: सार्वभौमवाद के बरक्स स्थानीयता की दावेदारी

सुनील ने रास्ता बदलने के लिए केसला का रास्ता नहीं चुना था। उनका मुकम्मल विश्वास था कि परिवर्तन का रास्ता हथियारों से नहीं विचारों से होकर गुजरता है। 

प्रेम सिंह
सुनील की पहचान केसला के साथ जुड़ी थी। बल्कि कह सकते हैं केसला और सुनील अभिन्न हो गए थे। सुनील देश के कोने-कोने में जाते थे तो केसला उनके साथ जाता था और देश का कोना-कोना उनके साथ केसला चला आता था। केसला वह स्रोत है जहां से सुनील की विचारशीलता और कर्मशीलता फूटती और पल्लवित होती है तथा सार्वभौमवादी वर्चस्व को चुनौती देती है। सुनील के साथ केसला सार्वभौमवाद के खिलाफ स्थानीयता का दावा बन जाता है। हमारे दौर के गंभीर विचारक और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता सुनील की भूमिका और उसका महत्व समझने के लिए सार्वभौमवाद के बरक्स स्थानीयता की दावेदारी की अवधारणा को समझना जरूरी है।
सुनील ने अस्सी के दशक में केसला को अपना कार्यक्षेत्र बनाया और लगातार तीन दशकों तक वहीं रह कर आदिवासियों और किसानों के बीच काम करते रहे। सुनील ने बड़े शहरों की मारामारी से बचने के लिए केसला रहने का चुनाव नहीं किया था, जैसा कि आधुनिक औद्योगिक सभ्यता से त्रस्त कुछ प्रकृति-प्रेमी करते हैं। न ही उन्हें आदिवासी जीवन के प्रति नॉस्टेल्जिक लगाव था, जैसा कि कई विदेशियों से लेकर भारतीयों तक में देखने को मिलता है। आदिवासियों/किसानों को शिक्षित और सुसंस्कृत बनाना भी उनका ध्येय नहीं था, जैसा कि कुछ एनजीओ, मिशनरी, आरएसएस आदि करते हैं। केसलावासियों के आर्थिक/प्रशासनिक सशक्तिकरण में भी वे नहीं जुटे थे, जैसा कि मौजूदा व्यवस्था के तहत बहुत से एनजीओ करते हैं। सुनील वहां सीधे राजनीति करने के उद्देश्य से भी नहीं गए थे, जैसा कि राजनीतिक विचारधारा के तहत संगठित कर उनका नेता बनने की मंशा से कुछ लोग करते हैं। सुनील ने सक्रिय राजनीतिक काम 1995 में समाजवादी जन परिषद की स्थापना होने के बाद करना शुरू कियाजो प्रचलित राजनीति से बिल्कुल अलग था।
उपनिवेशवादी दौर में दुनिया में सब जगह सब लोगों के लिए एक, यानी सार्वभौमिक दर्शन/विचारधारा का दावा किया गया और उसके तहत सब जगह सब लोगों के लिए एक यानी सार्वभौमिक व्यवस्था कायम करने की मुहिम चलाई गई। यह सार्वभौमिक विचारधारा पूंजीवाद की थी, जिसे सामंतवाद के बाद पूरी मानवता के लिए एक अनिवार्य स्थिति बताते हुए आगे की समाजवादी व्यवस्था के लिए भी अनिवार्य बताया गया। तभी से समाजवाद के साथ पूंजीवाद का रोग उपनिवेशित देशों में भी लगा रहा है, जिसके चलते आज भी बड़े-बड़े विद्वान और नेता समाजवाद के पहले पूंजीवाद की वकालत करते हैं। जाहिर है, इससे पूंजीवाद मजबूती के साथ आगे बढ़ता रहा है। कई चरणों से गुजरते हुए वह विरोध और विकल्प के समस्त स्वरों व संघर्षों को परास्त कर वर्तमान दौर में कारपोरेट पूंजीवाद/वित्त पूंजीवाद के रूप में सामने है। पूंजीवादी  सार्वभौमिकता के दावे की एक बार और पुष्टि करते हुए उसके नियामकों ने उसका नया नाम वैश्वीकरण दिया है। उनका कहना है कि वैश्वीकरण एक सार्वभौमिक व सार्वकालिक व्यवस्था है, जिसका कोई विकल्प नहीं है। अपने इतिहास, भूगोल, सभ्यता, संस्कृति, भाषा, समाज, राजनीति, आर्थिक स्थिति सहित विभिन्न देश हों या देशों के अंतर्गत स्थानीयताएं, सभी वैश्वीकरण के मातहत हैं। दुनिया में भूख, भय, मानवीय गरिमा की अवमानना और हिंसा का तांडव मचा है, फिर भी उनका दावा है कि यह इतिहास का अंत है, और, लिहाजा, समस्त नवीन उद्भावनाओं/विचारों का भी। पूंजीवादी सार्वभौमवाद का इस बार का आक्रमण इतना प्रबल है कि उपनिवेशवाद के खिलाफ लंबा संघर्ष करके जो स्वतंत्रता अनेक देशों ने हासिल की थी, उस पर इस कदर गहरा संकट आ गया है कि स्वतंत्रता का विचार ही त्याज्य होता जा रहा है।
पूंजीवादी सार्वभौमवाद में संसाधनों पर स्थानीय निवासियों की हकदारी तथा विकास संबंधी योजनाओं के निर्माण में भागीदारी को स्वीकार नहीं किया जाता है। सब कुछ शीर्ष पर शासक वर्ग द्वारा तय होता है। उपनिवेशवादी दौर से ही यह होने लगा था; यह ‘सिद्ध’ करते हुए कि स्थानीय लोग हकदारी और भागीदारी के अयोग्य होते हैं; उन पर शासन करना ‘कर्तव्य का बोझ’ है। पूरी तरह से केंद्रवादी-वर्चस्ववादी यह व्यवस्था स्थानीय लोगों की हकदारी व भागीदारी की दिशा में किए जाने वाले चिंतन, प्रावधानों और प्रयासों को बारीकी से निरस्त कर देती है। उपनिवेशवाद से लंबे संघर्ष के बाद स्वतंत्र हुए देशों में भी ज्यादातर यही स्थिति है, जहां वैकल्पिक चिंतन की धाराएं विकसित हुईं। ऐसा नहीं है कि पूर्व-उपनिवेशित देशों में आजादी और लोकतांत्रिक प्रणाली के चलते कुछ लोग राजनीति और नौकरशाही में नीचे से उपर नहीं आते। लेकिन उन्हें इसी सांचे में ढल कर काम करना होता है। इस व्यवस्था में योग्यता की कसौटी पूंजीवदी व्यवस्था के योग्य होना निर्धारित कर दी गई है।
1991 में नई आर्थिक नीतियां लागू होने के बाद भारत की पहले से ही केंद्रवादी सत्ता के उपर कारपोरेट पूंजीवाद की नियामक – विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन, विश्व आर्थिक मंच आदि – वैश्विक आर्थिक संस्थाओं का सुपर केंद्र स्थापित हो गया। तभी से वैश्वीकरण के नाम पर संसाधनों को तेजी से लूटा और विशाल आबादी का उच्छेद किया जा रहा है। मुख्यधारा राजनीति इन संस्थाओं के तहत कारपोरेट पूंजीवाद की वाहक बनी हुई है। केसला इस परिघटना के प्रतिरोध का न केवल सशक्त प्रतीक है, उसका विकल्प भी प्रस्तुत करता है। लोकतंत्र समेत भारतीय राजनीति का तंत्र पूंजीवादी-साम्राज्यवादी लक्ष्यों की पूर्ती का जरिया न बन कर स्वतंत्र, स्वावलंबी, समतामूलक व्यवस्था का माध्यम बने, वैकल्पिक राजनीति के निर्माण की इस चुनौती का आगाज केसला से होता है। यानी, जिनके संसाधन हैं और जिनके जीवन के फैसले लिए जा रहे हैं, वे लोग खुद इस पूंजीवादी-साम्राज्यवादी सार्वभौमवाद का मुकाबला और उसके विकल्प का निर्माण करें। इस अवधारणा के तहत सार्वभौमिकता केसला सरीखी स्थानीयताओं का समुच्चय होगी; वह नहीं जो स्थानीयताओं को अपना ग्रास बनाती है। केसला पूंजीवादी सार्वभौमिकता का सगुण विकल्प है, जिसमें इस दिशा में होने वाले दुनिया भर के अनुभवों को जोड़ा जा सकता है। वैकल्पिक दृष्टि से संभावनाशील पर्यावरण संबंधी आंदोलनों से लेकर लैटिन अमेरिका की साम्राज्यवाद विरोधी राजनीतिक घटनाओं तक केसला में बैठे सुनील की पैनी नजर रहती थी।
कहना न होगा कि सुनील की यह समझ और भूमिका केसला पहुंचने के पहले दिन से ही नहीं बन गई होगी। समता संगठन में किशन पटनायकसच्चिदानंद सिन्हा और अन्य साथियों के साथ काम, गांधी, लोहिया, जेपी के चिंतन के साथ भारत और विश्व के समाजवादी आंदोलन का गहराई से अध्ययन और वैश्वीकरण का प्रतिरोध करने वाले कई संगठनों के साथ सतत काम करते हुए उनकी समझ और भूमिका का निर्माण हुआ। सजप की स्थापना के पहले के उनके काम को रचनात्मक राजनीति की कोटि में रख सकते हैं, आधुनिक भारतीय राजनीति में जिसकी नींव गांधी ने डाली थी और जिसे ‘फावड़ा’ के प्रतीक व ‘चौखंभा राज’ की अवधारणा के साथ लोहिया ने तथा गैरदलीय राजनीतिक कर्म के विचार के साथ जेपी ने आगे बढ़ाया। रचनात्मक राजनीति का चिंतन सक्रिय राजनीति और उसके द्वारा सत्ता में भागीदारी से कटा हुआ नहीं रहा है। इस चिंतनधारा में स्थानीय निकायों के माध्यम से सत्ता सबसे पहले और सीधे लोगों के हाथों में सुनिश्चित करने की वकालत है। सुनील ने पूंजीवादी सार्वभौमिकता का विकल्प देने वाली इस पूरी परंपरा को आत्मसात किया था।
कहा जा सकता है कि मौजूदा भीमकाय वैश्वीकरण के सामने सुनील की स्थानीयताधर्मी भूमिका बहुत ही सीमित थी। लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि वह मूलभूत, अविभाजित और अडिग थी। सुनील अब से कुछ साल पहले हम लोगों के बीच से चले जाते, तब भी उनकी भूमिका यही होती। वे अगले बीस-तीस साल जीवित रहते, तब भी इसी भूमिका को निभाते। सुनील के निधन पर हस्तक्षेप’ पर लिखी श्रद्धांजलि नवउदारवाद की बेदखली होगी सुनील को सच्ची श्रद्धांजलि’ में हमने यह रेखांकित किया है कि सुनील को अप्रोप्रिएट’ नहीं किया जा सकता था। यानी उन्हें केसला से नहीं डिगाया जा सकता था। अडिगता के साथ सुनील अपनी भूमिका में पूरी तरह सहज थे – प्रचलित क्रांतिकारी दिखावों से अलग। गांधी ने औद्योगिक पूंजीवादी सभ्यता के मुकाबले में कहा था -  ‘एक कदम काफी है’; बशर्ते वह कदम हो। वैश्वीकरण के प्रतिरोध में केसला भी एक कदम है।
दुनिया ध्वंसों और रचनाओं के समानांतर सिलसिले का नाम है। जिस तरह ध्वंस के कई रूप और प्राक्रियाएं होती हैं, उसी तरह रचना के बहुत-से रूप और प्रक्रियाएं चलती रहती हैं। सुनील ने रचना के पक्ष को मजबूत बनाया। कह सकते हैं उन्होंने रचना की तरह राजनीति की। नवसाम्राज्यवादी गुलामी में पगे ज्यादातर भारत में केसला एक ऐसा कोना है जहां फागराम, गुलियाबाई, मंगल सिंह, फूलवती, रामदीन, सुमरलाल, सदाराम, शेखलाल, राजेंद्र जैसे सैंकड़ों स्वतंत्र भारतीय रहते हैं। वैकल्पिक राजनीति और विकास के मॉडल पर ये लोग किसी भी विद्वान अथवा नेता से सार्थक बहस कर सकते हैं।
रचना की बात चली है तो सार्वभौमवाद के बरक्स स्थानीयता का दावा पेश करने वाली भारतीय भाषाओं की कुछ साहित्यिक कृतियों का स्मरण आता है। हिंदी के मशहूर कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु की कालजयी कृति ‘मैला आंचल’ (1954) उनमें से एक है। केसला और सुनील के संदर्भ में इस उपन्यास को पढ़ा जा सकता है। रेणु ने ‘मैला आंचल’ की भूमिका में लिखा है कि उन्होंने मेरीगंज (उपन्यास का गांव) को देश के सात लाख पिछड़े गांवों का प्रतीक मान कर चित्रण किया है। केसला/भुमकापुरा महज केसला/भुमकापुरा नहीं है। वह होशंगाबाद, हरदा, बैतूल, खंडवा के गांवों-कस्बों समेत भारत के समस्त गांवों-कस्बों का प्रतीक है। ‘मैला आंचल’ में डॉ. प्रशांत एक प्रमुख पात्र है। वह पटना मेडिकल कॉलिज से डाक्टरी की पढ़ाई करने के बाद, विदेश जाने के लिए मिली स्कॉलरशिप छोड़ कर, काला आजार पर रिसर्च करने के लिए मेरीगंज आने का फैसला करता है। मेरीगंज उसे पूरी तरह अपनी गिरफ्त में ले लेता है। वह मेडिकल रिसर्च छोड़ कर मेरीगंज के सामाजिक-आर्थिक यथार्थ पर रिसर्च करके रोग की जड़ को पकड़ता है। रोग के दो कीटाणुओं – ‘गरीबी और जहालत’ – की पहचान करके उनसे मुक्ति के लिए ‘लाल’ क्रांति की कल्पना करता है। मेरीगंज में रहते हुए वह वंचितों, खास कर संथाल आदिवासियों की सहायता करने लगता है। कम्युनिस्ट होने के आरोप में उसे जेल होती है, जो कि वह नहीं होता है। जेल से छूटने के बाद वह मेरीगंज में ही रह कर कुछ लोगों के चेहरे पर मुस्कराहट लाने का संकल्प लेता है।
डॉक्टर प्रशांत की भूमिका राजनीतिक नहीं है। वह कई राजनेताओं के संपर्क में रहा होता है; मेरीगंज में राजनीतिक काम करने वाले बालदेव, कालीचरन, बावनदास, लछमी आदि से उसका संबंध बनता है; वह गांधी जी की ‘अंतिम इच्छा’ पर विचार करता है, लेकिन राजनीति नहीं करना चाहता। लिहाजा, मेरीगंज में उसकी भूमिका वंचित लोगों के प्रति सहानुभूति तक सीमित रहती है; राजनीतिक मानस/चेतना के निर्माण में वह कोई भूमिका नहीं निभा पाता। शायद राजनीति उसे बुरी चीज लगती है। वह स्मरण करता है कि पटना में रहने वाली उसकी मित्र ममता ने राजनीति की तुलना डायन से की थी।
सुनील की भूमिका ठेठ से राजनीतिक है। सजप के गठन के पहले भी और बाद में भी। ‘मैला आंचल’ आजादी की उदय बेला में लिखा गया उपन्यास है। उपन्यास की कथा का समय भी 1946 से 1948 तक है और उस पर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की गहरी छाया पड़ी है। उपन्यास में स्वतंत्रता आंदोलन के आदर्शवाद और उसके समानांतर निहित स्वार्थों के अवसरवाद की गहरी टकराहट चित्रित हुई है। उपन्यास का अंत आते-आते गांधी जी की हत्या हो जाती है। मेरीगंज में आजादी का काम करने आया बावनदास एक रात दुलारचंद कापरा, जो गांजा और नेपाली लड़कियों की तस्करी करता था और आजादी मिलते ही कांग्रेस का नेता बन गया, की ब्लैक के माल से लदी गाड़ियों के आगे अड़ कर खड़ा हो जाता है और कुचल कर मारा जाता है। (सोशलिस्ट) पार्टी को प्रेमिका की तरह प्यार करने वाला कार्यकर्ता कालीचरन पार्टी सेक्रेटरी को अपनी बेगुनाही का सबूत देने के लिए जेल से फरार होतो है और पुलिस की गोली से घायल होकर जंगल की तरफ चला जाता है। जातिवादी राजनीति की आंधी में तपे-तपाए कांग्रेसी कार्यकर्ता बालदेव के पैर उखड़ जाते हैं और वह अपनी कार्यस्थली मेरीगंज को छोड़ कर अपने गांव चन्ननपट्टी अपने जातिभाइयों के बीच चले जाने का फैसला लेता है। अगर प्रशांत – भारत का बुद्धिजीवी/सिविल सोयायटी एक्टिविस्ट – अपनी भूमिका को राजनीतिक बना लेता तो मेरीगंज उपनिवेशवादियों के कब्जे से छूट कर उनके वारिसों के कब्जे में इतनी आसानी से नहीं चला जाता। तब केसला पर भी वैश्वीकरण का हमला उस तरह नहीं होता। तब शायद नवसाम्राज्यवादी गुलामी भी इस कदर आयद नहीं होती, जैसी आज है। न ही केसला में सुनील अपने अंतिम दिनों में इतना अकेला पड़ता!
उपन्यास में यह जानकारी नहीं मिलती कि जंगल प्रयाण के बाद कालीचरन का क्या हुआ? वह चलित्तर कर्मकार से मिल पाया या नहीं, जो बयालीस का बागी था और आजादी मिलने पर जिसने सरकार के कहने के बावजूद हथियार नहीं रखे थे। उसका मानना था कि संसदीय लोकतंत्र की राजनीति से गरीबों के हक में परिवर्तन नहीं होगा। उसने कालीचरन को कहा था कि जब वह निराश और असहाय हो जाए तो पार्टी और नेताओं को छोड़ कर उसके पास जंगल में चला आए। पार्टी ने चलित्तर कर्मकार से हथियार रखवाने के लिए कालीचरण को उसके साथ मेलजोल बढ़ाने के लिए कहा था। तभी से कालीचरन उसके संपर्क में था। चलित्तर कर्मकार द्वारा डाली गई डकैती में कालीचरन का नाम भी आ जाता है और उसे जेल हो जाती है। निर्दोष कालीचरन जेल से फरार होता है ताकि सेक्रेटरी साहब को सच्चाई बता सके और पार्टी को बदनामी से बचा सके। लेकिन सेक्रेटरी दरवाजे पर आए घायल कालीचरन को दुत्कार कर भगा देता है।
हिंसक संघर्ष में विश्वास रखने वाले लोग कह सकते हैं कि जैसे सेक्रेटरी द्वारा  दुत्कारे जाने पर कालीचरन ‘जंगल’ में चला गया, साथियों से चोट खाने पर सुनील को भी अपना रास्ता बदल लेना चाहिए था। सुनील ने रास्ता बदलने के लिए केसला का रास्ता नहीं चुना था। उनका मुकम्मल विश्वास था कि परिवर्तन का रास्ता हथियारों से नहीं विचारों से होकर गुजरता है। जब उन्हें अधरंग और उसके बाद मस्तिष्काघात हुआ, वे केसला में ‘सामयिक वार्ता’ का संपादकीय लिख रहे थे। पिछले दिनों स्थानीयता के दिखावटी और अधकचरे दावेदार नवदारवाद की नई लहर में खोखले डिब्बों की तरह बह गए; केसला का किला अपनी जगह मजबूती के साथ खड़ा रहा।

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