Friday, 10 February 2017

जनता की तकलीफ की राजनीति

जनता की तकलीफ की राजनीति

प्रेम सिंह

                पिछले दिनों लिए गए विमुद्रीकरण के फैसले पर छिड़ी बहस में फैसले से साधारण जनता को होने वाली तकलीफ का जिक्र कई रूपों में बार-बार हो रहा है। इस औचक फैसले से साधारण जनता को होने वाली तकलीफ की शिकायत उच्च एवं उच्चतम न्यायालय ने भी की है। फैसले के अनेक समर्थकों ने भी जनता की तकलीफ पर अपनी चिंता व्यक्त की है। 50 से अधिक लोगों की मौत सीधे इस फैसले के कारण हो चुकी है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थकों का कहना है कि फैसले से जनता को कोई तकलीफ नहीं है, बल्कि वह खुश है। वे फैसले से होने वाली तकलीफ की शिकायत करने वाले भुक्तभोगियों और पत्रकारों को धमकाते नजर आते हैं। उनका कहना है कि जनता को तकलीफ होती तो वह बैंक की कतारों में नहीं, फैसले के विरोध में सड़कों पर होती। पूरे देश में सुबह से शाम तक बैंक की लाइनों में लगी जनता की तकलीफ शायद कहीं न कहीं मोदी समर्थकों को भी नजर आती है। तभी वे सीमा पर तैनात सेना के जवानों द्वारा सही जाने वाली तकलीफ का वास्ता देने लगते हैं। पहले केवल चार-पांच दिनों की तकलीफ उठाने की बात करने वाले प्रधानमंत्री ने देश का वास्ता देकर पचास दिनों तक तकलीफ उठाने की भावुक गुहार लगाई है।
                इस फैसले के चलते जनता की तकलीफ से सचमुच विचलित होने वाले लोगों द्वारा कहना कि गरीब की हाय लगेगी’, एक असहाय उद्गार भर है। ऐसे उद्गारों का आज की राजनीति में कोई अर्थ नहीं है। लोकतंत्र में जनता को एक दिन भी तकलीफ देने का किसी सरकार को हक नहीं है, इस तरह की बातें न चलन में रह गई हैं, न पसंद की जाती हैं। लोहिया की उस स्थापना का हवाला देना भी बेकार है जिसमें वे कहते हैं कि प्रत्येक कदम/फैसले का औचित्य उस कदम/फैसले में ही निहित होना चाहिए; भविष्‍य का वास्ता देकर किया गया औचित्य-प्रतिपादन सरकारों/राजनीतिक पार्टियों को जनता पर मनमाने अत्याचार की छूट देता है। विमुद्रीकरण के फैसले से भविष्‍य में स्वर्णिम भारतबनने के दावे बढ़-चढ़ कर किए जा रहे हैं। मैं तुम्हें स्वर्णिम भारत दूंगाका खर्चीला प्रचार अभियान दिल्ली में शुरू हो चुका है।
                यह गौर करने की बात है कि नवउदारवादी अर्थव्यवस्था लागू होने के बाद से भारतीय राजनीति में जनता की तकलीफ के प्रति शासक वर्ग का रवैया तेजी से बदलता गया है। शासक वर्ग अब जनता की वोट की ताकत से नहीं डरता; कि उसकी नीतियों के कारण तकलीफ उठाने वाली जनता चुनाव में उसे परास्त कर देगी। किसी भी व्यवस्था में लोगों की तकलीफ का इंतिहाई छोर जीवन को ही समाप्त कर देना होगा। नवउदारवादी दौर में करीब तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। यह सिलसिला जारी है। लेकिन सरकारों और नेताओं पर इसका कोई असर नहीं है। क्योंकि चुनाव काले धन के बल पर प्रचार कंपनियों, कारपोरेट घरानों, चुनाव जिताने के विशेषज्ञों और मीडिया की मार्फत लड़ा जाता है। ये मिल कर तय करते हैं कि केंद्र में कब किस नेता और पार्टी की सरकार होगी। नवउदारवादी दौर में नेता/पार्टियां नहीं, लाल बुझक्कड़ विशेषज्ञ भारत की राजनीति और सरकारें चलाने लगे हैं। ऐसी स्थिति में जनता की तकलीफ पर केवल लफ्फाजी और झांसेबाजी होती है, जो सबके सामने है। 50 दिन में जनता की तकलीफ दूर करने का वादा करने वाले प्रधानमंत्री और उनके विशेषज्ञों को अच्छी तरह पता है कि जनता उसके बाद भी तकलीफ में ही रहेगी।
                यह स्पष्‍ट है कि 6 महीने पहले लिए गए विमुद्रीकरण के फैसले में अन्य जो भी खयाल रखे गए हों, जनता को होने वाली तकलीफ पर ध्यान नहीं दिया गया। जनता की तकलीफ कोई समस्या नहीं रह गई है। नेताओं को पता है उनका प्रचारतंत्र जनता की तकलीफ पर भारी पड़ेगा। वे अपने पक्ष में सहमति का निर्माण कर लेंगे। तकलीफ सहने वाली जनता फिर कारापोरेट के हित की राजनीति करने वालों को वोट देगी। शासक वर्ग ऐसा इंतजाम करता है कि जनता आत्महत्या, विस्थापन, बेरोजगारी, मंहगाई, बीमारी जैसी निरंतर बनी रहने वाली तकलीफों का दर्द अपने को धर्म, जाति, क्षेत्र आदि से जोड़ कर भुला देती है। इस प्रक्रिया में जनता का अराजनीतिकरण होता जाता है। विकल्पहीनता की स्थिति दरअसल जनता के अराजनीतिकरण के चलते बनती है। वह नवउदारवादी व्यवस्था के विकल्प की राजनीति खड़ी करने की कोशिशों में लगे नेताओं और पार्टियों के साथ खड़ी नहीं होती। स्थिति और जटिल हो जाती है जब ज्यादातर नागरिक समाज और जनांदोलनकारी बिचौलिए की भूमिका निभाते है।
                यह मान्य तथ्य है कि विदेशी फंडिंग वाले एनजीओ पूंजीवादी व्यवस्था के सेफ्टी वाल्व हैं। वे राजनीतिक कार्यकर्ताओं को राजनीतिक कर्म से विरत करके अराजनीतिकरण की प्रक्रिया को बढ़ाते हैं। नवउदारवाद के प्रतिष्‍ठापकों का दावा है कि नवउदारवादी व्यवस्था का कोई विकल्प नहीं है, न ही किसी विकल्प की जरूरत है। अगर नवउदारवादी व्यवस्था के तहत कतिपय समस्याएं हैं तो एनजीओ गठित करके उनका समाधान निकाल लीजिए। पिछले दिनों दो एनजीओ सरगनाओं द्वारा प्रायोजित भ्रष्‍टाचार विरोधी आंदोलन का अधिकांश नागरिक समाज और जनांदोलनकारियों ने पुरजोर समर्थन और उसमें हिस्सेदारी करके नवउदारवाद के विकल्प की राजनीति को गहरी क्षति पहुंचाई। उस आंदोलन को आरएसएस और कारपोरेट घरानों समेत रामदेव, रविशंकर, जनरल वीके सिंह सरीखों का खुलेआम सक्रिय समर्थन था। अन्ना हजारे ने तब भी नरेंद्र मोदी की तारीफ की थी और आज भी मोदी के साथ है। इतना ही नहीं, सीधे कारपोरेट की कोख से जन्मी आम आदमी पार्टी का साथ भी सेकुलर और प्रोग्रेसिव नागरिक समाज ने दिया और आज भी दे रहा है। इसके बावजूद कि यह पार्टी घोषित रूप से, संविधान की विचारधारा सहित, विचारधाराहीनता की वकालत करती है। उनमें से बहुतों के लिए मोदी का विकल्प अगर राहुल गांधी नहीं बन पाते हैं, तो केजरीवाल है।
                जाहिर है, 1991 के बाद से अराजनीतिकरण साधारण जनता का ही नहीं, नागरिक समाज का भी होता गया है। चुनींदा अपवादों को छोड़ दें तो देश का कौन-सा बड़ा बुद्धिजीवी है जिसने मनमोहन सिंह द्वारा लागू की गईं नई आर्थिक नीतियों के खिलाफ निर्णायक स्टैंड लिया हो? मोदी को देश पर मूर्खों द्वारा थोपी आपदा कह कर अपने को बड़ा विचारशील जताने वाले थोड़ा रुक कर विचार करें कि जनता की तकलीफ के प्रति उनकी सहानुभूति कितनी सच्ची है? जैसा युग होता है, वैसा ही युग पुरुष निकल कर आता है। मनमोहन सिंह के बाद मोदी उस भारतीय समाज के उग्र प्रतिनिधि हैं जो नवउदारवादी दौर में बना है। यह एक झूठी तसल्ली है कि वे केवल 31 प्रतिशत मतदाताओं का चुनाव हैं। विमुद्रीकरण के फैसले से जनता को होने वाली भारी तकलीफ से द्रवित कुछ लोग विरोध के लिए विपक्ष की तलाश कर रहे हैं। 1991 के बाद से भारत की राजनीति एक पक्षीय - नवउदारवादी - बनती गई है। नितीश कुमार और नवीन पटनायक विमुद्रीकरण के समर्थन में हैं। अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी दोनों नवउदारवाद के समर्थक हैं और इस मामले में मुस्लिम वोट बैंक पक्का करने की नीयत से परिचालित हैं। 
                काले धन की सारी बहस में यह नहीं बताया जाता कि वह मेहनतकश जनता की गाढ़ी कमाई की लूट का धन है; और उस लूट में नई आर्थिक नीतियां लागू होने के बाद से अभूतपूर्व तेजी आई है। भारत में नवउदारवाद मेहनतकशों की अनंत और अटूट तकलीफों का नाम है। 25 साल बीत जाने पर भी स्वर्णिम भविष्‍य की बातें बिना किसी शर्म और हिचक के की जाती हैं। यानी किसानों की आत्महत्या, आदिवासियों का विस्थापन, बेरोजगारों की निरंतर बढ़ती फौज, दिन-रात बड़े बांधों-राजमार्गों-पुलों-हवाई अड्डों-इमारतों आदि के निर्माण में लगे करोड़ों मजदूरों का जीवन स्वर्णिम भविष्‍यकी कीमत है। कमेरों को आगे भी यह कीमत चुकाते रहना होगा। उदाहरण के लिए, कल्पना कीजिए पांच सौ स्मार्ट सिटी बनाने के लिए मेहनतकशों की कितनी पीढियां खपेंगी? पूरे भारत को डिजिटलऔर कैशलेस करेंसीमें तब्दील करने के लिए किनकी बलि चढ़ेगी? बच्चों की परवरिश, शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन आदि का इंतजाम हर लोकतांत्रिक सरकार का दायित्व होता है। लेकिन नवउदारवादी भारत के वर्तमान और भविष्‍य में मेहनतकशों के बच्चों के लिए कोई जगह नहीं है। भारतीय राजनीति की इससे बड़ी तकलीफ क्या हो सकती है कि श्रमशील जनता ने नवउदारवादी व्यवस्था के निर्माण में मर-खप जाने को ही अपनी नियति मान लिया है!
                जनता की तकलीफ में कमी हो, इससे शायद ही किसी को इनकार हो सकता है। इस दिशा में शुरुआत हो सकती है। कांग्रेस-भाजपा से इतर पार्टियां एका बना कर सीधे मेहनतकश जनता से कहें कि वे उन्हें तबाह करने वाली नवउदारवादी नीतियों को अपदस्थ करके संविधान के नीति निर्देशक तत्वों की रोशनी में अपनी नीतियां चलाएंगी। अगर संकल्प सच्चा हो तो 2019 का चुनाव आसानी से जीत लिया जा सकता है। उसके लिए कारपोरेट के काले धन की आवश्‍यकता नहीं पड़ेगी। नवउदारवाद का समर्थक स्वभावतः नवसाम्राज्यवाद का समर्थक हो जाता है। नवसाम्राज्यवादी शिकंजे के तहत अनेक कुर्बानियों से हासिल की गई आजादी गुलामी में तब्दील होती जा रही है। आशा करनी चाहिए कि कांग्रेस और भाजपा के समर्थक, विशेषकर युवा, लंबे समय तक आजादी का खोते जाना चुपचाप नहीं देखते रहेंगे। वे नवउदारवाद विरोध की राजनीति का समर्थन कर सकते हैं। या अपनी पार्टियों को इसके लिए बाध्य कर सकते हैं।

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