Monday 20 November 2017

बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के साम्प्रदायिक उत्पीड़न पर सोशलिस्ट पार्टी का बयान

17 नवम्बर 2017

प्रेस रिलीज़

बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के साम्प्रदायिक उत्पीड़न पर सोशलिस्ट पार्टी का बयान    

      सोशलिस्ट पार्टी का मानना है कि अल्पसंख्यक नागरिकों की धार्मिक पहचान के साथ जीवन, संपत्ति, सम्मान और व्यवसाय की पूरी हिफाजत करना हर राज्य का कर्तव्य है. साथ ही अल्पसंख्यक आबादी बिना किसी भय और भेदभाव के पूरे नागरिक अधिकारों के साथ स्वतंत्रता पूर्वक रह सके, यह सुनिश्चित करना भी राज्य की जिम्मेदारी है। आधुनिक राष्ट्र-राज्य की अवधारणा और संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्देशों में यह बात अच्छी तरह स्पष्ट की गई है. लेकिन बांग्लादेश की सरकारें यह जिम्मेदारी निभाने में नाकाम रही हैं.

      दुनिया में हिंदू आबादी वाले तीन सबसे बड़े देशों में बांग्लादेश का नाम है. यहाँ भारत और नेपाल के बाद सबसे ज्यादा, क़रीब डेढ़ करोड़ हिंदू रहते हैं। लेकिन इस्लामी कट्टरपंथियों के लगातार हमलों और सरकार की नाकामी के चलते बांग्लादेश में हिंदू आबादी लगातार घट रही है. बांग्लादेश ब्यूरो ऑफ़ स्टेटिस्टिक्स के आंकड़ों के मुताबिक इसका कारण हिन्दुओं का बांग्लादेश से पलायन है. आंकड़ों के मुताबिक 1947 में तब के पूर्वी पाकिस्तान में क़रीब 28  फीसदी हिंदू आबादी थी। 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद 1981 में वहां जो पहली जनगणना हुई उसमें हिंदू आबादी 12 फीसदी रह गई. इसके बाद 2011 की जनगणना के मुताबिक बांग्लादेश में करीब 9 फीसदी हिंदू बचे हैं.

      संयुक्त राष्ट्र संघ, भारत समेत दुनिया के कई देश, नागरिक अधिकार संस्थाएं और स्वतंत्र शोधकर्ता बांग्लादेश सरकार पर हिन्दुओं के खिलाफ जारी साम्प्रदायिक हिंसा को रोकने का दबाव डालते रहे हैं. लेकिन स्थिति में सुधार नहीं हो पा रहा है.  

      बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, खास तौर पर हिन्दुओं का उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर उत्पीड़न करने की घटनाएं अक्सर होती हैं. 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तानी सेना और इस्लामी साम्प्रदायिक तत्वों ने हिन्दुओं को हिंसा का खास निशाना बनाया. 1992 में अयोध्या स्थित बाबरी मस्जिद गिराए जाने पर बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ साम्प्रदायिक दंगे हुए. अंतर्राष्ट्रीय क्राइम्स ट्रिब्यूनल (आईसीटी) ने 2013 में ज़माते इस्लामी के उपाध्यक्ष हुसैन सईदी को युद्ध अपराधी करार देकर फांसी की सजा सुनाई. यह सजा उन्हें 1971 के युद्ध अपराधों के लिए सुनाई गई जिसमें कई लाख निर्दोष नागरिक, ज्यादातर हिन्दू, मारे गए थे. कट्टरपंथी इस्लामी तत्वों ने आईसीटी द्वारा दी गई सजा के लिए हिन्दुओं को ज़िम्मेदार ठहरा कर उनके खिलाफ 20 जिलों में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा की. 2014 के आम चुनावों के दौरान अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर साम्प्रदायिक हमले हुए. यह सिलसिला 2015, 2016 और  2017 में भी जारी रहता है. 

      फेसबुक पर डाली जाने वाली इस्लाम धर्म, पैगम्बर मुहम्मद और कुरआन की निंदा की तस्वीरों और टिप्पणियों के कारण हिन्दुओं के खिलाफ साम्प्रदायिक हिंसा का नया ट्रेंड देखने में आया है. 2012-13 से यह शुरुआत हुई और इसकी आंच बांग्लादेशी बौद्धों पर भी आई. 2012 में एक बौद्ध के नाम से डाली गई आपत्तिजनक फेसबुक पोस्ट की प्रतिक्रिया में करीब 25000 की भीड़ ने 22 बौद्ध मठों और 50 घरों को नष्ट कर दिया. ताज़ा उदाहरण फेसबुक पर लिखी एक आपत्तिजनक टिप्पणी है जिसके चलते 10 नवंबर 2017 को रंगपुर जिले के ठाकुरबाड़ी गांव में 30 से ज्यादा हिंदू परिवारों के घर जला दिए गए। इस तरह की ज्यादातर घटनाओं में माना गया है कि अल्पसंख्यकों को आसान निशाना बनाने के मकसद से इस्लामी कट्टरपंथी खुद फेसबुक के माध्यम का इस्तेमाल करते हैं.    

      अपने को धर्मनिरपेक्ष बताने वाली मौजूदा अवामो लीग सरकार अक्सर कहती है कि हिन्दुओं के खिलाफ हमले निहित राजनीतिक स्वार्थ के चलते कट्टरपंथी तत्व करते हैं. मीडिया और रपटों में इस्लामी कट्टरपंथी तत्वों को संगठित करने और बढ़ावा देने वालों में मुख्यत; जमाते इस्लामी (जेआई), उसके छात्र संगठन इस्लामी छात्र शिबिर (आईसीएस) और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) का नाम लिया जाता है. ईसिस (ISIS) जैसे अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी संगठनों का नाम भी इसमें आता है. बीएनपी की नेता खालेदा जिया 2001 में जमाते इस्लामी के साथ गठबंधन सरकार चला चुकी हैं. हालाँकि जमात और बीएनपी दोनों हिन्दुओं के साम्प्रदायिक उत्पीड़न में अपनी संलिप्तता से इनकार करते हैं.
  
      विशेषज्ञ बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर हमलों के पीछे धार्मिक और राजनीतिक के अलावा आर्थिक कारण भी बताते हैं. उनके मुताबिक विशेष कर 'वेस्टेड प्रॉपर्टी एक्ट' (The Vested Property Act) ने सामाजिक और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली बहुसंख्यक लोगों ने हिन्दुओं की ज़मीन पर कब्जा ज़माने की नीयत से कट्टरपंथी तत्वों को बढ़ावा दिया है.  

      सोशलिस्ट पार्टी का सत्तारूढ़ अवामी लीग और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी, ज़माते इस्लामी समेत सभी विपक्षी राजनीतिक पार्टियों से आग्रह है कि वे अल्पसंख्यक नागरिकों के जीवन, संपत्ति, सम्मान और व्यवसाय की पूरी हिफाजत सुनिश्चित करें. ताकि हिन्दू, बौद्ध और ईसाई बिना भय और भेदभाव के पूरे नागरिक अधिकारों के साथ स्वतंत्रता पूर्वक अपने देश में रह सकें. साथ ही पार्टी की मांग है कि सरकार अभी तक की घटनाओं में संलिप्त अपराधियों को तुरंत गिरफ्तार कर सजा दे.

      सोशलिस्ट पार्टी आगाह करना चाहती है कि बांग्लादेश की यह स्थिति भारत के लिए एक सबक है. भारत के शासक वर्ग को भारतीय संविधान में उल्लिखित धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का ईमानदारी से पालन करना चाहिये. दुर्भाग्य से मौजूदा सरकार में प्रधानमन्त्री और मुख्यमंत्री की हैसियत वाले नेता धर्मनिरपेक्षता की खुले आम अवमानना करते हैं. यहाँ तक कि खिल्ली उड़ाते हैं. यह देश और समाज के लिए बेहद खतरनाक स्थिति है. 1971 में बना बांग्लादेश 1972 में संवैधानिक रूप से धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया गया था. लेकिन फौजी तानाशाह जनरल इरशाद ने 1988 में इस्लाम को बांग्लादेश के राज्य धर्म का दर्ज़ा दिया जो बांग्लादेश के स्वतंत्रता आंदोलन के नारों - धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र - के बिलकुल उलट था. मुहम्मद अली जिन्ना ने भी पकिस्तान को एक धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक देश बनाने का फैसला किया था. लेकिन वहां की स्थिति सबके सामने है. सोशलिस्ट पार्टी का मानना है कि लोकतंत्र बिना धर्मनिरपेक्षता के नहीं चल सकता. भारत के लिए बांग्लादेश और पाकिस्तान इसके निकटतम उदाहरण हैं.  
   
डॉ. अभिजीत वैद्य
प्रवक्ता
मोबाइल : 9822090755 

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