Friday, 10 February 2017

सोशलिस्‍ट पार्टी के 14-15 नवंबर 2016 को लखनऊ में चौथे राष्‍ट्रीय अधिवेशन में पारित राजनीतिक प्रस्ताव




     
सोशलिस्‍ट पार्टी के 14-15 नवंबर 2016 को लखनऊ में चौथे राष्‍ट्रीय अधिवेशन में पारित राजनीतिक प्रस्ताव
      देश में लोकसभा चुनाव हों या राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव, ज्‍यादातर स्थापित राजनीतिक दल किसी भी तरह देश की सत्ता पर काबिज होने की होड़ लगाते हैं। झूठे वायदों, व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप, सांप्रदायिक उन्माद, जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद, व्‍यक्तिवाद, परिवारवाद, धनबल, बाहुबल, छल-कपट का इस्‍तेमाल बिना किसी शर्म के किया जाता है। वंचित समूहों के प्रति दिखावटी सहानुभूति के सहारे ये पार्टियाँ गरीब और मेहनतकश जनता को गुमराह कर अपने-अपने पक्ष में लामबंद करने का दांव खेलती हैं। मीडिया ‘जो दिखता है वह बिकता है‘ की तर्ज पर चौबीस घंटे इस लोकतंत्र विरोधी राजनीति को लोगों के सामने परोसता है। इस पूरे शोर-शराबे के बीच गरीबी, गरीबों और अमीरों के बीच मौजूद विषमता की लाखों गुनी खाई, बेरोजगारी, अशिक्षा, कुपोषण, लाखों किसानों की आत्महत्या, नागरिक अधिकारों का दमन, आदिवासियों-दलितों-स्त्रियों-अल्पसंख्यकों की बढ़ती असुरक्षा, पर्यावरण विनाश जैसे बुनियादी मुद्दों पर कोई सार्थक चर्चा नही हो पाती। दरअसल, मुख्‍यधारा पार्टियाँ नब्बे के दशक से लागू की गईं नवउदारवादी आर्थिक नीतियों, भूमंडलीकरण, बाजारवादी उपभोक्तावाद, केंद्रवाद, अंधराष्ट्रवाद के पक्ष में एकमत हैं। ये विश्‍व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्‍व व्यापार संगठन जैसी कारपोरेट पूंजीवाद की पुरोधा संस्थाओं के आदेश पर बड़े देशी-विदेशी कॉरपोरेट घरानों के हितों के अनुसार अपनी नीतियाँ बनाती हैं। इस तरह ज्यादातर मुख्यधारा राजनीतिक पार्टियाँ देश की धरोहर - जल, जंगल, जमीन - को कारपोरेट घरानों को बेचने वाली एजेंट बन गई हैं।
      दुनिया के स्तर भी पूंजीवाद के नवउदारवादी-बाजारवादी दौर ने तबाही मचाई हुई है। ताकतवर और अपने को सभ्य कहने वाले देशों ने तेल, गैस, खनिजों आदि पर कारपोरेट का कब्जा जमाने, हथियार बेचने, ठेके हथियाने के मकसद से अफगानिस्तान, इराक, लीबिया, सीरिया, इजिप्ट, सूडान, कोंगो, माली, मोजांबिक, आदि कई देशों को लंबे गृहयुद्ध अथवा सशस्त्र संघर्ष की आग में धकेला हुआ है। ये देश हिंसा और दमन पर आमादा तालिबान, इस्लामिक स्टेट, अलशबाब, हिजबुल मुजाहिदीन जैसे संगठनों को हिंसा फैलाने के लिए धन और हथियारों की कमी नहीं होने देते। जबकि अमेरिका और यूरोप के देशों में भी आतंकवादी और अन्‍य तरह की वारदातें हो रही हैं। इस सबके चलते करोड़ों नर-नारी-बच्चे सालों-साल शरणार्थी शिविरों में रहने को अभिशप्त हैं। पिछले कुछ सालों में यूरोप जाने के लिए निकले कई हजार लोग मेडिटेरेनियन सागर में डूब चुके हैं। दुनिया भर में फैला माफिया तंत्र हिंसा और गृहयृद्ध से परेशान एशिया और अफ्रीका के लोगों को धन लेकर अवैध रूप से यूरोप भेजने, स्त्रियों को जबरन वेश्‍यावृत्ति में धकेलने, युवा पीढी को नशे की लत लगा कर नाकारा बनाने में बडे पैमाने पर सक्रिय है। तमाम देशों के नेताओं, उद्योगपतियों, उच्चाधिकारियों, दलालों का काला धन स्विटजरलैंड से लेकर ओफ शोर टैक्स हैवंस में जमा होता है। संयुक्त राष्‍ट्र संघ, सुरक्षा परिषद, यूरोपीय संघ आदि मानव सभ्‍यता को नष्‍ट करने वाली इन समस्याओं का समाधान नहीं निकाल पा रहे हैं।
      इस राष्‍ट्रीय सम्मेलन से सोशलिस्ट पार्टी भारत और विश्‍व के सहमना संगठनों और लोगों का आह्वान करती है कि प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन और ताकतवर देशों/कारपोरेट घरानों की लूटपाट पर आधारित पूंजीवादी-उपभोक्तवादी विकास के मौजूदा मॉडल को खारिज करें। मानवता को हिंसा और दमन के दुश्‍चक्र से निजात दिलाने और पर्यावरण का विनाश रोकने के लिए समता, सादगी, विकेंद्रीकरण, सहकारिता और पर्यावरण संरक्षा पर आधारित विकास के वैकल्पिक मॉडल को भारत और दुनिया के स्‍तर पर कारगर बनाएं।         
      नवउदारवादी नीतियों की शुरुआत के साथ श्रम कानूनों में मजदूर विरोधी और उद्योगपतियों के हक में तेजी से परिवर्तन किए गए हैं। सोशलिस्‍ट पार्टी की मांग है कि मूलभूत श्रम कानूनों का पूरी तरह और सख्‍ती से पालन किया जाए, श्रम कानूनों में कोई भी बदलाव ट्रेड यूनियन प्रतिनिधियों के साथ बातचीत करके मजदूरों की बेहतरी के लिए हो। हिंद मजदूर सभा समेत ट्रेड यूनियनों की तरफ से सरकार को सौंपे गए 12 सूत्री मांगपत्र का सोशलिस्‍ट पार्टी समर्थन करती है।
      विधानसभाओं तथा लोकसभा मे धनबल से तीन-चौथाई सदस्य करोडपति चुने जा रहे है जिन्‍हें गरीब मेहनतकश जनता की समस्याओं से कोई लेना-देना नही है। जाहिर है, चुनाव प्रणाली मे मौलिक सुधारों की जरूरत है। सोशलिस्‍ट पार्टी की मांग है कि उम्मीदवारों के खर्च के साथ राजनीतिक पार्टियों का खर्च भी जोड़ा जाए, सभी राजनीतिक पार्टियों की संपत्तियों और आय-व्यय को सूचना अधिकार कानून के तहत लाया जाए, पहले स्थान पर आने वाले उम्मीदवार को विजयी मानने की प्रणाली के स्थान वोट के अनुपात में सीटों (प्रपोर्शनल रिप्रेजेंटेशन) की प्रणाली अपनायी जाए।     
      वर्तमान केंद्र सरकार ने अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय को लक्ष्य करके समान नागरिक संहिता पर बहस चलाई है। सोशलिस्ट पार्टी का मानना है कि भारत जैसे आचार-विचारों की विविधता वाले समाज में, जहां कई अल्‍पसख्‍यक धर्म और आदिवासी कबीले हैं, समान नागरिक संहिता न तो संभव है, न जरूरी। बहुसंख्‍यक हिंदुओं में भी भिन्‍न-भिन्‍न रिवाज प्रचलित हैं। उत्‍तर भारत में लडकी की मामा से शादी की कल्‍पना भी नहीं की जा सकती। जबकि दक्षिण भारत में यह आम रिवाज है।
      तीन तलाक के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई है और समान नागरिक संहिता, जो एक अलग विषय है, के सवाल के साथ उसकी प्रासंगिकता नहीं है। इस मसले में असली सवाल औरतों के साथ भेदभाव का है। कई मुस्लिम देशों में तीन तलाक वैध नहीं है। भारत में कई मुस्लिम विद्वानों ने स्‍पष्‍ट किया है कि भारत में तीन तलाक जिस रूप में प्रचलित है उसकी मान्‍यता इस्‍लाम नहीं देता। पाकिस्‍तान और बंगला देश में भी तत्‍काल तीन तलाक की अनुमति नहीं है। सोशलिस्‍ट पार्टी आरएसएस और दूसरे सांप्रदायिक संगठनों द्वारा इस मुद्दे पर सांप्रदायिक भावनाएं उभारने की निंदा करती है। यह ध्‍यान दिया जा सकता है कि बंगला देश में हिंदू अल्‍पसंख्‍यक अभी भी 1947 पूर्व के हिंदू लॉ को मानते हैं और हमारे यहां हिंदू लॉ में 1956 में हुए सुधारों को अस्‍वीकार करते हैं।
      सोशलिस्‍ट पार्टी जम्‍मू और कश्‍मीर में मानवाधिकार और नागरिक अधिकारों की बिगडती स्थिति पर गहरी चिंता जाहिर करती है। हुरियत के निर्देश पर बच्‍चों के स्‍कूल बंद हैं, कुछ जला दिए गए हैं। पब्लिक सेफ्‍टी एक्‍ट के तहत बच्‍चों को हिरासत में लिया जाना, सुरक्षा बलों द्वारा बच्‍चों को भी मारा जाना, उन्‍हें पैलेट बुलेट के प्रयोग से अंधा कर देना – वहां रोजमर्रा का दर्दनाक अनुभव है। सोशलिस्‍ट पार्टी मांग करती है कि हिरासत में लिए गए बच्‍चों को तुरंत छोडा जाए और शांतिपूर्ण संवाद कायम करके स्‍कूलों को जल्‍द से जल्‍द खोला जाए। पार्टी केंद्र सरकार से अपील करती है कि वह सभी राजनीतिक पार्टियों, समूहों और हुरियत के साथ तुरंत बातचीत शुरू करे। बातचीत के लिए सरकार या अन्‍य पक्षों की ओर से कोई पूर्व शर्त नहीं होनी चाहिए। पार्टी की मांग है कि कश्‍मीर से सशस्‍त्र बल विशेष अधिकार कानून (अफ्‍सपा) हटाया जाए, जिसकी मांग लंबे समय से नागरिक अधिकार संगठन कर रहे हैं। साथ ही कश्‍मीर के लोगों को आश्‍वस्‍त किया जाए कि वहां धारा 370 बनी रहेगी और किसी भी रूप में उसे कमजोर नहीं बनाया जाएगा।
      जब से भाजपा की सरकार केंद्र में आई है समाज में सांप्रदायिक तनाव तेज हुआ है। अल्पसंख्यक मुसलमानों, दलितों और आदिवासियों पर हिंसक और जानलेवा हमले हुए हैं, जिनमें कई लोगों की जानें गई हैं। पहले लव जिहाद और उसके बाद गोरक्षा के नाम पर सांप्रदायिक उन्माद फैलाया गया है, जिससे अल्पसंख्यकों और दलितों में असुरक्षा की भावना है। आरएसएस और उसके सहयोगी संगठन यह सब कर रहे हैं। भाजपा, सरकार और प्रधानमंत्री का उन्हें समर्थन है। यह देश के बहुसंख्यक हिंदू समाज को अपना वोट बनाने की रणनीति के तहत किया जा रहा है। यह सरकार तिरंगा ध्वज और सेना पर भी वोट की राजनीति करने पर उतर आई है। स्वाधीनता संग्राम में अंग्रेजों का साथ देने वाला आरएसएस खुद को देशभक्त और अपने राजनीतिक विरोधियों को देशद्रोही घोषित कर रहा है। ऐसा लगता ही नहीं कि एक संविधान सम्मत सरकार देश में चल रही है। प्रधानमंत्री मोदी और उनकी टीम ने ज्यादातर मुख्यधारा मीडिया को सरकारी सत्ता और कारपोरेट घरानों की मार्फत अपने पक्ष में कर लिया है।
      इस सरकार ने पूरी अर्थव्यवस्था कारपोरेट घरानों के हवाले और समाज आरएसएस के उत्पातियों के हवाले कर दिया है। सरकार ने आरएसएस का एजेंडा लागू करने की नीयत से स्कूल, उच्च शिक्षा और शोध के संस्थानों में न केवल अनुचित हस्तक्षेप किया है, दलित व कमजोर तबकों के छात्रों को प्रताडि़त कर हरी है। भाजपा में शामिल कई ऐसे दलित, पिछड़े, मुस्लिम नेता, जिनका आरएसएस से संबंध नहीं है, चुपचाप बैठे हैं। कांग्रेस तथा अन्य क्षेत्रीय पार्टियों के नेता और सरकारें भी भारत के संवैधानिक स्वरूप को विकृत करने वाली आरएसएस की हरकतों पर प्रभावी रोक लगाने की कोशिश नहीं करते हैं। उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी की सरकार ने राज्य में होने वाली आरएसएस प्रायोजित कई अपराधी घटनाओं पर प्रभावी कार्रवाई नहीं की है। सोशलिस्ट पार्टी इस सम्मेलन से देश की जनता को आगाह करना चाहती है कि वह भाजपा/आरएसएस के राष्‍ट्र और समाज को तोड़ने वाले मंसूबों और कृत्यों को गंभीरता से समझे और उनका विरोध करे।
      आचार्य नरेंद्रदेव, गांधी, डॉ. अंबेडकर, भगत सिंह, जेपी, डॉ. लोहिया, एसएम जोशी, युसुफ मेहरअली, अच्युत पटवर्द्धन, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, सरोजिनी नायडू, कर्पूरी ठाकुर, मधु लिमये, किशन पटनायक सरीखे महान नेताओं व चिंतकों की विरासत से प्रेरित सोशलिस्ट पार्टी इस राष्‍ट्रीय सम्मेलन में समाजवाद के बुनियादी सिद्धान्तों में दृढ़ आस्था रखते हुए मेहनतकश जनता की एकजुटता से नवउदारवादी व्यवस्था को जड़ से उखाड कर समाजवादी व्‍यवस्‍था कायम करने का संकल्प दोहराती है।
सोशलिस्ट पार्टी का नारा
समता और भाईचारा

Political Resolution of the Socialist Party (India) passed in the 4th National Convention held in Lucknow on 14-15 November 2016




Political Resolution of the Socialist Party (India) passed in the 4th National Convention held in Lucknow on 14-15 November 2016

          Most of the established parties do all sorts of things to grab power during state and center elections. False promises, personal allegations and counter-allegations, communal tension, casteism, regionalism, lingualism, individualism, dynasty politics, money & muscle power, conspiracy and all such tactics are used shamelessly. Superficial sympathy is shown towards deprived sections of society to mislead the poor and working class in order to bring them in respective parties' fold. The media, following the maxim of ‘people buy what they see’ serves up this anti people politics 24X7. In the midst of all this cacophony, there’s no space for meaningful debate on fundamental issues like poverty, the complexities of the chasm between the rich and the poor, unemployment, illiteracy, malnutrition, suicides by lakhs of farmers, suppression of civil rights, the increasing vulnerability of tribals, dalits, women, minorities and environmental destruction. Actually, all main stream parties are in union since the beginning of nineties on implementing the policies of liberalization, privatization, globalization, consumerism, centralism and jingoistic nationalism. These parties frame their policies for the profiteering of national and multi-national corporate, following the dictates of the World Bank, IMF, WTO and other such organizations which propagate corporate capitalism. Thus, the main stream political parties have become agents for the sell-off of natural resources - water, forest and land - to the big corporate houses on through away prices.
          The neoliberal capitalist era has wreaked havoc at the global level too. The powerful and so-called civilized nations have pushed many countries like Afghanistan, Iraq, Libya, Syria, Egypt, Sudan, Congo, Mali, Mozambique etc into long term civil war or armed conflict with the sole purpose of selling arms, gaining contracts and getting access to these countries’ oil, gas and mineral resources for their corporates. These nations ensure the supply of funds and ammunitions to terrorist organizations like the Taliban, ISIS, Al Shabab, Hizbul Mujahideen even though terror incidents are happening in European countries and America as well.  Due to all this millions of men-women-children are condemned to live in refugee camps for many years. During the past years many thousands of people setting out for Europe via the Mediterranean Sea have drowned in it. The human traffic and drug mafia network throughout the world is extorting money from war ridden nations in Asia and Africa and channeling it back to Europe. It is also forcing women into prostitution and youngsters into debilitating addiction on a large scale. The black money of politicians, industrialists, bureaucrats, brokers of all countries is stored from Swiss banks to offshore tax heavens. The United Nations, UN Security Council, European Union etc. have not been able to find solutions to these human civilization threatening problems so far.
          Through this national convention of Socialist Party calls upon like-minded people and organizations in India and the world to reject this capitalist-consumerist model of development based upon indiscriminate plundering of natural resources by powerful nations and corporate houses. They must think of an alternative models of development  based on preserving environment, equality, simplicity, decentralization and co-operative planning to eject the inhumanity out of the vicious cycle of violence and oppression.
          In our state assemblies and parliament, three-fourth of the elected members are millionaires  winning  elections with money-power, who have nothing to do with issues of poor and working class people. It is obvious that there is a need of fundamental reforms in the election system too. Socialist Party demands that expenses done by parties should be added to the expenses done by respective party candidates. All political parties should be brought under the ambit of the Right to Information Act (RTI) for their property and income-expenditures. Instead of declaring the candidate with highest number of votes as the winner, proportional representational system based on ratio of votes should be implemented.
          Since the beginning of neo-liberal policies, anti-laborer and pro-industrialist changes have been introduced in the labor sector. Socialist Party demands that original labor laws should strictly and completely be implemented. If there is need of pro-labor change in labor laws then trade union representatives should be taken into confidence. Socialist Party supports the 12 points demand charter submitted by Hind Mazdoor Sabha (HMS) along with other trade unions.
          The present government has ignited a debate on Uniform Civil Code targetting the muslim community. The Socialist party believes that in a country like India, consisting of various minorities, a uniform civil code is neither possible nor necessary. The sensitivity of each religious group has to be respected and the majority of religious group has no right to foist its own practices on other minorities. Even amongst majority i.e. Hindus different practices prevail. Thus in North marriage between uncle (Mama) and niece is unimaginable, while in the south this practice is quite prevalent.
          The question of Triple Talaq is being heard before the Supreme Court and has no relevance o the question of Uniform Civil Code, which is a separate category.
          The question of discrimination against Women is the real question in this subject. The fact that many Muslim Countries, including Pakistan and Bangladesh do not have instant Talaq under their law, and many Muslim Scholars in India have openly said that under Islam Triple Talaq as practised to be found in India is not sanctioned. Even Pakistan and Bangla Desh do not allow instant Triple Talaq. It may be noted that in Bangladesh Hindu Minority is still following Hindu Law of pre 1947 period and has opposed any reforms on the line of those enacted since 1956 in India.The Socialist Party condemns the mala fide intention of RSS and other communal bodies to heighten tension amongst the minorities on this subject.   
          The Socialist party views with great concern the continuous deterioration of Human Rights in Jammu and Kashmir : Schools are closed under directive from Hurriyat,  children have been arrested under Public Safety Act, the killings by the security forces even of small children and blinding by pellet guns are grave matters of daily pain and suffering. The Party demands that the children should be immediately released and all efforts should be made to reopen schools through of process peaceful dialogue. 
          The party calls upon the central government to immediately initiate dialogue with all parties, groups, and Hurriyat. There should be no pre-condition for talks either from the government, Hurriyat or other groups. The central government should withdraw Armed Forces Special Powers Act (AFSPA) which has been a long standing demand of all human right bodies. At the same time people of Kashmir should be assured by the central government that the Article 370 of the Constitution will be maintained strictly and that there will be no dilution done in it.
          Ever since the BJP has come to power communal tensions have increased in society. Minority Muslims, dalits and tribals have been violently and even fatally attacked. Communal hysteria was whipped up first in the name of ‘love jihad’ and then ‘goraksha’, which has left the minorities and dalits feeling very vulnerable and insecure. The RSS and allied organizations are doing all these acts. They have an undeclared support of the BJP, government and the Prime Minister. All this is being done as a strategy to manipulate the majority Hindu vote bank. This government has not even spared the national flag and army for electoral gains. The RSS, which worked for British rule during the freedom struggle, is now self proclaiming to be nationalist and blaming other political parties and dissenting organizations and people to be anti-nationals. It does not appear that government believes in the Constitution of India to run the country. The Prime Minster and his team have brought most of the main stream media into their fold using state and corporate power.
          This government has handed over the economy to corporate houses and the society to hooligans of RSS. The government, with its intentions of implementing the agenda of RSS, has not only intervened in the working of schools, higher education and research institutions, but has also harassed Dalit and weaker sections' students. The BJP has many leaders from the Dalit, backward and Muslim background, who are not associated with RSS but are silent. Congress and other regional party leaders and governments are not working effectively to curb the activities of RSS that aim to sabotage the constitutional setup of India. In Uttar Pradesh, the Samajwadi Party's government has not taken effective actions against criminal acts sponsored by RSS. The Socialist Party through this national convention wants to alert people of India that they should seriously look into the intentions and actions of RSS/BJP of dividing the society and oppose them.
          The Socialist Party inspired by the inheritance of great leaders and thinkers like Acharya Narendra Deva, Gandhi, Dr. Ambedkar, Bhagat Singh, JP, Dr. Lohia, SM Joshi, Yusuf Meherally, Achyut Patwardhan, Kamladevi Chattopadhyaya, Sarojini Naidu, Karpoori Thakur, Madhu Limaye, Kishan Patnaik, reaffirms its faith in the fundamental principles of socialism and its pledge to establish a socialist order uprooting neo-liberal order in solidarity with the working class.

Thus Stands the Socialist Party
Upholding Brotherhood and Equality

जनता की तकलीफ की राजनीति

जनता की तकलीफ की राजनीति

प्रेम सिंह

                पिछले दिनों लिए गए विमुद्रीकरण के फैसले पर छिड़ी बहस में फैसले से साधारण जनता को होने वाली तकलीफ का जिक्र कई रूपों में बार-बार हो रहा है। इस औचक फैसले से साधारण जनता को होने वाली तकलीफ की शिकायत उच्च एवं उच्चतम न्यायालय ने भी की है। फैसले के अनेक समर्थकों ने भी जनता की तकलीफ पर अपनी चिंता व्यक्त की है। 50 से अधिक लोगों की मौत सीधे इस फैसले के कारण हो चुकी है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थकों का कहना है कि फैसले से जनता को कोई तकलीफ नहीं है, बल्कि वह खुश है। वे फैसले से होने वाली तकलीफ की शिकायत करने वाले भुक्तभोगियों और पत्रकारों को धमकाते नजर आते हैं। उनका कहना है कि जनता को तकलीफ होती तो वह बैंक की कतारों में नहीं, फैसले के विरोध में सड़कों पर होती। पूरे देश में सुबह से शाम तक बैंक की लाइनों में लगी जनता की तकलीफ शायद कहीं न कहीं मोदी समर्थकों को भी नजर आती है। तभी वे सीमा पर तैनात सेना के जवानों द्वारा सही जाने वाली तकलीफ का वास्ता देने लगते हैं। पहले केवल चार-पांच दिनों की तकलीफ उठाने की बात करने वाले प्रधानमंत्री ने देश का वास्ता देकर पचास दिनों तक तकलीफ उठाने की भावुक गुहार लगाई है।
                इस फैसले के चलते जनता की तकलीफ से सचमुच विचलित होने वाले लोगों द्वारा कहना कि ‘गरीब की हाय लगेगी’, एक असहाय उद्गार भर है। ऐसे उद्गारों का आज की राजनीति में कोई अर्थ नहीं है। लोकतंत्र में जनता को एक दिन भी तकलीफ देने का किसी सरकार को हक नहीं है, इस तरह की बातें न चलन में रह गई हैं, न पसंद की जाती हैं। लोहिया की उस स्थापना का हवाला देना भी बेकार है जिसमें वे कहते हैं कि प्रत्येक कदम/फैसले का औचित्य उस कदम/फैसले में ही निहित होना चाहिए; भविष्‍य का वास्ता देकर किया गया औचित्य-प्रतिपादन सरकारों/राजनीतिक पार्टियों को जनता पर मनमाने अत्याचार की छूट देता है। विमुद्रीकरण के फैसले से भविष्‍य में ‘स्वर्णिम भारत’ बनने के दावे बढ़-चढ़ कर किए जा रहे हैं। ‘मैं तुम्हें स्वर्णिम भारत दूंगा’ का खर्चीला प्रचार अभियान दिल्ली में शुरू हो चुका है।
                यह गौर करने की बात है कि नवउदारवादी अर्थव्यवस्था लागू होने के बाद से भारतीय राजनीति में जनता की तकलीफ के प्रति शासक वर्ग का रवैया तेजी से बदलता गया है। शासक वर्ग अब जनता की वोट की ताकत से नहीं डरता; कि उसकी नीतियों के कारण तकलीफ उठाने वाली जनता चुनाव में उसे परास्त कर देगी। किसी भी व्यवस्था में लोगों की तकलीफ का इंतिहाई छोर जीवन को ही समाप्त कर देना होगा। नवउदारवादी दौर में करीब तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। यह सिलसिला जारी है। लेकिन सरकारों और नेताओं पर इसका कोई असर नहीं है। क्योंकि चुनाव काले धन के बल पर प्रचार कंपनियों, कारपोरेट घरानों, चुनाव जिताने के विशेषज्ञों और मीडिया की मार्फत लड़ा जाता है। ये मिल कर तय करते हैं कि केंद्र में कब किस नेता और पार्टी की सरकार होगी। नवउदारवादी दौर में नेता/पार्टियां नहीं, लाल बुझक्कड़ विशेषज्ञ भारत की राजनीति और सरकारें चलाने लगे हैं। ऐसी स्थिति में जनता की तकलीफ पर केवल लफ्फाजी और झांसेबाजी होती है, जो सबके सामने है। 50 दिन में जनता की तकलीफ दूर करने का वादा करने वाले प्रधानमंत्री और उनके विशेषज्ञों को अच्छी तरह पता है कि जनता उसके बाद भी तकलीफ में ही रहेगी।
                यह स्पष्‍ट है कि 6 महीने पहले लिए गए विमुद्रीकरण के फैसले में अन्य जो भी खयाल रखे गए हों, जनता को होने वाली तकलीफ पर ध्यान नहीं दिया गया। जनता की तकलीफ कोई समस्या नहीं रह गई है। नेताओं को पता है उनका प्रचारतंत्र जनता की तकलीफ पर भारी पड़ेगा। वे अपने पक्ष में सहमति का निर्माण कर लेंगे। तकलीफ सहने वाली जनता फिर कारापोरेट के हित की राजनीति करने वालों को वोट देगी। शासक वर्ग ऐसा इंतजाम करता है कि जनता आत्महत्या, विस्थापन, बेरोजगारी, मंहगाई, बीमारी जैसी निरंतर बनी रहने वाली तकलीफों का दर्द अपने को धर्म, जाति, क्षेत्र आदि से जोड़ कर भुला देती है। इस प्रक्रिया में जनता का अराजनीतिकरण होता जाता है। विकल्पहीनता की स्थिति दरअसल जनता के अराजनीतिकरण के चलते बनती है। वह नवउदारवादी व्यवस्था के विकल्प की राजनीति खड़ी करने की कोशिशों में लगे नेताओं और पार्टियों के साथ खड़ी नहीं होती। स्थिति और जटिल हो जाती है जब ज्यादातर नागरिक समाज और जनांदोलनकारी बिचौलिए की भूमिका निभाते है।
                यह मान्य तथ्य है कि विदेशी फंडिंग वाले एनजीओ पूंजीवादी व्यवस्था के सेफ्टी वाल्व हैं। वे राजनीतिक कार्यकर्ताओं को राजनीतिक कर्म से विरत करके अराजनीतिकरण की प्रक्रिया को बढ़ाते हैं। नवउदारवाद के प्रतिष्‍ठापकों का दावा है कि नवउदारवादी व्यवस्था का कोई विकल्प नहीं है, न ही किसी विकल्प की जरूरत है। अगर नवउदारवादी व्यवस्था के तहत कतिपय समस्याएं हैं तो एनजीओ गठित करके उनका समाधान निकाल लीजिए। पिछले दिनों दो एनजीओ सरगनाओं द्वारा प्रायोजित भ्रष्‍टाचार विरोधी आंदोलन का अधिकांश नागरिक समाज और जनांदोलनकारियों ने पुरजोर समर्थन और उसमें हिस्सेदारी करके नवउदारवाद के विकल्प की राजनीति को गहरी क्षति पहुंचाई। उस आंदोलन को आरएसएस और कारपोरेट घरानों समेत रामदेव, रविशंकर, जनरल वीके सिंह सरीखों का खुलेआम सक्रिय समर्थन था। अन्ना हजारे ने तब भी नरेंद्र मोदी की तारीफ की थी और आज भी मोदी के साथ है। इतना ही नहीं, सीधे कारपोरेट की कोख से जन्मी आम आदमी पार्टी का साथ भी सेकुलर और प्रोग्रेसिव नागरिक समाज ने दिया और आज भी दे रहा है। इसके बावजूद कि यह पार्टी घोषित रूप से, संविधान की विचारधारा सहित, विचारधाराहीनता की वकालत करती है। उनमें से बहुतों के लिए मोदी का विकल्प अगर राहुल गांधी नहीं बन पाते हैं, तो केजरीवाल है।
                जाहिर है, 1991 के बाद से अराजनीतिकरण साधारण जनता का ही नहीं, नागरिक समाज का भी होता गया है। चुनींदा अपवादों को छोड़ दें तो देश का कौन-सा बड़ा बुद्धिजीवी है जिसने मनमोहन सिंह द्वारा लागू की गईं नई आर्थिक नीतियों के खिलाफ निर्णायक स्टैंड लिया हो? मोदी को देश पर मूर्खों द्वारा थोपी आपदा कह कर अपने को बड़ा विचारशील जताने वाले थोड़ा रुक कर विचार करें कि जनता की तकलीफ के प्रति उनकी सहानुभूति कितनी सच्ची है? जैसा युग होता है, वैसा ही युग पुरुष निकल कर आता है। मनमोहन सिंह के बाद मोदी उस भारतीय समाज के उग्र प्रतिनिधि हैं जो नवउदारवादी दौर में बना है। यह एक झूठी तसल्ली है कि वे केवल 31 प्रतिशत मतदाताओं का चुनाव हैं। विमुद्रीकरण के फैसले से जनता को होने वाली भारी तकलीफ से द्रवित कुछ लोग विरोध के लिए विपक्ष की तलाश कर रहे हैं। 1991 के बाद से भारत की राजनीति एक पक्षीय - नवउदारवादी - बनती गई है। नितीश कुमार और नवीन पटनायक विमुद्रीकरण के समर्थन में हैं। अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी दोनों नवउदारवाद के समर्थक हैं और इस मामले में मुस्लिम वोट बैंक पक्का करने की नीयत से परिचालित हैं। 
                काले धन की सारी बहस में यह नहीं बताया जाता कि वह मेहनतकश जनता की गाढ़ी कमाई की लूट का धन है; और उस लूट में नई आर्थिक नीतियां लागू होने के बाद से अभूतपूर्व तेजी आई है। भारत में नवउदारवाद मेहनतकशों की अनंत और अटूट तकलीफों का नाम है। 25 साल बीत जाने पर भी स्वर्णिम भविष्‍य की बातें बिना किसी शर्म और हिचक के की जाती हैं। यानी किसानों की आत्महत्या, आदिवासियों का विस्थापन, बेरोजगारों की निरंतर बढ़ती फौज, दिन-रात बड़े बांधों-राजमार्गों-पुलों-हवाई अड्डों-इमारतों आदि के निर्माण में लगे करोड़ों मजदूरों का जीवन ‘स्वर्णिम भविष्‍य’ की कीमत है। कमेरों को आगे भी यह कीमत चुकाते रहना होगा। उदाहरण के लिए, कल्पना कीजिए पांच सौ स्मार्ट सिटी बनाने के लिए मेहनतकशों की कितनी पीढियां खपेंगी? पूरे भारत को ‘डिजिटल’ और ‘कैशलेस करेंसी’ में तब्दील करने के लिए किनकी बलि चढ़ेगी? बच्चों की परवरिश, शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन आदि का इंतजाम हर लोकतांत्रिक सरकार का दायित्व होता है। लेकिन नवउदारवादी भारत के वर्तमान और भविष्‍य में मेहनतकशों के बच्चों के लिए कोई जगह नहीं है। भारतीय राजनीति की इससे बड़ी तकलीफ क्या हो सकती है कि श्रमशील जनता ने नवउदारवादी व्यवस्था के निर्माण में मर-खप जाने को ही अपनी नियति मान लिया है!
                जनता की तकलीफ में कमी हो, इससे शायद ही किसी को इनकार हो सकता है। इस दिशा में शुरुआत हो सकती है। कांग्रेस-भाजपा से इतर पार्टियां एका बना कर सीधे मेहनतकश जनता से कहें कि वे उन्हें तबाह करने वाली नवउदारवादी नीतियों को अपदस्थ करके संविधान के नीति निर्देशक तत्वों की रोशनी में अपनी नीतियां चलाएंगी। अगर संकल्प सच्चा हो तो 2019 का चुनाव आसानी से जीत लिया जा सकता है। उसके लिए कारपोरेट के काले धन की आवश्‍यकता नहीं पड़ेगी। नवउदारवाद का समर्थक स्वभावतः नवसाम्राज्यवाद का समर्थक हो जाता है। नवसाम्राज्यवादी शिकंजे के तहत अनेक कुर्बानियों से हासिल की गई आजादी गुलामी में तब्दील होती जा रही है। आशा करनी चाहिए कि कांग्रेस और भाजपा के समर्थक, विशेषकर युवा, लंबे समय तक आजादी का खोते जाना चुपचाप नहीं देखते रहेंगे। वे नवउदारवाद विरोध की राजनीति का समर्थन कर सकते हैं। या अपनी पार्टियों को इसके लिए बाध्य कर सकते हैं।

MR. RAJINDAR SACHAR FORMER PRESIDENT OF PEOPLE UNION FOR CIVIL LIBERTIES HAS ISSUED THE FOLLOWING STATEMENT.

MR. RAJINDAR SACHAR FORMER PRESIDENT OF PEOPLE UNION FOR CIVIL LIBERTIES HAS ISSUED THE FOLLOWING STATEMENT.

The two-day 4th National Convention of the Socialist Party concluded in Lucknow (UP) on 15 November 2016. The party, in the convention, once again resolved to throw out the yoke of neo-imperialism imposed on the country in the guise of liberalisation. I am of the firm opinion that the Socialist Party will soon attain its past glory by carrying forward the legacy of the freedom movement and socialist stalwarts.
I felt honored by facilitating Mohammad Shoaib of Rihai Manch from the dais of the Socialist Party for his relentless efforts made for the release of innocent Muslims, particularly youths, from jail. Mr. Shoaib, who is the national vice president of the Socialist Party, has successfully got released 11 innocent persons arrested and implicated by the police on false charges.
I welcome the decision of the national council of the Socialist Party to elect Dr. Prem Singh as its president. He is known all over the country for his commitment for socialism, secularism and democracy. I believe that the party will become stronger under his dynamic leadership.
I, further, would like to appeal all like-minded individuals and organizations to extend their maximum support to Dr. Prem Singh in order to re-strengthen the struggle against the on-going nexus of neo-liberal-communal forces.
Rajindar Sachar

Dr. Prem Singh is elected new president of Socialist Party (India)

16 November 2016
Press Release

Dr. Prem Singh is elected new president of Socialist Party (India)

          Dr. Prem Singh was unanimously elected president of the Socialist Party for a two-year term in its 4th national convention held in Lucknow on 14-15 November 2016. Formerly general secretary and spokesperson of the party Dr. Singh has been active in the socialist movement from his student days. He has presented a unique critique of neoliberal-communal nexus through his writings and actions. He continuously works in the interest of the deprived masses of the country and protests against, along with other like-minded people and organizations, violation of civil and human rights.
          Dr. Prem Singh works among the youth to make them understand that socialism is the only alternative of capitalism. It is hoped that after becoming the president he will strengthened the party and the youth will be attracted towards socialism and Socialist Party.  

Bhai Vaidya
Out-going president

डॉ. प्रेम सिंह सोशलिस्‍ट पार्टी (इंडिया) के नए अध्‍यक्ष

16 नवंबर 2016
प्रेस रिलीज

डॉ. प्रेम सिंह सोशलिस्‍ट पार्टी (इंडिया) के नए अध्‍यक्ष

      लखनऊ में आयोजित सोशलिस्‍ट पार्टी के चौथे राष्‍ट्रीय अधिवेशन (14-15 नवंबर 2016) में डॉ. प्रेम सिंह को दो साल के कार्यकाल के लिए पार्टी का नया अध्‍यक्ष चुना गया। अभी तक पार्टी के महासचिव और प्रवक्‍ता रहे डॉ. सिंह का चयन सर्वसम्‍मति से हुआ। वे छात्र जीवन से सोशलिस्‍ट आंदोलन से जुडे रहे हैं। नवउदारवादी-सांप्रदायिक गठजोड के खिलाफ उन्‍होंने सशक्‍त लेखन व संघर्ष किया है। वे समाज के वंचित तबकों के हित में लगातार काम करते हैं। नागरिक अधिकारों व मानवाधिकारों के हनन के खिलाफ उनकी सक्रियता हमेशा बनी रहती है।
      वे देश भर में युवाओं को रचना और संघर्ष के लिए प्रेरित करते हैं ताकि वे गहराई से समझ सकें कि समाजवाद ही पूंजीवाद का वास्‍तविक विकल्‍प है। डॉ. प्रेम सिंह के सोशलिस्‍ट पार्टी का अध्‍यक्ष बनने से पूरी संभावना है कि पार्टी और ज्‍यादा मजबूत होगी तथा युवाओं का आकर्षण समाजवादी विचारधारा और सोशलिस्‍ट पार्टी की ओर बढेगा।

भाई वैद्य
निवर्तमान अध्‍यक्ष

पांच सौ और हजार के नोटों पर पाबंदी : मोदी का एक और तमाशा

सोशलिस्‍ट पार्टी (इंडिया)
9 नवंबर 2016
प्रेस रिलीज

पांच सौ और हजार के नोटों पर पाबंदी : मोदी का एक और तमाशा

      पांच सौ और हजार के नोट अचानक बंद करके सरकार और समर्थक दावे कर रहे हैं कि इस कदम से भ्रष्‍टाचार, कालाधन, कालाबाजारी, टैक्‍स चोरी, प्रोपर्टी की कीमतों में बनावटी उछाल के साथ सीमा-पार के आतंकवाद की समस्‍या पर भी लगाम लग जाएगी। ये बडबोले दावे ही इस कदम के खोखलेपन को जाहिर कर देते हैं। यह फैसला दरअसल, विदेशों में जमा काला धन नहीं लाने की सरकार की नाकामी को लोगों की निगाह से हटाने की कवायद है। क्‍योंकि चारों तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मजाक बन रहा था कि वे कब प्रत्‍येक भारतीय के बैंक खाते में 15 लाख रुपया जमा कराने जा रहे हैं।
      मोदी देश के पहले तमाशगीर प्रधानमंत्री हैं। सरकार की हर मोर्चे पर बार-बार होने वाली विफलता से लोगों का ध्‍यान हटाने के लिए वे हर बार नया तमाशा खडा करते हैं। इस बार का तमाशा कुछ ज्‍यादा ही बडा लगता है। सरकार ने जनता को इस योजना के खर्च और उपलब्धि का कोई आंकडा/अनुमान नहीं बताया है। बाजीगर की तरह सीधे डुगडुगी बजा दी है। अचानक थोपे गए इस फैसले से सबसे ज्‍यादा परेशानी उन मेहनतकश गरीबों को उठानी पड रही है जिन्‍हें नवउदारवादी अर्थव्‍यवस्‍था ने हाशिए पर पटका हुआ है।          
      सोशलिस्‍ट पार्टी का मानना है कि काला धन नवउदारवादी नीतियों का अनिवार्य नतीजा है। पूरी दुनिया के स्‍तर पर यह देखा जा सकता है। जो सरकार नवउदारवादी नीतियों को पिछली सरकारों से ज्‍यादा तेजी से चला रही है, उसका काला धन खत्‍म करने का दावा सिद्धांतत: गलत है। सरकार के इस फैसले का वही राजनीतिक पार्टी या नागरिक समर्थन कर सकते हैं जो पूंजीवादी आर्थिक नीतियों और विकास के समर्थक हों।
     

डॉ. प्रेम सिंह
महासचिव/प्रवक्‍ता

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