Monday, 11 December 2017

राष्ट्रीय आय का वितरण (तीसरी लोकसभा का 5वां सत्र)


राष्ट्रीय आय का वितरण (तीसरी लोकसभा का 5वां सत्र)
(13 अगस्त 1963 - 21 सितम्बर 1963)


            डॉ. राममनोहर लोहिया : अध्यक्ष महोदय, अभी तक इस बहस का नतीजा इतना निकला है कि मैंने 27 करोड़ हिन्दुस्तानियों के लिए तीन आने रोज की आमदनी कही, प्रधानमंत्री ने 1
5 आने रोज की और योजना मंत्री ने साढ़े सात आने रोज की | अब प्रधानमंत्री और योजना मंत्री आपस में निबट लेंगे कि दोनों में कौन सही है |

            मेरी बहस यह नहीं है कि हिन्दुस्तानियों की और खासतौर से 27 करोड़ की आमदनी तीन आने या साढ़े तीन आने है | बल्कि यह देश इतना गरीब है जिसका अंदाजा इस सरकार को नहीं है, और इस गरीबी को दूर करने के लिए जब तक इस सरकार में भावना नहीं आएगी, तब तक कोई अच्छा नुस्खा तैयार नहीं हो सकता |

            पहली बात तो मुझे कहनी है, जो आंकड़े मंत्री ने यहाँ रखे उनके बारे में, कि वह कर जांच कमेटी के लिए तैयार किए गए थे | वित मंत्रालय ने पूछा था कि किस तरह से हिन्दुस्तान के लोगों की आमदनी है और खपत है ताकि वह कर अच्छा और ज्यादा अच्छा लगा सके | इसलिए इस जांच समिति के आंकड़े पहले से ही संदेहात्मक थे क्योंकि उनका तात्पर्य ही कुछ और था ........

            श्री त्यागी : वह खर्च के आंकड़े थे, आमदनी के नहीं थे |

            डॉ. राममनोहर लोहिया : ठीक है लेकिन वह दिखाना चाहते थे कि हिन्दुस्तानी ज्यादा खर्च करते हैं, इसलिए उनके ऊपर ज्यादा टैक्स लागाओ | बिलकुल साफ़ बात है, छपा हुआ है किताब में | जो सेन्ट्रल सर्वे छपता है उसमें लिखा है कि वह टैक्सेशन एन्क्वायरी कमेटी की तरफ से कहा गया है ताकि फाइनेंस मिनिस्ट्री उससे अपना काम चला सके | यह सब लिखा हुआ है | इस पर आप बहस न करिए नहीं तो प्रधानमन्त्री की तरह आप भी फंस जायेंगे |

            तो पहली बात तो मुझे यह कहनी है |
            और दूसरी बात यह है कि सन 1948-1949 की जो आधार कीमतें हैं उनको छोड़कर अक्सर चालु कीमतें ले ली जाया करती हैं | और इस तरह की एक रुकावट मेरे सामने और आ जाती है कि ये अंकशास्त्री लोग कौन हैं | जिस वक़्त बंगाल में पचास लाख आदमी भूख से मरे थे, उस वक़्त इन अन्क्शास्त्रियों ने साबित किया था कि खाली पांच  मरे हैं | तो इसलिए मंत्रियों को बड़ा सावधान रहना चाहिए, और उन्हें कोई दिशा देनी चाहिए | मैं कोशिश करूँगा कि इन अंको को, जहां तक हो सके, अपने दिमाग को लगा करके भी इस्तेमाल करूँ | तो पहली बात मुझे यह कहनी है | और दुसरे, योजना मंत्री ने जो आंकड़े दिए उसके अनुसार देहाती खपत 87 अरब रूपए की हो जाती हैं | 87 अरब | और जो हमारी राष्ट्रीय आमदनी खेती से हैं जिसमें कि मैं पशुधन को शामिल किए लेता हूँ वह कुल 66 अरब या 6,600 करोड़ रुपए की है | तो 6,600 करोड़ रुपए की देहाती आमदनी और 8,700 करोड़ रुपए का खर्चा यह योजना मंत्री के आंकड़े से बिलकुल साफ़ साबित होता हैं | वैसे मुझे चाहिए कि खेती की आमदनी में से पशुधन की रकम अलग कर लूँ लेकिन उसको बिना अलग किए हुए ही 2,000 करोड़ रुपए का फर्क पड़ता है | एक माने में 3,000-3,500 करोड़ रुपए का फर्क पद जाता हैं जो दो हिसाब दिए हैं उनमें | हो सकता हैं कि सरकार की तरफ से यह कहा जाए कि आमदनी में और खर्चे में फर्क है क्योंकि खर्चे में दान भी जोड़ दिए जाते हैं, कर्जा भी जोड़ लिया जाता है | अब इसके बारे में मैं यह कहना चाहूँगा कि लगातार कर्जा नहीं चला करता हैं | कर्जा तो 2, 4, 5, या 10 वर्ष की चीज होती है | आखिर कर्जा और खर्चा यह किसी न किसी तरीके से एक होना ही चाहिए, थोड़ा-बहुत फर्क चाहें रहे |

            एक बहुत बड़ी गलती इन उपभोक्ता आंकड़ो में होती हैं और वह यह कि इनमें मूल्य फर्क जोड़ लिया जाता हैं | मिसाल के लिए मैं आपको  बतलाऊं कि इंधन और रोशनी पर 13वें चक्र के आंकड़े हैं जो छप चुके हैं | और योजना मंत्री ने 17वें चक्र के बताए, उनके लिए हमारे पास कोई आधार नहीं है | 13वें चक्र को मैं बतला रहा हूँ कि इंधन और रोशनी पर नकद खर्चा सबसे निचे के लोगों पर 20 पैसे रखा गया है और खर्चा रखा गया हैं 91 पैसे | 20 पैसे और 91 पैसे | इसी तरीके से एक और समूह का रखा है नकद खर्चा 28 पैसे और दूसरा कुल खर्चा 1 रुपए 2 पैसे | चीनी के लिए 15 पैसे नकद खर्चा और दूसरा खर्चा 19 पैसे रख दिया गया है | इस तरीके से कुल खर्चे को बढ़ा दिया जाता है, लेकिन कितना भी बढायें 6,600 से 8,700 तक बढ़ा देंगे, मैं समझता हूँ कि यह बहुत ही अनुचित काम है |

            मैं एक दूसरा तरीका बतलाऊंगा उस हिसाब को लगाने के लिए और वह यह है कि सन 1960-61 में हिन्दुस्तान के 32 करोड़ खेतिहरों को जो देहात में रहते हैं, 45 पैसे रोज आमदनी पड़ती हैं | आज 1961-62 में 35 करोड़ खेतिहरों को 43 नए पैसे रोज के हिसाब से हो गई है | अब यह हिसाब मैंने कैसे लगाया हैं, यह तो एक लम्बा किस्सा होगा, खाली इतना ही बतला दूँ कि यह सरकार के आकंड़ों से ही हिसाब लगाया गया है, 45 पैसे रोज और 43 नए पैसे का | यह साधारण तौर से मान लिया जता है कि जो ऊपर से 10 सैकड़ा लोग हैं पूरी आमदनी का 50 सैकड़ा ले लिया करते हैं जिसका कि नतीजा यह होता है कि 1960-61 में खेतिहरों को 25 पैसे रोज की आमदनी थी और 1961-62 में 26 पैसे रोज की आमदनी थी, सरकार के आंकड़ों से सिद्ध होता हैं | अगर मान लीजिये इसमें पशुधन की आमदनी जोड़ भी ली जाए तो 27 पैसे रोज की आमदनी यानी साढ़े 4 आने की आमदनी पड़ती है | लेकिन पशुधन जोड़ना नहीं चाहिए क्योंकि जिन लोगों के बारे में मैं चर्चा कर रहा हूँ वह इस हैसियत में नहीं कि पशु वगैरह रखकर अपनी आमदनी को बढ़ा लिया करें | इसलिए जो सरकार के अपने आंकड़े हैं उनसे यह सिद्ध होता हैं कि 27 करोड़ से ज्यादा आदमी 4 आने रोज के ऊपर जिन्दा रहते हैं यह जो राष्ट्रीय आमदनी के आंकड़े सरकार की तरफ से छपे हैं, उनके बारे में मैं कह रहा हूँ |

            इस सिलसिले में मैं एक थोड़ी-सी जानकारी जो मैंने हासिल की वह बतलाना चाहूँगा | अब वह कहाँ तक सही है या गलत है यह मैं नहीं कह सकता | बहरहाल मैं आपको बतलाता हूँ कि जब से यह राष्ट्रीय आमदनी का सिलसिला सरकार ने चलाया है तब से शुरू से ही 20 सैकड़े की बढ़ती कर दी गई है चाहे जिस इरादे से की गई हो | बढती इसलिए भी की जा सकती है कि हिन्दुस्तान को ज्यादा अमीर दिखाना है जितना कि वह है नहीं | दुसरे इसलिए भी हो सकती है कि सरकार को यह टैक्स,कर लगाने की सुविधा हासिल करनी है और यह सबको मालुम है कि जो भी आंकड़े हमारे असली हैं उनमें 20 सैकड़े की बढती करके यह यह सारे आंकड़े छापे जाते हैं |

            अब मैं आपको एक और बात बतलाता हूँ और वह हैं गरीब प्रदेशों की दर, जिन आंकड़ों को योजना मंत्री ने रखा था और वह दुसरे सेंशस वाले आंकड़े थे | उनमें उतर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश, उड़ीसा और आन्ध्रप्रदेश यह 6 हिन्दुस्तान के सबसे गरीब इलाके हैं | इनकी कुल देहाती जनसंख्या 20 करोड़ होती है वैसे तो कुल 23 करोड़ हैं | मुझे उतर प्रदेश का एक आंकड़ा मालुम है | सरकार ने वह आंकड़े छापे हैं | एक बार तो 182 रुपया फ़ी आदमी हर साल देहात की आमदनी थी और वही अगर तर्क लगाया जाए कि ऊपर का दस सैकड़ा 50 सैकड़ा आमदनी हजम कर लेता हैं या एक  दूसरा तर्क जो कि मैं लगाता हूँ कि उपभोक्ता गरीब से लेकर ऊपर का सैकड़ा खा लेता है | 60 सैकड़ा और निचे के 80 सैकड़े के लिए केवल 40 सैकड़े बच जाता है | ये आंकड़े मैंने खुद सरकार की किताब से लिए हैं | ये बात दूसरी है कि आंकड़े दुसरे के हैं, अलबता जो कुछ मैंने हिसाब लगाया हैं वह मेरा अपना है | मैं सरकार को सलाह दूंगा कि विशेषज्ञों के आंकड़ों को वह इस तरीके से इस्तेमाल न करे बल्कि किसी दिशा के साथ करे | बिना दिशा के इस्तेमाल करने का नतीजा ख़राब हो सकता है | इसलिए यह जो 182 रुपए फ़ी आदमी की हर साल के उतर प्रदेश के देहात की आमदनी है वह अगर 50 सैकड़े वाला घटा दिया जाता है तो 101 रुपए हो जाती है | और 80 सैकड़ा ले लिया जाता है तो 91 रूपए हो जाती है | इसके मानी यह हुए कि वह 4 आने के नीचे रहता हैं | 4 आने के नीचे खुद सरकार के आंकड़े से 27 करोड़ से ज्यादा लोगों की आमदनी रह जाती है | यह तो बिलकुल सिद्ध हो जाता हैं | फिर उसके बाद 1-3 रूपए की भी रकम दी गई है फ़ी आदमी पीछे और वह थोड़ी-सी बढ़ सके तो वह 4 आने रहेगी या साढ़े तीन आने या सवा चार आने होगी | इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा | यह मैंने उतर प्रदेश के बारे में कहा है | हालांकि यह उतर प्रदेश का दुर्भाग्य है कि मुझ जैसा निकम्मा आदमी और प्रधानमंत्री जैसा अज्ञानी आदमीं इस सूबे का प्रतिनिधित्व इस जगह पर करते हैं जो कि इतना गरीब सूबा है | उसके साथ-साथ उड़ीसा, मध्यप्रदेश, बिहार और राजस्थान यह सब भी उसी हालत में पड़े हुए हैं, और करोड़ों लोग, मैंने आपको बतलाया, 20 करोड़ देहाती, उनमें से या तो आप घटा दीजिए दस सैकड़े के हिसाब से 2 करोड़ और 20 सैकड़े के हिसाब से 4 करोड़ हुए, तो यह 18 करोड़ या 16 करोड़ लोग सरकार के अपने आंकड़ो के मुताबिक़ 4 आने या साढ़े साढ़े तीन आने रोज पर अपनी जिन्दगी चला रहे हैं |

            उपाध्यक्ष महोदय, अब मैं आपको याद दिलाऊं कि प्रधानमन्त्री ने 22 अगस्त सन 1960 को कहा था कि राष्ट्रीय आय में 42 प्रतिशत और प्रतिव्यक्ति आय में 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई | फिर उन्हें बड़ा अचरज हुआ कि यह बढती चली कहाँ गई ? तो सच पूछो एक माने में वह पहले ही इसे मान चुके हैं कि उन्हें पता नहीं कि कहाँ चली गई यह बढती | तब उन्होंने यह 14 अक्टूबर 1960 को आय विवरण समिति बनाई थी | अब मेरा सवाल यह है कि वह समिति कहाँ चली गई | इस सवाल पर कुछ थोड़ी सी तफसील की बात मैं आगे बतलाऊंगा | लेकिन पहले एक और चीज के ऊपर मैं आपका ध्यान खीँच दूँ कि हिन्दुस्तान में 1 एकड़ से कम खेती करने वाले 34 सैकड़ा कुटुंब हैं और 24 सैकड़ा जमीन एक सैकड़ा जमीन कुटुंब के पास चली जाती है | इस आंकड़े से कुछ खतरनाक नतीजा निकलता है | मैंने तो 20 करोड़ के लिए 3 आने वाली बात कही थी | अब मैं यह कहना चाहता हूँ कि 10 से 15 करोड़ हिन्दुस्तानी सिर्फ 2 आने की आय पर ही रहते हैं | मेरे पास ख़त आए हैं | बहुतेरे ख़त आए हैं कि यह तुमने 3 आने कहकर कैसा अन्याय कर दिया ? अगर इस तरह के आंकड़े को दुसरे ढंग से साबित करना चाहें तो खेतिहर मजदूरों की संख्या करीब 7 करोड़ हैं | इनमें एक या आधा करोड़ घाटा दीजिये जो शायद ऊँची अवस्था में हो | फिर छोटे किसानों की संख्या मालूम है, ढाई एकड़ तक के किसानों की संख्या कम से कम 15-16 करोड़ होगी | फिर कारीगरों की संख्या मालुम हैं, वह भी 2-3 करोड़ होगी | फिर शहर के अन्दर 25 से 25 सैकड़ा लोग ऐसे हैं जो कि बड़ी मुश्किल से जिंदगी बसर करते हैं | मुश्किल से क्या, वह कैसे जिंदा रहते हैं, मुझे नहीं मालुम | वे पग-पथ पर रहते हैं | वे बेचारे झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं और शहर के कुदेदानों पर जाकर उसमें से दाने बीन-बीनकर किसी तरह से अपनी जिन्दगी बसर करते हैं और जो लोग देहात से आकर यहाँ आमदनी करते भी हैं वे खुद बहुत कम खर्च करते हैं, क्योंकि अपने देहाती आदमियों को उन्हें पालना होता हैं | फिर आदिवासी हैं, विधवाएं है, और अगर मैं कहूँ कि, तो फक्कड़ साधु हैं- सरकारी साधु नहीं | इन सबको मिलाकर कोई 27-30 करोड़ आदमी आ जाते हैं |

            अगर इन आंकड़ों के अलावा मैं आँखों देखी हालत बताऊँ, जो कि प्रधानमन्त्री, योजना मंत्री और सरकार को अपने सामने रखनी चाहिए, तो वह यह है | मैंने बनारस में गाय को मुर्दे का मुर्दे का मांस खाते देखा है इस सरकार में | मैंने उड़ीसा में जहां मछलियाँ बिल्कुल रह नहीं गई थी, बहुत मामूली थीं, सैकड़ो लोगों को जाल फेंककर मछली पकड़ते देखा है | मैंने तमिलनाडु में सेलम में लाखों कारीगरों को रोज दस आने, बारह आने, चौदह आने रोज कमाते देखा है और सुना है और अगर हिसाब भी लगाया जाए, तो तीन आने से कम पड़ जाता है | इसी तरह से जो भी हमारी जनसंख्या के छोटे वर्ग हैं, अगर उनकी तरफ ध्यान देंगे, तो आमदनी उतनी ही आ जाएगी |

            श्री मौर्य : गोबर में से दाने बीनकर खाते हुए मैंने राजस्थान में देखा है |

            डॉ. राममनोहर लोहिया : मैंने भी देखा है कूड़े में से चीजें निकालते हुए, गोबर में से अनाज निकालते हुए | मैंने बहुत कम बताया था | मैंने सोचा था कि कहीं कोई नाजुक दिल टूट न जाए, इसलिए मैंने दो आने वाली बात नहीं कही थी |

            ये खुद सरकार के ही आंकड़े हैं | उन सरकारी अंकशास्त्रियों में कुछ होड़ चला करती है | एक संस्था यहाँ दिल्ली में ही काम करती है, जिसको कहते हैं, आर्थिक जांच की राष्ट्रीय कौंसिल | उसने 29 जिलों के नाम दिए हैं, जिनमें कुछ जिले हैं -बहुत संभलकर बोलना पड़ता है - जो 100 रूपए के निचे जाते हैं | दरभंगा 96 रूपए फ़ी आदमी, सारण (छपरा) 96 रूपए फ़ी आदमी, देवरिया 98 रूपए फ़ी आदमी, टिहरी गढ़वाल 84 रूपए फ़ी आदमी | अगर वही तरीका यहाँ भी लागू किया जाए जो मैंने पहले दिया था कि ऊपर के 10 सैकड़ा के लिए 50 सैकड़ा निकाल दो और अगर इस खपत जरीब के जरिए 20 सैकड़ा के लिए 80 सैकड़ा निकाल दो, फिर इन जिलों की आमदनी तीन आने फ़ी आदमी रोज से भी कम पड़ती है | मैंने चार के ही नाम गिनाए हैं | और इस तरह चालीस के करीब हैं, जो कि 110, 120 और 125 रूपए की आमदनी वाले हैं |

            उपाध्यक्ष महोदय : अब माननीय सदस्य अपना भाषण समाप्त करने का प्रयत्न करें |

            डॉ. राममनोहर लोहिया : उपाध्यक्ष महोदय, यह बहुत बड़ा सवाल है और मैं यह भी निवेदन करूँगा कि........

            उपाध्यक्ष महोदय : मैं आपका ध्यान रुल 195 की तरफ खींचना चाहता हूँ......

            डॉ. राममनोहर लोहिया : क्या आप कुछ समय बढ़ा सकते हैं ? क्योंकि सभी सदस्य चाहेंगे कि वह बहस में भाग लें |

            श्री बागड़ी : यह देश की किस्मत का सवाल है | इसका समय बढ़ा दिया जाए |

            उपाध्यक्ष महोदय : माननीय सदस्य ने 20 मिनट ले लिए हैं |

            डॉ. राममनोहर लोहिया : मैं समझता हूँ कि कांग्रेस के माननीय सदस्य भी चाहेंगे कि समय बढ़ाया जाए |          (अंतर्बाधाएं)
            श्री रामसेवक यादव : चर्चा का समय बढ़ा दिया जाए |

उपाध्यक्ष महोदय : वे पांच मिनट और ले लें |

            डॉ. राममनोहर लोहिया : जीवन-स्तर कितना निचे गिरता जा रहा है, यह इस तेरहवें चक्र से साबित होता है कि करीब 30 सैकड़ा आबादी का खर्चा 1952 में पड़ता था, 10 रूपए, 28 नए पैसे- यह मैं सरकार वाले आंकड़े दे रहा हूँ और 1957-58 में वह घटकर 10 रुपए 14 नए पैसे हो गया | प्रधान मंत्री जी अपनी किताबों को खुद पढ़ लिया करें, तो इनको पता लग जाए कि चीजें घटती रहती हैं | 15 रूपए 70 नए पैसे था और तीस सैकड़ा घरों के लिए, जो घटकर 14 रूपए 50 नए पैसे हो गया |  सिर्फ 2 सैकड़ा घरों का खर्चा 45 रूपए से बढ़ करके 48 रूपए हुआ है | यह जीवन स्तर घटता चला जा रहा हैं |

            जहाँ तक राष्ट्रीय आमदनी का सवाल है, वह पहले 7 रुपए फ़ी आदमी हर साल बढ़ा करती थी | वह अब बंद हो गई है, ऐसा मेरा हिसाब बताता है, जो दो नए पैसे फ़ी आदमी फ़ी साल अगर एक रफ़्तार से हम लोग चलते गए, तो न जाने हमको किस-किस के शिकार होना पड़ेगा, सिर्फ चीन के ही नहीं | दुसरे देशों में घाना और चीन की बात मैं खासतौर से कहूँगा, रूस और अमेरिका की नहीं | घाना में करीब 30-40 रूपए फ़ी आदमी के हिसाब से बढ़ रहा है और चीन 50-60 रूपए फ़ी आदमी फ़ी साल | हम क्यों बंध गए ? इसका कारन यह है कि खपत का आधिनिकीकरण हमारे यहाँ हुआ और पैदावार के आधुनिकीकरण को किए बगैर हमने यूरोप-अमेरिका की नक़ल करना शुरू कर दिया | नेताओं, नगर-सेठों और नौकरशाहों का जीवन-स्तर तो उठता चला गया ताकि वे यूरोप और अमेरिका के बराबर आ जाएँ लेकिन साधारण जनता का जीवन-स्तर नहीं उठ पाया |

            दो-तीन लाख हर साल साहब बनते हैं, यह इस योजना का परिणाम जरुर होता है और वहां बहुत काफी हिस्सा बढती हुई आमदनी का चला चला जाता है | मेरे हिसाब से इस वक्त पचास लाख बड़े लोग हैं, हर साल तीन लाख साहब या बड़े लोग बनते हैं | पिछले बारह-पंद्रह बरस से तीन लाख साहब बड़े साहब हो गए हैं | एक मानी में कहा जाए, तो अंग्रेजी की सरकार तो तीन लाख लोगों की सरकार थी और यह सरकार पचास लाख लोगों की सरकार है | 

            अगर आमदनी के आंकड़े, आयकर को भी आप देखें, तो पता चलता है कि 9,52,000 आदमी कर देते हैं, जिसके ऊपर दो अरब का कर है और बारह अरब आमदनी हैं | लेकिन हर एक जानता है कि कम से कम उतनी ही रकम और है मुनाफे की या दूसरी तरह से सुविधा वगैरह की, जो कि मंत्रियों वैगरह को मिलती है | तो साथ मिलाकर करीब 25 अरब रूपया है | यह 25 अरब रूपया केवल एक सैकड़ा आदमी ले लेते हैं, यह सरकारी आंकड़े से सिद्ध होता है | मेरे आंकड़े तो खैर और ज्यादा आगे जाते हैं |

            मैं समझता हूँ कि आसानी से 10-12 अरब रूपया एक हिसाब से, 15-20 अरब रूपया दुसरे हिसाब से बचाया जा सकता है | इस खपत के आधुनिकीकरण से, जिससे सरकार का भी ठीक काम चल सकता है, लोगों के ऊपर करों का बोझ कम हो सकता है और खेती, कारखानों का पूंजीकरण भी ज्यादा अच्छा हो सकता है | लेकिन यह वही कर सकता है, जो इस दर्द को जाने |

            यह विशेषज्ञों की सरकार हो गई है और दिशाहीन विशेषज्ञों की | कोई भी पुर्जा मंत्री को बढ़ा देता है और मंत्री बगैर सोचे-समझे उसको पढ़ देता है, क्योंकि मंत्री बेचारों को कुछ पाता ही नहीं होता है क्या खेती है, क्या कारखाने हैं, क्या राष्ट्रीय आमदनी है | मंत्रियों को खुद अपना दिमाग लगाना चाहिए | इन बातो के ऊपर सोच-विचार कर उन्हें दिशा बतानी चाहिए, क्योंकि अंकशास्त्री और अर्थशास्त्री तो विषघर की तरह हैं और बीन जिस तरह बजाओगे, उसी तरह से वह नाचने लग जाएगा और अगर बीन बजाना ही नहीं जानते, तो फिर नतीजा क्या निकल सकता है ?

            मैं दावे के साथ कहना चाहता हूँ कि अगर हिन्दुस्तान की आमदनी के बंटवारे को ठीक किया गया तो 20 रूपए हर साल की वृद्धि की जा सकती है और कोई मामूली अक्ल के आदमी भी इस काम को कर सकते हैं, लेकिन तब, जब बढती के सब हिस्सेदार हों |

            मैं आपसे अर्ज करूँगा कि मेरे खिलाफ यहाँ काफी जहर उगला गया | पच्चीस हजार रूपए रोज के खर्च के मामले में | लोगों ने कहा कि मैं उकसाता हूँ कि प्रधानमंत्री को क़त्ल कर दिया जाए | लोगों ने नहीं सोचा कि वे उकसा रहे हैं कि मुझको क़त्ल कर दिया जाए | इस तरह का जहर मेरे खिलाफ उगला जाता है | मैंने तो खाली एक सिद्धांत की बात उठाई थी, वर्ना मुझे क्या मतलब पड़ा हुआ है | अगर एक आदमी पच्चीस हजार रुपए रोज खर्च कर देता है, तो मैं उसको माफ़ भी कर देता लेकिन मेरे लिए सवाल ये है कि उसकी नक़ल करके ये एक सैकड़ा बड़े लोग 25 अरब रुपए सरकारी आंकड़े के हिसाब से - और 50 अरब रूपए मेरे आंकड़े के हिसाब से ले जाया करते हैं | यहाँ कई माननीय सदस्यों ने कहा कि 25 हजार क्या चीज है, करोड़ो खर्च करेंगे | मैं उनको खाली याद दिलाना चाहता हूँ कि वह किस्सा जो 1916 में गांधी जी ने बड़े लाट वाइसराय के बारे में कहा था | वाइसराय बहुत ज्यादा खर्च करता था अपने ऊपर लेकिन इतना नहीं जितना ये हजरत करते हैं | वह इसका छठा भाग ही था | तब महात्मा गाँधी ने कहा था, यह बड़ा भूखा देश है, गरीब देश है, खाने को नहीं मिलाता है, अगर बड़े लाट इतना रुपया खर्च करने से ही अपनी जिंदगी बचाते हैं तो इससे ज्यादा अच्छा है कि वह मर जाएं | ए गांधी जी के शब्द हैं मेरे नहीं हैं |

            आखिर में मैं इतना ही कहूँगा कि बहुत धधकती आग है भूख की और गरीबी की | तबियत तो मेरी यही कहती है कहने को कि धधकती आग में यह सरकार जल करके ख़ाक हो जाए और मेरे जैसे निक्कमें आदमी जो इस सरकार को न हटा पाए, शायद उनके लिए भी ख़त्म होना अच्छा ही होगा |

            श्री मोरारका : अध्यक्ष महोदय, इस बहस की शुरुआत डॉ. लोहिया के इस कथन से हुई कि इस देश के 27 करोड़ लोग तीन आने रोज पर जिन्दगी बसर कर रहे हैं | इसका तर्क बहुत साधारण है लेकिन नतीजा गंभीर है | सदन को यह जानने का अधिकार है कि वह जाने कि डॉ. लोहिया के तर्क सही है, अगर ये सही हैं तो उनके क्या परिणाम होंगे और अगर ये सही नहीं हैं तो डॉ. लोहिया के तर्कों के प्रभाव क्या पड़ेंगे ?
            डॉ. लोहिया की बहस में एक जबरदस्त कमी है जिसके जरिये वे इस नतीजे पर पहुंचे कि 27 करोड़ लोगों की औसत प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति आमदनी 3 आना है | (अंग्रेजी में)

            डॉ. राममनोहर लोहिया : अध्यक्ष महोदय, माननीय सदस्य भाषण तैयार करके लाए थे, मेरे भाषण को सुनने के पहले | सब बतलाया मैंने |

            श्री मोरारका : 27 करोड़ व्यक्ति भुखमरी की हालत में नहीं जी सकते | ये हमेशा कर्ज पर भी नहीं जिंदा रह सकते |......... नेशनल सेंपुल सर्वे के आंकड़े साढ़े सात आना फ़ी आदमी प्रतिदिन वाला ज्यादा सही है, डॉ. लोहिया के आंकड़े भ्रमात्मक हैं | (अंग्रेजी में )
डॉ. राममनोहर लोहिया : आपने मोर करेक्ट शब्द इस्तेमाल किए हैं | ज़रा बतला दीजिए कि सही क्या है !   


Sunday, 10 December 2017

Socialist Party's statement on Donald Trump's decision on Jerusalem

9 December 2017


Press Statement

Socialist Party's statement on Donald Trump's decision on Jerusalem

            
The Socialist Party believes that the unilateral and arbitrary announcement of Donald Trump, the US President, to declare Jerusalem as the capital of Israel and to shift the American Embassy from Tel Aviv to this  city is coercive and dangerous, to say the least, for the already violent-conflicts-ridden world. This decision taken by him  will not only worsen the situation further  in West Asia and  in the Muslim world by making the present and the coming generations more vulnerable,  particularly in Palestine-Israel territories, but will also create dangers for  the lives of common innocent citizens world over. This is specifically important  keeping in view the operating nexus between armed dealers and unchecked terrorist outfits.

            The Socialist Party  views this decision of Trump as a clever  maneuvering to divert attention from the internal contradictions/problems that his one-year old regime is facing at home which includes the promoting of business interests of his favorites in the region. At the same time, it is again a well planned strategy to keep the conflict, aggravated by the deepening crisis of capitalist system, always at a safe distance from America and European part of the globe.

            The US Ambassador in the UN Security Council, echoing Trump's argument, has stated that the decision is a simple acceptance of reality. It means that the US has decided against the two-nation solution of the Palestine-Israel dispute having their common capital  in  Jerusalem. Thus this  bizarre  leap is directed towards implementing the inherent intention of the US regarding  the Palestine-Israel dispute, that is, making a myth of reality i.e. Palestine, and making a reality of the myth i.e. Israel!       
            It comes as a good ray of hope  that the UN and as well as  several other nations, including some allies of the US in world diplomacy, have opposed this decision terming it as one which  is against all international laws, treaties, and agreements held time to time at  various levels in  world forums.  

            The Socialist Party appeals to the world community, including Americans who still adhere to the wisdom of equality, freedom and democracy, to exert pressure on Donald Trump to withdraw his decision. As suggested by  the members of the UN Security Council and several nations, a peaceful two-nation solution should be arrived at between Palestinians and Israelis at the earliest. Only  a solution of this kind  would end the agony of the common citizens, as well as the security forces, who have been leading a life of trauma for a long time.


Dr. Prem Singh
President 

डोनाल्ड ट्रम्प की यरुशलम संबंधी घोषणा पर सोशलिस्ट पार्टी का बयान

9 दिसम्बर 2017


प्रेस रिलीज़

डोनाल्ड ट्रम्प की यरुशलम संबंधी घोषणा पर सोशलिस्ट पार्टी का बयान



      सोशलिस्ट पार्टी का मानना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की यरूशलम को इजराइल की राजधानी स्वीकार करने और तेल अवीव में स्थित अमेरिकी दूतावास को यरुशलम स्थानांतरित करने की एकतरफा और मनमानी घोषणा जोर-जबरदस्ती वाली और खतरनाक है. ख़ास कर ऐसे समय जबकि दुनियां पहले से कई तरह के हिंसक संघर्षों और विग्रहों में उलझी हुई है. इस समय पूरी दुनियां में हथियारों के सौदागरों और आतंकवादी गुटों के बीच जारी गठजोड़ के मद्देनज़र सोशलिस्ट पार्टी का यह आकलन है कि  ट्रम्प का यह फैसला न केवल पश्चिम एशिया, ख़ास कर फिलस्तीन-इजरायल में आपसी झगड़ों को तेज़ करेगा और वहां की पहले से नाज़ुक हालातों में जीने वाली वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों को और असुरक्षित बनाएगा, बाकी दुनिया के साधारण निर्दोष नागरिकों के जीवन को भी असुरक्षित बनाने वाला सिद्ध होगा.
      सोशलिस्ट पार्टी के विचार में ट्रम्प ने यह फैसला घरेलू स्तर पर उन अंतर्विरोधों और समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए किया है जिनका वे अपने एक साल के शासन में सामना कर रहे हैं. साथ ही फिलिस्तीन-इजराइल में अपने चहेतों का व्यापार बढ़ाने की मंशा भी इस फैसले के पीछे साफ नज़र आती है. इसके साथ अमेरिका की यह दीर्घावधि नीयत भी इस फैसले के पीछे काम कर रही है कि पूंजीवाद के परवान चढ़ने पर जो संकट और विग्रह तेज़ हो रहे हैं, अमेरिका उन्हें अमेरिका और यूरोप की धरती से दूर बाकी दुनियां में धकेले रखना चाहता है.
      संयुक्त राष्ट्र परिषद् में इस फैसले पर ट्रम्प के तर्क को आगे बढ़ाते हुए वहां की राजदूत ने कहा है कि ट्रम्प का फैसला हकीक़क का बयान भर है. इसका मतलब है कि ट्रम्प फिलस्तीन-इजराइल विवाद में अभी तक स्वीकृत द्वि-राष्ट्र के फैसले को नहीं मानते हैं, जिसमें यरुशलम शहर फिलिस्तीन और इजराइल दोनों देशों की राजधानी होगा. दरअसल, यह एक बड़ी छलांग है जो अमेरिका ने फिलस्तीन-इजराइल विवाद पर लगायी है. इसमें फिलस्तीन-इजराइल विवाद पर उसकी नीयत खुल कर सामने आ गई है. वह नीयत है : जो हकीक़त है, यानी फिलिस्तीन, उसे मिथक बनाना; और जो मिथक है, यानी इस्रायल, उसे हकीकत बनाना!
      यह एक अच्छी आशा की किरण है कि संयुक्त राष्ट्र समेत दुनियां के कई देशों ने, जिनमें अमेरिका के सहयोगी भी हैं, अम्रेरिका के इस फैसले का विरोध किया है. सभी ने एक स्वर से फैसले को अंतर्राष्ट्रीय कानूनों, संधियों, समझौतों, जो समय-समय पर इस जटिल समस्या पर स्थापित प्रावधानों के तहत विश्व मंचों पर लिए गए हैं, के विपरीत कहा है.
      सोशलिस्ट पार्टी विश्व समुदाय से, बराबरी, स्वतंत्रता और लोकतंत्र की समझदारी से परिचालित अमेरिका के नागरिकों समेत, अपील करती है की वह डोनाल्ड ट्रम्प पर यह फैसला वापस लेने के लिए दबाव डालें. जैसा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् और दुनियां के कई देशों के नुमाइन्दों का मानना है, फ़िलिस्तीन-इजराइल विवाद का जल्द से जल्द समाधान दोनों देशों के बीच द्वि-राष्ट्र के स्वीकृत सिद्धांत के आधार पर निकला जाना चाहिए. यही एक समाधान है जो इस इलाके के नागरिकों, और सुरक्षा कर्मियों को भी, प्रताड़ना और हिंसा की लम्बी पीड़ा से निजात दिलाएगा.

डॉ. प्रेम सिंह
अध्यक्ष 

Friday, 8 December 2017

BEAUTY AND SKIN COLOUR

BEAUTY AND SKIN COLOUR
Dr. Rammanohar Lohia


            The colour of the skin is no criterion of beauty or any other type of superiority. And yet the fair of colour and the beautiful are words of similar meaning not alone in the white lands of Europe but more so in the sultrier climes of Asia or the Americas. On merit, this distortion of aesthetics is inexplicable.
            The dark of colour have not always been treated with neglect, at least not in India. To Sanskrit literature, the dark one, Shyama, is the beautiful one. She need not actually have been dark of colour, but if she was young and beautiful, and the young and the beautiful often tend to be synonymous, she was called Shyama. The perplexed cloud asks as to how he would recognise the damsel to whom the message was to be delivered and Kalidas describes the Shyama of slender waist and of step languorous with the weight of hips, of a lower lip red and full, of eyes that belong to an astonished deer and similar treasure. The male incarnations of god-head, Ram and Krishna, were dark of colour.
            The greatest woman of Indian myth was dark. Draupadi also called Krishna has suffered neglect, probably because current male vanity cannot reconcile itself to her five husbands and a platonic affairs or two in addition. Savitri and Seeta, the chaste and also the fair of colour, represent India’s womanhood, not entirely without reason, but unreason ensures when other representatives are excluded. Krishna, the dark female, and Krishna the dark male, are however the two peerless flowers of India’s myth-making with the utmost beauty and fragrance.
            Draupadi is perhaps the one woman of myth or history in the wide world, who was wiser and wittier than all the men of her time. The question of comparing her with Krishna should never arise, for this woman of ready wit and deep wisdom was his friend, the companion, the heroine and the occasion of his years of duty as Radha was of those of delight, and Krishna and Krishna are the two heroes of Mahabharat of equal merit, companions without a shadow of conflict. This Draupadi was dark of skin.
             Are not then the fair of skin beautiful? To say that they are not would again be untrue. In fact, one of the finest poems on woman’s beauty describes the visible forehead surrounded by the darkness of the hair as the incomplete moon of the 8th day. Such a forehead must necessarily be fair and this exceedingly delicate poem also belongs to Sanskrit literate. Ancient India had probably succeeded in separating beauty from colour of complexion and was ready to discover the beautiful wherever it was located. It had presumably at least during certain periods been able to rid itself of prejudices in favour of the dark or of the fair in appraisals of beauty. Succeeding generations have squandered this great maturity of aesthetic judgment.
            From such rites of beauty contests as are revealed to the world, it would appear that the measurements of chest, waist and hip are among the deciding qualities. No dark beauty, however, has so far been elected. A Japanese Miss Universe succeeded in gate-crashing after what must have been nearly half a century of beauty contests. Japanese women must, of course, have been beautiful even before one of them was crowned as the queen of the world, and it is not as though they are more beautiful today than before. The change is not in them but in the eyes of the beauty judges of California. The turn for the dark skins of Africa and Asia may yet to come.
             The eyes of the beholder have so patently deceived not only over weeks or decades but also over tens of centuries, for they see what the mind has taught them to. Assam is the fabled land of feminine magic and also of feminine charm. Visiting strangers extol the beauty of its females, most of them because of ceremony and without knowing what they are Beauty and Skin Colour | 123 124 | Essential Lohia talking about. Is it the soft melting beauty of the fair skinned which they praise or the celestial shapes of the dark skinned for which their eyes are beholden? Assam is indeed a land of female beauty, but they could hardly know it who confuse beauty with fair skin. The tea woman, or at least some of them, predominantly of Chattisgarh and Oriya extraction arrest the eye with the shape of their body and the lustre of their visage and hold it captive for ever and these labouring women are dark-skinned. Not many hit upon this truth of beauty residing in dark as well as fair skin ever in their life. Some do, but when their youth has passed. Myth also makes Radha the fair-skinned companion of the youthful Krishna, while Krishna who is dark of skin is his companion in the period of statecraft and middle age. As one grows in years, one begins to prefer the south to the north and also those who are dark of skin.
            I am talking from the angle of the male and about female beauty. There is no implication that I hold woman to be a thing of beauty and no more. If that in fact were my perspective, I would never have been able to discern Draupadi’s beauty, of which her unexcelled wisdom seems to be a source, or that of Assam’s tea women, with whom labour, independence and good looks would be difficult to disentangle. If I were a female, I would probably have looked at the question of male beauty much from the same angle. In the first place, the male has not suffered the same amount of depreciation because of the colour of the skin, and secondly, the female has so far been busy evaluating her own beauty as much as his. Should beauty ever become a mark of man to the extent that it is today of woman, which I very much doubt, the proposition about the colour of the skin would hold just as well if not more.
            Meenakshi the fish eyed has her abode in Madura, now the chief city of the river Vygeyi, which at one time nurtured the great Pandyan kingdom. This great goddess who presides all by herself over what must be one of the largest temples of India, is not the only fish eyed one. All women of the Vygeyi share in her beauty. To judge between the fish eyed and the deer eyed would be at all time difficult, for the Mediterranean eyes speak just a little bit more to the senses, while those of the Vygeyi speak that bit more to the soul. The fish eyes seem to possess a little extra of the quality of sympathy and mercy. These Vygeyi women of the fish eyes are dark-skinned, as are most women of Tamilnad, India’s true south.
            Tamilnad makes its own films in Tamil language, though Hindustani films are also popular. A most curious fact stands out that, though male heroes of these films are generally Tamils, Andhra and Malayali women are just as generally cast in the role of film heroines. There may be many reasons for this, but I would like to mention one. I had occasion to see Tambaram Lalita, a Tamilian woman, play in a minor role, and I looked intently at her for a possible clue to the behaviour of Tamil films. The thick coat of paint and powder made her face look different from her arm, whose true colour showed through a coating that was not as liberal. Lest one should put it down to the failure of technique, it is only fair to wonder whether all parts of a heroine’s body which a film has to show can be effectively covered with such thick coats of paint and powder.
             I found Lalita just as beautiful as any other woman cast in the major roles of that film. A dark-skinned Meenakshi of shapely body would of course be peerless. But the dark-skinned Tamilians evidently do not think so and they prefer to see the Malayali and Andhra women of lighter skin in their films. A friend completed my observation and told me that, before the beauty judgments of film audiences could come into play, the dark-skinned beauty would have to pass muster at the hands of the producer or the director. The coat of paint and powder may charm the audience, but the producer would be a little too close for that.
This distortion of aesthetic judgement must be ascribed to political influences. The fair-skinned peoples of Europe have dominated the world for over three centuries. For the most Beauty and Skin Colour | 125 126 | Essential Lohia part, they conquered and ruled, but, in any event, they have possessed power and prosperity, which the coloured peoples have not. If the Negroes of Africa and ruled the world in the manner of the whites of Europe, standards of woman’s beauty would undoubtedly have been different. Poets and essayists would have spoken of the soft satin of the Negro skin and its ennobling feel and sight; their aesthetic construction of the beautiful lip or elegant nose would have tended to be on the side of fullness. Politics influence aesthetics; power also looks beautiful, particularly unequalled power.
            The worldwide conjunction of fair skin with overwhelming power has received great reinforcement from a specific Indian situation. Those fair of skin or at least less dark have generally belonged to the higher caste. The Hindustani word for cast is ‘Varna’, which probably means colour. The ‘Rigveda’ has named white as the Aryan colour. Against the background of bright colours of nature and sky in India, the fully white but unstarched raiment probably makes the beholding eye happy and accentuates the beauty of the wearer. But that has nothing to do with the colour of the skin. Nevertheless, the conjunction of worldwide domination with the speciality of India’s caste has given to fair skin its formidable prestige and made it a thing of beauty in itself almost without other accompaniments.
             Is the colour of the skin then no part of beauty. When the element of novelty tickles the beholder, all fair skin looks like soothing marble and, I guess, by the same token, all dark skin, ochre or wheat-like, looks like the immaculate trunk of the plantain tree. After the novelty has passed, the blotches of the white will show themselves same as the monotone of the dark. The colour of the skin is certainly no criterion of beauty. If any quality of the skin goes into beauty, that certainly is its texture, a soft, unbroken and even texture, that is some times seen perhaps at its best in China or among the ochre or wheat-like women of Africa, India and similar lands. I have perhaps tilted the balance somewhat in the other direction, and that often happens when an earlier tilt is being corrected. A soft, unbroken and even texture may be found, though more rarely, among the fairer skin, which may cause madness to rage in the blood just as much as its darker skin.
            While it makes no sense to prefer between the dark and the fair, some subjective impressions may be noted. All women are beautiful. Some are more so than the other. Among the more beautiful ones of fair skin are such as ooze frankness and innocence and pleasing beauty like the clear rippling brook or better still the transparent depths of rivers in the hills and the light of the moon. Among the more beautiful ones of dark skin are such as evoke the mystery of life and creation, the quickening that gives to fish its eyes, to the she-elephant its languorous step, to twilight its pregnant repose and all such things where deep calls unto deep.
            Beauty and sexuality are allies. Darker women have in fact attracted the sexuality of the dominant male, but only in nights clubs or on the sly. India’s system of castes erects further hurdles. Not only are the ways of life and speech and conduct different, but the modes dictate a segregation, at least outward, between the sexes of the higher and the lower castes. The dark skinned women of the lower castes, when genuinely in love, would perhaps neither relish nor be able to practise the ruses of the higher castes. There is, however, no love without sexuality and no beauty without love. The woman who loves and is loved radiates the beauty of the starlit sky, whether she is dark or fair. The darker women have in the recent past been denied such love, at least by those who speak or sing of beauty. Hurdles made out of different ways of life and erected among India’s castes or between the dark and the fair in all the world may take time to remove. The greatest hurdle of them all is built upon a sheer error, which attributes beauty to fair skin.
            The tyranny of colour is among the great oppressions of the world. All women are oppressed and mankind is the poorer for lack of adequate expression to their talents or gifts. Coloured women, who are more numerous, suffer greater oppression. Beauty and Skin Colour | 127 128 | Essential Lohia They are reared on a diet of anxiety and inferiority. Even as a little child, the dark girl, who may be sister to a fairer girl in the same family, has to accustom herself to neglect and treatment reserved for citizens of the second grade. The female child suffers lack of opportunities for growth in comparison to the male child, and on top of that, the coloured girl experiences an additional portion of shame, at least the burdens of an inferior position. The coloured male is also not wholly free of such burdens.
            Soaps and creams and lotions and the latest is injections, as might change the skin to lighter hue, are very much in demand by the coloured youth, both male and female. In land where a minority of whites and a mass of coloured people live together, as in South America, and where the white dominates, the accepted tyranny of colour can be seen in its most accentuated forms. All the world suffers this tyranny of skin’s colour, a tyranny made worse because the tyrants do not practise it as much as the slaves, who inflict upon themselves.
            Most tyrannies are built upon error and so is this largest and widest tyranny, that of colour. How coloured humanity has come to willing and eager acceptance of standards of beauty laid down by those of fair skin is probably a greater marvel than any. The key to the marvel is the same as in the case of the tyranny of the rich over the poor, the high caste over the low caste, the foreign-tongued over the native-tongued, the select over the mass. Between dark and fair as between rich and poor lie myriad gradations. The dark can be the black of coal or the yellow of pearl with many intermediate wheats and browns and ochres and chocolates, so that the fair who dominate aesthetic judgments are able to win substantial followers in the dark-skinned camp. The distance between dark and fair as between rich and poor is covered by innumerable intermediate points, so that the restoration of a valid aesthetic judgment has become as difficult as that of a proper economic or moral standard. When would the beautiful women of dark skin assert their supremacy or at least their rights of equality or, perhaps, the revolution in this as in other matters will be paved by the tyrants themselves. An aesthetic revolution in the evaluation of beauty and its relation to the colour of the skin will blow the air of freedom and inner peace over all the world almost as much as any political or economic revolutions.

 [March 1960]

Saturday, 2 December 2017

खाद्दान्न समस्या (बहस) तीसरी लोकसभा का 7वां सत्र (12 फरवरी 1964 - 15 अप्रैल 1964)

खाद्दान्न समस्या (बहस)
तीसरी लोकसभा का 7वां सत्र (12 फरवरी 1964 - 15 अप्रैल 1964)

      डॉ. राममनोहर लोहिया : पिछली बहस में सरदार साहब ने फ़रमाया था कि जब अन्न मंत्रियों का सम्मेलन हो जाएगा तब वह बतला सकेंगे कि अनाज के दामों में उतार-चढ़ाव के बारे में क्या फैसला हुआ है, किंतु मुझे अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि उनकी तरफ से कोई जवाब और नीति नहीं आई |
      मैंने यह सलाह दी थी कि कोई भी अनाज दो फसलों के बीच में किसी एक जगह पर आने से या साढ़े 16 सैकडे से ज्यादा उतार-चढ़ाव न हो | इस पर बहस करने का क्या तरीका है ? व्यापारियों को गिरफ्तार करने की मंत्रियों को गिरफ्तार करने की बहुत कम उम्मीद हम रखते हैं | अलबता हम यह फैसला करें कि अनाज के दामों के बारे में क्या नीति बरती जाती है | फिर उस नीति को हासिल करने का कौन सा तरीका होता है उसपर बहस हो |
      मुझे सबसे पहले यहाँ पर यही बात जोर से कहनी है कि अनाज के दाम बांधने के बारे में अब इस लोकसभा में कोई फैसला हो जाना चाहिए | जब मैं बांधने की बात कह रहा हूँ तो कोई 6 आने या 7 आने सेर बांधने की बात नहीं कह रहा हूँ | अगर कम से कम 6 आने सेर का हो तो ज्यादा से ज्यादा 7 दाम उस चीज का 7 आने सेर होना चाहिए | 6 आने या 7 आने के बीच में दामों का उतार-चढाव, इससे ज्यादा फर्क न हो | बिल्कुल यह फैसला हो जाए |
      मैंने सरदार साहब के बयान को बहुत ध्यान से पढ़ा है | उसमें सिर्फ एक बात है कि मैं दोषी नहीं हूँ, दोषी या प्रकृति है या व्यापारी है | हम हिन्दुस्तानियों की आदत हो गई है कि हम हमेशा अपने दोष को किसी और पर डाल दिया करते हैं | मैं चाहता हूँ कि यह बात नहीं होनी चाहिए | दोषी कौन है यह बहस फिजूल है | अगर कोई मुझसे पूछे तो मैं कहूँगा कि सरकार तथा व्यापारी, मंत्री तथा करोड़पति या यह पक्के आढतिया, यह लोग इसके दोषी है | यह बहस फिजूल है और इस बहस को छोड़ देना चाहिए | दामों को बांधने के बारे में कोई फैसला लिया जाए | एक तरफ किसान की लूट बंद हो और दूसरी तरफ उपभोक्ता की लूट बंद हो | इसके साथ-साथ मैं यह भी कह दूँ कि किसान की उपज के दाम के बारे में जहां हम नीति का बंधन करें वहां कारखाने के दाम के बारे में जरुर फैसला करें | क्योंकि दोनों एक दुसरे से जुड़े हुए हैं | अब होता यह है कि कारखाने वाले अपनी वस्तुओं का दाम चढ़ा लिया करते हैं क्योंकि उनके पास साधन हैं, शक्ति है, लेकिन किसान चूँकि इतना शक्तिमान नहीं है और और इतना बिखरा हुआ है इसलिए वह ऐसा कर नहीं पाता हैं | इसलिए मैं चाहूँगा कि कारखानों में जरुरी चीजो के दाम भी लागत खर्च से डेढ़ गुना से ज्यादा किसी हालत में नहीं होना चाहिए | ऐसा मैं जरुरी चीजों के लिए कह रहा हूँ | अब रेशम, शराब या सिगरेट वगैरह के लिए मैं यह नहीं कह रहा हूँ | फैशन की चीजों के दाम ज्यादा हो सकते हैं दामों के बारे में जब यह नीति अपना लेते हैं तब जाकर कहीं उपभोक्ता और किसान यह दोनों आदमी हो पाते हैं | इस नीति के अभाव में आज किसान आदमी है ही नहीं | गाय से हम दूध ज्यादा पैदा करते हैं, कब, जब गाय को चारा दे देते हैं | लेकिन किसान को कहीं कोई चीज मिल ही नहीं पाती और उससे उम्मीद करते हैं कि वह पैदावार बढ़ाएगा | इसलिए मेरा कहना है कि किसान को अगर मनुष्य के जैसा नहीं तो कम से कम गाय, बैल का जैसा ही जीवन हम दें |
      मैं बतलाऊं कि सफ़ेद दुनिया में जहाँ 3,500 कैलोरीज का औसत पड़ता है और पीली दुनिया में 3,000 या 2,500 हरारा का औसत पड़ता है वहां हिंदुस्तान में मुश्किल से 1,700 हरारा का ही औसत पड़ता है | अगर हिंदुस्तान के 27 करोड़ आदमियों के तरफ ध्यान दिया जाए तो वह करीब 800 या 900 हरारा का ही जाकर औसत पड़ेगा | मैं बहुत अफ़सोस के साथ कह रहा हूँ कि अभी मैं राजस्थान और पंजाब के कुछ इलाकों में गया था | वहां मैंने कुछ लोगों को सड़क पर बैठा देखा | वहां पर अकाल सा दृश्य दिखाई देने लग गया है | एक आदमी का चेहरा तो अभी कुछ दिनों मुझे याद रहेगा | वह बन्दर जैसा हो गया था | खाने को उसके पास कुछ भी नहीं था और वह बेचारा बेर बीन-बीनकर खा रहा था | अकाल की स्थिति अब अपने देश में आ गई है | मुझे इस बात का भय है कि अगले तीन-चार महीनों में कुछ इलाकों में अकाल हो जाएगा | यूँ कभी और भुखमरी की हालत तो हमेशा ही रहती है, लेकिन इस वक्त बड़े पैमाने पर अकाल की स्थिति है |
      पैदावार बढाने की बातचीत जब हमेशा हुआ करती है, तो उसके बारे में भी हम फैसला करें कि आखिर पैदावार कैसे बढ़ाएंगे | जब कभी होता है, जब कभी कोई चर्चा उठती है तो सरकार की ओर से कहा जाता है कि हम दो सौ ट्यूबवेल खोद देंगे, हम 500 यह कर देंगे | यह हिन्दुस्तान की खेती का मखौल उड़ाना है | हिन्दुस्तान की तीस करोड़ एकड़ खेती के बारे में सरकार की क्या नीति है, सरकार स्पष्ट करे | वह साफ़-साफ़ कहे कि हमारी यह नीति है इसपर हमें चलना है |
            मैं समझता हूँ कि आज हिन्दुस्तान में सबसे बड़ी कमी यह है कि जवाबदेही बिल्कुल रह ही नहीं गई है | ख़ासतौर से लोकशाही में जवाबदेही के बिना कोई काम काज नहीं हुआ करता है और ख़ासतौर पर बहस में | बहस की जवाबदेही इस लोकसभा में बिलकुल नहीं रह गई है | हंमेशा सरकार को मौका मिल जाता हैं कि वह बिना कुछ नीति बताए हुए अपना कुर्ता झाड़कर अलग चली जाए | उसको जवाबदेही के बंधन में फांसना चाहिए | बतलाओं कि कितने समय के अन्दर-अन्दर तुम हिन्दुस्तान का पेट भर दोगे - मैं नहीं कहता कि 3,000 कैलोरीज  के हिसाब से 1,500, 1,700, 2,000 जो भी बांधो कितने समय में तुम हिंदुस्तान का पेट भर दोगे और किस ढंग से भर दोगे ? अगर पिछली बातें भुला भी दें, तो अगले दो साल के लिए या तीन साल के लिए वक्त दिया जाए, ताकि सरकार पर यह जिम्मेदारी हो जाए कि ख़ास ढंग पर, एक नीति को अपनाकर, एक बंधे हुए समय के अन्दर-अन्दर वह हिंदुस्तान का पेट भर देगी | और अगर उस समय तक वह न हो, तो फिर उसके बाद अगर सरकार हयादार है, मैं सिर्फ बोलने के लिए बोल रहा हूँ- तो उसे हट जाना चाहिए |

      एक माननीय सदस्य : हया नहीं है |

      डॉ. राममनोहर लोहिया : लेकिन वह तो होता नहीं है | असल बात है कि फिर लोकशाही में जनता की भी जिम्मेदारी हो जाती है कि वह बहस की जवाबदेही को समझा करे | जब एक ढंग और एक नीति से काम नहीं हो पाया, तो फिर दुसरे ढंग ढंग और दूसरी नीति की तरफ जनता को चलना चाहिए |
            इसलिए सबसे बड़ी बात तो यह हो गई है कि हिंदुस्तान की खेती की पैदावार को बढाने के लिए सबसे पहले किसान को इंसान बनाना है | आज किसान खा नहीं रहा हैं | उसके हाथ की मसलियाँ पिघल चुकी है | वह पैदावार बढ़ा नहीं सकता | नई जमीन तोड़ी नहीं जा रही हैं | किसान में इतनी सामर्थ्य नहीं है कि वह नई जमीन को तोड़े, साल-दो साल तक अपने घर से खाए और फिर अनाज की पैदावार बढाए | नई जमीन को तो खाली सरकार तोड़ सकती है | और मेरा मतलब कोई दस-बीस लाख एकड़ से नहीं, करोड़-डेढ़ करोड़ से है |
      उसी तरह से जो पुरानी खेती है उसको सिंचाई का पानी देने के लिए जरुरी है कि कोई एक बड़ी योजना ले लो, कोई एक चीज ले लो- जैसे मैंने एक दफा यहीं एक भाषण में कहा था कि कम से कम दो-तीन करोड़ एकड़ जमीन हिंदुस्तान में जलमग्न रहा करती हैं | सरकार के जो वैज्ञानिक अनुसंधान करने वाले हैं, जो वैज्ञानिक मंत्रालय हैं, उनको यह काम सौंप दिया जाए कि यह जो तीन-चार करोड़ एकड़ जमीन हर साल जलमग्न रहा करती हैं, इसको किसी तरह से उससे छुटकारा दिलाया जाए, ताकि खेती की पैदावार बढे व बाकी और जमीन को जितना भी पानी दिया जा सके, उसकी व्यवस्था की जाए | अध्यक्ष महोदय, इस सिलसिले में आपको याद दिलाऊं कि यहाँ पर हमारी किसी बात का जवाब नहीं दिया जाता हैं | आपने बहुत कृपा की है और कहा है कि आप मंत्री को दबायेंगे कि वह हमारी बातों का जबाब दें |

      अध्यक्ष महोदय: क्या मैंने दबाएँगे कहा था ?

      डॉ. राममनोहर लोहिया: हम यूरोप से सब चीजें सिख रहे हैं, अंग्रेजी में जो शब्द होता हैं, उसी को मैंने उल्टा कर दिया | 'दबाएँगे' का मतलब यह नहीं है कि कोई शारीरिक ढंग से आप उनको दबाएँगे, बल्कि मानसिक ढंग से दबाएँगे, आप उनके जवाब दिलवाएंगे |
      1947, 1948 या 1949 के आस-पास दुनिया में जो सिंचाई का सबसे बड़ा विद्वान था, उससे इस सरकार ने राय ली थी | उस विद्वान ने बताया था कि बड़ी सिंचाई से दस-पंद्रह सैकड़ा से ज्यादा हिन्दुस्तान की जमीन को पानी नहीं मिल सकता और अस्सी, पचासी सैकड़ा जमीन को छोटी सिंचाई से ही पानी मिलेगा | लेकिन उसपर कोई ध्यान नहीं दिया गया है और पंद्रह बरस से हम हमेशा इस मामलें में दबाव में सड़ते जा रहे हैं | आखिर अब कहीं कोई नीति तो होनी ही चाहिए | मुझे बातें तो और भी कहनी थीं, लेकिन मैं तो अपना समय बांधकर चलता हूँ | असल में तो यह श्री मनीराम बागड़ी का सवाल है | वह इस पर ज्यादा बोलेंगे, हालाँकि स्पष्ट बात है कि मैं खुद बोलना चाहता हूँ |

      अध्यक्ष महोदय: एक बात तो उलट गई | मुझे बताया गया था कि पांच मिनट आप लेंगे और दस मिनट बागड़ी साहब लेंगे | अब आपने 10 मिनट ले लिए तो उनको कितना समय मिलेगा?

      डॉ. राममनोहर लोहिया : 10 मिनट ? तो मैं फ़ौरन बैठ जाता हूँ | मैं थोड़ा सा अर्ज कर दूँ कि अगर सात मिनट समझें तो अच्छा होगा |

      अध्यक्ष महोदय: आप कहें कुछ और मैं समझूँ कुछ और ?

            श्री एस. एम. बनर्जी : ...... हमारे नेहरु जी के जो आदर्श थे, वे ख़त्म हो गए | अपने पूज्य प्रधानमंत्री जी को देखकर आज ऐसा मालुम होता है कि वह शाहजहाँ हैं, लाल बहादुर शास्त्री जी दारा हैं और पाता नहीं इस सदन में कौन औरंगजेब छिपा हुआ है, जो उनके सिद्धांतों पर कब्ज़ा करने वाला है |

      एक माननीय सदस्य : सिद्धांत थे ही नहीं |

      श्री एस. एम. बनर्जी : इस बजट को पढ़ने के बाद मेरे मन में इस समाजवाद के बारे में कोई भ्रम नहीं रहा | मैं समझता हूँ कि सरकार फ़ूड ग्रेन्स की स्टेट ट्रेडिंग नहीं कर सकती, लेकिन फिर भी मैं यह सुझाव माननीय मंत्री जी के सामने रखना चाहता हूँ |

      डॉ. राममनोहर लोहिया: माननीय सदस्य यह बताते चलें कि दारा और शाहजहाँ का क्या हुआ |

      श्री एस. एम. बनर्जी : मैं चाहता हूँ कि दारा और जहांआरा मिलकर किसी हालत में शाहजहाँ को बचाएं |

      डॉ. राममनोहर लोहिया: मैं भी एक अर्ज कर दूँ | मंत्री महोदय नीति के बारे में कभी कुछ नहीं बताते | खाली आंकड़ो का विवरण दे दिया करते हैं | नीति नहीं रहती है | इसलिए बहस में कोई दिलचस्पी नहीं आ पाती |

      श्री स्वर्ण सिंह : फिर भी आप तो मेहरबानी करके बैठे हुए हैं |
     
      अध्यक्ष महोदय : जो तकरीर कर चुकते हैं, उनमें से बहुत से चले जाते हैं, जवाब सुनने का इन्तेजार नहीं करते हैं |

      श्री काशीराम गुप्त : अधिकतर तो उनमें से यहाँ बैठे हैं | कांग्रेस के साथी चाय पार्टी में चले गए हैं |

      श्री हरिविष्णु कामथ : उनको पार्टी का समय 6 बजे रखना चाहिए था | (अंग्रेजी में)

      अध्यक्ष महोदय : घंटी बजाई जा रही हैं- अब कोरम है | गृहमंत्री जी भाषण जारी रखें |

      डॉ. राममनोहर लोहिया : फुटकर दाम तो आदमी जब खरीदता हैं, तभी वह जानता हैं | मंत्री महोदय खाली अखबारों पर चलते हैं | पिछली बहस में यह बात आ गई हैं |

      अध्यक्ष महोदय : मंत्री जी कबुल नहीं कर रहे हैं |

      श्री स्वर्ण सिंह : डॉ. लोहिया शायद कभी बाजार में जाकर नहीं खरीदते | इन्होने भी शायद बहुत सा इधर-उधर से सूना हुआ है | शायद मुझसे भी कम वह बाजार में खरीदने के लिए जाते हैं | वह बड़े लीडर हैं | उनको पार्टी का काम बहुत रहता हैं |

      डॉ. राममनोहर लोहिया : आपके जितना हम बाजार में नहीं जाएंगे क्योंकि मेरा उतना बड़ा खानदान नहीं है |

      श्री नंबियार : दक्षिण क्षेत्र में वृद्धि मामूली या छोटी सी नहीं हैं | कभी-कभी 50 प्रतिशत से ज्यादा होती हैं | (अंग्रेजी में)

      श्री स्वर्ण सिंह मैं नहीं सोचता कि कहीं भी इस तरह से हैं | (अंग्रेजी में)

      डॉ. राममनोहर लोहिया : 100 फीसदी उतार-चढ़ाव हो जाता हैं |
      श्री स्वर्ण सिंह : मेरा ख्याल हैं कि माननीय सदस्य को साउथ का ज्ञान नहीं है |
      डॉ. राममनोहर लोहिया : ज्ञान बढाने की बात हुई तो लम्बी बहस हो जायेगी |
      डॉ. राममनोहर लोहिया : अध्यक्ष महोदय, आप इजाजत दें तो मैं साफ़ कर दूँ कि मैंने कभी नहीं कहा .......
      श्री स्वर्ण सिंह : मैंने माननीय सदस्य जब बोल रहे थे उनके भाषण में बाधा नहीं डाली | वे हमेशा कड़ी बात कहते हैं | कभी उनको समस्या को भी समझने का प्रयत्न करना चाहिए | मेरा रास्ता उनके रास्ते के जैसा प्रभावशाली नहीं हैं, यह हो सकता हैं, किन्तु मुझे एक कर्तव्य करना हैं | उन्हें समस्या को समझने का प्रयत्न करना चाहिए बजाय इस तरह खड़े होने के | (अंग्रेजी में)

      डॉ. राममनोहर लोहिया : मैंने दामों के उतार-चढ़ाव के बारे में कहा था | मैंने दामों को किसी एक जगह बांधने को नहीं कहा था | मैंने कहा था कि दो फसलों के बीच में दामों के उतार-चढ़ाव को बाँधा जाए | यह मैं कई बार पहले भी कह चूका हूँ |

            श्री स्वर्ण सिंह :  एक और विषय हैं जिसका उल्लेख श्री बागड़ी ने किया था जिन्होंने मुझे उतर देते व सुनते यह सौभाग्य भी प्रदान नहीं किया | जबकि उन्होंने कहा था कि इस प्रकार की बहस ओर सदन का ध्यान आकर्षित करते हुए उन्होंने एक या दो बार बहिर्गमन किया था | (अंग्रेजी में)

      डॉ. राममनोहर लोहिया : उनके बदले हम लोग बैठे हुए हैं |

      डॉ. राममनोहर लोहिया : अध्यक्ष महोदय, मैं तो सिर्फ आपसे यह अर्ज़ कर रहा हूँ कि कभी किसी समय जल्दी ही मंत्री महोदय से आप अनाज के दाम के उतार-चढ़ाव का कुछ ठोस जवाब दिलवाइये, क्योंकि आज भी खाली एक किताबी उपदेश था | न तो फर्श की कोई कीमत बताई गई |

      अध्यक्ष महोदय : अब इस नुक्ताचीनी और कमेंट की कोई जरुरत नहीं है | माननीय सदस्य चाहते हैं कि उसमें वेरिएशन एक सरटेन लिमिट में हो | उसके जवाब में मिनिस्टर साहब ने कहा है कि हाँ, सरकार इसी पर गौर करके कोई फैसला करेगी |

      डॉ. राममनोहर लोहिया : पिछली दफा भी यही था | किसी सैकड़े में जवाब आना चाहिए | मान लीजिए, सोलह सैकड़ा या बीस सैकड़ा तक उतार-चढ़ाव होगा | दूसरी बात मैंने आपसे यह अर्ज़ की थी कि कोई समयबद्ध नीति होनी चाहिए खेती की पैदावार बढाने के लिए, लेकिन वह नीति अभी तक नहीं आई है | आप कभी किसी समय वह नीति दिलवाइए |

अध्यक्ष महोदय : बाकी बहस हम डिमांडज में करेंगे | आज की बहस सिर्फ इतनी ही थी |  

                            


   

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