Friday, 11 August 2017

चीन के साथ सीमा-विवाद पर सोशलिस्ट पार्टी का नज़रिया

18 जुलाई 2017

प्रेस रिलीज़
चीन के साथ सीमा-विवाद पर सोशलिस्ट पार्टी का नज़रिया

      वर्तमान मोदी सरकार की आक्रामक कश्मीर नीति उसे चीन से टकराव तक ले गई है। चीन भारत की चारों ओर से घेराबंदी करता जा रहा है। चीन के मीडिया में उनके नीति विशेषज्ञ यह विचार व्यक्त कर रहे हैं कि जिस तरह भारत ने भूटान में घुसकर चीन का विरोध किया है, उसी तरह चीन की सेना आजाद कश्मीर में घुसकर भारत का विरोध कर सकती है। चीनी मीडिया 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान लिखे गए लेख और फोटो संग्रहालय से निकल कर छाप रहा है। अगर कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी केन्द्रीय गृहमंत्री को बता रही हैं कि चीन कश्मीर और दार्जिलिंग पहाड़ियों में हस्तक्षेप कर रहा है तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए।
      दुर्भाग्य से सरकार देश की सीमाओं की सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दे पर समुचित ध्यान देने के बजाय समाज और देश के भीतर नफरत फ़ैलाने में जुटी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक और उनसे प्रेरित मीडिया कश्मीर की अवाम के खिलाफ नफरत फैला रहे हैं गोयास वे भारत का अभिन्न हिस्सा न हों। चीनी सामानों के बहिष्कार अभियान भी कश्मीर से जोड़कर चलाया जाता है. यह बात काफी पहले से जाहिर है कि चीन पाकिस्तान की मदद करता है और मौलाना मसूद अजहर जैसे आतंकियो पर अंतरराष्ट्रीय पाबंदी लगाए जाने का संयुक्त राष्ट्र में विरोध करता है। लेकिन कश्मीर के मामले से चीन को जोड़कर प्रचार करने का अभियान देश के भीतर आरएसएस के प्रचारकों और मीडिया ने पहली बार शुरू किया है। उनकी नफ़रत का हाल यह है कि उन्हें वह दिखावटी सद्भाव भी सहनीय नहीं है जो महबूबा मुफ्ती और राजनाथ सिंह ने अमरनाथ यात्रा के बाद कश्मीर के अलगाववादी और मानवाधिकारवादी संगठनों की प्रतिक्रिया के बाद कश्मीरियत के हवाले से व्यक्त किया था! इस बीच भारत के सेनाध्यक्ष जनरल विपिन रावत ने अढ़ाई मोर्चे पर निपटने की तैयारी का बयान देकर यह जाहिर किया है कि वे कश्मीर को आधा मोर्चा मान कर चल रहे हैं। किसी भी देश के लिए इतने मोर्चे खोलना न तो सैद्धांतिक तौर पर सही है और न ही व्यावहारिक तौर पर।
      भारत के समाजवादियों चिंतकों और नेताओं का लंबे समय से चीन के बारे में यह नजरिया रहा है कि वह एक विस्तारवादी देश है और मौका मिलते ही भारत को घेरने और कमजोर करने की कोशिश करता है। इसीलिए डॉ. लोहिया ने हिमालय नीति बना कर नेपाल, भूटान, सिक्किम, कश्मीर समेत पूर्वोत्तर राज्यों की महत्वपूर्ण आबादी के साथ भाईचारा संबंध कायम करने और उनमें होने वाले लोकतांत्रिक आंदोलनों को मजबूत करने की बात की थी। उनका मानना था कि इससे भारत की सीमाएं सुरक्षित होंगी।
      लेकिन संकीर्ण सांप्रदायिक संगठन आरएसएस से निकली मोदी सरकार उन इलाकों में हिमालय नीति की बजाय 'हिंदू नीति' चलाने पर आमादा है। यही वजह है कि यूपीए सरकार के समय अपेक्षाकृत शांत कश्मीर एनडीए सरकार के समय भड़क उठा है; दार्जीलिंग में ममता सरकार के खिलाफ लगाई गई भाजपा की आग सिक्किम को भी झुलसा रही है; प्रधानमंत्री मोदी की पशुपतिनाथ यात्रा और भूकम्प के दौरान असाधारण राहत के बावजूद नेपाल चीन की ओर अतिरिक्त रूप से झुक गया है; अरुणाचल प्रदेश के स्थानों को चीन अपने नाम दे रहा है; और डोकलाम पर महीने भर से तनातनी के बावजूद भूटान उससे वार्ताएं कर रहा है। हालाँकि भूटान के चीन चीन से राजनयिक संबंध नहीं हैं।  
      लोहिया जी ने स्पष्ट तौर पर कहा था, ``तिब्बत के बारे में मुझे कोई लंबी ऐतिहासिक बहस नहीं करनी है। मैं समझता हूं कि तिब्बत आजाद होना चाहिए। वह आजाद रहा है। इतिहास में ऐसा भी समय रहा है जब तिब्बत ने चीन पर राज किया है।‘’ डॉ. लोहिया ने तो यह भी साबित करने की कोशिश की थी किसी जमाने में लद्दाख के राजा ने कैलाश मानसरोवर तिब्बत को उपहार में दिया था लेकिन वहां स्थित मनसर गांव अपने पास रख लिया था और उसकी मालगुजारी उन्हें मिलती थी। इसलिए आज 1890 की अंग्रेजों और चीन के बीच हुई उस संधि को ठुकराने की जरूरत है जिससे स्वयं पहले प्रधानमंत्री नेहरू भी सहमत नहीं थे। साथ ही कैलाश मानसरोवर जैसे स्थलों पर भारत के दावों को पुख्ता करने की ज़रुरत है।
      इसी के साथ भारत को 90,000 वर्ग किलोमीटर भूमि पर भी दावा करना चाहिए जिस पर चीन ने कब्जा किया हुआ है। इस बारे में संसद में एक बार फिर संकल्प प्रस्ताव पारित किया जाना चाहिए और विपक्षी दलों को विश्वास में लेकर यह दिखा देना चाहिए कि दोकलाम के मामले पर पूरा भारत एक है। भारत चीन से सीमा विवाद हल करने के लिए वार्ताएं करने को तैयार है, लेकिन अपनी संप्रभुता की कीमत पर उसके विस्तारवाद को स्वीकार करने को तैयार नहीं है।
      यह नहीं भूलाया जाना चाहिए कि भूटान और सिक्किम के सीमा त्रिकोण पर स्थित दोकलाम के पठार का विवाद 2014 के दौलत बेग ओल्डी और 2013 के चुमार विवाद से अलग है. तब चीन सैनिक स्तर पर वार्ता के लिए तैयार था और उसे जल्दी ही निपटा लिया गया था. लेकिन इस बार चीन ने शर्त रखी है कि वह वार्ता तभी करेगा जब भारतीय सेनाएं दोकलाम से पीछे हटेंगी। यहां भारत को राजनयिक समझौता किए बिना अपनी दृढ़ता दिखानी चाहिए, क्योंकि चीन भारत को नेपाल, श्रीलंका, पकिस्तान, भूटान, बांग्लादेश जैसे सभी देशों में घुस कर चारों तरफ से घेर रहा है और 'वन बेल्ट वन रोड' योजना को इस इलाके की तरक्की का मन्त्र बता रहा है.
      भारत को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यह चीन देंग श्याओपिंग का चीन नहीं है। यह माओ के चीन जैसा आक्रामक चीन है जो उस संकट से निकल चुका है जो सोवियत संघ जैसे कम्युनिस्ट देशों के विघटन और थ्येनआनमन चौक की विद्रोही घटना के बाद पैदा हुआ था। तब चीन के अस्तित्व का संकट था। अब चीन का शासक वर्ग व्यावहारिक विदेशनीति की बजाय भारत की तरह आक्रामक राष्ट्रवाद की नीति पर चल रहा है। लेकिन अंतर यह है कि चीन के राष्ट्रवाद में समाज और धर्म के आधार पर वैसा संकीर्ण विभाजन नहीं है, जैसा संघ परिवार के लोग भारत में पैदा कर रहे हैं। भारत चीन के सामने तभी डटकर खड़ा हो सकता है जब आरएसएस/भाजपा देश के भीतर संकीर्णता आधारित नफरत फैलाने का अभियान बंद करे।
      मामला सिर्फ चीनी सामानों के बायकाट करने का नहीं है। यह पाखंडपूर्ण आर्थिक हथकंडा किसी काम का नहीं है अगर आप सरदार पटेल की मूर्ति चीन से बनवा रहें हैं। अगर बायकाट करना है तो समस्त बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सामानों का बायकाट करना होगा। यह तभी होगा जब उदारीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों का बहिष्कार किया जाये जिसके विरुद्ध हैम्बर्ग में भी जबरदस्त प्रदर्शन हुआ था। तभी इस देश के संसाधन बहुराष्ट्रीय कंपनियों और कार्पोरेट घरानों की लूट से बच सकेंगे। तभी देश के मेहनतकश लोग देश की अखंडता के लिए किसी भी विदेशी ताकत के सामने डट कर खड़े हो सकेंगे।

डॉ. प्रेम सिंह
अध्यक्ष
मोबाइल : 8826275067 

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प्रतिक्रांति के हमसफर

(यह टिप्पणी 2014 की है. हस्तक्षेप पर प्रकाशित हुई थी. 5 साल बाद देश और दिल्ली में अब फिर चुनाव होंगे. टिप्पणी फिर से इसलिए दी जा रही है ...