Thursday, 28 June 2018

विश्वविद्यालय में खोज कार्य



डॉ. राममनोहर लोहिया
           
विश्वविद्यालय के मुख्य आकर्षणों में एक यह विश्वास भी होता है वह ज्ञान और शक्ति का भण्डार होने के अतिरिक्त ऐसी सोद्देश्य जिज्ञासा का केंद्र भी है जो ज्ञान और शक्ति बढाने की ओर ले जाती है | युवा दिमाग इस जिज्ञासा की उपस्थिति से उतना ही आकर्षित होता है जितना खेल-कूद, जवान और स्वस्थ शरीरों की उपस्थिति से | दिमाग और शरीर की इस रसमयता (रोमांस) से, ज्ञान के नए क्षेत्रों के उपयोग और सामान्य स्वास्थय में सुधार से, राष्ट्र को लाभ पहुंचता है | भारतीय विश्वविद्यालयों को दोनों ही दिशाओं में तीव्र गति से प्रयत्न करने होंगे, क्योंकि उन्हें लगभग नए सिरे से काम करना है |
            यहाँ मैं केवल दिमाग की रसमयता की ही बात करूँगा | इस रसमयता को जगाने का करीब-करीब पक्का कारगर उपाय एक यह है कि विश्वविद्यालय के अध्यापक वास्तव में विद्वान हों, जो अपने विषय के सारे उपलब्ध ज्ञान से परिचित हो और अपनी विशिष्ट बुद्धि और ज्ञान से विषय की मोटी-मोटी बातों को प्रकाश में ला सकें | अध्यापक अभी जितनी किताबें और पत्र-पत्रिकाएं पढ़ते हैं, उससे कहीं ज्यादा उन्हें पढना होगा | पढ़ी हुई सामग्री और जीवन पर ज्यादा चिंतन और मनन करना होगा | लेकिन अगर, विश्वव्यापी नहीं तो कम से कम राष्ट्रिय वक्त रखने वाले महत्वपूर्ण खोज-कार्य न हों, खोज की योजनाएं और उनमें लगन से काम करने वाले लोग न हों, तो यह सब बेमजा ही रह जाता है | सबसे अधिक संभव रसमयता तो खोज में और दिमाग की व्यवस्थित जिज्ञासा में है, जो सौंदर्य-शक्ति या ज्ञान के क्षत्रों को उजागर करती है | 
            जितना आकर्षण प्राकृतिक विज्ञानों के खोज-कार्य में है, उतना अधिक आकर्षण और किसी में नहीं होता | इतने तात्कालिक महत्व की और कोई चीज भी तो नहीं है | ऐसा मालूम होता है कि गणित, रसायन, भौतिक-शास्त्र और भूगर्भ-विज्ञान जैसे विषयों में खोज निश्चित रूप से रहस्योद्घाटन करती है | मैं खोज की इन योजनाओं और उनमें लगे हुए वैज्ञानिकों के बारे में कुछ चर्चा करने योग्य तो नहीं हूँ, लेकिन इतना तो कह ही सकता हूँ कि उनके बिना आधुनिक काल का विश्वविद्यालय निष्प्राण प्रतीत होगा | सामाजिक विज्ञानों की निस्बतन कम रसमयता ही इस समय मेरा विषय है | एक अर्थ में, यह कम रसमयता अधिक महत्व की है, क्योंकि इसकी प्रतिध्वनियाँ जन-चेतन की गहराइयों तक जाती हैं और यह आंशिक रूप में वह आधार प्रदान करती हैं, जिस पर प्राकृतिक विज्ञान निर्मित होते हैं |
            सामाजिक विषयों में खोज का वर्गीकरण मुख्य रूप से वर्त्तमान औत अतीत, आधुनिक और प्राचीन में करना चाहिए | फिर आधुनिक का वर्गीकरण मुख्य रूप से वर्णन-विश्लेषण और सिद्धांत-विश्लेषण में होना चाहिए | इतिहास, भूगोल, साहित्य, अर्थशास्त्र और पुराकथाओं जैसे विभिन्न विषयों की सीमा-रेखाओं को मिटाने की न जरुरत है और न ऐसा करना ही चाहिए, लेकिन खोज के उद्देश्य के लिए उन सभी का एक केंद्र में समन्वय करने की जरुरत है, जिसके तीन अंग हों, आधुनिक-वर्णन, आधुनिक-सिद्धांत और प्राचीन |
            अभी तक भारतीय विश्वविद्यालयों में कला-विषयों की खोज ज्यादातर आधुनिक-वर्णन-परक रही है | वहां भी, उसने अपने को संकुचित दायरों और अस्थायी अवधियों में सीमित रखा है | इसका यह अर्थ नहीं कि दामों में उतार-चढाओ या किसी जिले में मजदूरों के रहन-सहन या वर्त्तमान शताब्दी के तीसरे या चौथे दशक में रेलवे वित्त जैसे विषयों पर खोज अनावश्यक है | ऐसी खोज जारी रहनी चाहिए | किन्तु अगर विश्वविद्यालय दिमाग की रसमयता का सच्चा केंद्र बनना चाहें तो विस्तृत क्षेत्रों और व्यापक अवधियों को लेना होगा | 
            मैं एक उदाहरण दूँ | हिन्दुस्तान में जमीन का उपयोग एक ऐसा विषय है | एक ओर तो इसी प्रकार की पंद्रह एक-सी संकुचित किन्तु ज्यादा गहराई में जाने वाली खोजें हो सकती हैं | दूसरी ओर चार या पांच अधिक व्यापक विषय हो सकते हैं | जैसे एशिया या यूरोप में जमीन का उपयोग | विषय को कानून, मिलकियत, पैदावार के साधन, दाम और अन्य ऐसे ही विभिन्न पहलुओं में बांटा जा सकता है और हरेक पर खोज-निबंध प्रस्तुत किया जा सकता है | इसी प्रकार, उदाहरण के लिए, हिन्दुस्तान के विभिन्न साहित्यों में नारी के स्थान पर या अहिंसा और विश्व एकता जैसी नई उभरती हुई परिघटना पर भी खोज की जा सकती है |
            नई उभरती हुई या परिपक्व होने के बाद समाप्त होने वाली परिघटनाओं का विषय व्यापक और अद्भुत है और उसमें बहुत-सी संभावनाएं हैं | रंगीन चमड़ी वाले लोगों की स्वतंत्रता से ऐसे बहुतेरे विषय सामने आए हैं | स्वतंत्रता दिलाने वाली कौमिंतांग, वफ्द और कांग्रेस जैसी संस्थाओं में कुछ एकरूपता मिलती है, और कुछ विभिन्नताएं भी | उनके अध्ययन से न सिर्फ ऐसी ख़ुशी होगी, जो सभी रहस्योद्घाटन में होती है, बल्कि ज्ञान भी मिलेगा |
            हिन्दुस्तान की वर्ण-व्यवस्था अपने रहस्यों का पता तो शायद किसी खोजी को कभी न लगाने दे, लेकिन व्यापार और उद्योग के मौजूदा पेशों में उसका विस्तार, खोज का एक ऐसा क्षेत्र है जिससे लाभ हो सकता है | उदाहरण के लिए, मल्लाह, मछुए, भिश्ती और घरेलु नौकर एक ही व्यापक वर्ण के सदस्य हैं और आर्थिक स्थिति व पेशों के अलावा उनके मौजूदा रीति-रिवाज, रहन-सहन और विचारों की खोज में बहुत सामग्री तो मिलेगी ही, कुछ नई बातें भी मालूम होंगी |
            वर्ण-विश्लेषण को सिद्धांत-विश्लेषण का मार्ग तैयार करना चाहिए, जिसका इस समय भारतीय विश्वविद्यालयों में लगभग पूरा अभाव है | सैद्धांतिक विश्लेषणात्मक खोज के बिना केवल वर्णनात्मक खोज का मूल्य लाजमी तौर से नष्ट हो जाता है और वह प्रतिष्ठा व आमदनी की दृष्टि से घटिया डॉक्टर उपाधिधारियों का नीरस प्रवचन रह जाती है | विशेषतः गैर-यूरोपीय देशों में सैद्धांतिक-विश्लेषणात्मक खोज गहरी होनी चाहिए, क्योंकि इस समय सारी दुनिया में यूरोप में गढ़े हुए वैद्य दिमाग के सैद्धांतिक औजार इस्तेमाल होते हैं | इन औजारों को बारीकी से जांचना चाहिए | विश्वविख्याति वैधता के उनके झूठे दावों की असलियत को सामने लाना होगा और मौलिक विश्लेषण के द्वारा विचार के बेहतर औजारों का निर्माण करना होगा | 'डॉक्टर' की उपाधि के उम्मीदवार से शायद यह आशा करना उचित न होगा कि वह इन औजारों का निर्माण करे क्योंकि आमतौर पर वह युवा होता है, उसमें विस्तृत ज्ञान नहीं होता और न ही असाधारण प्रतिभा | किन्तु उससे यह आशा करना तो उचित ही है कि वह इन औजारों की बारीकी से जांच करे और उनकी उपयोगिता के साथ-साथ उनकी कमियों को भी सामने लाए | ऐसी खोज से संभव है कि विश्वविद्यालय के अन्दर और बाहर भी ऐसे बी=विचार के औजारों की सृष्टि के अनुकूल वातावरण बन सके जिनकी वैधता सार्वभौमिक हो |
            मनुष्य के मौजूदा विचार ऐसी धारणाओं से भरे पड़े हैं जिनकी वैधता केवल आंशिक है | उनमें से कुछ ये हैं : 1. प्रगति, 2. समृद्धि, 3. पूंजीवाद, 4. सामंतवाद, 5. समाजवाद या साम्यवाद | इनमें से हरेक का किताब में, बातचीत में निरंतर इस्तेमाल होता रहता है | प्रचलित विचारों पर यूरोप ऐसा हावी है कि गैरयूरोपीय विश्वविद्यालय के लोगों को इन धारणाओं की गहराई से जांच करने की बात नहीं सुझती | कोल्हू के बैलों की तरह वे बंधें हुए दायरे में यूरोप के औजार लेकर खोज का काम करते जाते हैं और कभी यह नहीं सोचते कि ये औजार नाकाफी हैं और इन्हें फिर से गढ़ने की जरुरत है |
            पूंजीवाद, समाजवाद या साम्यवाद जैसी कल्पनाएँ वास्तव में विचार-श्रेणियां हैं, जो कुछ आर्थिक और सामाजिक व्यवस्थाओं की पहचान कराती हैं | साथ ही साथ, और इससे भी अधिक, ये ऐसी अनुपम ऐतिहासिक परिघटनाएं हैं, जिनका पुनर्जन्म समान परिस्थितियों में ही हो सकता है | साम्यवाद केवल निजी संपति का खात्मा नहीं है | यह काम कहां हो सका है ? चेकोस्लोवाकिया जैसे बड़े पैमाने की पैदावार वाले देश में या वियतनाम के गतिहीन खेती के ढाँचे में ? रूस में जहां आबादी का घनत्व कम है, या चीन में जहाँ आबादी घनी है ? बहुत घनी आबादी वाले हिन्दुस्तान जैसे देशों को छोड़ ही दें | आबादी का घनत्व और मशीनों का प्रकार और परिमाण, ये पहलू ऐसे निर्णायक महत्व के हैं कि इनकी मात्रा कम-ज्यादा होने पर साम्यवाद का चरित्र बिल्कुल ही भिन्न हो जाएगा | इसीलिए पूंजीवाद और साम्यवाद की प्रचलित धारणाओं की समीक्षा करना जरुरी है | बहुत संभव है कि उनका परस्पर विनाशकारी प्रतीत होने वाला युद्ध निकट से जांच करने पर वास्तव में एक ही सभ्यता के दो अंगों की आपसी प्रतिद्वंदिता प्रमाणित हो | तब इतिहास और अर्थशास्त्र को पूंजीवाद और साम्यवाद के यूरोपीय प्रसंग में नहीं समझा जाएगा जो अधिक सार्वभौमिक है |
            इसी प्रकार प्रगति और समृद्धि की धारणाओं की बहुत व्यवस्थित और वैज्ञानिक जांच करने की जरुरत है | यह अंधविश्वास फैलने दिया गया है कि विज्ञान के द्वारा निरंतर प्रगति और समृद्धि बढती रही है या उसके लाभ निकट भविष्य में मिलने ही वाले हैं | अगर भाप या बिजली या पेट्रोल के संबंध में की गई भविष्यवाणी पूरी नहीं हुई, तो मनुष्य के लिए यह मान लेने का कोई कारण नहीं है कि अणुशक्ति के बारे में की जा रही ऐसी ही भविष्यवानियाँ पूरी हो जायेंगी | दो हजार वर्ष पहले या कुछ सदियां पहले भी हिंदुस्तान और रंगीन चमड़ी वाले अधिकांश इलाकों में प्रति व्यक्ति जितना भोजन उपलब्ध था, आज निश्चय ही उससे कम है | लेकिन हिन्दुस्तान और अन्य स्थानों के उच्च-माध्यम वर्ग के रहन-सहन में प्रगति हो रही है, और यही लोग किताबें लिखते हैं | विश्वविद्यालय में जो लोग सत्य के खोजी हैं उन्हें इन धारणाओं की बड़ी मेहनत से और बड़ी पैनी दृष्टि से जांच करनी होगी |                                                                                                                          एडम स्मिथ में यह प्रतिभा थी कि उसने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और श्रम के भौगोलिक विभाजन के बीच समानता स्थापित कर दी | यह मूलतः इंग्लिस्तानी विचार था लेकिन सौ वर्ष से अधिक समय तक सारी दुनिया के दिमाग पर छाया रहा | फिर जे. एम. कीन्स में यह प्रतिभा थी कि 'उसने  'सबको रोजगार मिले' के सिद्धांत को इस विचार में जोड़ा | यह भी मूलतः एक इंग्लिस्तानी विचार था, लेकिन सारी अंग्रेजी बोलने वाली दुनिया पर इस समय यह विचार छाया हुआ है | हिन्दुस्तान में विश्वविद्यालय के लोगों को कम से कम इतनी योग्यता प्राप्त करने की कोशिश तो करनी ही चाहिए कि अन्दर से और बाहर से भी, इन सभी धारणाओं की जांच कर सकें और सारी दुनिया में अपेक्षतया समान उत्पादन-शक्ति के सार्वभौमिक सिद्धांत को खोजने की चेष्टा करें |
            वर्ण-विश्लेषण और सिद्धांत-विश्लेषण के साथ-साथ प्राचीन के भी गहरे अध्ययन की जरुरत है | किसी भी समय दुनिया अपने अतीत का ही फल होती है | हिन्दुस्तान तो मुख्य रूप से अपने अतीत का ही फल है | किसी अन्य देश का वर्त्तमान जीवन अपने अतीत के सिद्धांतों, स्मृतियों और पुराकथाओं से उतना ओत-प्रोत नहीं है, जितना हिन्दुस्तान का | समकालीन बातों से ज्यादा, लोग अतीत की इन बातों को लेकर हँसते-रोते और झगड़ पड़ते हैं, फिर भी कोई सही अध्ययन नहीं होता |
            इतिहास-पूर्व काल में भी दक्षिणमार्गी था | राम उस पर सचमुच चले या यह केवल किंवदंती है ? इसका और प्राचीन भारतीय इतिहास में उसके उत्तराधिकारी का अध्ययन किया जाना चाहिए | इसी प्रकार कृष्ण के पूर्व-पश्चिम मार्ग का अध्ययन भी किया जाना चाहिए | प्राचीन इतिहास-भूगोल, पुराकथाएँ और साहित्य की खोज के नतीजों को एकत्रित करना होगा, ताकि इन विषयों के रहस्य का उद्घाटन हो सके | इसी प्रकार गंगा, नर्मदा या कावेरी की अतीत और वर्त्तमान में प्रचलित कथाओं में बड़ी सामग्री मिलेगी | तुलसीदास की सीता की तरह वाल्मीकि की भी एक सीता थी,और लोकगीतों की सीता का कहना ही क्या |इन सारे युगों की सीता की जीवनी की खोज करना लाभदायक होगा |
            इनमें से कुछ पुराकथाओं के प्रतिक और ख्याल आज भी नित्यप्रति इस्तेमाल होते हैं और ज्ञान की कमी के कारण उनसे बहुतेरे झंझट होने के अलावा अपव्यय भी होता हैं | हिन्दुस्तान की वर्णमालाएं इसका एक उदाहरण हैं | ये सब नागरी वर्णमाला के हेरफेर हैं | उड़िया वर्णमाला, जो पहली बार देखने में नागरी लिपि से असाधारण रूप से भिन्न प्रतीत होती है, वास्तव में उसी सिद्धांत का एक प्रसार-मात्र है जिसकी वजह से बंगला वर्णमाला नागरी से भिन्न हो गई है | उसमें सीधी रेखाओं के स्थान पर वक्र और गोल रेखाओं का अधिकाधिक इस्तेमाल होता है | तमिल वर्णमाला में अक्षरों कि संख्या कम है, लेकिन उनकी ध्वनियाँ नागरी की जैसी ही हैं | अगर इसके इतिहास का अध्ययन करने पर उसमें भी वही बात पाई जाए तो मुझे कोई आश्चर्य नहीं होगा | इसी तरह हिन्दुस्तान की भाषाओं के विस्तृत अंगों और उनकी व्यापक अभिव्यंजना-शक्ति का भी अध्ययन करने की जरुरत है | प्राचीन कला के सारे क्षेत्र में इतनी गुंजाइश है कि डाक्टरेट की हजारों उपाधियाँ प्राप्त की जा सकती हैं |
            जो विश्वविद्यालय वर्णन-विश्लेषण, सिद्धांत-विश्लेषण और प्राचीन विषयों में खोज का सुगठित कार्यक्रम चलाएगा, वह हिन्दुस्तान के लोगों की भलाई का काम करेगा | हिन्दुस्तान का दिमाग, अपने विकास की पूर्ति के लिए ऐसा विश्वविद्यालय खोज निकालेगा | मुझे यह कहने की जरुरत नहीं है कि ऐसी खोज का माध्यम कभी अंग्रेजी नहीं हो सकती | अवश्य ही ऐसी खोज की भाषा हिंदी या हिन्दुस्तान  की कोई अन्य भाषा होगी | पहले मैं सोचता था कि स्नातकीय शिक्षा के ऊपर हिन्दुस्तान के सभी विश्वविद्यालयों में हिंदी में काम होना चाहिए | अपनी इस राय में आंशिक संशोधन करना मेरे लिए जरुरी है | भाषा का वह साधिकार प्रयोग, जिसके बिना प्राचीन विषयों में खोज का कोई अर्थ नहीं होता, और वर्णनात्मक और सैद्धांतिक विषयों में भी कम ही होता है, केवल मातृभाषा के द्वारा ही संभव है | मुझे आशा है है कि कोई दिन ऐसा आएगा जब हिन्दुस्तान के सभी लोगों के लिए हिंदी मातृभाषा के समान होगी | लेकिन तब तक के लिए हिन्दुस्तान के सभी भाषाओं को स्नातकीय शिक्षा के बाद खोज-कार्य के माध्यम के रूप में स्वीकार करना होगा | अन्यथा आजकल खोज करने वाले आमतौर पर अपने माध्यम से अच्छी तरह परिचित न होने के कारण जो मोटी-मोटी नीरस और तत्वहीन किताबें लिखते हैं, उनका सिलसिला जारी रहेगा |  
                                                        

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प्रतिक्रांति के हमसफर

(यह टिप्पणी 2014 की है. हस्तक्षेप पर प्रकाशित हुई थी. 5 साल बाद देश और दिल्ली में अब फिर चुनाव होंगे. टिप्पणी फिर से इसलिए दी जा रही है ...